Friday, October 31, 2014

साहित्य में भी ज्ञान वर्धन की जरूरत है

                  
                                                 
हिंदी में साहित्य के अतिरिक्त ज्ञान का सृजन अरसे से बंद नहीं है तो मम से कम उसकी चर्चा तो जरूर बंद है कुल मिलाकर हिंदी की दुनिया में साहित्य का ऐसा आत्ममुग्ध वातावरण शायद ही पहले कभी रहा हो प्रमाण यह है कि भारतेंदु से लेकर छायावाद-प्रगतिवाद के समय तक हिंदी के प्रबुद्ध पाठक को अन्य भारतीय भाषाओं में लिखे साहित्य का पता तो होता ही था, दुनिया भर में चल रही साहित्यिक हलचल से भी वह अनजान नहीं रहता था हिंदी में जानकारी का यह स्तर गिरा है और एक खास तरह की पारस्परिक प्रशंसा का छिछला माहौल तारी हुआ है आश्चर्य की बात है कि जिस समय हिंदी में श्रेष्ठ लेखन हो रहा था तब हिंदी के पाठक दुनिया में रचित अधिकांश महत्वपूर्ण लेखन से परिचित होते थे हिंदी साहित्य की वर्तमान केंद्रित आत्ममुग्धता का स्तर यह है कि लोगों के भुला दिए जाने के भय से विवादप्रियता का जन्म हो रहा है ऐसे में विजय शर्मा की किताब ताजा हवा की तरह है 2014 में वाणी प्रकाशन सेअफ़्रो-अमेरिकन साहित्य : स्त्री स्वरशीर्षक से लगभग 350 पृष्ठों की यह किताब अनेक कारणों से पठनीय और विचारणीय है ।
पुस्तक के शीर्षक से ही स्पष्ट है कि लेखक अमेरिकी समाज में अफ़्रीकी मूल के बाशिंदों के सिलसिले में जारी भाषिक बहसों से परिचित हैं इन्हें शुरू में नीग्रो कहा जाता था जो एक तरह का अपमानजनक संबोधन था उनके द्वारा आपत्ति जताने के बाद इन्हें ब्लैक कहा जाने लगा जो साहित्य के प्रसंग में अब भी प्रयुक्त होती है लेकिन सरकारी भाषा में इन्हें अफ़्रो-अमेरिकन ही कहा जाने लगा है सही बात है कि अभिधान में बदलाव असली हालात में बदलाव नहीं लाते फिर भी इसे लेकर होने वाली लड़ाई यही साबित करती है कि नाम में भी कुछ रखा है । इसे व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखा हैअफ़्रो-अमेरिकन लोगों के लिए पहले कई शब्दों का प्रयोग किया जाता था । काफी समय तक उन्हें काले, हब्शी, नीग्रो, दास, गुलाम, ढोर की संज्ञा दी जाती रही । इनमें से अधिकांश शब्द हीनता बोध कराने वाले शब्द थे । उन्हें मनुष्य से कम दर्जे का साबित करने वाले शब्द थे । बाद में भी कभी अश्वेत, कभी नीग्रो, कभी अफ़्रो-अमेरिकन कहा जाता रहा । इन सब शब्दों में सदा थोड़ा भ्रम, थोड़ा कन्फ्यूजन बना रहा । आज अमेरिका की अश्वेत प्रजाति के लिए अफ़्रीकन-अमेरिकन अथवा अफ़्रो-अमेरिकन शब्द का प्रयोग प्रचलन में है । यह सम्मानजनक संज्ञा है ।इस लेखन में भी यदि स्त्री के लेखन पर विचार होगा तो स्वाभाविक तौर पर कला की जगह उन सामाजिक हालात पर सोचा जाएगा जिन्होंने इस लेखन को जन्म दिया इस पर भी ध्यान दिया ही जाएगा कि लेखन की भूमिका अपने आपमें एक तरह की मुक्ति की भावना की प्रतिष्ठा है । इस तथ्य को सोजर्नर ट्रूथ के प्रसंग में रेखांकित करते हुए उन्होंने दर्ज किया हैइस स्त्री को अपने लोगों, अन्य स्त्रियों की आलोचना का शिकार होना पड़ा । अन्य स्त्रियों की आलोचना का क्योंकि बहुत कम स्त्रियां अपना स्वतंत्र नजरिया रखती हैं, अधिकांश पुरुष के नजरिए को ही आत्मसात किए हुए जीती हैं ।इस वक्तव्य से स्त्री लेखन के समर्थकों को आपत्ति हो सकती है लेकिन उनका उद्देश्य इन लेखकों की विद्रोही भूमिका को उजागर करना है । इस साहित्य के पीछे की आंदोलनात्मक शक्ति को चिन्हित करते हुए उन्होंने कहा किन्यूयार्क सिटी में हारलम नामक स्थान में बहुतायत में अश्वेत रहते आए हैं । यहां बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में एक अफ़्रो-अमेरिकन सांस्कृतिक आंदोलन चला ।---इस आंदोलन के कारण पहली बार अफ़्रो-अमेरिकन साहित्य की ओर लोगों का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित हुआ ।अस्मितामूलक इन संघर्षशील विमर्शों की यही खूबी है कि इनके आधारभूत साहित्य के बारे में बात करते हुए उस सामाजिक समुदाय के हालात को भी लगातार ध्यान में रखना पड़ता है । बिना इस संदर्भ के इनकी रणनीतिक और राजनीतिक दखलंदाजी के योगदान का मूल्यांकन असंभव होता है ।
अफ़्रो-अमेरिकन साहित्य की विविधता का एक पक्ष यह भी है कि इसमें गोरों और कालों के संसर्ग से उत्पन्न मुलातो भी शामिल किए जाते हैं । विजय शर्मा ने भी ऐसी एक लेखिका को किताब में शरीक किया है । पहले लेखिका का परिचयउन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में एक अफ़्रो-अमेरिकन (मुलातो) लेखिका हुई जिसने दास जीवन की कठिनाइयों को सरल बनाने का अपने लेखन में उपाय बताया । हैरियट जैकब्स नेइंसिडेंट्स इन द लाइफ़ आफ़ ए स्लेव गर्लमें अपने लिए लिंडा ब्रेंट नाम अपनाया और चित्रित किया कि कैसे एक युवा गुलाम लड़की अपने मालिक के द्वारा किये जाने वाले बलात्कार के खतरे से बचने का उपाय करती है ।उनके लेखन का विश्लेषण स्त्री लेखन की विशेषताओं को रेखांकित करने का भी अवसर बन जाता है ।लेखन लेखन होने के बावजूद एक पुरुष और एक महिला के लेखन में कुछ मूलभूत अन्तर होता है ।इसके उदाहरण के रूप में ‘उस समय के समाज में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार औरत के जो गुण बताए गए थे उनसे जैकब्स इनकार करती हैं ।---लिंडा अपने यौन अनुभवों के द्वारा यह दिखाती हैं कि वह आदर्श स्त्री की परिभाषा पर खरी नहीं उतरती हैं ।’
अफ़्रो-अमेरिकन लेखिकाओं द्वारा आत्मकथा लिखने के कारणों की व्याख्या करते हुए उसके तीन कारण बताए गए हैं । ‘पहला कारण इस प्रथा के एजेंट गुलामों पर जो अत्याचार करते थे, कोड़े मारकर खाल उधेड़ना, बलात्कार जैसे शारीरिक अत्याचार जो यह स्थिति पैदा करती थी, उसे दिखाना ।’ लेकिन इससे भी बड़ा अत्याचार था दासों के ‘परिवार को नष्ट करना, बच्चों को तितर-बितर कर देना, यौन शोषण, अपभाषा का निरंतर प्रयोग, अपमान, घृणा आदि ।’ दूसरा कि ‘अमेरिका के उत्तर में एक धारणा प्रचलित थी और जिसे अमेरिका के दक्षिणी श्वेतों ने जानबूझकर फैलाया हुआ था । यह धारणा थी कि अश्वेत दास अपनी स्थिति से बहुत खुश और संतुष्ट, बहुत सुरक्षित हैं ।’ इस धारणा के खंडन के लिए बड़े पैमाने पर इन स्त्रियों ने अपने कथन को विश्वसनीय बनाने के लिए इस विधा का सहारा लिया । तीसरा कारण कि ‘दास लोगों, खासकर दास अश्वेत स्त्री को स्वतंत्र और श्वेत स्त्री के मापदंड पर नहीं जांचा जा सकता है, नहीं जांचा जाना चाहिए ।’ स्पष्ट है कि उद्देश्य पूर्ण होने के कारण ही यह लेखन मुख्य धारा के लेखन से भिन्न था ।          
किताब एक हद तक हाल में सामने आई विशेष किस्म की विधा में रची गई है । किसी उपयुक्त नाम के अभाव में इसे विविधा कहा जा रहा है जिसमें विषय-वस्तु की विविधता नहीं होती बल्कि एक ही विषय पर अनेक तरह के लेख संकलित किए गए रहते हैं । शोध प्रबंधों की अरुचिकर एकरसता की जगह यह विविधता आकर्षक है । इसका प्रमाण यह है कि किताब के अलग अलग अध्यायों की पृष्ठ संख्या भिन्न भिन्न है और आश्चर्य की बात कि उनकी संख्या का उनके महत्व से कोई खास लेना देना नहीं है । उदाहरण के लिए हाल ही में दिवंगत माया एंजेलो को महत्वपूर्ण आत्मकथा लेखिका मानकर लगभग चालीस चालीस पृष्ठ दिए गए हैं । इनके साथ ही टोनी मारीसन के उपन्यासों और एलिस वाकर के समूचे लेखकीय कर्म को समेटते हुए उन्हें भी इतनी ही जगह दी गई है । इसके अलावा पहले अध्यायअफ़्रो-अमेरिकी स्त्री रचनाकार : एक विहंगम परिदृश्यको भी इतने ही पृष्ठों में समेटा गया है । ऊपर गिनाई गई इन सभी लेखिकाओं को उनकी रचनात्मकता के भिन्न भिन्न आयामों के हिसाब से किताब के केंद्र में रखा गया है । सबसे अधिक जगह लिंडा ब्रेंट को उचित ही दी गई है क्योंकि इस लेखिका का लेखन सामने आना ही परम साहस का उदाहरण है । इन बड़े लेखों के अतिरिक्त सोजर्नर ट्रूथ को 5 पृष्ठ, क्लोटेल शीर्षक उपन्यास को 15 पृष्ठ, इसके अलावा लगभग 30 पृष्ठों में एक ही जगह 11 फुटकर लेखिकाओं के बारे में, अफ़्रो-अमेरिकन स्त्री लेखन से फ़िल्मों के संबंध पर 15 पृष्ठ तथा सबसे मार्मिक प्रसंग अंतिम 4 पृष्ठों में । यह संगठन इस बात की पुष्टि करता है कि किताब किसी किस्म के औपचारिक बंधन से आजाद होकर विषय में डूबकर लिखी गई है ।
किताब का सबसे छोटा अंतिम अध्यायअंडरग्राउंड रेलरोड : बिना रेल, बिना रोड कर दिया कमालसबसे अधिक महत्वपूर्ण है । गुलामी से मुक्ति का यह ऐसा मिथकीय आख्यान है जिसे थोड़ी ज्यादा जगह मिलनी चाहिए थी । यह एक मिथकीय रास्ता था जिससे होकर गुलामों को दक्षिण से उत्तर लाया जाता था । कानून था कि भागे हुए गुलामों को देखते ही गोली मार दी जाए इसलिए यह रास्ता अंडरग्राउंड था । इसमें दासता के विरोधी गोरे भी शामिल थे लेकिन मुख्य रूप से अफ़्रीकी लोग ही, खासकर स्त्रियों ने, यह रास्ता बनाया था । इस रास्ते पर चलते हुए ज्यादातर लोग मारे गए, बहुत कम बच सके । रात के अंधेरे में एक मंजिल से दूसरी मंजिल तक अनजान लोग खामोशी से भागे हुए दासों को ले जाते । दिन में ऐसी जगहों पर छिपाया जाता जिसकी याद भी बाद में न रह जाती । जो लोग भी लोकप्रिय किस्म के भूमिगत आंदोलनों के भोक्ता रहे होंगे वे इस अनुभूति की आंच को समझ सकते हैं । अकेले इस अध्याय ने पूरी किताब को साहित्य के व्यापक सरोकारों और पहलुओं तक ऊँचा उठाने में मदद की है ।                 
यह किताब साहित्य के भीतर की नैतिकता को भी उजागर करती है जो नैतिकता के पाखंड का भंडाफोड़ करता है समाज में आम तौर जिस किस्म के नैतिक मानदंडों का प्राधान्य रहता है उस पर साहित्य सवाल तो उठाता ही है, कई बार ऊपर से अनैतिक लगने वाले कामों के भीतर की गहन नैतिकता से हमें परिचित कराता है और इस तरह हमारे नजरिए को विस्तारित करके विपथगामियों को सहानुभूतिपूर्वक देखने की दृष्टि देता है प्रसिद्ध कवि गुरदयाल सिंह ने अपनी आत्मकथाचोला टांकियावालामें एक वाकये का जिक्र किया है एक स्त्री के आचरण की निंदा यह कहकर की जा रही थी कि जब उसकी संतान मर रही थी तो वह संभोग का आनंद उठा रही थी गुरदयाल सिंह ने इसे एक जीवन के खात्मे के अंदेशे के समय एक और जीवन को रचने की उदग्रता के रूप में व्याख्यायित किया है । एक संस्कृत की कहावत का सहारा लेकर कह सकते हैं कि साहित्य की गति सूक्ष्म होती है । इसी तरह इस किताब में एक लेखक के उपन्यास में वर्णित एक घटना का जिक्र है जिसमें नायिका गुलामी से बचने के लिए भाग जाती है । भागते हुए वह अपने बच्चों को मार डालती है । उसके इस आचरण को हत्यारा आचरण कहा जा सकता है लेकिन उपन्यासकार के लिए इसके पीछे उसके मन में बच्चों के प्रति इतना गहरा प्रेम था कि वह उन्हें गुलामी की तकलीफ भोगने के लिए जिंदा नहीं छोड़ना चाहती है । पूरी किताब ही ऐसे प्रसंगों से भरी हुई है जिन्हें सामान्य मान्यताओं के तराजू में नहीं तोला जा सकता । जो लोग अंग्रेजी में उपलब्ध यह विपुल साहित्य भाषाई दूरी या समय की कमी के चलते नहीं पढ़ सकते उनके लिए संक्षेप में बेहद उपयोगी तरीके से मूल लेखन और उसमें वर्णित जीवन की झांकी प्रस्तुत कर दी गई है ।
किताब में इन गुलाम स्त्रियों की आत्मकथाओं में व्यक्त कथा-व्यथा तो है ही उस समूचे माहौल के घिनौनेपन को भी उभारा गया है जो गोरों के जीवन के लिए भी बहुत उपकारी नहीं था । इसका वर्णन कुछ इस तरह किया गया हैश्वेत मां के अश्वेत बच्चे को कई बार गला घोंटकर मार डाला जाता । अश्वेत मां के श्वेत बच्चे को नीलामी के तख्त पर चढ़ा दिया जाता ।हैरियट के बहाने दर्ज किया गया हैगुलामी की प्रथा श्वेत-अश्वेत दोनों के लिए शाप थी । यह प्रथा श्वेत पुरुष को कामुक और क्रूर बनाती । लड़कियां भी संक्रमण से बच नहीं पातीं । स्त्रियां दिन-रात बेवफाई का शिकार होतीं, ईर्ष्या-द्वेष की अग्नि में जलती रहतीं । अश्वेत को भी इस प्रथा ने मनुष्य नहीं रहने दिया । उनकी पहचान, उनके अधिकार, उनकी इज्जत नहीं होती ।यही तो इन आत्मकथाओं का मकसद था गुलामी प्रथा की अमानवीयता को संसार के सामने ले आना । लिंडा का मालिक एक डाक्टर था । उससे बचने के लिए वह भागकर अपनी नानी के घर की नौ फ़ीट लंबी, सात फ़ीट चौड़ी और तीन फ़ीट ऊंची दुछत्ती में छिप गई । स्वाभाविक रूप से इसमें खड़ा होना या बैठना असंभव था । लेटे लेटे उसके शरीर के अंग जकड़ गए तो रात को नीचे उतरकर थोड़ा शरीर सीधा कर लेती । इसी तरह उसने चूहों के साथ पांच साल काटे थे । इसके बाद अपने प्रेमी के प्रयासों से वह भागकर उत्तर गई और आजाद हुई । सचमुच अपनी आजादी के लिए इन स्त्रियों ने कितने महाकाव्यात्मक प्रयास किए । असली जीवन की भयानकता के कुछेक ही दृश्य इस लेखन से व्यक्त हुए होंगे !    

अगर धीरज और ध्यान के साथ किताब को पढ़ा जाय तो इस सवाल का भी जवाब मिलता है कि आखिर क्यों वंचित समुदाय अपने हालात से विद्रोह को मुखरित करने के लिए आत्मकथा का सहारा लेते हैं लेकिन इसी जगह इस रणनीति की एक समस्या भी सामने आती है । जीवन की विडंबना को सामने लाने की कोशिश तो इनमें की जाती है लेकिन आलोचक अक्सर उस चीख को सुनने के बदले सराहने लगते हैं । उदाहरण के लिए स्त्री लेखन में सिलाई की उपस्थिति को उबाऊ श्रम के प्रतिकार के बदले उसका गुण समझा जाना । आशा की जानी चाहिए कि हिंदी में लिखित होने के कारण इस किताब के बहाने अस्मिता लेखन की खूबियों और खामियों पर बहस होगी ।       

Tuesday, October 28, 2014

दुनिया को समझने और बदलने के प्रयासों का लेखा जोखा

                     
                                                       
इसाइया बर्लिन ने जिस कारण से यह माना कि 1845 तक मार्क्स ने जिंदगी का अपना मकसद और उस तक पहुंचने का रास्ता तय कर लिया था शायद वह मार्क्स लिखित ‘1844 की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियांशीर्षक पुस्तक है । मार्शल बेर्मान ने ज्यादातर इसी मजेदार किताब पर विचार किया है । मार्क्स की यह किताब उनके जीवन में प्रकाशित नहीं हुई थी । 1927 में सोवियत विद्वानों को इसकी पांडुलिपि मिली तब इसका प्रकाशन हुआ । मार्क्स की इस किताब के प्रकाशन के बाद से ही पूरी दुनिया को एक दूसरे तरह के मार्क्स का पता चला जिन्हें बाद के उनके लेखन के मुकाबले अधिक मानवीय माना गया । बहुत से विद्वान यह कहते हैं कि बाद में चलकर मार्क्स दुनिया को समझने में आर्थिक पहलू पर अधिक बल देने लगे थे । इसके मुकाबले उन्हें यह किताब ज्यादा कारकों की ओर ध्यान देनेवाली महसूस हुई । इसी तरह के विद्वानों में से एक मार्शल बेर्मान न्यूयार्क सिटी कालेज में राजनीतिशास्त्र के प्रोफ़ेसर थे । खास बात यह है कि बेर्मान ने 1963 में आक्सफ़ोर्ड में अपना शोध बर्लिन के निर्देशन में ही किया था । 1999 में वर्सो से मार्शल बेर्मान की यह किताब प्रकाशित हुईएडवेंचर्स इन मार्क्सिज्म। अपनी तरह की मजेदार यह किताब लेखक की दूसरी किताब है । पहली किताबआल दैट इज सोलिड मेल्ट्स इन्टु एयर: द एक्सपीरिएंस आफ़ माडर्निटीउन्होंने शहरों के समाजशास्त्र पर लिखी थी । उसके बाद यदा कदा मार्क्सवाद के बारे में संपादकों की मांग पर लिखते रहे थे लेकिन उसे किसी स्वतंत्र किताब लायक नहीं मान सके थे । बाद में दोस्तों के अनुरोध पर अलग अलग जगहों पर प्रकाशित उन्हीं लेखों का संग्रह करके उन्होंने यह किताब तैयार की ।  
किताब के शुरू में उन्होंने आत्मकथात्मक सा नोट लिखा है । इसमें वे अपने पिता की पचास साल से कम उम्र में हुई मौत से बात शुरू करते हैं और बताते हैं कि मंदी के शुरुआती धक्के ने उनकी जान ले ली थी । बेर्मान के मन में हत्यारों से बदला लेने की इच्छा थी इसलिए अध्ययन का आरंभ ही उन्होंने मार्क्सवाद से किया । उनके अध्यापक ने ‘1844 की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियांपढ़ने की सलाह दी । यहीं से उनका दुस्साहस शुरू हुआ । तब से उन्होंने दोस्तों को खुशी के किसी भी मौके पर यही किताब उपहार में देना शुरू किया । इस किताब को प्रचारित करना ही व्यवस्था से उन्हें सर्वोत्तम बदला लेना महसूस होने लगा ।
इस किताब में उन्हें मनुष्य के प्रति मार्क्स के अप्रत्याशित सरोकार के दर्शन हुए । इसमें एकाधिक बार मानव अस्मिता और श्रम की प्रक्रिया में उसका अपने आपसे अलगाव का जिक्र आता है । इस अलगाव के विपरीत मार्क्स मनुष्य की शारीरिक और मानसिक ऊर्जा के स्वतंत्र विकास, स्वत:स्फूर्त गतिविधि के आनंद, मुक्त सक्रियता की वकालत करते हैं । बुर्जुआ क्रांतियों ने जिस बाजार आधारित समाज को जन्म दिया उसमें धन ने सारी वैयक्तितता को उलट दिया और सब कुछ को बेचने लायक बना दिया । आधुनिक पूंजीवाद ने काम को इस तरह संगठित किया है कि कामगार अपने क्रियाकलाप, अन्य कामगारों और प्रकृति से अलग हो जाता है । उसका शरीर सूली पर चढ़ जाता है और दिमाग बरबाद हो जाता है । वह अपने आपको अपने काम से बहिष्कृत अनुभव करता है । जब वह काम पर होता है तो अपने आपमें नहीं होता और जब अपने आपमें होता है तो काम पर नहीं होता । इसी के चलते उसका श्रम जबरिया की मेहनत है ।
श्रमिक यूनियनें इसके विरोध में तो होती ही हैं, कामगार को छिनी हुई सामूहिकता की वापसी का अहसास कराती हैं इसलिए मार्क्स उन्हें सलाम करते हैं । असल में मार्क्स शुरू से ही लोकतंत्र के जुझारू पक्षधर थे लेकिन चारों ओर फैली हुई समस्याओं का समाधान केवल लोकतंत्र से होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा था । वे उन महान लोगों की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा थे जो आधुनिक समय में मनुष्य की गुलामी से परेशान थे लेकिन उनकी विशेषता थी कि उन्होंने इस गुलामी की संरचना को सबसे अच्छी तरह देखा और दिखाया । 1844 की पांडुलिपियों में इसे खुलकर पहचाना जा सकता है ।
इन लेखों की रचना पेरिस में जेनी के साथ हनीमून के दौरान हुई थी । बेर्मान का कहना है कि इस किताब की पढ़ाई के दौरान उन्हें भी जीवन का पहला प्रेम हुआ था और वे इन पांडुलिपियों में प्रेम और यौनानंद संबंधी इंदराज खोजने लगे । उन्हें लिखा मिला किइस संबंध (स्त्री-पुरुष संबंध) के स्तर से मनुष्य के समूचे विकास की परीक्षा की जा सकती है। स्त्री-पुरुष संबंध के मामले में मार्क्स के विचारों को उस समय के फ़्रांसिसी क्रांतिकारियों की मान्यताओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए । इनमें से कुछ लोग यौन स्वच्छदता को बुर्जुआ बंधनों का प्रतिरोध मानते थे । मार्क्स इस हद तक तो उनसे सहमत थे कि प्रेम में अगर प्रेमी अपने प्रेमास्पद को निजी संपत्ति की तरह समझने लगे तो इस संबंध में समस्याओं का पैदा होना लाजिमी है, लेकिन इसके विरोध में सार्वभौमिक वेश्यावृत्तिको भी गलत समझते थे । उस जमाने के ऐसे कम्युनिस्टों का उन्होंने विरोध किया है जो निजी संपत्ति के आगमन से पहले की दुनिया को आदर्श समझकर उसमें लौटने की हिमायत करते थे । यौनानंद के सिलसिले में एक और बात की ओर बेर्मान ध्यान खींचते हैं । मार्क्स के अनुसार मजदूर जब कार्यस्थल पर अलगाव महसूस करता है तो उसकी भरपाई अति-भोजन, अति-पान और अति-कामक्रिया के सहारे करना चाहता है लेकिन उसकी हताशा उसे पूरी तरह से शारीरिक आनंद नहीं लेने देती क्योंकि उस पर असहनीय मानसिक दबाव रहता है ।
मार्क्स मानते हैं कि मनुष्य की इंद्रियों का निर्माण समूची दुनिया के अब तक के इतिहास का फल है । लगता है कि हनीमून के आनंद में मार्क्स भविष्य के ऐसे मनुष्यों के आगमन की अपेक्षा कर रहे थे जो कम लालची होंगे, ऐंद्रिकता और जीवंतता के मामले में सहज होंगे और प्रेम को मानव विकास का महत्वपूर्ण अंग बनाने में आंतरिक तौर पर अधिक काबिल होंगे । मानवता को प्रतिनिधित्व और मुक्ति एक साथ देने में सक्षम ये ‘नए’ लोग कौन होंगे ? इस सवाल का जवाब ही मार्क्स की नेकनामी और बदनामी की वजह है । उन्होंने ‘आधुनिक मजदूर वर्ग, सर्वहारा’ को अपनी इस आशा का केंद्र माना । सवाल उठता है कि मजदूर वर्ग के सदस्य कौन हैं और इस वर्ग का लक्ष्य क्या है । इन पांडुलिपियों में सदस्यता पर तो उन्होंने विचार नहीं किया लेकिन लक्ष्य के सिलसिले में रोचक बातें कही हैं ।  
वे कहते हैं कि आधुनिक समाज एक ओर मनुष्य के आत्म का पाशविक हनन करता है लेकिन इसी के साथ समृद्ध मानव जीवन और समृद्ध मानव आवश्यकताओं को भी पैदा करता है । समृद्ध मानव जीवन जर्मन मानववाद से उठकर चला आया है लेकिन इन मानवतावादियों को यकीन था कि कुछ ही स्त्री-पुरुष कल्पना में सक्षम गहराई से युक्त होंगे और ज्यादातर लोग तुच्छताओं में मसरूफ़ होने से आत्माविहीन होंगे । मार्क्स ने इन मानववादी मूल्यों को रूसो से प्रभावित क्रांतिकारी-लोकतांत्रिक समाज दर्शन के साथ गूंथ दिया । रूसो का कहना था कि आधुनिक सभ्यता मनुष्यों को अपने आपसे अलगाती तो है लेकिन इन अलगाव में पड़े हुए व्यक्तियों को ऐसा विकास, गहनता और क्षमता प्रदान करती है जिसके आधार पर वे सामाजिक संविदा करके पूरी तरह से नए समाज का निर्माण करते हैं । मार्क्स ने भी समाज को इसी द्वंद्वात्मक तरीके से देखा । पूंजीवादी समाज मजदूरों के भीतर समग्र मानव गतिविधि के जरिए अपने आपको साकार करने की इच्छा पैदा करता है । जो समाज व्यवस्था उन्हें पीड़ित करती है वही उन्हें शिक्षित और रूपांतरित भी करती है । फ़्रांसिसी मजदूरों के बारे में उन्होंने लिखा कि राजनीतिक और आर्थिक कारणों से एक जगह एकत्र हुए इन मजदूरों के लिए संगठन साधन ही नहीं साध्य भी बन गया और वे इसमें खोया हुआ समाज पा गए । मजदूर समृद्ध मानव प्राणी नहीं बनना चाहते, अन्य लोग तो उन्हें ऐसा बनते देखना भी नहीं चाहते फिर भी यह विकास उनकी नियति है, उनकी सामूहिकता की चाहत की शक्ति उन्हें विश्व ऐतिहासिक शक्ति में बदल देती है ।
मार्क्स ने दो किस्म के कम्युनिज्मों की बात की है- एक जो मनुष्य और प्रकृति के बीच तथा मनुष्य और मनुष्य के बीच टकराव का वास्तविक समाधान की बात करता था और दूसरा जो निजी संपत्ति के भी पार नहीं जा सका था । बेर्मान बीसवीं सदी की ज्यादातर समाजवादी सत्ताओं को दूसरी किस्म में शामिल करते हैं । पहली किस्म को वे मार्क्सवादी मानववाद कहते हैं और इसकी निरंतरता को वे संघर्षरत मार्क्सवादी आंदोलनों में बताते हैं । वे अपने आदर्शवाद को पहचानते हुए कहते हैं कि यह मानववाद किसी भी देश के शासन में नहीं है लेकिन पूंजीवाद के वर्तमान दौर में उसकी एक जगह है । वह हालात के जंजाल में फंसे हुए लोगों को सुकून दे सकता है । वह भरोसा दे सकता है कि सत्ता द्वारा दलित लोग भी सत्ता से लड़ने की ताकत रखते हैं, किसी त्रासदी में जीवित बचे लोग भी इतिहास को पलट सकते हैं । इससे नई पीढ़ियों को नए साहस की ऊर्जा मिलेगी, उनमें दुनिया को बदलने की चाहत संजोने की ताकत आएगी ताकि वे फंसे रहने की जगह घुलें-मिलें ।        

किताब के लेख विभिन्न किताबों की समीक्षाओं के रूप में लिखे गए हैं इसलिए इन लेखों को पढ़ते हुए पाठक मार्क्स के बारे में लिखी गई किताबों के कथ्य और समस्याओं से दो चार होता चलता है ।  

Sunday, October 12, 2014

मार्क्स के जीवन और विचार पर मजेदार टिप्पणी

     
2002 में प्रसिद्ध विद्वान और प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के प्रोफ़ेसर इसाइया बर्लिन लिखित ‘कार्ल मार्क्स: हिज लाइफ़ एंड एनवायरनमेंट’ का चौथा संस्करण प्रकाशित हुआ । इसकी भूमिका में उन्होंने बताया है कि चालीस साल पहले छपी इस किताब को तमाम दार्शनिक, आर्थिक और समाजशास्त्रीय मुद्दों पर बहस मुबाहिसे को छांटकर नये संस्करण में केवल उनकी बौद्धिक जीवनी पर केंद्रित करके मूल का आधा कर दिया गया है । तीस साल की उम्र में बर्लिन की यह पहली किताब थी और इसी से विचारों के इतिहासकार के रूप में उन्हें प्रतिष्ठा मिली थी । उन्होंने जिन विचारकों के बारे में भी लिखा यह ध्यान रखा कि उनमें हमारी रुचि उनके निजी जीवन के विवरणों के चलते नहीं, उनके विचारों के चलते पैदा हुई है । मार्क्स के बारे में लिखते हुए उन्हें यह विचित्र बात महसूस हुई कि परिस्थिति को प्रभावित करने के मामले में खुद मार्क्स विचारों के मुकाबले अन्य ताकतों को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे लेकिन उनके विचारों की ताकत उनकी ही मान्यताओं को गलत साबित करती है । दूसरे कि मार्क्स इतिहास में व्यक्ति की भूमिका को अधिक महत्व नहीं देते थे लेकिन लेनिन, स्तालिन, माओ जैसे व्यक्तियों ने विराट सामाजिक शक्तियों को गति दी । बर्लिन का यह भी कहना है कि मार्क्स पूंजीवादी व्यवस्था में व्याप्त अन्याय से जितनी नफरत करते थे उसे देखते हुए उन्हें लौह नियमों का आविष्कर्ता कहना उचित नहीं है । इसके संदर्भ में वे मार्क्स के अनुयायियों द्वारा उनके चिंतन में भौतिकवाद की मुख्यता स्थापित करने के नाम पर उनके नैतिक सरोकारों को उपेक्षित रखने की भी आलोचना करते हैं । यहां तक कि पूंजीवाद के स्वत: विनाश की कथित भविष्यवाणी का मेल भी वे मार्क्स द्वारा स्वास्थ्य और पारिवारिक सुख की कीमत पर क्रांतिकारी लक्ष्य को हासिल करने के लिए सचेत प्रयासों के तकलीफदेह और लंबे इतिहास के साथ नहीं बिठा पाते । बर्लिन के मार्क्स यूरोपीय ज्ञानोदय की संतान तो हैं ही ज्ञानोदय के विरुद्ध रोमांटिक विद्रोह की भी पैदावार हैं
इस किताब का इतिहास भी मजेदार रहा है पहली बार इसका प्रकाशन दूसरे विश्व-युद्ध से पहले हुआ था दूसरे संस्करण के प्रकाशन के समय तक शीत-युद्ध शुरू हो चुका था तीसरे संस्करण के प्रकाशन के समय तक रूस में ख्रुश्चेव ने स्तालिन की आलोचना शुरू कर दी थी हंगरी की घटना ने पश्चिमी मार्क्सवादियों को निराश किया औरमानवीयमार्क्स की तलाश होने लगी, ‘लिबरेशन थियोलाजीका जन्म भी इसी समय हुआ चौथा संस्करण 1978 में प्रकाशित हुआ तब तक तमाम ऐसे अध्ययन हो चुके थे जो एकाधिक मार्क्स की खोज पर आधारित थे, जिनके अनुसारयुवा मार्क्सऔरपरिपक्व मार्क्समें विभाजन किया जाना प्रस्तावित था
1963 में बर्लिन ने स्वीकार किया था कि एक तरफ ‘आर्थिक-दार्शनिक पांडुलिपियां’ के व्यापक प्रसार और दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी यूरोप की युद्धोत्तर आर्थिक समृद्धि के चलते पूंजीवाद के नाश संबंधी मार्क्स के कथन में भरोसा कुछ कम होने लगा लेकिन मनुष्य को मशीन के लिए बलिदान करने वाली, संस्कृति को नकदी में तौलने वाली और बाजार की अमानवीय तथा अमूर्त ताकतों को सत्ता प्रदान करने वाली व्यवस्था के विरुद्ध उनकी नैतिक-दार्शनिक आलोचना का महत्व इससे धूमिल नहीं हुआ ।
बर्लिन के मुताबिक मार्क्स न तो श्रोताओं को मुग्ध कर लेने वाले वक्ता थे और न ही घनघोर आंदोलनकारी । उनका लेखन भी उनके जीवित रहते कम ही प्रकाशित हुआ था । जीवन भर वे उतने मशहूर भी नहीं रहे । वे अपने परिवार, अपने बच्चों और अपने दोस्तों की सुरक्षित दुनिया पसंद करते थे । उनकी खूबी उनका जबर्दस्त दिमाग था । उसमें चल रहे विचारों को कागज पर उतारना उनके लिए तकलीफदेह होता था । वे ऐसे लोगों के बीच पले बढ़े थे जिनके लिए विचार तथ्यों से अधिक यथार्थ हुआ करते थे और निजी रिश्ते बाहरी दुनिया की घटनाओं से अधिक मानीखेज होते थे, जिनके लिए सार्वजनिक जीवन कभी कभी अनुभवों की निजी समृद्ध दुनिया के मायनों में समझा जाता और व्याख्यायित होता था । वे बुद्धिजीवियों की भाषणबाजी और भावुकता से उतने ही चिढ़ते थे जितना पूंजीपतियों की बेवकूफी और आत्मतुष्टि से । ऐसे बेहूदे और शत्रुतापूर्ण माहौल में रहने से उनमें रूखापन और आक्रामकता बढ़ गई । उनका यह रुख बाहर के लोगों के प्रति ही था, परिवार या दोस्तों के बीच वे सज्जन और सौम्य थे । उनके दुश्मन भी उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता, उनके विचारों के पैनेपन और तत्कालीन स्थितियों के मर्मभेदी विश्लेषण के कायल हो जाते थे । उनके समय के क्रांतिकारियों में वाद-विवाद बेहद तीखे होते थे लेकिन अपने समय के हालात की तीखी नैतिक आलोचना के चलते वे आपस में मिलकर काम करते थे । हालात में बुनियादी बदलाव की आकांक्षा उन्हें एकजुट रखती थी ।
इन सबसे मार्क्स इस मामले में अलग थे कि उन्होंने कोई नैतिक या सामाजिक आदर्श मानव समाज पर नहीं थोपा । उन्होंने बदलाव के लिए हृदय परिवर्तन की जगह सामाजिक ताकतों के शक्ति संतुलन को समझने की अपील की । मौजूदा व्यवस्था की आलोचना के लिए किसी आदर्श का सहारा लेने की जगह उन्होंने इतिहास का सहारा लिया । भावना की बनिस्बत बुद्धि को संबोधित करने की आकांक्षा के बावजूद बर्लिन के अनुसार उनकी भाषा में घोषणा के तत्व दिखाई पड़ते हैं जो झूठ का पर्दाफाश करने और सचाई को उजागर करने के लिए अपनाई गई प्रतीत होती है । उन्होंने अपने लिए जो कार्यभार तय किया था 1845 तक उसका पहला चरण पूरा कर लिया और प्रकृति, इतिहास तथा समाज के विकास के मूल नियमों को समझ लिया था । उनका मानना था कि समाज का इतिहास व्यक्ति के सृजनात्मक श्रम के जरिए अपने आप और बाहरी दुनिया को काबू करने का इतिहास है । परस्पर विरोधी वर्गों के बीच संघर्ष में इस गतिविधि का पुनर्जन्म होता है जिसमें कोई एक वर्ग विजयी होकर निकलता है । एक वर्ग पर दूसरे की जीत की यह निरंतरता ही प्रगति कहलाती है । वही लोग तार्किक होंगे जो अपने समाज में उदीयमान वर्ग के साथ अपने को जोड़ेंगे । अगर जरूरत पड़ी तो अपने अतीत का त्याग करके इस वर्ग का अंग होंगे । इसी समझदारी के अनुसार अपने समय में संघर्षरत वर्गों में उदीयमान वर्ग के रूप में सर्वहारा वर्ग को पहचानने के बाद उन्होंने सारा जीवन इसकी जीत की रणनीति बनाने में लगा दिया । इतिहास की स्वाभाविक प्रक्रिया में यह विजय निश्चित है लेकिन साहस, निश्चय और ईमानदारी के चलते यह जीत निकट आएगी, बदलाव में तकलीफ कम होगी, टकराव कम होंगे और जन-हानि भी कम ही होगी ।     
       

   

Friday, September 26, 2014

दर्शन की दुनिया में मार्क्स का प्रवेश

                   
                                             
2000 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से पहली बार ए वेरी शार्ट इंट्रोडक्शनयोजना के तहत मार्क्स पर पीटर सिंगर द्वारा 1980 में लिखी और 1996 में पुनर्प्रकाशित किताब को छापा गया है । इसमें लेखक ने पहले अध्याय में संक्षिप्त जीवनी लिखने के बाद दूसरे अध्याय में हेगेल के दर्शन में मार्क्स द्वारा किए गए रूपांतरण की प्रक्रिया को अच्छी तरह से समझाया है । इस प्रक्रिया पर ध्यान देने से यह भी स्पष्ट होता है कि विचारकों के चिंतन को सामाजिक शक्तियों के प्रतिनिधि समय की मांग के अनुरूप इस्तेमाल कर लेते हैं । लेखक के मुताबिक हेगेल की किताब ‘फेनोमेनोलाजी आफ़ माइंड’ में माइंड के लिए जिस जर्मन शब्द का उपयोग किया गया है उसका अंग्रेजी अनुवाद स्पिरिट या आत्मा के बतौर किया जाता है । हेगेल ने इसका प्रयोग ब्रह्मांड के आध्यात्मिक पहलू के रूप में किया है और इस मामले में यह विश्वात्मा जैसी चीज होगी । मेरी, आपकी या अलग अलग चेतन प्राणियों की आत्मा इसी विराट आत्मा की विशेष, सीमित अभिव्यक्तियां होती है । इस पर विवाद है कि हेगेल की यह विश्वात्मा ईश्वर है या समूचे ब्रह्मांड में व्याप्त चेतना है । हेगेल की किताब में व्यक्ति की आत्मा से इस विश्वात्मा तक के विकास को समझने की कोशिश की गई है । यह विकास द्वंद्वात्मक होता है ।
द्वंद्वात्मकता को स्पष्ट करने के लिए वे एक रूपक का सहारा लेते हैं । मान लीजिए दो स्वतंत्र मनुष्य हैं जो विश्वात्मा के भिन्न भिन्न रूप के बतौर अपनी समानता नहीं पहचानते । उनमें से एक दूसरे को अपनी शक्ति की सीमा या चुनौती समझेगा । उनमें संघर्ष होगा जिसमें जीतने वाला व्यक्ति हारने वाले को गुलाम बना लेगा । मालिक और गुलाम के रिश्ते में उनकी स्थिति बदलती रहती है । पहली नजर में मालिक ही सब कुछ महसूस होता है लेकिन असल में गुलाम काम करता है और अपनी मेहनत से प्रकृति को बदलता है । प्रकृति पर अपनी चेतना की दावेदारी में गुलाम को संतुष्टि मिलती है और वह आत्म-चेतना विकसित करता है । मालिक गुलाम पर निर्भर होता जाता है । गुलाम को मुक्ति मिलती है और दो स्वतंत्र मनुष्यों के बीच का शुरुआती संघर्ष समाप्त हो जाता है ।
अलग अलग मनुष्यों की आत्मा को इस बात का ज्ञान नहीं होता कि वे विश्वात्मा का अंग है । इसी स्थिति को हेगेल आत्मा का अपने आपसेअलगावकहते हैं । अर्थात कोई एक मनुष्य जिसमें विश्वात्मा का एक अंश है वह उसी विश्वात्मा के दूसरे अंशों यानी दूसरे मनुष्यों को पराया और शत्रु समझने लगता है, एक ही विराट अखंडता का अंश नहीं मानता । इस स्थिति में वह स्वतंत्र नहीं हो सकता क्योंकि उसे अपने संपूर्ण विकास की राह में विरोध और बाधा का अनुभव होता है । आत्मा तो असल में सर्वव्यापी और अनंत है इसीलिए यह विरोध-बाधा सिर्फ़ ऊपरी बात है । यह होता ही इसलिए है क्योंकि आत्मा अपने आपको नहीं पहचान पाती, जो उसी के अंश हैं उन्हें पराया और शत्रु समझती है । ये परायी शक्तियां ही आत्मा की स्वतंत्रता को सीमित कर देती हैं क्योंकि यदि आत्मा को अपनी अनंत शक्तियों का ज्ञान नहीं होगा तो वह दुनिया को अपने मुताबिक संगठित करने के लिए इन शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकेगी ।
हेगेल के दर्शन में आत्मा का द्वंद्वात्मक विकास स्वतंत्रता की ओर होता है । स्वतंत्रता की यह चेतना ही विश्व इतिहास है । बहुत दिनों तक उनके दर्शन को अनुयायी नहीं मिले लेकिन मार्क्स की नौजवानी में हेगेल कि विश्वात्मा को समग्र मानव जाति के अर्थ में व्याख्यायित किया जाने लगा था । इसे मनुष्य की स्वतंत्रता की दिशा में प्रगति के रूप में समझा जाने लगा । मार्क्स ने अपने शोध की भूमिका में लिखाअगर किसी दार्शनिक ने सच में समझौता किया है तो उसके अनुयायियों का कर्तव्य है कि वे उसके चिंतन के सार का इस्तेमाल करते हुए उसकी सतही अभिव्यक्तियों को उजागर करें। युवा हेगेलपंथियों के लिए सतही अभिव्यक्ति प्रशियाई राज्य के लिए हेगेल का समर्थन था और उनके चिंतन का सार मनुष्य की आत्म-चेतना की स्वतंत्रता की आकांक्षा थी । इन हेगेलपंथियों में ब्रूनो बावेर से मार्क्स की करीबी थी । बावेर के लिए पारंपरिक ईसाई धर्म ही वह प्रमुख भ्रम था जो मानव की आत्म-चेतना की स्वतंत्रता में बाधा बना हुआ था । उसके विरुद्ध लड़ाई में दर्शन का हथियार के रूप में इस्तेमाल होना था । हेगेल ने ही ईसाई धर्म को अलगाव का एक रूप कहा था । उनकी इसी मान्यता के सहारे बावेर ने घोषित किया कि ईश्वर को मनुष्य ने जन्म दिया है और अपनी ही रचना से उसने खुद को अलग कर लिया है । मनुष्य की मुक्ति के लिए उसके इस अलगाव को खत्म करना जरूरी है और इसके लिए धर्म की आलोचना करनी होगी । धर्म के विरुद्ध हथियार के बतौर हेगेल की पद्धति का सबसे तीखा इस्तेमाल फ़ायरबाख ने किया ।

एंगेल्स पर फ़ायरबाख की ‘एसेंस आफ़ क्रिस्चियनिटी’ का अधिक गहरा असर पड़ा क्योंकि मार्क्स तो बावेर के तर्कों से परिचित थे ही फिर भी फ़ायरबाख के परवर्ती लेखन से वे भी प्रभावित हुए । कारण कि फ़ायरबाख धर्म की आलोचना तक ही नहीं रुके । उन्होंने हेगेल के दर्शन की भी आलोचना की लेकिन यह आलोचना बहुत कुछ उनके रूपांतरण के तरीके से की गई थी । हेगेल की पद्धति के सहारे ही उनके समस्त दर्शन की आलोचना की गई थी । हेगेल ने आत्मा को इतिहास की चालक शक्ति माना था और मनुष्य को उसकी अभिव्यक्ति । फ़ायरबाख के अनुसार ऐसा करके उन्होंने मनुष्य के सार को उससे बाहर स्थापित कर दिया था जिसका मतलब कि धर्म की तरह यह मान्यता भी मनुष्य को उसके सार से अलग करती है । हेगेल को फ़ायरबाख ने उलट दिया । उनके दर्शन के केंद्र में मनुष्य आ गया । मार्क्स ने इसी बात को और आगे बढ़ाते हुए मनुष्यों की तात्कालिक स्थिति की आलोचना के लिए हेगेल की पद्धति का उपयोग किया ।