सभी
जानते हैं कि नवउदारवाद की प्रयोगभूमि सबसे पहले लैटिन अमेरिका का चिली नामक देश बना था । वही चिली पचासेक साल बाद नयी
लड़ाई का मोर्चा बन गया है । उस समूचे महाद्वीप को संसार की सबसे ताकतवर सत्ता अमेरिका अपना पिछवाड़ा मानकर अपनी पसंद के
शासकों को गद्दी पर बैठाती और उतारती रही है । लैटिन अमेरिका के प्रति संयुक्त राज्य अमेरिका का यही रवैया उसके हालात की जड़ में है । इस सच को जाहिर करते हुए 2006 में मेट्रोपोलिटन बुक्स से ग्रेग ग्रैन्डिन की किताब ‘एम्पायर’स वर्कशाप: लैटिन अमेरिका, द यूनाइटेड
स्टेट्स, ऐंड द राइज आफ़ द न्यू इम्पीरियलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । इसी प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए 2007 में यूनिवर्सिटी
आफ़ न्यू मेक्सिको प्रेस से थामस एफ़ ओ’ब्रायन की किताब ‘मेकिंग द अमेरिकाज: द
यूनाइटेड स्टेट्स ऐंड लैटिन अमेरिका फ़्राम द एज आफ़ रेवोल्यूशंस टु द एरा आफ़
ग्लोबलाइजेशन’ का प्रकाशन हुआ । लैटिन अमेरिका के बारे में इस धारणा का सबूत पेश करते
हुए 2009 में ज़ेड बुक्स से ग्रेस लिविंगस्टोन की किताब ‘अमेरिका’ज बैकयार्ड: द
यूनाइटेड स्टेट्स ऐंड लैटिन अमेरिका फ़्राम द मुनरो डाक्ट्रिन टु द वार आन टेरर’ का
प्रकाशन हुआ । लैटिन अमेरिका की लूट ऐसी बहती गंगा है जिसमें कनाडा ने भी हाथ धोये
। इस पहलू पर 2016 में फ़ेर्नवुड पब्लिशिंग
से टाड गोर्डन और जेफ़्री आर वेबर की किताब ‘ब्लड
आफ़ एक्सट्रैक्शन: कनाडियन इम्पीरियलिज्म इन लैटिन अमेरिका’
का प्रकाशन हुआ । किताब के दस
अध्याय चार भागों में संयोजित हैं । पहला भाग प्रस्तावना का है जिसमें इस
साम्राज्य की विशेषता बताने के साथ किताब के ढांचे की भी जानकारी दी गई है । दूसरे
भाग में केंद्रीय अमेरिका के हालात पर चर्चा की गई है । इसके तहत होंडुरास,
ग्वाटेमाला, अल सल्वाडोर, कोस्टा रिका, निकारागुआ, पनामा
जैसे देशों का विवेचन है । तीसरे भाग में एन्डीज का विवेचन है । इसके तहत
कोलम्बिया, पेरू, इक्वाडोर, वेनेजुएला आदि देशों का हाल लिया गया है । चौथा और आखिरी भाग उपसंहार का
है जिसमें कनाडाई पूंजी के प्रसार तथा मानवाधिकार और पारिस्थितिकी पर विचार करते
हुए साम्राज्य के प्रसार और उसके प्रतिरोध की कहानी कही गई है ।
1996 में द पेनसिल्वानिया स्टेट यूनिवर्सिटी प्रेस से जेम्स ई महोन, जूनियर
की किताब ‘मोबाइल कैपिटल ऐंड लैटिन अमेरिकन डेवलपमेंट’ का प्रकाशन हुआ । लेखक के
अनुसार विषय के मुताबिक इस किताब में अपघटन और सतहीपन का खतरा है । चल मुद्रा को
एकमात्र कारक न मानने के बावजूद आधुनिक राजनीति में उसके महत्व को वे बुनियादी
मानते हैं । असल में अस्सी और नब्बे के दशक में लैटिन अमेरिका के राष्ट्रपतियों और
वित्त मंत्रियों ने अंतर्राष्ट्रीय पूंजी प्रवाह का बेहद तेज दौर देखा । दूसरी ओर
बैंकरों ने इस प्रवाह को सरकारों को अनुशासित रखने के लिहाज से उपयुक्त समझा । लेखक
की कोशिश यह देखने की है कि राजनेताओं ने बैंकरों का पक्ष क्यों लिया । इसी क्रम में 1997 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी
प्रेस से पीटर बावेर की प्रस्तावना के साथ पाल क्रेग राबर्ट्स और कारेन लाफ़ोलेत
अराउजो की किताब ‘द कैपिटलिस्ट रेवोल्यूशन इन लैटिन अमेरिका’ का प्रकाशन हुआ ।
लैटिन अमेरिका में नवउदारवाद के प्रथम प्रयोग ने उससे जुड़े तमाम अन्य पहलुओं
को भी अध्ययन का विषय बना दिया । मसलन 1998 में द
पेनसिल्वानिया स्टेट यूनिवर्सिटी प्रेस से फिलिप डी आक्सहोर्न और ग्रेसीला दुकातेनज़ेइलेर
के संपादन में ‘ह्वाट
काइंड आफ़ डेमोक्रेसी? ह्वाट
काइंड आफ़ मार्केट?: लैटिन
अमेरिका इन द एज आफ़ नियोलिबरलिज्म’ का प्रकाशन
हुआ । इन राजनीतिक हलचलों का एक विशेष रूप वाम का उभार रहा । इसी तथ्य को उजागर करते
हुए 1999 में वेस्टव्यू से जेम्स पेत्रास की किताब ‘द लेफ़्ट स्ट्राइक्स बैक: क्लास
कंफ़्लिक्ट इन लैटिन अमेरिका इन द एज आफ़ नियोलिबरलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । 2012 में द यूनिवर्सिटी आफ़ अरिज़ोना प्रेस से रोबेर्ता
राइस की किताब ‘द न्यू पोलिटिक्स आफ़ प्रोटेस्ट: इंडीजेनस मोबिलाइजेशन इन लैटिन
अमेरिका’ज नियोलिबरल एरा’ का प्रकाशन हुआ ।
लेकिन लैटिन अमेरिकी राजनीति का यही एकमात्र रूप नहीं रहा । उसके दूसरे रूप
को सामने लाते हुए 1999 में स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से सांद्रा मैकगी ड्यूश
की किताब ‘लास देरेचास: द एक्सट्रीम राइट इन अर्जेन्टिना, ब्राजील, ऐंड चिली,
1890-1939’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि लैटिन अमेरिका के इतिहास की
छानबीन करने वालों को यकीन है कि वामपंथी क्रांतिकारी बदलाव ही इस इलाके की
प्रवृत्ति रही है लेकिन सच यह है कि वाम के मुकाबले दक्षिणपंथ का शासन इस इलाके
में अधिक समय तक रहा है । अगर वह शासन में नहीं भी रहा तो विभिन्न देशों में प्रतिक्रांतिकारी
समूहों का प्रभाव पर्याप्त रहा है । लैटिन अमेरिका के निर्भर पूंजीवाद ने पुराने
समाजार्थिक ढांचों को बरकरार रखा और इनके चलते दक्षिणपंथी आंदोलन और सोच की प्रभावी
उपस्थिति इस इलाके में रही । इसके बावजूद अध्येताओं को क्रांतियों में अधिक रुचि
रही । साठ के दशक तथा क्यूबा क्रांति के बाद से ही लैटिन अमेरिका पर शोध करने वाले
वामपंथी आंदोलनों का अध्ययन करते रहे हैं । दक्षिणपंथ को आदिम या असामान्य कहकर
खारिज किया जाता रहा । कुछ अध्ययन हुए भी तो किसी एक देश या आंदोलन या नेता पर ही
केंद्रित रहे । इसी कमी को पूरा करने के मकसद से इस किताब को तैयार किया गया है ।
जिनका अध्ययन किया गया है वे तीनों देश लैटिन अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण देश हैं
।
2003 में पालग्रेव मैकमिलन से रोनाल्डो मुन्क की किताब ‘कनटेम्पोरेरी लैटिन अमेरिका’ का
प्रकाशन हुआ । किताब के नौ अध्यायों में इस महाद्वीप का समग्र परिचय पाठक को मिल
जाता है । साथ ही उसकी राजनीति में वाम उपस्थिति तथा उस राजनीति की पारंपरिक वाम
राजनीति के मुकाबले सामाजिक सवालों को उठाने और नए समाज की रचना में समाज की रचनात्मक
पहल को मुक्त करने की विशेषता का कारण भी बहुत कुछ समझ में आने लगता है ।
2004 में ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस से पीटर विन के संपादन में ‘विक्टिम्स आफ़
चीलियन मिरैकल: वर्कर्स ऐंड नियोलिबरलिज्म इन द पिनोशे एरा, 1973-2002’ का प्रकाशन
पाल ड्रेक की प्रस्तावना के साथ हुआ । उनका कहना है कि पीटर विन और उनके साथी
लेखकों ने लैटिन अमेरिका के सर्वाधिक सफल प्रयोग को चुनौती देने का साहस किया है ।
इसके लिए उन्हें चमकदार आंकड़ों से छिपाये गये मनुष्य के हालात की छनबीन करनी पड़ी
है । चिली के चमत्कार की भारी कीमत विभिन्न क्षेत्रों के मजदूरों को चुकानी पड़ी थी
। इस बाजारोन्मुखी अभियान का दुष्प्रभाव स्त्रियों पर सबसे अधिक पड़ा । पर्यावरण को
भी इससे बेहिसाब क्षति हुई । मजदूरों की तकलीफ का बयान करने के साथ किताब में उनके
प्रतिरोध को भी दर्ज किया गया है ।
2005 में प्लूटो प्रेस से जेम्स पेत्रास और हेनरी वेल्टमेयर की किताब ‘सोशल मूवमेंट्स ऐंड स्टेट पावर: अर्जेंटिना, ब्राजील, बोलीविया, इक्वाडोर’ का प्रकाशन
हुआ । सामाजिक आंदोलनों और सरकारों के सहकार का जो प्रयोग लैटिन अमेरिका में हुआ उसे
ढेर सारे विद्वान समाजवादी निर्माण की दिशा में मौलिक और रचनात्मक योगदान मानते हैं
। इसी पहलू को उभारते हुए 2006 में
प्लूटो प्रेस से डी एल रेबी की किताब ‘डेमोक्रेसी
ऐंड रेवोल्यूशन: लैटिन
अमेरिका ऐंड सोशलिज्म टुडे’ का
प्रकाशन हुआ ।
आश्चर्य नहीं कि लैटिन अमेरिका नव उदारवाद के विरोध की बहुरंगी छटा का गवाह
रहा । यहां तक कि जिन देशों में क्रांतियां हुईं भी वहां नये प्रयोग हुए । 2006 में द एम आइ टी प्रेस से जेवियर सान्तिसो की किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘लैटिन अमेरिका’ज पोलिटिकल
इकोनामी आफ़ द पासिबुल: बीयान्ड
गुड रेवोल्यूशनरीज ऐंड फ़्री-मार्केटियर्स’ का प्रकाशन हुआ । अनुवाद क्रिस्टीना सैनमार्टिन और एलिज़ाबेथ मरी ने किया है
। किताब लैटिन अमेरिका के उन अर्थतंत्रो की जानकारी देती है जो नवउदारवाद के विरोध
में उभरे लेकिन लोक कल्याण से बहुत आगे नहीं गए । उन्होंने न तो उदारीकरण का ही
रास्ता अपनाया और न सोवियत शैली का ही अनुकरण किया ।
2006
में वर्सो से तारिक अली की किताब ‘पाइरेट्स आफ़ द कैरीबियन: एक्सिस आफ़ होप’ का
प्रकाशन हुआ । यह किताब लैटिन अमेरिका के उन विद्रोही नेताओं के बारे में है जो
अपने अपने देशों में नवउदारवाद विरोधी गोलबंदी के राजनीतिक नायक बनकर उभरे । लेखक
को इन देशों की यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो उन्हें तस्वीर बेहद आशाजनक
प्रतीत हुई । दुनिया भर में जारी धार्मिक
पुनरुत्थान के मुकाबले इन देशों में नीचे से सामाजिक कल्याणकारी नीतियों के पक्ष
में दबाव पैदा हो रहे थे । इन नेताओं को बदनाम किया जाता है लेकिन अपने देशों की
जनता में इन्हें मुक्ति के प्रतीक के बतौर सम्मान हासिल है ।
2007 में
ज़ेड बुक्स से मार्ता हारनेकर की स्पेनी भाषा की किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘रीबिल्डिंग द लेफ़्ट’ का
प्रकाशन हुआ । हारनेकर चिली की हैं । पेरिस में लुइ अल्थूसर के साथ अध्ययन के बाद
वे अपने देश लौटीं लेकिन अलेंदे की हत्या और उनकी सरकार के तख्तापलट तथा पतन के
बाद उन्हें क्यूबा में निर्वासित होना पड़ा । उनके लेखन की विशेषता व्यावहारिक
आंदोलन के साथ वाम राजनीति के रचनात्मक संवाद का रेखांकन है । वेनेजुएला के शावेज
सरकार से लेकर ब्राजील के भूमिहीन किसान आंदोलनों तक लैटिन अमेरिका की तमाम हलचलों
का वे लगातार विवेचन-विश्लेषण
करती रहती हैं । उनकी इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद जेनेट डकवर्थ ने किया है ।
किताब को चार भागों में बांटा गया है । पहला भाग वामपंथ और नई दुनिया की टक्कर पर
केंद्रित है । इसमें दुनिया में आए बुनियादी बदलावों के साथ ही जनता के गहन
विक्षोभ का विवेचन किया गया है । साथ ही वैकल्पिक सामाजिक खेमे की रचना के बारे
में सोचा गया है । दूसरा भाग ‘पार्टी’ के पारंपरिक ढांचे के संकट और नई वाम राजनीतिक संस्कृति के निर्माण की
जरूरत को रेखांकित करता है । तीसरा भाग नवीन राजनीतिक उपकरणों की पहचान करता है ।
चौथे भाग का विषय सुधार से क्रांति की दिशा में बढ़ती लैटिन अमेरिकी राजनीतिक
प्रक्रिया का वर्णन है ।
2007 में ब्रिल से रिचर्ड ए डेलो बुआनो और जोसे बेल लारा के संपादन में ‘इम्पीरियलिज्म, नियोलिबरलिज्म
ऐंड सोशल स्ट्रगल्स इन लैटिन अमेरिका’ का
प्रकाशन हुआ । किताब की प्रस्तावना हवाना स्थित अमेरिकी अध्ययन केंद्र के निदेशक
अदलबेर्तो रोन्डावरोना ने लिखी है । इसके बाद संपादकों की भूमिका है । किताब में
शामिल लेख तीन भागों में बांटे गए हैं । पहला भाग नवउदारवाद के संकट से जुड़े छह
लेखों का है । दूसरे भाग के चार लेखों में विकास के वामपंथी रास्ते का विवेचन है ।
इसमें क्यूबा, ब्राजील, वेनेजुएला और उरुग्वे के प्रयासों की समीक्षा की गई है । तीसरे भाग में
शामिल छह लेखों में लैटिन अमेरिकी देशों में साम्राज्यवादी दबदबे और उसके प्रतिरोध
के आपसी विरोध से बने माहौल का विवेचन है । इसमें आंद्रे गुंदर फ़्रैंक का भी एक
लेख और उनकी स्मृति में एक लेख शामिल किया गया है ।
2008 में द
जान्स हापकिन्स यूनिवर्सिटी प्रेस से विलियम आइ राबिन्सन की किताब ‘लैटिन अमेरिका ऐंड ग्लोबल कैपिटलिज्म: ए क्रिटिकल ग्लोबलाइजेशन पर्सपेक्टिव’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि हाल के वर्षों में दुनिया भर में ऐसे
बदलाव आए हैं जिनको समझने में पहले की धारणाओं के आधार पर मुश्किल पेश आ रही है ।
परिवर्तन की गति भी काफी तेज हुई है । इसे वैश्वीकरण का नाम दिया गया है जिसे ढेर
सारे लोग नई सदी की प्रमुख धारणा मानते हैं । इसी के सिलसिले में होनेवाले विचार
विमर्श को इस किताब में समेटने की कोशिश की गई है । वैश्वीकरण की यह धारणा बहुत
सारी चीजों को व्याख्यायित करने में समर्थ है । लगभग सभी ज्ञानानुशासनों में इस
धारणा की व्याप्ति हो चली है । कुछ लोग इस प्रक्रिया के खास अनुप्रयोग को समझने की
कोशिश कर रहे हैं तो कुछ इस धारणा के बारे में ही सोच विचार जारी रखे हुए हैं ।
किताब में इन दोनों को सामने रखा गया है । एक ओर वैश्वीकरण की सामान्य प्रक्रिया
तो दूसरी ओर लैटिन अमेरिका में उसके फलितार्थ को भी देखा गया है ।
2009 में ज़ेड
बुक्स से जेराल्डीन लाइवेस्ली और स्टीव लुडलैम के संपादन में ‘रीक्लेमिंग लैटिन अमेरिका: एक्सपेरिमेंट्स
इन रैडिकल सोशल डेमोक्रेसी’ का प्रकाशन
हुआ । किताब का मकसद उस प्रक्रिया का विवेचन है जिसके तहत लंबे नवउदारवादी स्वाद के
बाद समूचे लैटिन अमेरिका में वाम राजनीति लोकप्रिय हो गई ।
2009 में
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से एडुआर्डो सिल्वा की किताब ‘चैलेन्जिंग नियोलिबरलिज्म इन लैटिन अमेरिका’ का प्रकाशन हुआ । किताब के शुरू में लैटिन अमेरिकी नवउदारवाद विरोधी जन
आंदोलनों का जायजा लेने के बाद उनके राजनीतिक प्रतिफलन तथा सत्ताओं पर कब्जे की
प्रक्रिया पर विचार किया गया है । इसके बाद अर्जेंटिना, बोलिविया, इक्वाडोर, वेनेजुएला, पेरू
और चिली जैसे कुछ प्रमुख देशों के हालात का ब्योरा दिया गया है ।
2011 में मंथली
रिव्यू प्रेस से स्टीव ब्रावेर की किताब ‘रेवोल्यूशनरी
डाक्टर्स: हाउ वेनेजुएला ऐंड क्यूबा आर चेंजिंग द वर्ल्ड’स कंसेप्शन आफ़ हेल्थ केयर’ का प्रकाशन
हुआ । लैटिन अमेरिका में घेरेबंदी के दौरान क्यूबा ने किसी भी प्राकृतिक आपदा के दौरान
पूरी दुनिया में डाक्टरों के दल भेजकर और देश में चिकित्सा की शिक्षा के लिए पड़ोसी
मुल्कों के विद्यार्थियों को मुफ़्त दाखिला देकर तथा घरेलू मोर्चे पर स्वास्थ्य की सर्वोत्तम
व्यवस्था बनाकर नैतिक और भौतिक रूप से ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी । उसी संघर्ष का बयान इस किताब
में किया गया है ।
2011 में ज़ेड बुक्स से फ़्रांसिस्को डोमिंगुएज़, जेराल्डीन लाइवेस्ली और स्टीव लुडलैम के संपादन में ‘राइट-विंग पोलिटिक्स इन द न्यू लैटिन अमेरिका: रिएक्शन ऐंड रिवोल्ट’ का प्रकाशन
हुआ । संपादकों का कहना है कि इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में लैटिन अमेरिका में शासन में
आयी वामपंथी सरकारों की प्रतिक्रिया में उपजे दक्षिणपंथी विपक्ष के हालात का बयान करना
इस किताब का मूल मकसद है । यह अध्ययन जरूरी है । जो सरकारें सत्ता में आयीं उनके पक्ष
में बहुमत थोड़ा ही था और निकारागुआ में तो कुल मत कम ही थे । इन सरकारों के बनने की
मुख्य वजह अमेरिकी धौंस के साथ अपनायी गयी नवउदारवादी समाजार्थिक और राजनीतिक नीतियों
से लोगों का भारी असंतोष था । इन नीतियों के पक्ष में दक्षिणपंथी सरकारें, पार्टियां, चिंतक, कारपोरेशन, धर्मसत्ता
और मीडिया खड़े थे ।
2012 में द यूनिवर्सिटी आफ़ शिकागो प्रेस से एवेलीन ह्यूबर और जान पी स्टीफेन्स की
किताब ‘डेमोक्रेसी ऐंड द लेफ़्ट: सोशल पालिसी ऐंड इनइक्वलिटी इन लैटिन अमेरिका’ का प्रकाशन हुआ । 1970 दशक में
लेखकों के बीच साझेदारी की शुरुआत हुई थी । तब उन्होंने यूरोपीय सामाजिक जनवाद और लैटिन
अमेरिका के सुधारवादी तथा पुनर्वितरणमूलक राजनीतिक बदलाव की आपसदारी पर ध्यान दिया
था । उस समय लैटिन अमेरिका में तानाशाही शासक अधिक थे लेकिन बदलाव आ रहा था । जमैका
में पुनर्वितरणमूलक सुधारवाद हो रहा था । वह सरकार सत्ता से बाहर हो गई लेकिन वाम ताकतों
ने उनके इस प्रयोग से सीखा । इसका अगला चरण अलेंदे की सरकार थी । इन कल्याणकारी सरकारों
की अस्थिरता को देखते हुए लेखकों ने लोकतंत्र को टिकाऊ बनाने की नीतियों के बारे में
थोड़ा गहराई से सोचना शुरू किया ।
2012 में ज़ेड बुक्स से गियान लुका गार्दिनी की इतालवी में 2009 में छपी
किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘लैटिन अमेरिका इन द 21स्ट सेन्चुरी: नेशंस, रीजनलिज्म,
ग्लोबलाइजेशन’ प्रकाशित हुआ । अनुवाद गेम्मा ब्राउन ने किया है । लैटिन अमेरिका
बहुत ही विशाल और विविधता से भरा महाद्वीप है । इतिहास, संस्कृति तथा राजनीतिक
सामाजिक प्रयोगों के लिहाज से उसकी समृद्धि चकित करती है । व्यापक दुनिया के साथ
वह भी संक्रमण से गुजर रहा है । अल्पविकास, गरीबी, निर्भरता, वाम और दक्षिण,
पश्चिम और पूरब जैसी कोटियों के सहारे वर्तमान लैटिन अमेरिका की जटिलता को समझना
सम्भव नहीं रह गया है । लैटिन अमेरिका की धारणा ही पर्याप्त विवादास्पद हो चली है
।
2013 में ज़ेड बुक्स से रोजर बरबक, मिशेल
फ़ाक्स और फ़ेडरिको फ़ुएंतिस द्वारा लिखित किताब ‘लैटिन अमेरिका’ज टरबुलेंट
ट्रांजीशंस: द फ़्यूचर आफ़ ट्वेंटी फ़र्स्ट सेंचुरी सोशलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । किताब लैटिन अमेरिकी देशों में समाजवादी आंदोलनों और
प्रयोगों का परिचय देती है और उनकी परीक्षा भी करती है । किताब के विभिन्न अध्याय
अलग अलग लेखकों ने लिखे और फिर सामूहिक चर्चा के बाद उन्हें अंतिम रूप दिया गया ।
लेखकों के मुताबिक फिलहाल लैटिन अमेरिका को परदे के पीछे छिपा दिया गया है । टकराव
खाड़ी के देशों में हो रहे हैं । आर्थिक संकट की गिरफ़्त में यूरोप है । चीन उभरती
हुई महाशक्ति है और अमेरिका पीछे छूट रहा है । लैटिन अमेरिका की बात होती भी है तो
मादक द्रव्य की तस्करी या आप्रवासी संकट की वजह से ही । लोग ध्यान ही नहीं देते कि
लैटिन अमेरिका भारी उथल पुथल और संक्रमण से गुजर रहा है । इसका नतीजा विश्व इतिहास
के लिए निर्णायक होगा । किताब में इस सिलसिले में दो विकासमान प्रवृत्तियों की बात
की गयी है । एक कि इस गोलार्ध में अमेरिका का प्रभुत्वशाली दरजा खात्मे की ओर है
और दूसरी तरफ लैटिन अमेरिका में समाजवाद का उभार और पुनर्जीवन हो रहा है ।
2013 में ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस से एनरिक डसेल की स्पेनी में लिखी किताब का
अंग्रेजी अनुवाद ‘एथिक्स
आफ़ लिबरेशन: इन द एज आफ़ ग्लोबलाइजेशन ऐंड एक्सक्लूजन’ शीर्षक से छपा है ।अनुवाद एदुआर्दो मेन्दीता, केमिलो पेरेज़ बुस्तिलो, योलन्दा
अंगुलो और नेल्सन माल्दोनादो-तोरेस ने
किया है । अनुवाद का संपादन अलेजान्द्रो एवालेगा ने किया है । एक पुस्तक श्रृंखला
के तहत इसका प्रकाशन हुआ है जिसे ‘लैटिन
अमेरिका अदरवाइज: लैंग्वेजेज, एम्पायर्स, नेशंस’ का नाम दिया गया है ।
2013
में मंथली रिव्यू प्रेस से डंकन ग्रीन की स्यू ब्रैनफ़ोर्ड के साथ लिखी किताब
‘फ़ेसेज आफ़ लैटिन अमेरिका’ के चौथे संस्करण का प्रकाशन हुआ । स्यू ब्रैनफ़ोर्ड ने इस
नये संस्करण को लेखक डंकन ग्रीन के साथ परामर्श करके अद्यतन बनाया है । उनका कहना
है कि बाहरी दुनिया लैटिन अमेरिका को खास नजर से देखती रही है । इसकी शुरुआत
सोलहवीं सदी में स्पेनियों की लालची निगाह से हुई थी । थामस मूर को यूटोपिया की
प्रेरणा इसी जगह से मिली थी । उसके बाद से लैटिन अमेरिकी लूट जारी रही और उसे अचम्भे
से देखा भी जाता रहा । वहां के लेखकों ने विकसित देशों के साहित्य में उसी तरह
ताजगी भरी जैसे अमेजन के जंगल प्राणवायु का स्रोत हैं । अब वहां के साहित्यकारों
ने जादुई यथार्थवाद की पुरानी दुनिया से आगे जाकर नशे और हिंसा के यथार्थ को भी
लेखन का विषय बनाना शुरू किया है । लैटिन अमेरिकी समाज के इस जटिल और अंतर्विरोधी
स्वरूप को सामने लाने का प्रयास किताब में किया गया है । किताब को पहली बार 1991
में छापा गया था जब लैटिन अमेरिका में कोलम्बस के आगमन की पांच सौवीं सालगिरह का
उत्सव मनाया जा रहा था ।
2015 में
प्लूटो प्रेस से माइक गोनज़ालेज़ और मारियानेला यानेस की किताब ‘द
लास्ट ड्राप: द पोलिटिक्स आफ़ वाटर’ का
प्रकाशन हुआ । किताब लैटिन अमेरिका में स्थानीय निवासियों और कारपोरेट धन्नासेठों
के टकराव की पृष्ठभूमि में अवस्थित है । इन टकरावों में पानी भी महत्वपूर्ण मुद्दा
है । पानी के स्रोत पारम्परिक रूप से स्थानीय आबादी के कब्जे में थे । पूंजीवाद के
नवउदारवादी लोभ ने पीने के पानी से लाभ उठाने के लिए इन स्रोतों और उससे जुड़ी जमीन
पर जबरन कब्जा कर लिया । लैटिन अमेरिका की वाम राजनीति में स्थानीय आबादी के सवाल
बेहद जरूरी हैं । इसी पृष्ठभूमि में समूचे राज्य और समाज में उथल पुथल चलती रहती
है ।
2015 में रटलेज से बेनेडिक्ट बुल और मारिएल अग्विलार-स्तोएन के संपादन में ‘एनवायरनमेंटल पोलिटिक्स इन लैटिन अमेरिका: एलीट
डायनामिक्स, द लेफ़्ट टाइड ऐंड सस्टेनेबुल डेवलपमेंट’ का प्रकाशन हुआ । किताब में कुल बारह लेख
संकलित हैं । इनमें पहला और अंतिम संपादकों ने प्रस्तावना और उपसंहार की तरह लिखे
हैं । लेखों को खेती और जैव प्रौद्योगिकी, खनन तथा वानिकी के
तीन हिस्सों में लगाया गया है । संपादकों के मुताबिक औपनिवेशिक काल से ही लैटिन
अमेरिका में सामान्य जनता से कुलीनों को अलगाया गया । इस मामले में प्राकृतिक संसाधनों
पर कुलीनों के कब्जे ने मदद की ।
2017 में
रटलेज से मार्गरेट मायर्स और कैरोल वाइज के संपादन में ‘द
पोलिटिकल इकोनामी आफ़ चाइना-लैटिन अमेरिका रिलेशंस इन द न्यू मिलेनियम: ब्रेव न्यू
वर्ल्ड’ का
प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना और जोसे लुइस लियोन-मानरिक्वेज के उपसंहार
के अतिरिक्त किताब में शामिल ग्यारह लेख दो हिस्सों में हैं । पहले हिस्से के
लेखों में प्रशांत महासागर के आर पार चीन से लैटिन अमेरिका को सहायता और पूंजी
प्रवाह की शक्ल में राजनय का तथा दूसरे हिस्से के लेखों में नयी सदी में विकास की
धारा का आलोचनात्मक मूल्यांकन हुआ है ।
2018 में
यूनिवर्सिटी आफ़ नेब्रास्का प्रेस से कोल्बी रिस्तोव की किताब ‘ए
रेवोल्यूशन अनफ़िनिश्ड: द चेगोमिस्ता रेबेलियन ऐंड द लिमिट्स आफ़ रेवोल्यूशनरी
डेमोक्रेसी इन जुचितान, ओक्साका’ का प्रकाशन हुआ । यह किताब मेक्सिको के मूल
निवासियों के अधूरे विद्रोह का विवरण पेश करती है । समूचे लैटिन अमेरिका में वाम
उभार के साथ अभिन्न रूप से मूल निवासियों के सशस्त्र विद्रोह की धारा भी जुड़ी हुई
है । जिन देशों में वामपंथी सरकारें बनीं उन्होंने भी नव उदारवादी कुलीन शासकों के
विरोध में इन समुदायों के स्वशासन को भिन्न भिन्न रूपों में आजमाया ।
2020 में
रटलेज से अन्तोनियो कोस्टा पिन्टो की किताब ‘लैटिन
अमेरिकन डिक्टेटरशिप्स इन द एरा आफ़ फ़ासिज्म: द कारपोरेटिस्ट वेव’
का प्रकाशन हुआ । किताब में फ़ासीवादी
दौर की लैटिन अमेरिकी तानाशाहियों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है । उस समय के
कारपोरेटीकरण के साथ तानाशाही सत्ता का उभार तमाम देशों में हुआ था लेकिन उनका कोई
तुलनात्मक अध्ययन उपलब्ध नहीं था । इस विषय पर लेखक का लेखन जगह जगह छपता रहा ।
इसमें 1930 दशक में लैटिन अमेरिका
में उदार लोकतंत्र के विकल्प के रूप में तानाशाह शासन के उभार का विवेचन है । देखा
गया है कि पूरे लैटिन अमेरिका में इस प्रवृत्ति का प्रसार क्यों हुआ । इसमें किस
तरह की प्रक्रियाओं का विस्तार हुआ । इनमें कारपोरेटीकरण को ही क्यों पसंद किया गया
। दोनों विश्वयुद्धों के बीच की इस परिघटना पर सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य के साथ ठोस
मामलों की चीरफाड़ की गई है ।
2020
में रटलेज से दिर्क क्रुइत, एदुआर्दो
रे त्रिस्तान और अल्बेर्तो मार्टिन अल्वारेज़ के संपादन में ‘लैटिन अमेरिकन गुरिल्ला मूवमेंट्स: ओरिजिन्स,
इवोल्यूशन, आउटकम्स’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों के लिखे पश्चलेख के अतिरिक्त किताब में अठारह
लेख संकलित हैं । शुरू के दो लेखों में पहला संपादकों की प्रस्तावना और दूसरा
दिर्क क्रुइत का क्यूबा और लैटिन अमेरिकी वाम के बारे में हैं । शेष को कुल चार
हिस्सों में रखा गया है । पहले में साठ की प्रथम क्रांतिकारी लहर, दूसरे में सत्तर की दूसरी क्रांतिकारी लहर, तीसरे
में तीसरी क्रांतिकारी लहर और चौथे में विशेष मामलों से जुड़े लेख हैं । शुरू के दो
हिस्सों का प्राक्कथन एदुआर्दो रे त्रिस्तान ने, तीसरे का
अल्बेर्तो मार्टिन अल्वारेज़ ने तथा आखिरी हिस्से का प्राक्कथन दिर्क क्रुइत ने
लिखा है ।
2020
में मैकगिल-क्वीन’स
यूनिवर्सिटी प्रेस से रोनाल्डो मुन्क की किताब ‘सोशल
मूवमेंट्स इन लैटिन अमेरिका: मैपिंग द मोजैक’
का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है
कि लैटिन अमेरिका के सामाजिक आंदोलनों का प्रचार तो बहुत हुआ है लेकिन उन्हें समझा
कम गया है । ऐसा माना जाता है कि बेहतर जीवन के लिए संचालित सामाजिक संघर्ष और
गोलबंदी की प्रयोगभूमि लैटिन अमेरिका बना हुआ है । यह बात बहुत गलत भी नहीं है ।
सरकार के स्तर पर तो राजनीति का रंग और तदनुसार नीतियों में बदलाव आता रहता है
लेकिन सड़क पर सामाजिक आंदोलनों में कोई कमी नहीं आती । 2000 के बाद से ही लैटिन
अमेरिकी प्रगतिशील या मध्य वाम सरकारों की जीत और उनके पराभव के बारे में बहुत
विचार हुआ है । उनसे लगता है कि इस तरह का कोई चक्र चलता है । इस सोच के मुताबिक वाम
में भी भेद किया जाता है जिसमें कुछ वामपंथी बहुत उथल पुथल नहीं मचाते जबकि कुछ
अन्य शासन स्थापित व्यवस्था को गहरी चुनौती देते हैं । कहा जाता है कि जो कठोर
वामपंथी होते हैं वे साम्राज्यवाद को धता बताते हुए बुनियादी बदलाव लाने की कोशिश करते
हैं और नरम वामपंथी शासक उदार लोकतंत्र का बहुत विरोध नहीं करते और स्थापित मान्यताओं
के भीतर ही काम करते हैं । लेखक का कहना है कि इस तरह के सरलीकरण के सहारे विगत बीस
साल से जारी राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों की जटिल अंत:क्रिया को समझना मुश्किल है ।
2021
में हेड आफ़ जीयस से विल ग्रांट की किताब ‘!पापुलिस्ता!: द राइज आफ़ लैटिन अमेरिका’ज 21स्ट सेन्चुरी स्ट्रांगमैन’ का प्रकाशन हुआ । इसमें शावेज़, लुला, मोरालेस, कोरिया, ओर्तेगा और
फ़िदेल के बारे में बताया गया है । ये सभी लोग लैटिन अमेरिका के विभिन्न देशों के
वाम झुकाव वाले शासक रहे हैं । लेखक का मानना है कि इस सदी की राजनीति का
पारिभाषिक शब्द पापुलिज्म है । लंदन से लाहौर तक और मास्को से मनीला तक मतदाता
पापुलिस्ट नेताओं के सफेद झूठ और अर्ध सत्य के बीच अंतर नहीं कर पा रहे हैं ।
यूरोप में अनेक देशों में लोकतंत्र विरोधी नेतागण लोकप्रिय समर्थन की लहर पर सवार
होकर सत्तासीन हो रहे हैं । तुर्की, हंगरी, फिलीपीन्स और रूस में मनमानी करने वाले नेताओं ने शासन संभाल लिया है और
उनके हटने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं । ब्रिटेन और अमेरिका भी इसी राजनीतिक
प्रवृत्ति की गरफ़्त में हैं । ये नेता अपने देशों को बुनियादी रूप से बदल दे रहे
हैं । लेखक का कहना है कि पश्चिमी दुनिया के इन बदलावों के बारे में इतनी बातें हो
रही हैं कि लैटिन अमेरिका में पिछले दो दशक से जारी वामपंथी लोकप्रिय नेताओं को
लोग भूल जा रहे हैं ।
2
फ़रवरी 1999 को तेल के मामले में धनी देशों में से एक वेनेजुएला में भारी मतों से
चुनाव जीतकर राष्ट्रपति के पद पर शावेज आसीन हुए । 25 नवम्बर 2016 को उनके
राजनीतिक गुरू फ़िदेल कास्त्रो का नब्बे साल की उम्र में हवाना में देहांत हुआ ।
लेखक के मुताबिक इन दोनों तिथियों के बीच लैटिन अमेरिका के वाम शासन के प्रभुत्व
को समझा जा सकता है । अमेज़न से एन्डीज तक पंद्रह साल वामपंथी नेता लोकतांत्रिक
तरीके से चुने जाते रहे । सबने अपने अपने देशों में समाजवादी सुधार किये । उन सबके
चलते महाद्वीप का शक्ति संतुलन बदल गया था । इन सबके जीवन की कहानियां बेहद
रोमांचक हैं । लेखक ने उनमें से पांच को इस किताब के लिए चुना है । इन सबके साथ
क्यूबाई क्रांति के जनक फ़िदेल को भी शामिल किया गया है क्योंकि उन्होंने ही इन
सबकी राह हमवार की थी ।
आम
तौर पर इन सबको एक साथ रखकर देखा जाता है लेकिन इनके व्यक्तित्व में पर्याप्त अंतर
मौजूद हैं । उन सबकी समाजार्थिक पृष्ठभूमि और भौगोलिक वातावरण भी जुदा जुदा रहे ।
व्यक्तियों के इन भेदों की तरह ही उनके आंदोलन भी भिन्न भिन्न प्रकृति के थे । इन
सबका उभार अपने अपने देशों की विशेष राजनीतिक पृष्ठभूमि में ही हुआ और उन देशों के
पुराने नेताओं की छवि से वे प्रभावित भी रहे । इसके बावजूद वे वर्तमान सदी के
आरम्भिक दशक में लैटिन अमेरिकी राजनीति के खास मौके पर आपस में घुल मिल गये । उन
सबने गरीबी और विषमता में काफी घटोत्तरी लायी । अपने अपने देशों के संसाधनों का
उपयोग उन्होंने सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लिए किया ।
2021 में यूनिवर्सिटी आफ़ फ़्लोरिडा प्रेस से तान्या हार्मर और अल्बर्तो मार्तिन
अल्वारेज़ के संपादन में ‘टुवर्ड ए
ग्लोबल हिस्ट्री आफ़ लैटिन अमेरिका’ज
रेवोल्यूशनरी लेफ़्ट’ का प्रकाशन हुआ
। संपादकों की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब के दो भागों में सात लेख संकलित हैं ।
पहले भाग के लेखों में तीसरी दुनिया के साथ वाम लैटिन अमेरिकी क्रांतिकारी ताकतों के
सम्पर्क का विवेचन है । दूसरे भाग में यूरोप के साथ इसी किस्म के सम्पर्कों का
विश्लेषण है । इसके बाद वान गोस्से का पश्चलेख शामिल किया गया है । किताब की
शुरुआत फ़िदेल की उस घोषणा से होती है जिसमें वे क्यूबा और लैटिन अमेरिका को इसी
दुनिया का अभिन्न अंग होने की बात कहते हैं । क्यूबा की क्रांति भी विश्व
क्रांतिकारी परियोजना का हिस्सा थी । साम्राज्यवाद से उत्पीड़ित औपनिवेशिक जनता की
क्रांति के साथ ही उन्होंने इसे जोड़ा । इस टकराव से ही नयी दुनिया को पैदा होते
उन्होंने देखा था । असल में लैटिन अमेरिका के क्रांतिकारी वामपंथ को उसके वैश्विक
प्रभाव से अलगाकर देखना मुश्किल है । इस खित्ते के क्रांतिकारियों ने चीनी क्रांति,
अल्जीरिया और वियतनाम के मुक्तियुद्ध, फिलीस्तीन
और अफ़्रीकी संघर्षों से प्रेरणा प्राप्त की थी । इन संगठनों के अस्तित्व और विकास
के लिए यह वैश्विक सहयोग जरूरी भी था । सरकारों के साथ सीधी लड़ाई में तमाम
संसाधनों की मदद चाहिए थी । हवाना में 1966 के आरम्भ में तीनों गरीब महाद्वीपों से
जुटे क्रांतिकारियों की सूची को देखने से ही यह स्पष्ट हो जाता है । इस जुटान में
पूर्वी और पश्चिमी यूरोप के वामपंथी भी शरीक थे ।
दुनिया भर
में लैटिन अमेरिका जिन बातों के लिए विख्यात है उनमें सामाजिक बदलाव के आवयविक
सहभागी के बतौर शिक्षा की कल्पना भी है । 2021 में रटलेज से आंद्रेस दोनोसो रोमो की स्पेनी में 2018 में छपी किताब का
अंग्रेजी अनुवाद ‘एजुकेशन इन रेवोल्यूशनरी
स्ट्रगल्स: इवान इलीच, पाउलो फ़्रेयरे, अर्नेस्तो
चेग्वारा ऐंड लैटिन अमेरिकन थाट’ का
प्रकाशन हुआ । इसका पुर्तगाली अनुवाद 2020 में छपा था । लेखक का कहना है कि किसी
न्यायपूर्ण समाज की रचना में शिक्षा की भूमिका का सवाल लैटिन अमेरिका के बौद्धिकों
में पिछले सौ सालों से बहस का मुद्दा बना हुआ है । नवउदारवाद की प्रभुता ने इस
सवाल को और भी मुश्किल बना दिया है । असल में स्थापित सामाजिक व्यवस्था को चुनौती
देने की किसी भी कोशिश को यह खारिज करता है और शिक्षा को सार्वजनिक क्षेत्र से
बाहर निकालकर निजी क्षेत्र के हाथ में सौंप देता है । इसके चलते शिक्षा को वर्तमान
व्यवस्था के चालक पैदा करने की तकनीक के बतौर समझा जा रहा है । इस किताब में
शिक्षा और सामाजिक बदलाव के रिश्ते को समझने के लिए समकालीन लैटिन अमेरिकी चिंतन
का सहारा लिया गया है । 2021 में रटलेज से मारिया अलीसिया रुएदा की किताब ‘द एजुकेशनल फिलासफी आफ़ लुइ एमीलियो रेकाबारेन:
पायनियरिंग वर्किंग-क्लास एजुकेशन इन लैटिन अमेरिका’ का प्रकाशन हुआ । किताब चिली के मजदूर वर्ग की शिक्षा के एक दार्शनिक के
बारे में है ।
2022 में
येल यूनिवर्सिटी प्रेस से ब्रित्ता एच क्रैंडल और रसेल सी क्रैंडल के संपादन में ‘“आवर
हेमिस्फीयर”?:
द यूनाइटेड स्टेट्स इन लैटिन अमेरिका, फ़्राम
1776 टु द ट्वेन्टी-फ़र्स्ट सेन्चुरी’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की भूमिका और उपसंहार के अतिरिक्त किताब में
शामिल बयालीस लेख चार भागों में हैं । पहले भाग में 1776 से 1898 तक पूरे महाद्वीप
में साम्रज्यवाद की विजय का वर्णन है । दूसरे में 1898 से 1940 तक साम्राज्य की
अवस्था का विवरण है । तीसरे भाग में 1950 से 1991 तक चले शीतयुद्ध की गरमी का
ब्यौरा है । चौथे भाग में 1989 के बाद की दुनिया में इस इलाके की भूराजनीति का
विश्लेषण किया गया है ।
2022 में
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से मार्गरीटा फ़जार्दो की किताब ‘द
वर्ल्ड दैट लैटिन अमेरिका क्रिएटेड: द यूनाइटेड नेशंस इकोनामिक कमीशन फ़ार लैटिन
अमेरिका इन द डेवलपमेंट एरा’ का
प्रकाशन हुआ । किताब में लैटिन अमेरिका के क्रांतिकारी अर्थशास्त्रियों द्वारा
पूरी दुनिया में वित्त और व्यापार के क्षेत्र में परिधि की भागीदारी बढ़ाने की
कोशिशों का विश्लेषण किया गया है । इस किस्म के प्रयास 1964 से ही शुरू हो गये थे
। दुनिया के औद्योगिक केंद्रों और कच्चे माल की उत्पादक परिधि के बीच संबंधों को
उलट देने की इस संगठित कोशिश ने आज की दुनिया का निर्माण किया है । इसी निगाह से
अब तमाम राजनेता, कार्यकर्ता और
विशेषज्ञ दुनिया की अर्थव्यवस्था को समझते हैं । लैटिन अमेरिकी अर्थशास्त्रियों के
इस समूह ने उन कोटियों और धारणाओं का इस्तेमाल किया जो सुनने में तो साम्राज्यवादी
सिद्धांतों की प्रतिध्वनि लगते हैं लेकिन उनसे बहुत अलग हैं । इन अर्थशास्त्रियों
ने आर्थिक विकास की समस्या को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के साथ जोड़ दिया ।
2022 में रटलेज से कारेन सिल्वा-टोरेस, कैरोलीना
रोज़ो-हिगुएरा और दैनिएल एस लियोन के संपादन में ‘सोशल ऐंड पोलिटिकल ट्रांजीशंस ड्युरिंग द लेफ़्ट टर्न इन लैटिन अमेरिका’ का प्रकाशन हुआ । किताब में कुल चौदह लेख
संकलित हैं । इनमें आरम्भिक दो लेख धारणागत बहस पर केंद्रित हैं जिनमें पहला
संपादकों का लिखा है । शेष बारह लेख तीन हिस्सों में हैं । आखिरी लेख भी संपादकों
का ही लिखा हुआ है । पहले हिस्से में संक्रमण में सरकारी पहल, दूसरे में सामाजिक पहल तथा तीसरे हिस्से में संक्रमण में निरंतरता और
विच्छेद का विश्लेषण करने वाले लेख शामिल किये गये हैं । संपादकों का कहना है कि
1980 के दशक से लैटिन अमेरिकी देशों में लोकतांत्रिक सरकारों का शासन फिर से शुरू
हुआ जिसे हंटिंगटन ने लोकतंत्रीकरण की तीसरी लहर कहा । 1970 दशक के अंत से 1990
दशक तक तमाम लैटिन अमेरिकी देशों में सैनिक तानाशाही का खात्मा हुआ और नागरिकों ने
चुनावों में अपनी पसंदीदा सरकारें चुनीं । नवउदारवाद के चलते इन देशों में असह्य
गरीबी और विषमता का प्रसार हुआ था । एक ओर इन समाजार्थिक हालात के विरुद्ध जनता
में विक्षोभ व्याप्त था दूसरी ओर भ्रष्टाचार के चलते राजनीति से कोई उम्मीद नहीं
बची । ऐसे में वामपंथी पार्टियों की लोकप्रियता में भारी इजाफ़ा हुआ । नतीजे के तौर
पर 2000 के बाद से ही वामपंथी सरकारों का गठन तेजी से होने लगा, सरकारों का लक्ष्य अर्थतंत्र के
संचालन में राज्य की भूमिका को बढ़ाना तथा बाजार की निरंकुश ताकतों के विनाशकारी
आर्थिक प्रभाव का मुकाबला करना था । पिछले दशक की नवउदारवादी नीतियों की यह
प्रतिक्रिया किसी एक देश तक ही सीमित नहीं रह गयी थी । इससे क्षेत्रीय स्तर पर नयी
व्यवस्था की शुरुआत हुई । बदलाव की इस बयार का आरम्भ वेनेजुएला से हुआ था ।
2022 में
ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस से फ़्रैंक गाउदीचौद, मसीमो मोदोनेसी और जेफ़री आर वेबर की किताब ‘द इम्पासे आफ़ द लैटिन अमेरिकन लेफ़्ट’ का प्रकाशन हुआ । लेखकों का कहना है कि वर्तमान सदी के शुरुआती पांच सालों
में लैटिन अमेरिका में नवउदारवाद के समर्थकों को जबर्दस्त चुनावी पराजय झेलनी पड़ी
। इसके चलते महाद्वीप के इतिहास में बड़े पैमाने पर राजनीतिक बदलाव आया । 2002 से
2006 के बीच वेनेजुएला, ब्राजील,
अर्जेन्टिना, बोलीविया, उरुग्वे,
इक्वाडोर, निकारागुआ और अल सल्वाडोर में घोषित
रूप से नवउदारवाद विरोधी पार्टियों की सरकारें बनीं । इसके कारण सदी के पहले दशक
में इस खित्ते में तमाम प्रगतिशील सरकारों का गठन हुआ । इन सरकारों ने कुछ ऐसा
वर्चस्व कायम किया कि दस से बीस साल तक ये सत्ता पर काबिज रहीं । इस दौरान चुनाव
भी होते रहे और बोलीविया तथा निकारागुआ को छोड़कर अन्य देशों में सरकार के मुखिया
भी बदलते रहे । लगता है कि अब वह प्रक्रिया थम गयी है । अर्जेन्टिना में चुनावी
हार हुई, ब्राजील में तख्तापलट हुआ और बोलीविया में भी अंत
में ऐसा ही हुआ । यही ठहराव वेनेजुएला और निकारागुआ की सरकारों के निरंतर संकट में
व्यक्त हो रहा है । किताब में इन राजनीतिक प्रयोगों के उभार, स्थायित्व और वर्तमान ठहराव की पड़ताल की गयी है । इस पड़ताल का महत्व लैटिन
अमेरिका तक ही सीमित नहीं है । इस दौर को लैटिन अमेरिकी प्रगतिशीलता के दो दशक कहा
जा सकता है ।
ऊपर ही
हमने जिक्र किया कि लैटिन अमेरिकी देशों में वाम शासन के तहत लोकतंत्र के खास तरह
के प्रयोग होते रहे हैं । इसी आयाम पर जोर देते हुए 2022 में डि ग्रूटेर से यानिना
वेल्प की किताब ‘द
विल आफ़ द पीपुल: पापुलिज्म ऐंड सिटिजेन पार्टीसिपेशन इन लैटिन अमेरिका’
का प्रकाशन हुआ ।
2023 में
रटलेज से सेबास्तियन प्ला और ई वायनी रास के संपादन में ‘सोशल
स्टडीज एजुकेशन इन लैटिन अमेरिका: क्रिटिकल पर्सपेक्टिव्स फ़्राम द ग्लोबल साउथ’
का प्रकाशन हुआ । किताब में भूमिका
के अतिरिक्त बारह लेख संकलित हैं । इनमें सेबास्तियन प्ला के दो लेख और संपादकों
की प्रस्तावना भी शामिल हैं ।
लैटिन
अमेरिका के महान शिक्षाशास्त्रियों का जिक्र ऊपर आ चुका है । उनके साथ ही जिस अन्य
रचनात्मक विस्फोट के लिए इस इलाके को जाना जाता है वह है साहित्य की दुनिया से
जुड़े लोगों का महत्व । नेरुदा का चिली का राजदूत होना कोई अकेली घटना नहीं है । साहित्य
के नोबेल पुरस्कार प्राप्त साहित्यकारों की संख्या वहां बहुत है । इसके साथ ही इस
साहित्य के प्रचार प्रसार और अनुवाद पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाता है । 2023 में
रटलेज से डेल्फ़िना काब्रेरा और डेनिस क्रिपर के संपादन में ‘द
रटलेज हैंडबुक आफ़ लैटिन अमेरिकन लिटररी ट्रांसलेशन’
का प्रकाशन हुआ । संपादकीय प्रस्तावना
के अतिरिक्त किताब के तीन हिस्सों में कुल बाइस लेख संकलित हैं । पहले हिस्से में
अनुवाद के बहाने लैटिन अमेरिकी महाद्वीप की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता पर बात की
गयी है । दूसरे हिस्से में अनूदित साहित्य के लैटिन अमेरिका के भीतर और बाहर
अभिग्रहण का विश्लेषण है । तीसरे हिस्से के लेखों में अनुवाद के प्रकाशन और वितरण
की व्यवस्था पर विचार किया गया है । संपादकों के अनुसार सदी के मोड़ पर दुनिया भर
में अनुवाद में रुचि फिर से बढ़ती नजर आयी । पहले इसे महज एक भाषा से दूसरी भाषा
में किसी पाठ का अंतरण माना जाता था लेकिन अब इसे सांस्कृतिक आदान प्रदान का अंग भी
समझा जाने लगा है ।
2023
में रटलेज से दिर्क क्रुइत और कीस कूनिंग्स के संपादन में ‘लैटिन
अमेरिकन मिलिटरी ऐंड पोलिटिक्स इन द ट्वेन्टी-फ़र्स्ट सेन्चुरी : ए क्रास-नेशनल
एनालीसिस’
का
प्रकाशन हुआ । संपादकों की लिखी प्रस्तावना और उपसंहार समेत किताब में अठारह लेख
संकलित हैं । इन्हें चार हिस्सों में रखा गया है । पहले हिस्से में बैरकों में
वापसी, दूसरे में क्षेत्रीय शक्तियों पर नियंत्रण, तीसरे
में हिंसक बहुलता और चौथे में सशस्त्र क्रांतिकारिता से जुड़े लेख रखे गये हैं
।
2023
में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस से गैब्रिएल हेटलैंड की किताब ‘डेमोक्रेसी
आन द ग्राउंड: लोकल पोलिटिक्स इन लैटिन अमेरिका’ज लेफ़्ट
टर्न’
का
प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि लोकतंत्र के बारे में लिखना और सोचना पागल कर
देने वाली बात है । इसमें भाषाई और सैद्धांतिक लचीलापन इतना अधिक है कि वर्तमान
अमेरिका में अल्पतंत्र की प्रत्यक्ष मौजूदगी के बावजूद उसे भी लोकतांत्रिक कह दिया
जाता है । इसकी धारणा को लेकर भी प्रचुर विवाद है । कुछ लोग इसे कुलीनों का
प्रतियोगी शासन मानते हैं जबकि अन्य लोग इसे जनता के जीवन को प्रभावित करने वाले
फैसलों पर उसके वास्तविक नियंत्रण की व्यवस्था मानते हैं । इसके अतिरिक्त लोकतंत्र
का अर्थ तमाम किस्म की समाजार्थिक,
सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं, नियमों,
संस्थाओं, संरचना, विश्वास
और आचरण भी किया जाता है । इतनी कठिनाई के बावजूद इस पर विचार करने की वजह यह है
कि इसकी उपेक्षा सम्भव नहीं है ।
2023 में रटलेज से एंथनी डब्ल्यू परेरा के संपादन में ‘राइट-विंग पापुलिज्म
इन लैटिन अमेरिका ऐंड बीयान्ड’ का प्रकाशन हुआ । संपादक की प्रस्तावना और उपसंहार
समेत किताब में कुल सोलह लेख संकलित हैं । इन्हें चार हिस्सों में लगाया गया है ।
पहले हिस्से में सिद्धांत, दूसरे में राजनीतिक अर्थशास्त्र, तीसरे में संस्थाओं का
हाल और चौथे हिस्से के लेखों में कोरोना महामारी से उपजे हालात का जायजा लिया गया
है ।
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