बचपन कुछ याद है, कुछ भूल गया । कारण
उसके साथ बंगाल का संसर्ग है । पिता बंगाल पुलिस के सिपाही थे । जन्म वहीं अस्पताल में हुआ था इसलिए मजाक में अब भी मेरे बदल जाने की कथा
सुनायी जाती है । बर्दवान के एक थाने की याद है जिसका नाम बीरहट्टा फाड़ी था । यह
भी याद है कि खेल की तरह अन्य सिपाहियों के राइफ़ल की लिबलिबी दबाया करता था । पिता
पुलिस लाइन में रहते थे । उससे सटे पोखरे की भी याद है जिसमें पांव लटकाकर बैठता
था । घर अंग्रेजों के जमाने के बनवाए थे ऊंची छत वाले । उनमें कबूतर उड़ते रहते ।
मां ने एक बार फोड़े पर कबूतर की बीट रख दी तो फोड़ा फूट गया । एक बार पता नहीं कैसे
सफेद चूहा पाला था । उसके शांत हो जाने से हुआ दुख याद है । दांत दुखते थे तो
निकलवाया गया था । तश्तरी में गिरे दांत की भी याद है । बाद में अपने आप गिरने पर
जमीन में दबा देने की हिदायत का पालन करना भी याद है । पोखरे के पार चारदीवारी के
बाहर सिनेमा हाल था जिसका नाम बहन ने रूपसी चित्र मंदिर बताया । उसमें खुदीराम बोस
पर फ़िल्म देखी थी । रुलाई आने पर बीच में बहन घर ले आयी थी । उसका गीत ‘एक बार बिदाइ
दे मां घूरे आशी। हांशी हांशी कोरबो फांशी, देखबे भारतबाशी ।’ गाया करता था । पिता
को वहीं से पिताजी कहना शुरू किया था जो अन्य भाइयों के बाबूजी से अलग संबोधन था ।
बहन और घर के अन्य लोग भी उन्हें पिताजी ही कहा करते थे । एक अद्भुत स्मृति उनके
पेट से जुड़ी हुई है । खिड़की पर बैठा था और पिता चटाई पर लेटे थे । उनके पेट ने ऐसा
आकर्षण पैदा किया कि उस पर कूद पड़ा । उनकी सहज प्रतिक्रिया मेरी नंगी पीठ पर थप्पड़
मारने की थी । तभी माता को सिंहनी की तरह उनसे लड़ते देखा । मैं उनकी आखिरी संतान
था और शरीर से बेहद कमजोर था इसलिए हमेशा ही मेरे लिए किसी से भी टकरा जाती थीं ।
उन्हें चिढ़ाते हुए पिता अक्सर मेरे लिए तोहार ललऊ कहते । मेरा नाम पिता ने
गोपाष्टमी के दिन की पैदाइश के कारण रखा था । बहुत बाद में एक बार आगरा जाते हुए
इस पर्व पर लगे बैनर नजर आये तो ऐसे किसी पर्व के अस्तित्व पर यकीन हुआ अन्यथा इसे
गढ़ी हुई कथा ही मानता रहा था । लम्बी छुट्टी में पिता गाज़ीपुर जिले के सुल्तानपुर
स्थित घर आया करते थे । यह यात्रा रेल से पिता और माता के साथ होती थी । तब रेल की
खिड़की लकड़ी की हुआ करती थी । मेरे हाथ पर गिर गयी और हाथ कुचल गया । उस अवसर पर भी
उन्हें पिता को डांटते हुए सुना था । उनके भीतर यह साहस बंगाल ने रोपा होगा । घर
पहुंचने के बाद बाबा ने उंगलियों पर राख भिगोकर पट्टी बांधी और कुछ दिनों बाद हाथ
दुरुस्त हो गया । गाज़ीपुर का घर किसानी था इसलिए संसाधनों की किल्लत रहती थी ।
पिता अपने साथ लालटेन से लेकर टार्च तक ले आते । सिपाही बनने से पहले भी उन्होंने
खेती की थी और जब घर आते तो फिर खेती के काम में लग जाते । मुझे कभी इससे जुड़े
किसी काम में शरीक नहीं किया इसी वजह से आज भी ऐसे तमाम काम नहीं कर पाता जो कर
सकता अगर सीख लिया होता ।
उधर बंगाल नक्सल आंदोलन की गिरफ़्त
में था । भय का माहौल बना रहता । एक बार दुर्गापूजा के जुलूस में चला गया था तो
लौटने पर माता ने फिर कभी इस तरह बाहर न जाने की हिदायत दी । कारण सिपाही का पुत्र
होना था । एक मंदिर की याद है जिसकी दीवार फट गयी थी । पता चला नक्सल युवकों ने बम
मार दिया था । किन्हीं कारणों से हाजमा हमेशा खराब रहा । एक नाले की सीमेंट की
दीवार पर बहन ने बैठाया तो नीचे फिसल पड़ा । बहन ने हाथ पकड़ लिया । वह भी कुल पांच
साल ही बड़ी थी । उसके हाथ पर जोर पड़ा तो मदद हेतु चिल्लाई । किसी और ने खींचकर ऊपर
निकाला । सिर में फोड़ा फुंसी बहुत होते रहते थे । नहलाते समय उन्हें बहन या भाई
साफ करते । सर्दी में अकड़े सांप की भी याद है जिसे ईंट पत्थर से बच्चों ने कुचल
दिया था । पिता के पुलिस होने के कारण स्कूल नहीं भेजा गया । हिंदी की लिपि और
वर्तनी से पिता माता और बहन ने परिचय कराया और घर पर ही हिंदी की सुबोधनी पढ़ डाली
। तब अन्य से भिन्न दीखने के लिए यज्ञोपवीत भी डालने लगा था क्योंकि पिता पहनते तो
आकर्षक लगता था । घर में पूर्वी उत्तर प्रदेश का संस्कार था इसलिए शाकाहारी भोजन
ही करता । बस एक पदार्थ की भिन्नता याद है । नीम के कोमल पत्तों की भुजिया के साथ
भात बहुत स्वादिष्ट लगता था, आज भी लगता है ।
बाहर के माहौल और पिता के किसानी
संस्कार में टकराव शुरू हो चुका था । अन्य सिपाहियों के पास राइफ़ल होती जबकि पिता
को हमेशा रिवाल्वर लगाए देखा । उत्सुकता में गोली के पीतल को गरम भी करने का
प्रयास करता । वर्दी उनके बदन पर कभी कभार ही नजर आती । उसमें खाकी हाफ़ पैंट की
बहुत कम याद है । इससे लगता है कि वे खुफ़िया पुलिस का काम करते रहे होंगे । धीरे
धीरे उन्होंने नौकरी छोड़ देने का मन बनाना शुरू किया । पूछने पर बाद में बताया कि
जिन युवकों को गोली मारनी होती वे उनके बच्चों की उम्र के थे इसलिए हत्या का पाप
चढ़ता । कुछ नक्सल युवकों को वे जानते रहे होंगे जो पड़ोस में ही रहते रहे होंगे ।
हो सकता है मौत का भय भी रहा हो हालांकि उन्हें कभी भयग्रस्त नहीं देखा । उनकी वह
स्वाभिमानी धज विरासत में हम सभी भाई बहन को मिली । इसकी कीमत
हम सबने चुकायी लेकिन उनकी विरासत को शर्मिंदा नहीं होने दिया । आज भी जब कोई ऊपर
बैठे होने का दम्भी दया दिखाने का सम्मान हासिल करना चाहता है तो वह स्वाभिमान जाग
जाता है और हम सभी अधिकारी से नम्रता के साथ क्षमा मांग लेते हैं । उनकी शक्ति और
दयालुता के किस्से सुने । एक बार कोई खेत से फसल काटकर ले जाने की फिराक में थे ।
पिता घूमते आ गये तो जितना काट सके थे उसे लेकर भागने लगे । पिता ने चोरी के
मुकाबले भागने को अधिक गम्भीर गलती मानकर चेतावनी देते हुए कहा कि भागने की कोशिश
से खतरा हो जाएगा । निशाना सटीक होने का गवाह हूं । दीवार पर रेंगते सांप का मुंह
लाठी के कुंदे से उन्होंने मेरे सामने कुचला था । नौकरी छोड़कर घर चले आये तो मेरा
प्रवेश कराया गया । एक साल बड़े चचेरे भाई के साथ स्कूल गया तो हिंदी की किताब पढ़
दी । इसलिए कक्षा दो में प्रवेश मिला । उस समय के स्कूल बहुत जीवंत हुआ करते थे । खेलकूद
और सांस्कृतिक आयोजन होते । शरीर से दुर्बल होने की वजह से कुछ ऐसे खेलों में
शामिल होता जो दूसरी तरह के होते । उदाहरण के लिए गणित दौड़ नामक खेल पसंदीदा था ।
स्लेट पर कोई गणित का सवाल लिखकर रखा रहता । उसे हल करते हुए दौड़कर सबसे पहले वापस
आने वाला विजयी माना जाता ।
गणित में इसी कारण जो रुचि पैदा हुई
वह अब केवल अमूर्तन के प्रति आकर्षण में बची हुई है । बहरहाल यह घोषित हुआ कि
जिन्हें बीस तक का पहाड़ा या जिसे आजकल टेबल कहा जाता है वह याद हो जाए तो उसे
तीसरी कक्षा में प्रोन्नत कर दिया जाएगा । रट गया और सीधे तीसरी कक्षा में बैठने
लगा । जोड़ घटाना के अलावे कुछ पल्ले ही नहीं पड़ता था । धीरे धीरे गुणा और भाग सीखे
। प्रत्येक शुक्रवार को काव्यपाठ या इसी तरह के कार्यक्रम होते । उन्हें बालसभा
कहा जाता था । इनमें भी खूब भाग लेता । सवर्ण खेतिहर परिवार से होने के कारण
अध्यापकों से डर कम लगता था । इन कार्यक्रमों ने सार्वजनिक रूप से बोलने का भय कुछ
हद तक खत्म किया हालांकि संकोच अब भी कायम है । लिखने की
शुरुआत का समय अभी नहीं आया था ।
बड़े भाई काशी हिंदू विश्वविद्यालय
में हिंदी के विद्यार्थी थे । बहन मिडल स्कूल में पढ़ रही थी । घर के कुछ अन्य युवक
दसवीं या उससे ऊपर की पढ़ाई कर रहे थे । लकड़ी की एक आलमारी थी जिसमें धर्मयुग और
साप्ताहिक हिंदुस्तान रखे थे । एक पट्टीदार प्राइमरी स्कूल के प्रधानाध्यपक थे ।
उनके पास बांटने को किताबें आतीं । उन सबको पढ़ता । मेला लगता तो वहां से भी कहानी
की किताबें ले आता । एक कापी में किताब की कहानी उतार डाली और समझा कि यह मेरे नाम
से छप सकती है । बहन ने समझाया कि यह तो किसी और का लिखा है । समझ ही नहीं आता था
कि फिर क्या लिखूं । दसवीं में स्कूल की पत्रिका के लिए कविता मांगी गयी तो किसी
पत्रिका से उतारकर दे दी । संपादक ने भांप लिया कि नकल की गयी है । बुलाकर नयी
कविता अपने सामने लिखने को कहा । जैसी लिखी उसके कारण उनका संदेह गहरा हो गया । घर
के कुछ बुजुर्ग वहीं से पढ़े थे और उनका लिखा उसमें छपा भी था । इसलिए संपादक छापना
चाहते थे लेकिन मुझे मौलिक लेखन का पता ही नहीं था । हारकर घरेलू छमाही परीक्षा
में किसान समस्या पर लिखा मेरा उत्तर उन्होंने छापा और वही पहला लेखन है जो छपा
।
बंगाल रहते हुए जाति देखी नहीं थी ।
गांव आकर पहली बार उसे समझना पड़ा । फिर भी इस विभाजन में जो स्थानीय हमउम्र पहले
से निष्णात थे उन लोगो के मुकाबले गलती हो जाती । खाने पीने में कभी छुआछूत बरत ही
नहीं सका इसलिए स्थानीय बालकों से कभी बहुत पट नहीं सकी । इसने संधि रेखा पर हमेशा
खड़ा रखा । लेखक और नागरिक, मंचस्थ और श्रोता, अध्यापक और विद्यार्थी, स्थापित और
अस्थिर, समेकित और बहिष्कृत, राजनीति और साहित्य के बीच के सभी द्विभाजनों को पार
करते रहने का लोभ और उसकी सुविधा इस विचित्र बचपन ने जीवन भर के लिए पैदा कर दी
।
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