Thursday, October 1, 2015

समकालीन हिन्दी कविता और स्त्री: विचार हेतु कुछ मुद्दे


समकालीन हिन्दी कविता के साथ स्त्री के संबंध पर बात शुरू करने से पहले इस बात पर स्पष्ट हो लेना जरूरी है कि आज की स्त्री किस तरह समस्याओं का सामना करते हुए अपने वजूद का अहसास करा रही है । क्योंकि उसके इस रोजमर्रा के संघर्ष से ही वे विषय पैदा हो रहे हैं जिन्हें कविताओं में बरता जा रहा है । साथ ही इसी संघर्ष के चलते स्त्री अस्मिता के प्रति सामाजिक नजरिए में भी बदलाव आए हैं । नजरिए के इस बदलाव से पहले की अनदेखी स्थितियों में भी निहित भेदभाव उजागर हो रहा है । उदाहरण के लिए किसी भी वंशवृक्ष को तैयार करते हुए स्त्री की वंशावली को पूरी तरह से गायब कर दिया जाता है । इसका आंशिक कारण पैतृक संपत्ति में स्त्री के अधिकार की अनुपस्थिति है । चूंकि पैतृक संपत्ति का विभाजन उत्तर भारतीय हिन्दू सामाजिक ढांचे में बेटों के बीच होता है इसीलिए वंशावली के निर्माण में भी स्त्री की उपेक्षा की जाती रही है । जबकि मान्य तथ्य है कि पिता के मुकाबले माता अधिक निश्चित होती है । सामूहिक रूप से उनकी स्मृति की इस बेदखली पर भी इस दौर में लेखको, खासकर स्त्री लेखिकाओं का ध्यान गया है और इसे बेहद रचनात्मक रूप से दर्ज किया जा रहा है । समाज और उसकी लगभग सभी संस्थाओं की ओर से जिस तरह सुनियोजित तरीके से स्त्री विरोधी इस भेदभाव को अंजाम दिया जाता है उसकी पहचान स्कूलों की पाठ्य पुस्तकों में निहित कार्य विभाजन को उजागर करके स्त्री लेखन ने कराई है । लड़का स्कूल में होगा तो लड़की पानी भरने गई होगी । अक्षर ज्ञान की स्कूली किताबों में निहित यह कार्य विभाजन सामाजिक रूढ़ियों को और अधिक सहनीय बनाता है, साथ ही इस कार्य विभाजन में निहित भेदभाव की सचाई को ओझल करने में मदद करता है । इससे उत्पीड़ित के मानसिक अनुकूलन का तंत्र भी पुख्ता हो जाता है ।
स्त्री की इस पराधीनता की व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण तत्व स्त्री के शरीर के प्रति नफ़रत की भावना को जन्म देना है । चीन में पहले स्त्री के स्वाभाविक पांवों की लंबाई को बुरा माना जाता था इसलिए उन्हें छोटा बनाए रखने के लिए उन्हें लोहे के जूते पहनाए जाते थे । स्त्री शरीर और उसकी स्वाभाविक क्रियाओं के प्रति यह नफ़रत अब भी उसके कसे हुए कपड़ों और माहवारी के समय उसके सामाजिक बहिष्कार में नजर आता है । शरीर के स्तर पर स्त्री और पुरुष के स्पष्ट विभाजन को चुनौती देते हुए जर्मेन ग्रिएर ने स्त्री के भीतर भी भगशिश्न की उपस्थिति तथा पुरुष के स्तनों में भी कामोत्तेजना की बात को उजागर किया है । अब तो वैज्ञानिक रूप से भी इस विभाजन की स्पष्टता को चुनौती मिल रही है । अर्धनारीश्वर की धारणा ही बताती है कि स्त्री पुरुष शरीर के स्पष्ट विभाजन को लेकर पहले भी संदेह रहा है ।
इसी के साथ निरंतर इसे भी रेखांकित किया जा रहा है कि संपदा के सृजन में स्त्री के योगदान को नकारने का व्यवस्थित तरीका हमारी अर्थशास्त्र की समझ है । यदि मजदूर के श्रम से संपदा का सृजन होता है तो उस मजदूर को पैदा करने से लेकर उसे काम करने लायक बनाए रखने में स्त्री का निर्णायक योगदान होता है । घरेलू काम को अनुत्पादक श्रम समझना राष्ट्रीय संपदा में स्त्री की साझेदारी को नकारना है । सिल्विया फ़्रेडेरिकी और अन्य तमाम स्त्री चिंतकों ने लगातार स्त्री श्रम के इस पहलू को उजागर किया है । इस तथ्य को धीरे धीरे मान्यता मिलने लगी है कि सामाजिक अन्याय के शिकारों में स्त्री सबसे अधिक प्रताड़ित रही है इसलिए समानता का कोई भी संघर्ष बिना उसके सवालों को शामिल किए नहीं चलाया जा सकता है ।

स्त्री लेखन और चिंतन ने साहित्य की सामाजिक भूमिका पर भी नए तरीके से विचार करने का मौका उपलब्ध कराया है । भाषा के भीतर भेदभाव की पहचान आसान नहीं होती इसीलिए भाषा में निहित हिंसा को पहचानने के उपकरण तैयार करके स्त्री काव्य ने अतीत के साहित्य के विश्लेषण का नया अवसर मुहैया कराया है । उदाहरण के लिए व्याकरणिक लिंग के साथ ही आकार का भी संबंध बन गया है । कड़ाही आकार में छोटी होगी तो कड़ाहा बड़ा । इसी तरह चींटा बड़ा होगा तो चींटी छोटी । इसके साथ स्त्री काव्य ने साहित्य के सामाजिक प्रकार्य को भी रेखांकित किया है । पिछले कुछ दिनों से साहित्य का धर्म निर्गुण हो चला था । उसके मुकाबले हाल के दिनों में दलित साहित्य के साथ मिलकर स्त्री लेखन ने साहित्य की सामाजिकता के तथ्य को उभारा है । तमाम स्त्री रचनाकारों, विशेषकर अनामिका और कात्यायनी की कविताओं में हम इन मुद्दों और नजरियों को देख-समझ सकते हैं ।             

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