पूरी दुनिया इस समय जलवायु परिवर्तन का अनुभव कर
रही है । बिना मौसम के बारिश, आंधी, बेतहाशा गर्मी जैसे हालात तेजी से हमारे
वातावरण का अंग होते जा रहे हैं । ये बदलाव उन देशों में अधिक महसूस हो रहे हैं
जिनका मौसम ठंडा रहा करता था । इस वजह से वहां के कार्यकर्ताओं की नयी पीढ़ी के
भीतर इस सवाल पर खूब तेज बहसें हो रही हैं । अनेक पश्चिमी देशों में राजनीति की मुख्य धारा को भी इसने
प्रभावित करना शुरू कर दिया है । आम तौर पर पूंजीवाद द्वारा मुनाफ़े के लोभ में
प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से इसे जोड़कर देखा जा रहा है । इसने पर्यावरण
के आंदोलनकारियों और पूंजीवाद के विरोधियों के बीच संवाद और सहकार का नया माहौल तैयार किया है ।
पर्यावरण के आंदोलनकारियों के साथ वर्तमान राजनीतिक ढांचे का रिश्ता हमेशा से ऐसा ही नहीं रहा । इस आंदोलन की शुरुआत साठ के दशक में हुई तो उस समय सोवियत संघ और अमेरिका के बीच शीतयुद्ध का दौर चल रहा था । उस समय के वैचारिक संघर्ष में पश्चिमी बौद्धिक जगत ने लोकतंत्र को अपने पक्ष में हथियार बना रखा था । उसने चुनावी लोकतंत्र के दायरे में तमाम सामाजिक आंदोलनों को खींच लाने की कोशिश की थी । इसके कारण भी चुनावी राजनीति में ग्रीन पार्टियों का उदय हुआ और उन्हें कुछ देशों में थोड़ी सफलता भी मिली । वर्तमान समय उससे पूरी तरह अलग किस्म का है । सोवियत संघ के बिखराव ने पूंजीवाद के लिए उदार मुखौटे की जरूरत समाप्त कर दी है और अब वह अन्य
सवालों की तरह पर्यावरण के सवाल पर भी अधिक ढीठ भंगिमा अपना रहा है । इस बदलाव ने आंदोलनकारियों के सामने नये हालात और नयी चुनौतियों को जन्म दिया है । अब उन्हें चुनावी लोकतंत्र के अनिवार्यत: उदार होने के भ्रम से मुक्त होकर पूंजीवाद की बर्बर असलियत का सामना करना पड़ रहा है । पूंजीवाद की इस अंतर्निहित बर्बरता के समकालीन घिनौने रूप समूची
दुनिया देख रही है ।
इसके कारण पूंजीवाद की समझ भी बदल रही है ।
मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में पूंजीवाद के वैश्विक प्रसार को प्रवृत्ति के
रूप में रेखांकित किया था जिसे साम्राज्यवाद और युद्ध के साथ सहज ही जोड़ लिया जा
सकता था लेकिन अनुपनिवेशन और शीतयुद्ध ने पूंजीवाद के साथ उपनिवेशवाद और युद्ध का
रिश्ता सहजबोध में धूमिल कर दिया था । अब दोनों के नग्न रूप का उभार हो रहा है तो
पूंजीवाद के अंतर्निहित पर्यावरण विरोध को समझना मुश्किल नहीं रह गया है । युद्ध
के साथ पर्यावरण के ध्वंस का मामला एक बहस से भी जुड़ा है । जो लोग पर्यावरण के
विनाश से पूंजीवाद को मुक्त रखना चाहते हैं उनका
तर्क है कि जबसे मनुष्य ने खेती शुरू की तबसे ही प्रकृति में असंतुलन पैदा हुआ है
। आज भी पश्चिमी देश ओज़ोन परत में छेद के लिए जिम्मेदार गैस के उत्सर्जन को धान की
खेती से जोड़ते हैं और इस आधार पर इसके लिए चीन पर दोष डालते हैं । इसके विरोध में
आंदोलनकारियों का तर्क होता है कि खेती के हस्तक्षेप से परिवर्तनीय बदलाव होता है
लेकिन इससे अलग औद्योगिक पूंजीवाद ने ऐसी वस्तुओं का उत्पादन शुरू किया जिनके नष्ट
होने की अवधि बहुत अधिक होने से पर्यावरण को होने वाला नुकसान चिरस्थायी होता है ।
इसी सिलसिले में युद्ध का भी उदाहरण दिया जाता है जो पहले के मुकाबले पूरी तरह से भिन्न
प्रकृति के हो गये हैं । बहुतेरे लोग इस मामले में परमाणु बम का उदाहरण देते हैं
जिसके प्रभाव जापान में आज भी महसूस किये जाते हैं । हमारे देश में भी रासायनिक
उत्पादन की ऐसी ही त्रासदी भोपाल गैस कांड है जिससे प्रभावित आबादी का मुकदमा
अवकाशप्राप्त न्यायाधीश मुरलीधर लड़ रहे हैं । ये ऐसे बदलाव हैं जिनके असरात पीढ़ियों
तक जारी रहते हैं । युद्ध का गहरा रिश्ता साम्राज्यवाद से है । उसका भी फिर से
उभार हो रहा है । साम्राज्यवाद ने उपनिवेशित देशों के प्राकृतिक संसाधनों के अपने
हित में दोहन की व्यवस्था विकसित की जिसने दक्षिणी गोलार्ध के देशों के पर्यावरण
में अपरिवर्त्य बदलाव किये । अब फिर से संसाधनों की लूट का नया दौर शुरू हो रहा है
जिसमें ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के उत्पादन हेतु खेती की उपज को उसी तरह बदला जा
रहा है जिस तरह कभी अफीम, चाय या इमारती लकड़ी की जरूरत से नये पेड़ पौधों का चलन
शुरू हुआ था ।
पूंजीवाद के इस नये उभार के साथ फ़ासीवाद का भी उत्थान समूची दुनिया मे
देखा जा रहा है । इस चिंतनीय प्रवृत्ति के साथ पारिस्थितिकी के बहुआयामी रिश्ते को
स्पष्ट करते हुए 2022 में पोलिटी से सैम मूर और अलेक्स राबर्ट्स की किताब ‘द राइज आफ़
इकोफ़ासिज्म: क्लाइमेट चेन्ज ऐंड द फ़ार राइट’ का प्रकाशन हुआ । किताब लिखने की
शुरुआत 2020 में हुई । लेखकों का कहना था कि जलवायु की हालत जैसे जैसे खराब होगी
उसी अनुपात में राजनीतिक जीवन से सामान्यता गायब होती जाएगी और जनता असामान्य
समाधानों की ओर खिंचेगी । जलवायु संकट की बढ़ोत्तरी के साथ ही चरमपंथी दक्षिण का
उभार होगा । साथ ही जनसंख्या वृद्धि के सिलसिले में माल्थस जैसे सिद्धांत लोकप्रिय
होंगे और घरेलू मोर्चे पर सुरक्षा तथा सरहदों पर सख्ती का माहौल बनेगा । इससे उत्तरी गोलार्ध में
नस्लभेदी राजनीति को गहराई मिलेगी । गंदगी, प्रदूषण और संक्रामकता जैसी बातें
सदियों से विभिन्न क्षेत्रों में ऊंच नीच तय करती रही हैं । इन मान्यताओं के इर्दगिर्द
मानव समाज प्रकृति के साथ अपना रिश्ता बनाता रहा है । लेखकों का अनुमान है कि प्राकृतिक
दुनिया को इन सबका स्रोत समझने की आदत बढ़ेगी और प्रकृति दुश्मन की तरह पेश की
जाएगी । पूंजी का हित तो हमेशा ही मुनाफ़े और आर्थिक वृद्धि में निहित होता है और
इसके लिए वह अधिकाधिक तानाशाह सरकारों का आश्रय लेगी । वैसे तो लेखक इस बात से
सहमत नहीं हैं कि जलवायु में बदलाव का अनिवार्य और प्रत्यक्ष नतीजा फ़ासीवाद होगा
लेकिन इसकी सम्भावना को वे पूरी तरह खारिज भी नहीं कर सकते ।
जिस दिन उन्होंने किताब लिखना शुरू
किया उस दिन चीन के वुहान अस्पताल में फेफड़ों के विचित्र संक्रमण के मरीजों का पता
चला । इसका कारण जो विषाणु था उसे ही बाद में कोविड19 कहा गया और उसने दुनिया भर
में भारी तबाही मचायी । इस महामारी के संदर्भ में जलवायु संकट पर बातचीत कुछ कम
हुई । कारण कि जलवायु परिवर्तन को आम तौर पर वातावरण में कार्बन उत्सर्जन और
वैश्विक तापवृद्धि के पैमाने पर ही देखा जाता रहा है । इसे लेखकों ने सरलीकरण कहा
है और महामारियों को भी जलवायु परिवर्तन से जोड़ने में इस समझ को बाधक पाया है ।
हवा में कार्बन डाइ आक्साइड की मात्रा बढ़ने से कोरोना की तबाही नहीं आयी थी । उसकी
वजह थी कि आधुनिक पूंजीवादी समाज पर्यावरण के साथ विनाशकारी छेड़छाड़ कर रहे हैं ।
इस अवसर पर हमें सामूहिक रूप से अपनी समझ बदलने की शुरुआत करनी चाहिए थी ।
तापवृद्धि की जगह इसे जलवायु की समूची व्यवस्था के ध्वंस की तरह देखना शुरू करना
होगा ।
एक ओर हमें पर्यावरण के प्रति फ़ासीवाद का यह रुख नजर आता
है तो दूसरी ओर यह भी दिखाई दे रहा है कि युवा कार्यकर्ताओं के बीच पर्यावरण के सवाल पर नयी सक्रियता
पैदा हुई है । इस सक्रियता में व्यापक सवालों से कन्नी काटने की प्रवृत्ति नहीं है
। इसका ठोस सबूत ग्रेटा थनबर्ग है जिसने फिलिस्तीन के सवाल पर फ़्लोतिला मिशन जैसी
अनुकरणीय गोलबंदी की । युवाओं में इस मसले की लोकप्रियता ने मुख्य धारा के उदार
बौद्धिकों में भी हलचल पैदा की है । उनकी ओर से कोशिश रहती है कि पर्यावरण के
विध्वंस की जिम्मेदारी से पूंजी को बरी किया जाए और इसे सबका दोष बता दिया जाए ।
इस परिघटना पर भी पर्यावरण के कुछ गम्भीर चिंतक सावधान हैं ।
उनमें से एक
जेफ़ स्पैरो हैं । 2021 में स्क्राइब से उनकी किताब ‘क्राइम्स अगेंस्ट नेचर: कैपिटलिज्म ऐंड ग्लोबल हीटिंग’ का प्रकाशन हुआ । किताब की शुरुआत एक लोकगायक के कथन से होती है कि धरती की हत्या हो रही है और हत्यारों को सभी जानते हैं । बात तो सही है लेकिन इसी तरह बतायी नहीं जाती । कहा जाता है कि मनुष्य की लोभी प्रवृत्ति के कारण तापवृद्धि हो रही है और इस प्रवृत्ति के वाहक हम सभी हैं । गलत खरीदने, खाने और कूड़े के निस्तारण की सही व्यवस्था न करने की हमारी आदत से जंगल कट रहे हैं, प्रदूषण बढ़ रहा है और कार्बन उत्सर्जन में इजाफ़ा हो रहा है । उद्योग तो हम सबको संतुष्ट करने में हांफे जा रहे हैं । जलवायु परिवर्तन के बारे में इसे ही सहजबोध बना दिया गया है । लेखक का कहना है कि ये सब बनायी बातें हैं ताकि असली
अपराधियों को दंड न दिया जाए । सच यह है कि जीवाश्म ईंधन के प्रयोग से लेकर
उत्सर्जन के स्तर संबंधी समझौते तक जलवायु परिवर्तन के दोषी बहुतेरे लोग नहीं,
मुट्ठी भर लोभी हैं । इन लोगों ने प्रत्येक हथियार का इस्तेमाल करके हम सबको वह सब
करने के लिए रिझाया या मजबूर किया जो करने की न तो हमारी चाहत थी न आसानी से हमने
वैसा करना मंजूर किया । चाहे हमें कबाड़ से उपयोगी चीजें बनाना हो, चाहे साइकिल की
सवारी को अपनाना हो या बिजली न जलाना हो- यह सब आम लोगों की जिम्मेदारी हो जाता है
। पर्यावरण विध्वंस के असली जिम्मेदार इन मुट्ठी भर लोगों पर इससे कोई फर्क नहीं
पड़ता । शायद उन्होंने अपने लिए दूसरी धरती बना ली है!
आक्सफ़ैम की एक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के छब्बीस
सबसे अमीर खरबपतियों के पास जितनी संपत्ति है उतनी ही दुनिया की आधी गरीब आबादी के
पास भी है । इतनी भीषण विषमता होने के बावजूद धृष्टता से कहा जाता है कि संकट की
सामूहिक जिम्मेदारी हम सबकी है । जो कहानी हमें सुनायी जाती है उसमें हम सब दोषी हो
जाते हैं तथा तापवृद्धि और पर्यावरणिक संकट मानव प्रगति का लगभग अपरिहार्य परिणाम नजर
आने लगता है लेकिन लेखक के अनुसार यह कतई सच बात नहीं है । सच्ची कहानी में आम
लोगों को बदनाम नहीं किया जाता । खलनायक भी मानवता मात्र नहीं है बल्कि खास तरह के
सामाजिक और राजनीतिक ढांचे हैं जो हमेशा से नहीं थे इसलिए भविष्य में भी समाप्त हो
जाएंगे । इस किताब में शामिल लेख जलवायु संकट में पूंजीवाद की भूमिका की पहचान
करते हैं । यही समझ इन सभी लेखों को आपस में जोड़ती है । पहले लेख में अमेरिकी कार
संस्कृति की छानबीन की गयी है जिसकी स्थापना के लिए टिकाऊ विकल्पों पर व्यवस्थित
कारपोरेट हमला संचालित किया गया । इससे स्पष्ट होता है कि दैनन्दिन जीवन में
विध्वंसक व्यवहार हम सब पर जबरन थोपा गया और इसकी लत लगाने के लिए अक्सर भरपूर
हिंसा का सहारा लिया गया । प्रकृति पर युद्ध को सामान्य बनाने का बाकायदे अभियान
चलाया गया । धरती की हालत बिगड़ने के बावजूद इस अभियान पर रोक लगाने का कोई इरादा
नजर नहीं आता । किताब में सोवियत संघ और पर्यावरण आंदोलन का इतिहास देखने के बाद
बताया गया है कि बेहतर दुनिया सम्भव है अगर उसके निर्माण की अपनी ही क्षमता पर
हमारा यकीन कायम रहा । जलवायु के बारे में शोध करने वाले लोग समय के बहुत लम्बे
पैमाने से काम लेते हैं । बदलाव का अनुमान लगाने के लिए मिट्टी की जमी हुई परत,
धूल, जीवाश्म और ऐसे ही अकल्पनीय पुराने निशानों की मदद लेते हैं । इसके बावजूद
उनका कहना है कि समय बहुत नहीं बचा है । सुधार का काम अगर तत्काल शुरू नहीं किया
गया तो धरती की सीमा का जल्दी ही उल्लंघन हो जाएगा और उसके बाद के नुकसान की भरपाई
पूरी तरह से कभी नहीं हो सकेगी ।
इसका मतलब कि हम मानव इतिहास के सबसे महत्व के वर्षों के
साक्षी हैं । इस छोटे से समय में जो फैसले होंगे वे धरती पर हमेशा के लिए अपने
चिन्ह छोड़ जाएंगे । इसलिए हमारी जिम्मेदारी बहुत अधिक हो गयी है । ठीक इसी समय
हमारे सामूहिक नायकत्व और अतुलनीय दृढ़ता की जरूरत है । दुर्भाग्य से इसी समय हमें
बताया जा रहा है कि हम आपराधिक रूप से तुच्छ प्राणी बनकर रह गये हैं । हम
अदूरदर्शी उपभोक्ता मात्र हैं जो भौतिक संतुष्टि ही चाहता है, कुछ भी नहीं करना
चाहता, बिना सोचे समझे कूड़ा पैदा करता है । कहा जाता है कि इससे होने वाला
पारिस्थितिकीय नुकसान आगामी पीढ़ी को झेलना होगा । हमारी वर्तमान पीढ़ी तो स्वार्थ
और फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाने में भी अक्षम हो गयी है । उनका कहना है कि इस तरह के
आरोपों से निष्क्रियता पैदा होती है जबकि पर्यावरण के संकट का समाधान बुनियादी
बदलाव की मांग कर रहा है । इस बदलाव का रिश्ता अपराध बोध और जिम्मेदारी के बारे
में हमारी इस सोच से भी है । आम जनता की ओर से वे कहते हैं कि असल में हम इस कहानी
के खलनायक नहीं हैं । हमें इसका नायक बनना है ।
पर्यावरण के सिलसिले में वैचारिक समझ की स्पष्टता पर जोर देते हुए 2024 में बिट्वीन द लाइन्स से फ़्रेडेरिक लेगो, आर्नोद थुरिला-क्लोतिए और अलैं सवार्द की 2021 में छपी फ़्रांसिसी किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘इकोलाजी फ़ार द 99%: ट्वेन्टी कैपिटलिस्ट मिथ्स डीबंक्ड’ प्रकाशित हुआ । अनुवाद चार्ल्स सिमार्द ने किया है । लेखक का कहना है कि आजकल सभी लोग हरितीकरण के पक्ष में बोल रहे हैं इसके बावजूद पर्यावरण का संकट गहराता ही जा रहा है । यहां तक कि तेल कंपनियां भी इसके पक्ष में बोल रही हैं
। इस पर खुश होने की जगह परेशान होना चाहिए । जलवायु परिवर्तन से मनुष्यों पर आफत
टूट पड़ी है । लू, सूखा, बाढ़, दावानल और तूफानी चक्रवात रोज रोज की बात हो गये हैं
। इस तबाही से सभी एक समान नहीं प्रभावित होंगे । असल में पारिस्थितिकी भी
रणक्षेत्र हो गयी है । इसमें भरोसेमंद साथी, खतरनाक शत्रु और हरित का परदा डाले
हत्यारे भी मौजूद हैं । किताब का मकसद इस टकराव में दोस्त दुश्मन की पहचान स्थापित
करना है ।
भ्रामक हरित सर्वसम्मति से परे जाते
हुए लेखक पूंजीवाद के विरोध का सवाल उठाते हैं । उनके अनुसार आम तौर पर इस शब्द के
इस्तेमाल से बहुत से लोग परहेज बरतते हैं लेकिन इसकी सच्चाई का अनुभव सबको ताउम्र
करना पड़ता है । इसके इर्दगिर्द ही समाज के गठन का समूचा ढांचा खड़ा होता है । अगर
हमें ऐसी पारिस्थितिकी का निर्माण करना है जो मुट्ठी भर शासकों के मुकाबले
बहुसंख्या के लिए हो तो फिर पूंजीवाद के बारे में बात करनी ही होगी । इस बात को
लेखकों ने फ़्रांस के एक प्रदर्शनकारी की भाषा में पेश करते हुए कहा कि आजीविका की
लड़ाई के साथ ही संसार को बचाने की भी लड़ाई लड़नी होगी । निजी संघर्षों के साथ अपने सामूहिक
संघर्ष को जोड़ने के लिए पारिस्थितिकी की दुश्चिंता को अधिकांश संपत्ति और आर्थिक
शक्ति के स्वामी एक प्रतिशत की सत्ता के विरुद्ध रचनात्मक अपमान में बदलना होगा । लेखकों
ने पारिस्थितिकी को विज्ञान के मुकाबले राजनीति से अधिक जुड़ा पाया है इसलिए प्रकृति
के साथ मनुष्य के शक्ति संबंध को राजनीतिक पारिस्थितिकी समझने पर उनका जोर है ।
पारिस्थितिकी नैतिक या राजनीतिक निष्ठा का ही मामला नहीं रह गया है । इसका सीधा
रिश्ता आर्थिक मजबूरियों से भी है ।
नागरिक की इसी भूमिका पर जोर देते हुए 2026 में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस से गुलियो बुकालेत्ती
की किताब ‘द एनवायरनमेंटल रिपब्लिक: ह्वाइ सिटिज़ेन्स विल सेव द वर्ल्ड’ का प्रकाशन
हुआ । लेखक का कहना है कि धरती के पर्यावरण के साथ हमारा सामूहिक रिश्ता संवैधानिक
गणतांत्रिक होना चाहिए । किताब में गणतंत्र और पर्यावरण के बारे में बात की गयी है
। इस तरह से देखने पर राजनीति की जिम्मेदारी के भीतर घर में रहने, बोलने, संस्था
बनाने और अपना मकसद परिभाषित करने में मदद करना आना चाहिए । उसे आजाद लोगों का
समाज बनाने में मदद करना चाहिए जो एक जगह पर मनमर्जी से साथ रह सकें । इसी को लेखक
ने पर्यावरणिक गणतंत्र कहा है । लेखक वैज्ञानिक हैं और जलवायु परिवर्तन की समझ को
लोकप्रिय बनाने के लिए अर्थशास्त्र और विज्ञान की सहायता लेने के मामले में शोध
केंद्र से जुड़े हैं । उनका मानना है कि विज्ञान पर्यावरण की समस्याओं पर रोशनी
डालता है लेकिन उन्हें परिभाषित नहीं करता । इस क्षेत्र में बीस साल तक काम करने
के बाद उनको लगा कि भविष्य की राजनीतिक पसंद तय करने के सिलसिले में विज्ञान की
क्षमता पर कुछ अधिक ही भरोसा किया जाता है ।
दक्षिणपंथी राजनीतिक उभार के साथ पर्यावरण के प्रति सरोकार में चिंताजनक गिरावट आयी है । इस तथ्य को उभारते हुए 2026
में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से कैरोलीन कुज़ेमको की किताब ‘क्लाइमेट
पोलिटिक्स: कान’ट लिव विथ इट, कान’ट मिटिगेट विदाउट इट’ का प्रकाशन हुआ । लेखक के मुताबिक 2020 में संयुक्त राष्ट्र संघ के क्योटो जलवायु समझौते को
लगभग तीस साल बीत चुके हैं । उस समय के वादे में मुताबिक ग्रीनहाउस गैसों के
उत्सर्जन के विभिन्न उपाय तमाम सरकारों ने करने की घोषणा की लेकिन उत्सर्जन कम
नहीं हुआ । ऊपर से तापमान बढ़ने से रोकने का वादा करने वाली राजनीति को अमेरिका और
यूरोप के बहुतेरे देशों में समर्थन भी कम होता गया । इसलिए पर्यावरण संबंधी इस
सरोकार को वामपंथ की राजनीति का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा ।
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