Tuesday, May 26, 2026

पूंजीवादी संकट की मार्क्सवादी समझ

 



2026 में सैम विलियम्स की किताब ‘ए मार्क्सिस्ट गाइड टु कैपिटलिस्ट क्राइसेज’ का प्रकाशन जान ब्रिटन के संपादन में हुआ । लेखक के लिखे को संग्रहित करने और छपाने का फैसला 2010 में ही हुआ । 2015 में उसका पहला मसौदा जारी किया गया । उसको नये और ताजे रूप में 2016 में प्रकाश में लाना था लेकिन दस साल लग गये और अब उसे सामने लाया जा सका । लेखक ने मार्क्सवादी आर्थिकी के एक पहलू पर ब्लाग लिखना शुरू किया । वह पहलू पूंजीवाद के आवर्ती संकट थे । 2007 से 2009 तक जो संकट आया था वह 1825 के बाद से ही लगातार आने वाले संकटों में सबसे हालिया था । ब्लाग और उस पर आधारित इस किताब की बुनियाद मार्क्स का महाग्रंथ पूंजी है । 2008 में बहुत समय बाद उसकी बिक्री फिर से बढ़कर सबसे अधिक हो गयी । पहली बात कि मार्क्स के उस ग्रंथ में इन आवर्ती संकटों के बारे में कोई स्वतंत्र अध्याय नहीं है । कम्युनिस्ट घोषणापत्र में उन्होंने संकटों के बारे में जितना अधिक लिखा था उसको देखते हुए पूंजी में उसकी चर्चा न होने से अचरज होता है । इसके लिए तर्क दिया जा सकता है कि मार्क्स ने अर्थशास्त्र के बारे में जिन किताबों को लिखने की योजना बनायी थी उनमें पूंजी पहली ही है । इसके बाद वे विश्व बाजार, राज्य, होड़ और संकटों के बारे में लिखने वाले थे लेकिन जीवन ने उन्हें समय नहीं दिया । मार्क्स को अगर समय मिला होता तो वे जो कुछ लिखते उसे लिखना किसी दूसरे के लिए तो सम्भव नहीं है । कारण केवल यह नहीं कि मार्क्स मार्क्स थे बल्कि यह भी है कि उनके बाद से पूंजीवाद ने बहुत रूप बदले । होड़ की जगह वह एकाधिकारी हुआ । इसके बाद महामंदी आयी । फिर सरकारी हस्तक्षेप का कीन्सीय समय आया । उसके बाद स्वर्णमान समाप्त हुआ और 1970 दशक का गतिरोध आया । इसके बाद नवउदारवादी प्रतिक्रिया का दौर आया और 2008 का हालिया संकट तथा उसके असरात प्रकट हुए । इन सबसे संकट सिद्धांत को बहुत सामग्री मिली जो मार्क्स को उपलब्ध नहीं थी ।

पूंजीवादी विश्व बाजार में प्रत्येक सात से ग्यारह साल के भीतर अलग अलग तीव्रता के आर्थिक संकट आते रहे हैं । उन्नीसवीं सदी की दूसरी चौथाई के बाद से ही यह क्रम देखा जा रहा है । दुनिया भर की पूंजीवादी सरकारों की तमाम कोशिशें इन संकटों को रोक नहीं सकीं । गम्भीर संकटों के बाद नरम संकट आये लेकिन उसके बाद गम्भीरतर संकट ने दस्तक दी । मुख्य धारा के पूंजीवादी अर्थशास्त्री इन संकटों को दुर्घटना या द्वितीयक महत्व की घटना मानते हैं । बहरहाल मार्क्सवादी लोग संकटों को काफी महत्व देते रहे हैं । इसके लिए लेखक संकट सिद्धांत से ज्यादा जरूरी ऐतिहासिक भौतिकवाद को मानते हैं । ऐतिहासिक भौतिकवाद के मुताबिक मानव समाज के किसी एक रूप से दूसरे रूप में बदलाव के पीछे उत्पादक शक्तियों का उत्पादन के सामाजिक संबंधों से टकराव होता है । इससे ही मानव समाज या आर्थिक उत्पादन में विकास होता है । इस टकराव से ही क्रांतिकारी बदलाव शुरू होता है । इस बदलाव के कारण देर सवेर न केवल संपत्ति संबंध बल्कि वैचारिक जीवन और धार्मिक संस्थान भी नयी उत्पादक शक्तियों की संगति में आ जाते हैं । इन नयी उत्पादक शक्तियों की जरूरत के मुताबिक उत्पादन संबंध या संपत्ति के रूप ढलने लगते हैं ।

मार्क्स और एंगेल्स ने जब कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र लिखा तो उस समय 1847 का वैश्विक पूंजीवादी आर्थिक संकट जारी था । उसमें उन्होंने सामंती समाज के अंत का मूल कारण चिन्हित किया था । कारण यह था कि यह नयी उत्पादक शक्तियों से टकरा रहा था । इन नयी उत्पादक शक्तियों का जब और विकास हुआ तो उन्होंने गिल्ड उत्पादन में एकाधिकार की समाप्ति की मांग की । साथ ही खेती में उन्होंने सामंती भूदास संबंधों को भी समाप्त करने की मांग की और इनके स्थान पर पगार पाने वाले मुक्त मजदूर की व्यवस्था कायम की । असल में रोमन साम्राज्य के पतन के बाद यूरोप में खेती और हस्तशिल्प उत्पादन की जो व्यवस्था कायम हुई थी उसमें नयी तकनीकों के विकास के लिए सामंती समाजार्थिक संबंध और भूदास प्रथा पर्याप्त थे । हालांकि सामंती समाज की दासता, ऊंच नीच और धार्मिक पोंगापंथ हमें स्वतंत्रता विरोधी और अन्यायपूर्ण लगते हैं लेकिन इसके बावजूद सच यही है ।

मध्ययुग के समाप्त होते होते उत्पादन की नयी पद्धतियों का टकराव इन सामंती संबंधों से होने लगा । तब क्रांतिकारी बदलाव का युग शुरू हुआ जिसमें सदियों पुरानी सामंती व्यवस्था खत्म हुई और उसके गर्भ से आधुनिक पूंजीवादी समाज का जन्म हुआ । इस व्यवस्था में लोकतंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के सामने सबकी औपचारिक समानता, चर्च और राज्य का अलगाव, मुक्त बाजार और सबसे आगे बढ़कर पगार पाने वाले मुक्त मजदूर का जन्म हुआ । इसके लिए श्रम के बाजार की स्थापना हुई । यहां तक तो बहुतेरे पूंजीवादी इतिहासकार और अर्थशास्त्री मार्क्स का साथ देते हैं लेकिन उनका कहना है कि अर्थतंत्र के विकास पर चूंकि कोई भी सामंती बंधन रह नहीं गया है इसलिए अब किसी क्रांति की जरूरत भी नहीं रही । आगामी सदियों में पूंजीवादी निजी संपत्ति, होड़ और पगारी श्रम पर आधारित सामाजिक संपदा की बढ़ोत्तरी होती रहेगी । मानव समाज अपने अंतिम रूप तक आ गया है, अर्थतंत्र या उदार लोकतंत्र की राजनीतिक व्यवस्था में भविष्य में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं होने हैं इसलिए इतिहास भी चरम विंदु पर आ पहुंचा है ।  

इसके बाद वर्तमान समय की बात शुरू होती है । नवउदारवाद ने उन सभी रियायतों से संघर्ष तेज कर दिया है जिन्हें पिछले दो सौ सालों में मजदूर वर्ग ने पूंजीपति वर्ग से हासिल किया था । नवउदारवाद के समर्थक इन्हें व्यवसाय के फलने फूलने की राह मे खड़ी बाधा मानते हैं और तेज आर्थिक वृद्धि हासिल करने के लिए इन्हें हटाना चाहते हैं । वे इसे उसी प्रगतिशील संघर्ष की निरंतरता मानते हैं जिसे शुरुआती उदारवादियों ने सदियों पहले पूंजीवादी उद्योग के रास्ते से हटाने के लिए सामंती अवरोधों के विरोध में छेड़ा था । उनका मानना है कि मजदूर वर्ग को हासिल सुविधाओं पर इस हमले से सबको रोजगार मिलेगा और जीवन स्तर में सुधार आयेगा ।  

इसकी सबसे स्पष्ट अभिव्यक्ति सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में 1980 और 1990 दशकों में आयी कम्युनिस्ट विरोधी सरकारों द्वारा योजना आधारित अर्थतंत्र के विनाश में हुई । उनका दावा था कि योजना ने खेती और उद्योग के रास्ते में जो भी बाधा खड़ी की थी उसे दूर करने से समूची आबादी के जीवन स्तर में काफी सुधार होगा । इसकी जगह उत्पादन में गिरावट देखी गयी । लाभ तो केवल नये पूंजीपति वर्ग के सदस्यों को हुआ और शेष लोगों के जीवन स्तर में बदतरी ही आयी । गरीबी का प्रसार हुआ और बहुतेरे इलाकों में आधुनिक सभ्यता का भी लोप नजर आया । नवउदारवाद का खंडन करने के लिए इससे अधिक प्रत्यक्ष प्रमाण की जरूरत ही नहीं थी । मार्क्स ने तो बहुत पहले ही उदारवादियों के विपरीत कहा कि उत्पादक शक्तियों और मानव समाज के विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा तो खुद पूंजी है । इसीलिए उनका कहना था कि मानव इतिहास में समाज का अंतिम रूप पूंजीवाद नहीं हो सकता । इसका पक्का सबूत बार बार आने वाले आर्थिक संकट हैं । इन संकटों के समय पूंजीवादी समाज का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है । इन संकटों के समय अति उत्पादन की ऐसी महामारी पैदा होती है जिसका पहले कभी नाम भी नहीं सुना गया था । जरूरी नहीं कि इन संकटों के दौरान ही पूंजीवाद का अंत हो जाए हालांकि इसकी सम्भावना होती है । इन संकटों से केवल यह साबित होता है कि उत्पादन के इतिहास में पूंजीवाद अस्थायी है और मानवता बची रही तो इससे बेहतर उत्पादन प्रणाली का जन्म होगा ।

मार्क्स के साथी एंगेल्स बड़े गजब आदमी थे । वे व्यवसायी थे लेकिन मजदूर वर्गीय क्रांति के पक्षधर भी थे । राजनीतिक अर्थशास्त्र के अपने गहन ज्ञान को उन्होंने व्यावहारिक अनुभव के साथ जोड़ा । ऐसा संयोग बहुत कम लोगों को मिलता है । 1877 में उन्होंने जर्मनी में मशहूर ड्यूहरिंग नामक दार्शनिक के मतखंडन की किताब लिखी और उसमें पूंजीवादी आर्थिक संकटों का विश्लेषण विस्तार से किया । जिनको भी हालिया वित्तीय संकट की याद होगी वे एंगेल्स के विवरण से सहत होंगे । एंगेल्स ने जब यह लिखा था तो मार्क्स जीवित थे हालांकि काम करने की उनकी क्षमता क्षीण होती जा रही थी । अगर वे एंगेल्स की राय से असहमत होते तो जरूर ही बताया होता । बजाय इसके उन्होंने इसमें एक अध्याय भी लगाया । इससे कहा जा सकता है कि संकटों की बारम्बरता संबंधी एंगेल्स की राय में मार्क्स की राय भी शामिल थी । उनका कहना था कि आधुनिक मशीन के आगमन के साथ सामाजिक उत्पादन की अराजकता के चलते प्रत्येक औद्योगिक पूंजीपति मशीन को बेहतर तथा अधिक उत्पादक बनाने के लिए मजबूर हो जाता है । इस तरह उत्पादन का विस्तार उसके लिए बाध्यकारी कानून बन जाता है । आधुनिक उद्योग का यह विस्तार गुणात्मक के साथ मात्रात्मक भी होता है । इसका कोई भी प्रतिरोध लगभग असम्भव होता है । यह प्रतिरोध उपभोग, विक्रय और बाजार की ओर से आता है । उत्पादन के विस्तार का साथ बाजार का विस्तार नहीं दे पाता । उनमें आपस में टकराव होने लगता है । इसका समाधान पूंजीवादी उत्पादन पद्धति में सम्भव नहीं इसलिए यह टकराव बार बार होता है । पूंजीवादी उत्पादन इस दुष्चक्र में फंस जाता है । साफ है कि एंगेल्स ने संकट को उत्पादन के विस्तार और बाजार द्वारा उसका साथ न दे पाने की परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों के टकराव में देखा है । पूंजीवादी उत्पादन पद्धति में अगर बाजार से अधिक तेज गति उत्पादन के विस्तार की रही तो समस्या पैदा होगी । इसके कारण ही कभी उत्पादन धीमा हो जाता है, उत्पादक शक्तियों की बरबादी होती है या बड़े पैमाने पर बेरोजगारी फैल जाती है । ये समाधान अस्थायी होते हैं । संकट और कुछ सालों के गतिरोध के बाद उत्पादन का फिर से विस्तार शुरू होता है, बाजार में सामानों की बाढ़ आ जाती है और फिर नया संकट शुरू होता है ।

संकट और उनके विश्वयुद्ध जैसे नतीजे अधिकाधिक विध्वंसक होते जाते हैं । इसलिए पूंजीवाद को हटाकर उसकी जगह समाजवाद की स्थापना आधुनिक समाज के अस्तित्व के लिए आवश्यक हो जाती है । यह बात एंगेल्स ने समाजवाद: वैज्ञानिक और काल्पनिक में भी मिल जाती है जो अलग से छपी । उसमें उन्होंने पूंजीवादी उत्पादन के बुनियादी अंतर्विरोध को बहुत ही अच्छी तरह प्रस्तुत किया है । उनके मुताबिक उत्पादन तो अधिकाधिक सामाजिक चरित्र ग्रहण करता जाता है जबकि उत्पाद का अधिग्रहण निजी ही बना रहता है । इसके साथ ही उन्होंने उत्पादन की अराजकता और उसके केंद्रीकृत, सामाजिक और वैश्विक चरित्र के बीच भी अंतर्विरोध देखा । इन सबका नतीजा अधिकाधिक अमीर होते जाते पूंजीपति वर्ग और लगातार बढ़ते शोषित मजदूर वर्ग के बीच टकराव में सामने आता है ।                                             

 

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