2025
में वर्सो से जोएल वेनराइट की किताब ‘द एन्ड: मार्क्स, डार्विन, ऐंड द नेचुरल
हिस्ट्री आफ़ द क्लाइमेट क्राइसिस’ का प्रकाशन हुआ । लेखक के मुताबिक इतिहास के कुछ
कोने ऐसे होते हैं जिनमें झांकना आसान नहीं होता । जिस तरह समुद्र के किनारे की
दीवार कभी कभी तूफान बहा ले जाता है वैसे ही जलवायु परिवर्तन ने हमारे बहुतेरे
भ्रमों पर पानी फेर दिया है । हमें भ्रम था कि प्रकृति ऐसा निष्क्रिय रंगमंच है
जिस पर मनुष्य अपना नाटक खेलता है । अब ऐसा सोचना सम्भव नहीं रह गया है । पुरानी
बात ही सही साबित हो रही है कि मनुष्य को प्रकृति से अलगाया नहीं जा सकता । अतीत
की तरह हमारा भविष्य भी प्रकृति के इतिहास से जुड़ा हुआ है ।
उनका
कहना है कि यह किताब धरती के संकट की आसान व्याख्या खोजने वालों के लिए नहीं लिखी
गयी है । न ही इसके समाधान हेतु दस आसान नुस्खे बताये गये हैं । इसमें हमारी
मौजूदा स्थिति के प्राकृतिक इतिहास का सैद्धांतिक रुख अपनाया गया है । सबसे पहले
तो इस तथ्य को मान लेने की जरूरत है कि अन्य सभी जीवों की तरह मानव प्रजाति भी ऐसे
पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरण में विकसित हुई है जो लगातार बदलता रहता है । इस
लिहाज से मनुष्यों द्वारा जलवायु परिवर्तन के साथ अनुकूलन कोई नयी बात नहीं है ।
चार्ल्स डार्विन के शब्दों में अनुकूलन अवरत चलने वाली प्रक्रिया है और समस्त जीवन
में अंतर्निहित है । डार्विन का सबसे बड़ा योगदान यही बताना है कि कोई भी जीवन
स्थिर नहीं होता । वह जटिल ऐतिहासिक बदलावों का विचित्र परिणाम होता है । इसलिए
मनुष्य द्वारा अनुकूलन ही जीवन है । हमारी दुनिया में नयी बात है कि इन बदलावों की
गति तेज है और स्तर बड़ा है । इनको नापने के लिए किसी अनुपात के संदर्भ की जरूरत है
और वही नहीं मिल रहा क्योंकि मानव प्रजाति के प्राकृतिक इतिहास में ऐसा क्षण पहले आया
ही नहीं था ।
मार्क्स
ने पूंजी के पहले खंड की भूमिका में लिखा कि समाज की आर्थिक व्यवस्था का विकास प्राकृतिक इतिहास की
एक प्रक्रिया है । मार्क्स के इस वक्तव्य के विस्तार के रूप में इस किताब को देखना
लेखक को उचित लगता है । मार्क्स की यह बात विचित्र लगती है क्योंकि कोई भी उनकी किताब
को प्राकृतिक इतिहास के बतौर नहीं देखता । लेकिन लेखक ने उनकी बात पर यकीन करना सही
समझा है और पूंजीवाद को धरती के प्राकृतिक इतिहास के भीतर अवस्थित करने का उन्हें श्रेय
दिया है । यह ऐसी वैज्ञानिक खोज है जिसकी जरूरत मनुष्यता को है । इसलिए मार्क्सवादी
प्राकृतिक इतिहास को लेखक ने तीन चरणों में व्याख्यायित किया है । सबसे पहले उन्होंने
बताया कि मार्क्स और डार्विन के जरिए यह नजरिया कैसे पैदा हुआ है । इसके बाद वे बताते
हैं कि पूंजी में उसका किस तरह उपयोग किया गया है । इसके बाद मनुष्यता के सामने उपस्थित
वर्तमान सवालों को समझने के लिए वे इसे काम में लाते हैं । इन सवालों के तहत पूंजीवादी
समाज का उद्भव, मार्क्सवादी प्रकृति ऐतिहासिक नजरिए का इतिहास दर्शन, मानव प्रकृति
और मनुष्य की चेतना की समझ पर प्रभाव तथा धरती के संकट के समाधान की राजनीति आदि उन्हें
जरूरी लगते हैं ।
लेखक का कहना यह भी है कि इस तरह से मार्क्स को देखने के
मामले में वे अकेले नहीं हैं । यह समय मार्क्सवादी पारिस्थितिकी चिंतन के उभार का है
। पाल बुर्केट, जान बेलामी फ़ास्टर और कोहेइ सैतो ने इस दिशा में महत्वपूर्ण लेखन किया
है । इस लेखन से लेखक ने काफी कुछ सीखा है और अपनी इस किताब को उनका विकास मानते हैं
। उनका यह भी कहना है कि प्राकृतिक इतिहास के भीतर इस मार्क्सवादी पारिस्थितिकी को
यथोचित जगह नहीं दी गयी है । मार्क्स के इस योगदान की आलोचना का उत्तर भी प्रभावी तरीके
से देना जरूरी है । इसके लिए उन्हें मार्क्स की दिखायी दिशा में आगे बढ़ते हुए मानव
समाज के आर्थिक रूपों के अध्ययन में डार्विन के विकास सिद्धांत का निवेश करना चाहिए
। इसकी शुरुआत पूंजीवाद से की जा सकती है । इस तरह मार्क्सवादी पारिस्थितिकी मनुष्य
अथवा पूंजी के अध्ययन की जगह विकासमान समाजार्थिक संरचनाओं के विश्लेषण का औजार बन
जाएगी ।
किताब का मकसद पाठकों को धरती के संकट के बारे में
प्राकृतिक ऐतिहासिक नजरिए से विचार करना है । धरती के संकट से लेखक का तात्पर्य
तापवृद्धि, प्रजातियों का लोप, आर्थिक विषमता तथा विश्वयुद्ध का खतरा है । इस संकट
के स्रोत पूंजीवादी समाज में हैं तो मार्क्स की सोच क्या कहती है । इस समय
पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन की जो हालत है उसकी तुलना इतिहास के किसी भी अन्य
अवसर से नहीं की जा सकती । उदारवाद की बरबादी के भीतर से आगे जाने का कोई रास्ता
नहीं मिल रहा । जीवाश्म पूंजी के प्रवक्ता प्रतिक्रियावादी तानाशाही की दिशा में
चले जा रहे हैं । इसके विरोधी वर्तमान जीवन पद्धति पर रोक लगाने की अपील करते रहते
हैं । जो लोग दोनों में किसी ओर नहीं हैं उनको यकीन है कि मानवता इस समस्या से
बाहर निकल आएगी । सभी कहीं फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं । अनेक वामपंथी लोग थकान और
निराशा की शिकायत करते पाये जा रहे हैं । प्रकृति वैज्ञानिक मानव सभ्यता के लोप की घड़ी को नजदीक आता देख रहे हैं । लेखक के
अनुसार प्राकृतिक इतिहास के बिना इस हालत को समझना मुश्किल है । यह भी समझना होगा
कि मानवता को पूंजीवाद और जलवायु परिवर्तन किस तरह इतिहास से इस मोड़ तक ले आये हैं
। इस मौके पर मार्क्स और डार्विन को फिर से पलटकर देखना लाभकर होगा ।
उन्होंने तापवृद्धि से अपनी बात शुरू की है । मानव
प्रजाति के विकास और धरती की प्रभुत्वशाली प्रजाति बनने के क्रम में जलवायु
परिवर्तन बहुत अधिक हुआ । इसका मतलब कि जलवायु की राजनीति धरती के प्राकृतिक
इतिहास का अभिन्न तत्व है । अपने आपको प्राकृतिक इतिहास के भीतर रखकर देखने से
मनोवैज्ञानिक समस्याओं का भी सामना करने में मदद मिलती है । इससे हमें अपने बारे
में वर्तमान सामाजिक प्राकृतिक माहौल में रह रहे मनुष्य की समझ पर मजबूत पकड़ बनाने
का मौका मिलता है । इस हालत का सामना करने के लिए हमें ऐसे बल की सहायता चाहिए
जिससे हमारा साबका अब तक नहीं पड़ा है । इस काम में मार्क्स हमारे लिए काम के चिंतक
साबित होते हैं । अपने शुरुआती लेखन में उन्होंने मानवता के प्राकृतिक इतिहास की
बात की लेकिन उनके तर्क बेहद अमूर्त रहे । वे हेगेल की आलोचना में इस अमूर्तता से
बाहर नहीं आ सके थे । 1860 में जब उन्होंने डार्विन की किताब पढ़ी तो चीजें बदल
गयीं । उन्हें अपने रुख के लिए डार्विन बेहद मददगार प्रतीत हुए और अगले कुछेक
सालों में ही उन्होंने पूंजीवाद के प्राकृतिक इतिहास की मजबूत धारणा विकसित कर ली
। मार्क्सवादी लोग डार्विन के प्रति कर्ज की बात तो करते हैं लेकिन इस पहलू को
जितना जरूरी था उतना नहीं उभारा गया । डार्विनवादी मार्क्सवाद को मार्क्सवाद
लेनिनवाद के नीचे दबा दिया गया । मार्क्स ने उनकी भी आलोचना की है जिन चिंतकों से
उन्होंने सीखा । सही है कि उन्होंने डार्विन की पद्धति की आलोचना की लेकिन उनकी
किताब को युगांतरकारी कहा ।
लेखक ने स्पष्ट किया है कि डार्विन की पढ़ाई ने प्राकृतिक
इतिहास और पूंजीवाद की मार्क्स की समझ को प्रभावित किया । उनके विश्लेषण से हम
जलवायु परिवर्तन को राजनीतिक समस्या के बतौर पहचान सकते हैं । इसके लिए कुछ
बुनियादी सवाल लेखक ने उठाये हैं । इनमें सबसे पहला सवाल प्रकृति से मानव समाज की
भिन्नता की समझ का है । उनके रिश्तों को आकार देने में किन खास ऐतिहासिक घटनाओं या
प्रक्रियाओं का योगदान रहा है । धरती के प्राकृतिक इतिहास में इस समय हम कहां खड़े
हैं । देखना यह भी है कि जलवायु परिवर्तन के राजनीतिक अर्थशास्त्र की समझ में
मार्क्स के प्राकृतिक ऐतिहासिक रुख से क्या मदद मिल सकती है और इस समय के संकट को
देखते हुए व्यवस्था परिवर्तन की सम्भावना उससे किस हद तक पैदा हो सकती है ।
पारिस्थितिकीय मार्क्सवाद के विकास के लिए इन सवालों के जवाब लेखक को बेहद जरूरी
लगते हैं । इस प्रसंग में लेखक ने ग्राम्शी को याद किया है जिनका मानना था कि
अंतिम समाधान सम्भव नहीं क्योंकि मार्क्सवादी विश्लेषण के तहत पूर्वप्रदत्त
कोटियों के आधार पर घटनाओं का इतिहासीकरण नहीं होता बल्कि उन कोटियों का भी
इतिहासीकरण किया जाता है । इसलिए इसे निरंतर बदलती हुई दुनिया में लागू करना होता
है और इसमें लगातार संघर्ष होते रहते हैं । यह अंतर्दृष्टि डार्विन की थी ।
बहुत दिन नहीं बीते जब प्राकृतिक इतिहास नामक अनुशासन के
भीतर भूगर्भ विज्ञान, जीव विज्ञान, भूगोल, मानवशास्त्र, इतिहास आदि शामिल थे । अब
ये सभी अलग अनुशासन हैं । उनके इस विभाजन से पहले प्राकृतिक इतिहास के भीतर
प्रकृति का इतिहास और इतिहास में प्रकृति की भूमिका पर विचार किया जाता था । अब इस
अनुशासन के घटक तत्वों का पुनर्वितरण हुआ है । इसके अवशेष आज भी प्राकृतिक इतिहास
के संग्रहालयों में देखे जा सकते हैं । उनमें डायनासोर की हड्डी, खनिज पदार्थ और आरम्भिक
मानवाभ प्राणियों के रेखाचित्र एक ही जगह रखे मिल जाते हैं ।
डार्विन से पहले प्राकृतिक इतिहास का बुनियादी सवाल सृष्टि
में मनुष्य की जगह के बारे में हुआ करता था । प्रबोधन के अधिकांश चिंतकों ने
यूनानी चिंतकों की तर्ज पर मनुष्यों को अन्य प्राणियों से अलगाया । प्राकृतिक
इतिहास ने मनुष्य की प्रकृति के बारे में भी सोचने की जगह बनायी । मनुष्यों के
आपसी संबंधों की तरह ही धरती के साथ उसके संबंधों के बारे में सोचा जाने लगा ।
इसके ही साथ धरती के इतिहास और भिन्न भिन्न माहौल में मनुष्य के रहने के तरीकों के
बारे में भी सोचा जाने लगा । लेखक ने साफ कहा कि उसका उद्देश्य प्राकृतिक इतिहास
नामक अनुशासन की रक्षा करना नहीं है न ही वे अनुशासनों के बीच की सीमारेखा फिर से
खींचना चाहते हैं । उनका मकसद तो प्राकृतिक ऐतिहासिक चिंतन की परम्परा को खोजना है
ताकि धरती के वर्तमान संकट की बेहतर समझ हासिल की जा सके ।
इसे साधारण तरीके से कह सकते हैं कि प्राकृतिक इतिहास के
मुताबिक इतिहास में प्रकृति और प्रकृति में इतिहास समाये हुए हैं । इन दोनों में
किसी एक का अर्थ दूसरे के बिना स्पष्ट नहीं हो सकता । इसका मतलब
यह हुआ कि सभी संरचनाओं के भीतर हमेशा बदलाव की सम्भावना बनी रहती है । इसी कारण लेखक
ने मार्क्सवाद को समूचे इतिहास में मनुष्यों के आपसी तथा प्रकृति के साथ रिश्तों में
बदलाव का विवेचन मानते हैं ।
उनका यह भी कहना है कि धरती के संकट के वर्तमान अवसर पर मार्क्स
को प्राकृतिक इतिहासकार मानने से कुछ निराशाजनक भी निष्कर्ष सामने आ सकते हैं लेकिन
इससे मुक्ति की सारी आशा का अंत नहीं हो जाता । अगर ऐसा होता तो मार्क्स ने किताब ही
नहीं लिखी होती । लेखक का सरोकार धरती का संकट तो है लेकिन मानवता के प्रति वे आशावान
भी हैं । उन्हें पूरी उम्मीद है कि वर्तमान समाज की जकड़बंदी से मानवता खुद को मुक्त
कर सकेगी ।
प्रतिक्रियावादी और रूढ़िवादी चिंतक मार्क्स और डार्विन की
आलोचना करते हैं क्योंकि उन्होंने धार्मिक विश्वासों को गहरा धक्का दिया । उदारवादी
चिंतकों की स्थिति थोड़ी जटिल है । वे राजनीतिक आधार पर डार्विन की प्रशंसा करते हैं
और मार्क्स को खारिज करते हैं । इसके लिए वे लोग दोनों की गलत तस्वीर बनाते हैं । डार्विन
के बारे में वे योग्यतम के जीवित रहने के उनके सिद्धांत को सामाजिक विषमता की सहमति
में बदल देते हैं और मार्क्स को आर्थिक निर्धारणवादी तथा राज्य दमन के समर्थक के बतौर
पेश करते हैं । इसके विपरीत लेखक का मानना है कि डार्विन ने प्राणी जगत का इतिहासीकरण
किया तो मार्क्स ने विभिन्न समाजार्थिक ढांचों का यही इतिहासीकरण किया । उदारवादी लोग
इन दोनों के बीच की समानता पर परदा डालते हैं और इस तरह हमारी दुनिया की व्याख्या के
आलोचनात्मक विश्लेषण के लिए कारगर औजार का अवमूल्यन करते हैं ।
एक और भी कारण से वामपंथी लोग डार्विन की बात नहीं करते
। उनके कुछ विचारों को नस्ल और लिंग के मामले में रूढ़िवादी सोच के साथ जोड़ दिया
गया है । इस मामले में किसी भी गलतफहमी से बचने के लिए लेखक ने नस्लवाद, लिंगवाद
और जैविक सार की धारणा का विरोध किया है । लेकिन उनका कहना है कि डार्विन के विरोध
से इन सबके विरोध को कोई खास धार नहीं मिल जाती । नस्लवाद, लिंगवाद आदि के आधार पर
विभाजित पूंजीवादी दुनिया का मुकाबला करने के लिए मानव विकास का वैज्ञानिक
परिप्रेक्ष्य बेहद आवश्यक है । इस प्रसंग में लेखक ने याद दिलाया है कि अधिकांश
लोग बुनियादी वैज्ञानिक शिक्षा से वंचित रहे हैं और डार्विन के विकासवाद का तो
विरोध भी होता रहा है । जहां मार्क्स और वामपंथ ने डार्विन के सिद्धांत को अपनाया
वहीं दक्षिणपंथ ने ही इसका विरोध किया है । डार्विन के सिद्धांत में प्राकृतिक
इतिहास की मानवीय धारणा के क्रांतिकारी निहितार्थ थे । दुर्भाग्य से उन
निहितार्थों को अब तक सही तरीके से खोला नहीं गया है ।