2026
में
सिमोन
& शूस्टर
से क्लारा ई मैत्तेई की किताब ‘एस्केप फ़्राम
कैपिटलिज्म: ऐन इंटरवेंशन’
का
प्रकाशन हुआ । शुरुआत 1920
में
ब्रसेल्स के प्रथम अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सम्मेलन में यूरोप के राजनेताओं और
अर्थशास्त्रियों की जुटान से हुई है । वातावरण औपचारिक लेकिन तनावग्रस्त था ।
उन्हें सामाजिक अराजकता या अस्वीकार्य अव्यवस्था से दुख था जिसके कारण पूंजीवादी
अर्थतंत्र रसातल के मुहाने पर आ पहुंचा था । इसके विरोध में वे एकताबद्ध होकर खड़े
थे । सम्मेलन का आयोजन प्रथम विश्वयुद्ध के बाद बने लीग आफ़ नेशंस ने किया था ।
इसका गठन विश्वयुद्ध में बरबाद अर्थतंत्र को पटरी पर लाने के लिए ही हुआ था । सारे
यूरोप में मुद्रास्फीति बढ़ी हुई थी,
भोजन
की किल्लत थी और हड़तालों की बाढ़ आयी हुई थी । मजदूर परेशान थे और थैलीशाहों के
शासन को चुनौती दे रहे थे । वे अर्थव्यवस्था में बुनियादी बदलाव चाहते थे ।
उद्योगों के निजी स्वामित्व को खत्म करके सरकारी या साझा मालिकाने की मांग हो रही
थी । ऐसे में सम्मेलन ने कठिन फैसला किया ।
उन्होंने
सामान्य नागरिकों के व्यवहार को आर्थिक नियमों के अनुरूप ढालने अथवा नियंत्रित
करने की वकालत की । लोगों से कड़ी मेहनत,
अल्प
उपभोग और सरकार से कोई उम्मीद न करने की आशा की गयी । जरूरी था कि पूंजीवाद की
उत्पादन प्रक्रिया में अवरोध पैदा करने आर्थिक अधिकारों की दावेदारी बंद हो । इसके
ही अनुरूप नीति निर्माण भी हुआ । सरकारी बजट में कटौती की गयी । स्वास्थ्य बीमा और
बेरोजगारी भत्ता जैसे खर्चों को रोक दिया गया । साथ ही वेतन में घटोत्तरी और
बुनियादी जरूरियात के सामानों पर अधिक टैक्स जैसे उपाय अपनाये गये । फैसला करने
वालों को मालूम था कि उनके इन कदमों का विरोध होगा । आर्थिक जरूरत के मुताबिक
नागरिकों को नियंत्रित करने की बात आसान थी, इसे करना थोड़ा कठिन था । इसके पक्ष
में जनमत को,
लोगों
की मानसिकता को तैयार करना था ताकि वे सरकारी कदमों का खुलकर साथ दें । उस समय
इटली में वर्ग संघर्ष अपने चरम विंदु पर था । मजदूरों द्वारा कारखानों पर कब्जा
किया जा रहा था । साठ शहरों में महीने भर से मजदूर खान से बंदरगाह तक, रेल से लेकर सूती
मिल तक प्रत्येक किस्म के उत्पादन पर कब्जा किये हुए थे । कामगार पतियों के लिए
भोजन लेकर औरतें कारखाने जातीं और उनके साथ बच्चे भी होते । मिल मालिकों या पुलिस
के उच्च अधिकारियों की मौजूदगी कहीं नहीं रह गयी थी । हड़ताली मजदूरों के हाथ में
सब कुछ था । देहातो में भी खेती की जमीन पर कब्जा करके वहां सहकारी खेती शुरू कर
दी गयी थी ।
लोगों
की मानसिकता उत्तर पूंजीवादी समाज जैसी बन गयी थी । इसमें उत्पादन के साधनों के
निजी मालिकाने और मालिक तथा मजदूर के शक्ति संबंध की जगह अधिक न्यायोचित ढांचों ने
लेनी शुरू कर दी थी । महायुद्ध के धक्के ने इसे आम चेतना का अंग बना दिया था कि
मूल्य और संपत्ति के उत्पादन में मजदूर की भूमिका केंद्रीय होती है । ग्राम्शी तथा
अन्य संगठकों और बौद्धिकों की अगुआई में कारखाना कौंसिलें उत्पादन और वितरण में
लोकतांत्रिक भागीदारी की चाहत का नया औजार साबित हो रही थीं । उनकी कोशिशों से
जनता आर्थिक और राजनीतिक आजादी पर अमल करना सीख रही थी । इसके आधार पर ही मुक्त और
समान उत्पादकों का नया समाज बनना था ।
मुद्रास्फीति
बेतहाशा तेजी से बढ़ रही थी और उसके ही कारण विक्षोभ की आग सुलग रही थी । भोजन की
कीमत में तेजी आने के साथ मजदूरों ने अपनी तकलीफ से लाभ उठाने वालों का विरोध करना
शुरू किया । उन्होंने चंद लोगों के हित में कार्तरत व्यवस्था के अन्याय की भी बात
शुरू की । विशेषज्ञ जानते थे कि मौद्रिक अस्थिरता कोई आर्थिक गुत्थी नहीं है जिसका
हल अर्थशास्त्री ही कर सकें । मूल तौर पर यह राजनीतिक समस्या थी । कीन्स ने माना
कि इससे मौजूदा व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा हो गयी है । उनका मानना था कि
मुद्रास्फीति और कीमतों में तेजी से न केवल विनिमय में कमी आएगी बल्कि कीमतों पर
उसके असर की वजह से संविदा और सुरक्षा तथा समूची पूंजीवादी व्यवस्था के लिए ही
मुश्किल पैदा हो जाएगी । कुछ विशेषज्ञ मुद्रास्फीति को अर्थतंत्र में मांग और
पूर्ति के बीच का असंतुलन समझते थे और इसके लिए जनता में नैतिकता की कमी को
जिम्मेदार ठहराते थे । सही है कि मजदूरों ने वेतन में बढ़ोत्तरी की लड़ाई लड़ी और
उसमें जीत हासिल होने के बाद अपने को काबू नहीं कर पाये और फिजूलखर्ची शुरू कर दी
। इसका सबूत शराब,
मिठाई, चाकलेट और बिस्कुट
के अति उपभोग की प्रवृत्ति से मिलता है । एक अर्थशास्त्री ने तो आरोप लगाया कि
मजदूर घर पर सूअर की तरह रहते हैं और शराब की भट्ठी पर सब कुछ लुटा देते हैं ।
इन्हीं
विशेषज्ञों ने बाद में चलकर फ़ासीवाद के जनक मुसोलिनी के शासन का समर्थन किया ।
इसका कारण था कि उसने वेतन में कटौती की,
समाज
कल्याण के सरकारी खर्चों पर रोक लगायी,
सार्वजनिक
सेवाओं का निजीकरण किया और ब्याज की दरें बढ़ायीं । दुनिया भर के उदारवादियों के
साथ ही राष्ट्रवादी आर्थिक विशेषज्ञों ने उसके आर्थिक कदमों की खुलकर सराहना की थी
। आज भी मजदूरों के मत्थे दोष मढ़ने की आदत अर्थशास्त्री बनाये हुए हैं । उनकी
पुरानी रुझान कायम है और सौ साल पहले की तरह ही आरोप के निशाने पर मजदूर वर्ग के
परिवार ही हैं ।
इसके
बाद लेखिका सीधे 2022 के ऐसे ही एक सम्मेलन का जिक्र करती हैं । मुद्रास्फीति की
एक और लहर ने विश्व अर्थतंत्र में उथल पुथल पैदा की हुई थी । अमेरिकी रिजर्व बैंक
के विशेषज्ञ ब्याज की दर बढ़ाने के लिए बैठक कर रहे थे । लगातार दो साल दरें तेजी
से बढ़ायी गयीं । असर सारी दुनिया के बैंकों पर पड़ा । विशेषज्ञों की भाषा अब
परिष्कृत हो गयी है लेकिन मजदूर वर्ग के प्रति शत्रुता का भाव पुराना ही है ।
गवर्नर कहते हैं कि कीमतों में स्थिरता बहाल करने के लिए आर्थिक विशेषज्ञों को
मजबूत उपाय करने होंगे जिससे तय है कि दर्द होगा । दर्द उनको होगा जो मुद्रास्फीति
के गुनाहगार हैं । ये वही हैं जो काम से उनके मुताबिक जी चुराते हैं लेकिन उपभोग
कुछ अधिक ही करते हैं । गवर्नर का मानना है कि श्रम बाजार में गड़बड़ी है क्योंकि
काम अधिक हैं और उन्हें करने लायक लोग कम हैं । इसके कारण मजदूरी बढ़ाने का दबाव
बनता है । ऐसे में बेरोजगारी बेहतर तरीका है जिससे इसकी दर को स्थिर रखा जा सकता
है । बेरोजगारी का भय मजदूर को निरीक्षकों के बिना भी अनुशासन में रखता है और वे
मेहनत से जी नहीं चुराते । कुछ लोग इन बातों को धक्कामार तरीके से भी व्यक्त करते
हैं । आस्ट्रेलिया के एक अरबपति ने आधी आबादी को रोजगार से बाहर रखने की हिमायत की
। इससे कामगारों को याद दिलाने में आसानी होगी कि वे नियोक्ता हेतु काम कर रहे हैं
। उनका कहना था कि दुनिया भर की सरकारों को बेकारी बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि
अर्थतंत्र को अपनी पटरी पर वापस लाया जा सके । इससे श्रम बाजार में मजदूरों की
ढिठाई पर अंकुश लगाने में मदद मिलने की उम्मीद थी ।
लेखिका
का कहना है कि जब कभी ब्याज दर बढ़ाने की बात की जाती है तो हम इसे दूरस्थ या
तकनीकी फैसला मानते हैं । लगता है कि उससे हमारा कोई हालिया सरोकार नहीं है या
उसके बारे में कुछ करना हमारे वश में नहीं है । इस तरह अर्थशास्त्र को राजनीति से
बाहर कर दिया जाता है और उसके बारे में फैसला लेने की प्रक्रिया में हमारी
भागीदारी नहीं होती । व्यवस्था की सफलता ही यह है कि हमारे हाथ बांध दिये जाते हैं
और जुबान पर ताला डाल दिया जाता है । अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ जिस भाषा का
इस्तेमाल करते हैं उससे लगता है कि हमारी जिंदगी को प्रभावित करने वाले आर्थिक
फैसलों के बारे में बात करने लायक ज्ञान हमारे पास नहीं है । यदि इन विशेषज्ञों की
करतूत पर ध्यान दें तो पाएंगे कि उनके फैसले बहुत ही गहरी राजनीतिक परियोजना से
उपजे हैं । वे सभी वर्तमान अर्थव्यवस्था को कायम रखना चाहते हैं क्योंकि वे इसे ही
एकमात्र सम्भव व्यवस्था समझते हैं । सौ साल पहले के अर्थशास्त्रियों की ही तरह आज
के अर्थशास्त्री भी ऐसी व्यवस्था को बचाना चाहते हैं जो न तो हमेशा से है और न ही
प्राकृतिक है लेकिन उनकी भाषा उनकी इस चिंता को छिपाती है । अगर आप मान लेंगे कि
आपका जीवन पूंजीवाद पर निर्भर है तो पूंजीवादी अर्थतंत्र को चुनौती देने वाला कोई
भी आंदोलन आपको भावुक प्रतिक्रिया के लिए मजबूर कर देगा ।
हमारे
समाज में अधिकांश सामाजिक संबंधों में मुद्रा मध्यस्थ का काम करती है ।
मुद्रास्फीति से डर लगता है क्योंकि इससे मुद्रा स्थिर नहीं रह जाती । हमारा समूचा
बाजार अर्थतंत्र मुद्रा की स्थिरता पर ही टिका हुआ है । कीन्स ने तो कहा था कि
मुद्रास्फीति से व्यवस्था को हासिल सहमति भी डगमग हो जाती है । हमें गुस्सा आता है
कि खाने पीने की चीजों की कीमत दोगुना हो गयी अथवा बिजली या गैस के खर्च की
बढ़ोत्तरी से बचत में कमी आएगी । मुद्रास्फीति से सामाजिक विक्षोभ तो पैदा होता ही
है उससे यह अनुभूति भी पैदा हो सकती है कि हमारी यह अर्थव्यवस्था सर्वोत्तम सम्भव
व्यवस्था नहीं है । इस अहसास से वैकल्पिक व्यवस्था की खोज पैदा होती है ।
1919
की मुद्रास्फीति ने यूरोप में भंडार लूटने, हड़ताल और उत्पादन पर कब्जा करने के
लिए संगठन की प्रेरणा दी थी । कोरोना के बाद अमेरिका में जो मुद्रास्फीति आयी उसने
यूनियनों के गठन की नयी लहर को जन्म दिया और यूनियनें वेतन बढ़ाने की मांग करने
लगीं । इसने मजदूरों के दिमाग में मालिकों की मंशा के प्रति संदेह को जन्म दिया
जिससे काम छोड़ने की प्रवृत्ति पैदा हुई । 2022 में ही अमेरिका के एक तिहाई मजदूरों
ने रोजगार से पीछा छुड़ा लिया । ऐसे में सौ साल पहले के अपने पुरखों के समान
वर्तमान विशेषज्ञ भी व्यवस्था में बदलाव की सम्भावना से परेशान हैं । उनकी उंगली
जिस दुश्मन की ओर उठ रही है वे मजदूर हैं । ऐसे में लेखिका की अपील है कि हमें
व्यर्थ के आरोपों के समक्ष शक्तिहीन नहीं होना होगा । आखिर ऐसी अर्थव्यवस्था को
क्यों मंजूर किया जाए जो चंद धन्नासेठों को और अमीर बनाती है जबकि आम लोग मुसीबत
में पड़े रहते हैं ।
लेखिका
का कहना है कि तमाम आर्थिक संस्थाओं के फैसले न तो निष्पक्ष हैं, न वैज्ञानिक या
नैतिक ही हैं । सबका कल्याण करने में वे बहुत पहले विफल हो चुके हैं । हमारे समाज
की मौजूदा अर्थव्यवस्था,
जिसे
पूंजीवाद कहा जाता है,
उसे
स्वाभाविक,
अपरिहार्य
और शाश्वत कहना धोखाधड़ी है । पूंजीवाद को स्वाभाविक समझने और अनेक बुनियादी फैसलों
को विशेषज्ञों पर ही छोड़ देने की हमारी आदत ने हमें शक्तिहीन बना दिया है और ऐसे
समाज के लिए हमारी सहमति हासिल कर ली है जो बहुसंख्या का उत्पीड़न करता है । लगभग
सभी अर्थशास्त्री,
टेलीविजन, सोशल मीडिया और
अखबार वही कहानी सुनाते हैं जो हमारी अर्थव्यवस्था की कार्यपद्धति की व्याख्या
करने की जगह उस पर परदा डालती है । तथ्य यह है कि व्यवस्था की विषमता विस्फोटक हो
गयी है । अमेरिका में मध्य वर्ग की आबादी कम हो रही है जबकि संपत्ति में असमानता
की खाई चौड़ी होती जा रही है । सबसे ऊपर के 0.1 फ़ीसद लोगों की
संपत्ति नीचे की आधी आबादी के पांच गुना से अधिक हो गयी है । सबसे अमीर तीन लोगों
की संपत्ति डेढ़ करोड़ अमेरिकी लोगों से अधिक हो गयी है । यह समस्या अमेरिका तक ही
सीमित नहीं है । ब्रिटेन में सबसे अमीर एक फ़ीसद लोगों के पास सत्तर फ़ीसद लोगों से
अधिक संपत्ति हो गयी है । 2014 से ही ब्रिटेन में प्रत्येक तीसरा बच्चा गरीबी में
रह रहा है जबकि इसी दौरान खरबपतियों की संख्या छह गुना बढ़ गयी ।
रोजगार
सृजन के तमाम दावों और व्यवसाय की सफलता से सबकी मदद की कहानी के बावजूद सच यही है
कि लाभ तो बाजार को ही मिल रहा है । मुनाफ़े और नागरिकों की खुशहाली में छत्तीस का
आंकड़ा होता है । एक की बढ़ती दूसरे की घटत पर निर्भर होती है । वर्तमान
अर्थव्यवस्था दमनकारी है और इस क्रूर राजनीतिक सच पर परदा डालना अर्थशास्त्र का
प्रमुख काम है । गड़बड़ी की आशंका के बावजूद हम सुबह काम पर निकल जाते हैं और आराम
का जरा भी समय न मिलने के बावजूद समाज हालात के सामान्य होने का संदेश देता है ।
आर्थिक जीवन के बारे में हमारा ठोस अनुभव अलगाव और संघर्ष का होता है इसके बावजूद
हम इसे मंजूर कर लेते हैं । यह मान लेते हैं कि इस व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है
। लेखिका के अनुसार हमारी इस मान्यता का निर्माण अर्थशास्त्र द्वारा किया गया है ।
वह हमें पूंजी की व्यवस्था के सामने समर्पण सिखाता है । इस व्यवस्था में फैसला
लेने की ताकत निजी निवेशकों के हाथों में केंद्रित हो गयी है और बहुसंख्यक लोग
किसी और के मुनाफ़े के लिए काम करने को मजबूर हो गये हैं । दुखद है कि उनको अपनी यह
मजबूरी नजर भी नहीं आती ।
इसी
कारण हम वैकल्पिक अर्थतंत्र देख नहीं पाते । दुनिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठित
विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ दशकों से हमें विकल्पहीनता की यह
कहानी सुनाते आ रहे हैं । मौजूदा अर्थव्यवस्था की असली प्रकृति पर परदा डालकर वे
हमारा दिमाग सुन्न कर देते हैं । इससे बदलाव की किसी व्यावहारिक कार्यवाही की
सम्भावना अवरुद्ध हो जाती है । लेकिन लेखिका को पूंजीवाद का विकल्प सम्भव प्रतीत
होता है । अर्थशास्त्र के संस्थापकों ने पूंजीवाद को वर्ग और वर्ग संघर्ष की निगाह
से देखा था । उनके इस नजरिए पर सौ साल से बौद्धिक और राजनीतिक टकराव जारी है ।
इसके तहत वर्ग की जगह व्यक्ति की और संघर्ष की जगह समरसता की स्थापना का प्रयास
किया गया । आर्थिक वृद्धि का चालक मजदूर की जगह उद्यमी हो गया जो बचत और निवेश
करता है । अर्थशास्त्र के पुरखों ने मजदूर को प्रमुख उत्पादक वर्ग माना और उसे
जमींदारों और पूंजीपतियों के विरोध में चित्रित किया । मार्क्स ने तो मजदूर के
शोषण को पूंजीवाद की संरचना में निहित करार दिया । इसके बदले नवशास्त्रीय
अर्थशास्त्री अपने विश्लेषण से वर्ग संघर्ष को बाहर कर देते हैं और श्रम संबंधों
को व्यक्तियों के बीच समान विनिमय की तरह प्रस्तुत करते हैं । वे यह भी कल्पना
करते और परोसते हैं कि आज मुक्त बाजार की होड़ में जो कोई अपने पत्ते सही तरीके से
चलेगा उसके लिए समृद्धि का दरवाजा खुल जाएगा ।
इन
विद्वानों ने अपने सिद्धांतों को वस्तुनिष्ठ कहा । राजनीतिक अर्थशास्त्र की जगह
शुद्ध अर्थशास्त्र की संज्ञा का प्रचलन हुआ । इसमें अर्थतंत्र को शक्ति संबंधों से
परे साबित करने की जीतोड़ कोशिश की गयी । न्यूटन के भौतिक विज्ञान के नियमों की तरह
अर्थशास्त्र के नियम बनाये गये । इन नियमों की रक्षा की जिम्मेदारी
अर्थशास्त्रियों ने ओढ़ ली क्योंकि ये नियम सबकी समझ में नहीं आ सकते थे । उसी समय
स्वतंत्र आर्थिक संस्थान बने जो नीति संबंधी फैसलों को लोकतंत्र की राजनीतिक दखल
से दूर रखने की वकालत करते थे ।
समस्त
अर्थशास्त्रीय विमर्श से किसी भी मानवीय सहजबोध को दूर रखा गया । प्रगतिशील आलोचक
भी अत्यधिक कारपोरेट लोभ या वित्तीय क्षेत्र के अनियंत्रित उभार पर ही उंगली उठाने
तक खुद को सीमित रखते थे । लक्षण की इस तरह की आलोचना बुनियादी ढांचे की समस्याओं
को सामने नहीं लाती थी । इन नवशास्त्रीय अर्थशास्त्रियों ने बाजार आधारित समाज को
सबकी उन्नति में सक्षम बताया । सामाजिक ऊंच नीच को उन्होंने व्यक्ति के गुणों का
नतीजा कहा जिसका मतलब था कि जिसकी जैसी योग्यता है वह वैसी जगह पर है । कहने की
जरूरत नहीं कि सत्ता में बैठे लोगों को ये तर्क सुहाने लगते हैं । इससे ही यह आम
समझ बनी कि कठिन परिश्रम से कोई भी अमीर बन सकता है । नतीजा यह निकला कि गरीब लोग
अपनी स्थिति के लिए खुद को ही दोषी मानने लगे ।
लेखिका
सवाल करती हैं कि क्या हम सचमुच एकमात्र सम्भव आर्थिक स्थिति में हैं । द्वितीय
विश्वयुद्ध के बाद के पूंजीवाद के सुनहरे दिनों में तो ऐसा कहा जा सकता था । कम से
कम अमेरिका और यूरोप में रहनेवाले गोरे मर्द के लिए यह विश्वसनीय बात होती लेकिन
आज तो धरती की अधिकांश आबादी समाजार्थिक अन्याय से जूझ रही है और समूची धरती
पारिस्थितिकी के विनाश की कगार पर है । ऐसे में एकमात्र सम्भव दुनिया का
छद्मवैज्ञानिक तर्क किसी काम का नहीं रह गया है । समाज को समझने का थोड़ा मानवीय
नजरिया खोजना होगा । इसके तहत अर्थतंत्र को लोकतांत्रिक बनाना होगा जिससे नागरिक
अपनी जिंदगी को नियमित करने वाली नीतियों के सिलसिले में अपनी पसंद जाहिर कर सकें
। आगे बढ़ने का यह सबसे पहला कदम होगा । इसके लिए परिप्रेक्ष्य में क्रांतिकारी
बदलाव आवश्यक है । दुनिया को देखने का हमारा नजरिया राजनीतिक होता है । दुनिया को
भिन्न नजर से देखने से ही हम अलग किस्म की कार्यवाही में शरीक हो सकते हैं ।
किताब
का उद्देश्य नया मुक्तिकारी परिप्रेक्ष्य प्रदान करना है । समय आ गया है कि
अर्थशास्त्र का अध्ययन राजनीतिक अर्थशास्त्र के लेखन पर आधारित होकर किया जाए ।
नागरिक आलोचनात्मक आर्थिक विश्लेषण के बल पर नीतियों में जरूरी बदलाव कर सकेंगे और
इसमें तकनीकी विशेषज्ञों के एकाधिकार की जगह लोकतांत्रिक भागीदारी को प्रमुखता
स्थापित कर सकेंगे । लेखिका को लगता है कि सारी आर्थिक समस्याओं की जड़ में
राजनीतिक समस्याएं होती हैं । अर्थतंत्र आखिरकार हम सबकी गतिविधि है इसलिए उसमें
हमारी दखल जरूरी है ।
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