Thursday, April 26, 2018

भगत सिंह जिंदा है


                  
शहीद भगत सिंह के बारे में राजेश कुमार लिखित नाटक पगड़ी संभाल जट्टाका प्रकाशन आज के माहौल में खास घटना है पहले अगर उन्हें भावुक क्रांतिकारी बताकर उनके विचारों पर परदा डाला जाता था तो आज उन्हें भगवा रंग में रंगने की व्यवस्थित कोशिश चल रही है यही माहौल राजेश कुमार के इस नाटक को महत्वपूर्ण बना देता है देश की सरकार ने देशभक्ति के नाम पर देश के अधिकांश लोगों को कठघरे में खड़ा कर रखा है ऐसे में स्वाधीनता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारियों की देशभक्ति की समझ को उभारना जरूरी काम बन जाता है  
यह नाटक पहलेअंतिम युद्धके नाम से लिखा गया था इसी नाम से अभिनीत हुआ और सुधीर विद्यार्थी के संपादन में निकलने वालीसंदर्शनामक पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ था कहने की जरूरत नहीं कि स्वतंत्र भारत की सत्ता को प्रिय होने के बावजूद भारत के स्वाधीनता संग्राम का यह सेनानी शायद सबसे प्रसिद्ध नायक है शुरू में उनकी छवि बलिदानी मासूम नौजवान की बनी या सचेत रूप से बनाई गई जैसे जैसे समय बीतता गया वे स्वाधीनता आंदोलन में कांग्रेसी समझौतावादी कार्यनीति के विरोध में जारी क्रांतिकारी धारा के प्रतीक के बतौर उभरते गए इस दौरान उनके राजनीतिक व्यवहार पर अधिक ध्यान दिया गया बहुत बाद में उनकी समझदारी के प्रमाण के रूप में उनके लेखन के गम्भीर विश्लेषण के प्रयास शुरू हुए इससे केवल उनके लेखन में मौजूद गहन समाजवादी तत्व उजागर हुए बल्कि स्वाधीनता संग्राम की क्रांतिकारी धारा को नई जमीन देने में उनके योगदान को भी पहचाना और सराहा जाने लगा हम सभी जानते हैं कि शुरुआत के क्रांतिकारियों के चिंतन और आचरण में धार्मिक पहलू मुखर थे भगत सिंह ने उसमें आधुनिक समाजवादी रंग भरा  
इन सबके चलते सिनेमा और तस्वीरों के लिए वे सबसे पसंदीदा चरित्र के रूप में उभरे बहुत दिनों तक संसद में उनकी तस्वीर लगाने के लिए अभियान चला जिसके चलते लगी भी जब नहीं लगी थी तब भी देश भर में ट्रक चालकों के लिए उनकी तस्वीर कठिन जीवन के सम्मान का प्रतीक थी उनकी विरासत के राजनीतिक अधिग्रहण के भी प्रयास हुए लेकिन तमाम तरह के शासकों के लिए उन्हें पचाना मुश्किल साबित हुआ भगत सिंह के लेखन के संग्रह-संपादन और उसके प्रकाशन के लिए चमनलाल ने अकेले अनथक परिश्रम किया इसके कारण भगत सिंह का लिखा सब कुछ हिंदी में केवल उपलब्ध हुआ बल्कि व्यापक रूप से पढ़ा भी गया बिपन चंद्र ने भूमिका लिखकर उनके लेख नेशनल बुक ट्रस्ट से अंग्रेजी में प्रकाशित करवाए भगत सिंह के वैचारिक पक्ष के इसी उद्घाटन के परिप्रेक्ष्य में राजेश कुमार के वर्तमान नाटक को देखना चाहिए
उन पर चले मुकदमे का दस्तावेजी विश्लेषण करते हुए जी नूरानी ने ट्रायल आफ़ भगत सिंहनामक अद्भुत किताब लिखी जी नूरानी की इस किताब को पढ़ते हुए कुल चौबीस साल के उस युवा की हिम्मत और समझ का पता चलता है जिन लोगों की गिरफ़्तारी को अंग्रेजी सरकार डकैतों की गिरफ़्तारी बताने में एक हद तक कामयाब हो गई थी उन लोगों ने कुछ ही दिनों बाद ऐसा माहौल बना दिया कि स्वाधीनता आंदोलन के लगभग सभी नेताओं को उनके लिए सोचना पड़ा पूरे मुकदमे में कभी उन्हें जेल से बाहर नहीं लाया गया जेल के भीतर से ही मुकदमे को उन्होंने मंच की तरह इस्तेमाल किया जजों में एक हिंदुस्तानी थे पहली ही सुनवाई में वरिष्ठ जज ने भारतीयों के विरोध में कोई टिप्पणी की भगत सिंह ने हिंदुस्तानी जज महोदय से उनकी राय पूछी नतीजतन पहली सुनवाई के बाद उनके जजों में केवल गोरे अंग्रेज रहे इसके चलते इस मुकदमे का नस्ली पहलू भी उजागर हुआ अंग्रेजी शासन का यही पहलू साइमन कमीशन के गठन में भी दिखाई पड़ता है जिसके सारे सदस्य गोरे अंग्रेज थे और इसके विरोध में लाहौर में प्रदर्शन इतना विशाल था कि एक रिपोर्ट के मुताबिक उस दिन मानो पूरा लाहौर नंगे सिर था      
भगत सिंह को दो नारे सबसे अधिक प्रिय थे- ‘साम्राज्यवाद का नाश होऔरइंकलाब जिंदाबाद दूसरे वाले नारे यानी इंकलाब जिंदाबाद के शीर्षक से गुरशरण सिंह ने भगत सिंह के बारे में एक बेहद मशहूर नाटक लिखा था पहले वाले नारे यानी साम्राज्यवाद का नाश हो के बारे में थोड़ी बातचीत जरूरी है कहना मुश्किल है कि हमारे देश पर अंग्रेजों के शासन को उस समय के कितने लोग साम्राज्यवाद समझते थे लेकिन उनकी संख्या निश्चित ही बहुत कम रही होगी इसका एक कारण यह भी था कि यह शब्दावली मार्क्स के अनुयायियों में लोकप्रिय हुई और मार्क्स का प्रभाव हमारे देश के स्वाधीनता आंदोलन पर कुछ देर से पड़ा हालांकि खुद मार्क्स ने भारत के स्वाधीनता के सवाल में उत्कट रुचि ली और 1857 के विद्रोह के बारे में लगातार लेख लिखे प्रथम विश्व युद्ध के दौरान विभिन्न पश्चिमी ताकतों ने एक दूसरे के सैनिकों का खून बहाया उसके बाद साम्राज्यवाद के प्रति दुनिया भर में हिकारत फैली इसका नेतृत्व रूसी समाजवादी क्रांति के नायक लेनिन ने किया जिनकी जीवनी भगत सिंह फांसी लगाए जाने से पहले पढ़ रहे थे लेनिन ने मजदूरों के क्रांतिकारी आंदोलन और उपनिवेशों के मुक्ति संघर्षों की एकता की वकालत की और साम्राज्यवाद को शिकस्त देने के लिए इस रणनीति को सबसे कारगर माना इसके कारण उपनिवेशों के मुक्ति संघर्षों में मार्क्सवाद के लिए उत्सुकता का जन्म हुआ इस उत्सुकता से उत्पन्न संवाद की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि भगत सिंह थे
असल में हमारे देश के स्वाधीनता संग्राम में 1920 का असहयोग आंदोलन जनता की भागेदारी के लिहाज से सबसे बड़ी गोलबंदी था उस आंदोलन को गांधी जी ने जिस तरह अचानक वापस लिया उससे कांग्रेस के लोग भी संतुष्ट नहीं थे व्यापक जन समुदाय को ठगे जाने का अनुभव हुआ और लड़ने के लिए तैयार उस जनता की कुंठा सांप्रदायिक झगड़ों के रूप में फूट पड़ी उसके बाद राजनीतिक स्तर पर कांग्रेस से स्वतंत्र होकर अनेक राजनीतिक नेताओं और धाराओं का जन्म हुआ और उन्हें जनता में खूब लोकप्रियता भी मिली इनमें लोहिया के वैचारिक नेतृत्व में उत्पन्न समाजवादियों की धारा और बाबा साहब के वैचारिक नेतृत्व में उपजी धाराओं की गिनती मुख्य रूप से होती है इनके साथ ही सशस्त्र क्रांतिकारियों की धारा का भी जिक्र जरूरी है क्योंकि भगत सिंह का रिश्ता इसी धारा से था भगत सिंह का स्वाधीनता आंदोलन की मुख्य धारा के साथ रिश्ता जटिल किस्म का था उन्होंने अपनी वैचारिक यात्रा की शुरुआत पंजाब के प्रमुख कांग्रेसी नेता लाला लाजपत राय की आलोचना से की थी लेकिन उनको फांसी हुई लाजपत राय पर लाठी बरसाकर उनकी जान लेने के दोषी सांडर्स की जान लेने के आरोप में नाटक में भगत सिंह के वैचारिक उभार का आरम्भ साइमन कमीशन के विरोध में आयोजित उसी जुलूस से होता है जिसमें लाला जी को लाठी पड़ी थी स्पष्ट है कि वे लाजपत राय की राजनीति के विरोध में थे इस राजनीति में समझौता परस्ती और हिंदू संप्रदायवाद के साथ हेल मेल की प्रवृत्ति थी
इस सवाल पर थोड़ा ठहरकर विचार करने की जरूरत है औपनिवेशिक समय देश में सांप्रदायिक गोलबंदी के लिए भी मशहूर है यहां तक कि उसी समय हमारे देश में इटली में उत्पन्न फ़ासीवाद से प्रभावित धारा का भी उदय हुआ था जो हिंदू सांप्रदायिकता को उभारकर स्वाधीनता आंदोलन को कमजोर कर रही थी इस धारा में हिंदू समाज में व्याप्त जातिवाद के प्रति भी लगाव देखा जाता था अनायास नहीं कि भगत सिंह सांप्रदायिकता के साथ ही जाति प्रथा के भी कट्टर विरोधी थे असल में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद बनने वाले भारत के सिलसिले में यही बुनियादी लड़ाई थी एक नजरिया आगामी भारत को अतीत के पुनरुत्थान के बतौर कल्पित कर रहा था उसके विरोध में भगत सिंह आगामी भारत को मेहनतकशों की आजादी और बराबरी पर आधारित देखना चाहते थे कांग्रेस से उनका विरोध इसी विंदु पर था कि वह इस मामले में सुसंगत रुख नहीं अपनाती है जिन कानूनों के विरोध में उन्होंने बम फेंके थे उनमें से एक मजदूरों के अधिकारों को समाप्त करने के उद्देश्य से लाया जा रहा था दूसरा ऐसा कानून था जो नागरिक सुरक्षा के नाम पर आम लोकतांत्रिक अधिकारों पर बंदिश लगाने वाला था विरोध के लिए इनका चुनाव ही भगत सिंह की वैचारिक प्रतिबद्धता को जाहिर करने के लिए काफी है दक्षिण भारत में पेरियार ने यदि भगत सिंह की सजा के विरोध में कलम उठाई तो उसका कारण यही था कि वे भगत सिंह के आंदोलन में निहित सामाजिक बदलाव की ऊर्जा को पहचान रहे थे प्रचंड उपनिवेशवाद विरोध के साथ ही सामाजिक बदलाव का यही एजेंडा उन्हें साम्राज्यवाद के साथ सामंतवाद के भी विरोध का लड़ाकू सिपाही बना देता है इसी एजेंडे ने स्वाधीनता आंदोलन के भीतर मजबूत वाम अंतर्वस्तु को जन्म दिया था जिसे मटियामेट करने की जल्दबाजी सत्ता पर काबिज लोगों को बनी रही इस काम में वे भगत सिंह की तस्वीर का भी इस्तेमाल करते रहते हैं राजेश कुमार का प्रस्तुत नाटक असल में भगत सिंह के इसी किस्म के दोहन के विरोध में उनके वैचारिक लेखन को उसके सही परिप्रेक्ष्य में रखने की कोशिश करता है इस नाटक की प्रासंगिकता वर्तमान समय में बहुत बढ़ गई है क्योंकि देश के फिर से उपनिवेशीकरण के साथ साथ मेहनतकश जनता के अधिकारों का दमन और जाति आधारित ऊँच नीच की वापसी तथा धार्मिक आधार पर लोगों को बाँटने की कोशिश भी अपने चरम पर है स्वाधीनता आंदोलन की ऊर्जा का यह क्षरण एक दिन में नहीं हुआ बल्कि आहिस्ता आहिस्ता उसे कुंद और नष्ट किया गया            
आजादी के बाद सत्ता कांग्रेस के नेतृत्व में चलनेवाली धारा को मिली लोहिया के नेतृत्व वाली धारा को भी समय समय पर केंद्र या विभिन्न प्रांतों में सत्ता प्राप्त होती रही बाबा साहब के नेतृत्व में स्थापित धारा के वारिस भी देर से ही सही उत्तर प्रदेश में शासन में रहे आजादी के बाद बनी व्यवस्था के लिए भगत सिंह वाली धारा को समायोजित करना संभव नहीं हुआ असल में जो व्यवस्था कायम हुई उसमें संसद के भीतर विपक्ष को भी समाहित कर लिया गया और प्रतीकात्मक तौर पर भी कहें तो भगत सिंह संसद में बम फेंकने के लिए जाने जाते हैं आश्चर्य नहीं कि राजेश कुमार का यह नाटक संसद में बम फेंकने के उसी साहसिक कृत्य की पुनर्रचना के साथ शुरू होता है केवल भगत सिंह के इस साहसिक कृत्य बल्कि उसके साथ जुड़े नारों और बयानों को एक पात्र आज दोहराता है इस दृश्य से राजेश कुमार भगत सिंह के कार्यभार की निरंतरता पर जोर देना चाहते हैं वह पात्र शहीदों के सपनों को पूरा करना चाहता है यहीं से राजेश कुमार आज के सपनों और स्वाधीनता आंदोलन के सपनों की बहस शुरू करते हैं इस बहस के बीच में शैलेंद्र का वह मशहूर गीत बजता है जो आजादी के बाद के शासन के भगत सिंह विरोधी चरित्र पर प्रकाश डालता है
आजादी के बाद भी तत्कालीन सत्ता को समाज में संपूर्ण वैचारिक राजनीतिक वर्चस्व तुरंत प्राप्त नहीं हुआ स्वाधीनता आंदोलन के दौरान वामपंथ की मजबूत उपस्थिति और स्वाधीनता आंदोलन का वाम अंतर्य लंबे दिनों तक कायम रहा तेलंगाना आंदोलन तो आजादी से पहले ही शुरू हो चुका था आजादी मिलने के चार साल बाद विद्रोहियों ने अपने हथियार सौंपे इसी तरह नाविक विद्रोह भी हुआ था जिसके समर्थन में बंबई के मजदूरों ने आम हड़ताल की सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के विद्रोहियों पर मुकदमा चला और उसके विरोध में बड़ी भारी गोलबंदी हुई थी इस गोलबंदी में भी वामपंथी कतारों की भूमिका महत्वपूर्ण थी फिर भी धीरे धीरे नवस्थापित सत्ता की पकड़ समाज पर बढ़ती गई और संसद के चुनाव तक ही लोकतंत्र सीमित रह गया वास्तविक जीवन में धारा 144 से शुरू होकर धारा 120 तक समाज में स्वतंत्रता को सीमित करने की प्रक्रिया चलती रही फिलहाल तो केवल भारत में बल्कि समूची दुनिया में ही चुनाव आधारित लोकतंत्र के ही सारहीन होने की सच्चाई पर चिंता जाहिर की जा रही है रूसी क्रांति के शताब्दी वर्ष में इस बात को याद करना जरूरी है कि उसके नेता लेनिन का मानना था कि संसद केवल मुखौटा भर होती है, वास्तविक शक्ति सेना और कार्यपालिका के पास होती है आश्चर्य नहीं कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के मुकाबले सेना की प्रतिष्ठा का अभियान संचालित किया जा रहा है । लोकतंत्र को दूसरा खतरा धनतंत्र से होता है ।
आधुनिक लोकतंत्र की धारणा का विकास ही एक ओर सामंती दबदबे से राजनीति को स्वतंत्र रखने के लिए हुआ था तो दूसरी ओर सार्वभौमिक बालिग मताधिकार का संघर्ष संपत्ति आधारित सीमित मताधिकार के विरोध में हुआ था । इसीलिए लोकतंत्र की सेहत इन दोनों के विरोध से तय होती है । धर्म और जाति का उभार जहां लोकतांत्रिक सबलीकरण के लिए घातक है वहीं निजीकरण के जरिए धनतंत्र के उभार से भी वह सारहीन होता जाता है । इन सबके चलते सत्ता के वैकल्पिक केंद्रों का उभार होता है जो धीरे धीरे असली केंद्र बन जाते हैं । भगत सिंह ने श्रमिकों को अधिकार संपन्न बनाने की जो लड़ाई शुरू की थी वह आज और भी गहन तथा कठिन चुनौती का सामना कर रही है ।          
भगत सिंह ने औपनिवेशिक शासन द्वारा भारत की जनता को शक्तिहीन बनाने की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए बताया कि 1857 के बाद आर्म्स ऐक्ट के जरिए इसकी शुरुआत की गई थी आंबेडकर ने दलित समुदाय के प्रसंग में शक्तिहीन बनाए जाने की इस प्रक्रिया को वर्ण व्यवस्था से जोड़ा और कहा कि वर्ण व्यवस्था ने दलित समुदाय को ज्ञान और हथियार दोनों से वंचित कर दिया इन दोनों ही महान विचारकों ने अधिकारविहीनता की प्रक्रिया को जिस तरह समझा उससे साफ है कि वे लोकतंत्र को केवल मताधिकार में सीमित नहीं देखते थे, बल्कि वंचित समुदाय की प्रत्यक्ष भौतिक सबलता में स्थित समझते थे इसकी बात कौन करे अब तो भोजन, वस्त्र और विचार तक की आजादी पर पाबंदी कानूनी तौर पर भी है राजेश कुमार ने नाटक लिखा है और हम सभी जानते हैं कि नाटक करने के लिए पुलिस की अनुमति आवश्यक होती है व्यापक तौर पर कहें तो राजेश कुमार का यह नाटक पाबंदी के विरोध में स्वतंत्रता, सामाजिक विषमता के विरोध में बराबरी और उपनिवेशीकरण की वर्तमान मुहिम के विरोध में वास्तविक लोकतंत्र की प्राप्ति हेतु बहुत पुरानी पुकार की मजबूत अनुगूँज है
                                                                                        

2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, जज साहब के बुरे हाल “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. अच्छा और जानकारीप्रद आलेख

    आज हमारे देश को ऐसे ही क्रांतिकारी विचार कि जरूरत है.
    सच है कि बदलाव बलिदान मांगता है.


    स्वागत है गम कहाँ जाने वाले थे रायगाँ मेरे (ग़जल 3)

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