2025
में येल यूनिवर्सिटी प्रेस से थामस पिकेटी की फ़्रांसिसी में 2024 में छपी किताब का
अंग्रेजी अनुवाद ‘इक्वलिटी इज ए
स्ट्रगल: बुलेटिन्स फ़्राम द फ़्रंट लाइन, 2021-2025’ प्रकाशित हुआ ।
लेखक के अनुसार बीसवीं सदी सामाजिक जनवाद की थी और वर्तमान सदी पर्यावरणिक, लोकतांत्रिक और
भागीदारीपरक समाजवाद की होने जा रही है । यह बात अचरज की लग सकती है क्योंकि ऊपर
से अस्मिता और नवउदारवाद का ही सर्वत्र बोलबाला नजर आ रहा है । इसके बावजूद लेखक
को उम्मीद है कि समता की लड़ाई में जीत मिल सकती है । अतीत में इस पर विजय हासिल की
गयी है इसलिए फिर से जीत हासिल हो सकती है और भविष्य में ऐसा होना तय है । इसके
लिए जरूरी सांस्थानिक बदलाव के सभी उपाय करने होंगे, राजनीतिक रणनीति
बनानी होगी और वैकल्पिक समाजार्थिक व्यवस्था की कल्पना विकसित करनी होगी । ये ऐसे
सवाल हैं जिन पर सबको सोचना होगा । इस तरह ज्ञान और सत्ता के संबंध को उलट देना
होगा,
सामूहिक
सामाजिक गोलबंदी करनी होगी ताकि समता और सम्मान की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा जा
सके ।
उनका
कहना है कि आज जिन सामाजिक,
पर्यावरणीय
और वैश्विक समस्याओं का हम सामना कर रहे हैं उनमें से किसी का भी हल वैश्विक
विषमता में कमी लाये बिना नहीं हो सकता । इसके लिए वर्तमान बाजारी और पूंजीवादी
तर्क पर सवाल उठाना ही होगा । चूंकि हमारे समय की चुनौतियों का जवाब उदारवाद और
राष्ट्रवाद जैसे विचारों के पास एकदम ही नहीं है इसलिए लोकतांत्रिक और
पारिस्थितिकी समाजवाद के बारे में सोचना ही होगा । चुनावी लोकतंत्र के लिए भी
मजबूत समाजवादी और समतावादी आधार की जरूरत है । 1980 और 1990 दशक से ही यह आधार
गायब रहा इसलिए ही राजनीति विफल नजर आ रही है और हम सब वैश्विक चुनौतियों का
सामूहिक मुकाबला करने में अक्षम साबित हुए हैं ।
जलवायु
की व्यवस्था को पूरी तरह धराशायी होने से रोकने के लिए सभी सामाजिक समूहों और
संसार के सभी इलाकों में उत्पादन और उपभोग का तरीका बुनियादी रूप से बदलना होगा ।
उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध के कामगार और मध्यवर्गीय समूह इन जरूरी बदलावों को कभी
स्वीकार नहीं करेंगे जब तक सबसे अधिक विशेषाधिकारप्राप्त सामाजिक समूह कुछ अधिक
कोशिश न शुरू करें । खरबपति और अरबपति तो दूसरों को उपदेश देना पसंद करते हैं
लेकिन उनका कार्बन उत्सर्जन और धरती के लिए उनके द्वारा पैदा खतरे शेष आबादी से
बहुत ज्यादा हैं । पर्यावरणिक तबाहियों की संख्या और बारम्बरता बढ़ने के साथ ही यह
यथार्थ अधिकाधिक स्पष्ट होता जाएगा और वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था और उससे पैदा
भारी विषमता के प्रति लोगों का रुख बदलता जाएगा । दुनिया के 10 प्रतिशत अमीर
कार्बन उत्सर्जन के विशाल अनुपात के लिए जिम्मेदार हैं । उनका उत्सर्जन सबसे गरीब
आधी आबादी या उससे भी ऊपर के 40 प्रतिशत आबादी से बहुत अधिक मापा गया है । अगर
पूंजी निवेश और स्वामित्व के हिसाब से उत्सर्जन को देखें तो इन 10 प्रतिशत लोगों
का हिस्सा 70 प्रतिशत हो जाता है जबकि सबसे गरीब आधी आबादी कुल 5 प्रतिशत ही
उत्सर्जन करती है । अगर इसी तरह विभिन्न सामाजिक समूहों के उपभोग के हिसाब से
उत्सर्जन के अनुपात को देखें तो इन्हीं 10 प्रतिशत द्वारा 40 प्रतिशत का उत्सर्जन
होता है सबसे गरीब आधी आबादी महज 20 प्रतिशत का उत्सर्जन करती है ।
जिस
तरह भी देखें उत्सर्जन का संकेंद्रण बहुत अधिक है और उसी अनुपात में पर्यावरणिक
विध्वंस भी हो रहा है । इसलिए जलवायु परिवर्तन के लिए अमीरों की जिम्मेदारी बहुत
अधिक है । खासकर पश्चिमी अमीर समुदाय के साथ ही चीन, रूस, भारत और मध्य
पूर्व के अमीर भी इसमें शामिल हैं । इसलिए ही लेखक का सुझाव दुनिया भर में सामाजिक
समूहों के बीच विषमता घटाने के पक्षधर हैं । इसकी जगह विभिन्न देशों के बीच ही
विरोध खड़ा हो जा रहा है । अमीर लोगों के कार्बन उत्सर्जन में कमी से ही
पारिस्थितिकी को नुकसान में कमी आएगी । जलवायु परिवर्तन पर रोक और धरती को रहने
लायक बनाने की यह पूर्वशर्त है । कारण कि उत्सर्जन में उनका हिस्सा सबसे अधिक है
और बिना उनकी पहल के अन्य सामाजिक समूहों को जीवन शैली में बदलाव के लिए राजी करना
बहुत ही मुश्किल है । न्याय और संगति की यही न्यूनतम मांग है ।
विषमता
में कमी धरती को रहने लायक बनाने की पूर्वशर्त तो है लेकिन यही पर्याप्त नहीं है ।
पारिस्थितिकी के पहलू को दरकिनार कर दें तो भी संपत्ति के मामले में मौजूदा विषमता
को कम करना जरूरी है । विश्व विषमता के आंकड़े बताते हैं कि यह सम्भव और वांछित भी
है । इसके बावजूद यह सोचना भूल होगी कि विषमता में घटोत्तरी से ही विकास का सातत्य
हासिल हो जाएगा और धरती भी 2100
तक
रहने लायक हो जाएगी । समता कायम हो जाए और कार्बन, प्लास्टिक तथा कंक्रीट पर आज की तरह
ही निर्भरता बनी रही तो खास फायदा नहीं होगा । समतापरक अनुपभोगीकरण की प्रक्रिया
आज की जरूरत है । इसका मतलब कि विषमता में भारी कमी के साथ ही बाजारी और पूंजीवादी
तर्क से भी क्रमश: बाहर निकलना होगा । यह काम अधिकाधिक व्यवसायों से शुरू कर समूचे
अर्थतंत्र पर करना होगा । इसका सीधा अर्थ है कि ऊर्जा, यातायत और निर्माण
के क्षेत्रों से मुनाफ़े के तर्क को हटाना होगा । इस काम के लिए हितधारकों की
बहुलता बनानी होगी,
सामूहिक
स्वामित्व बढ़ाना होगा तथा भागीदारीपरक और लोकतांत्रिक प्रशासन कायम करना होगा ।
इसके लिए प्लास्टिक के प्रयोग पर प्रतिबंध जैसे कुछ साझा सार्वजनिक मानदंडों का
कड़ाई से पालन करना होगा तथा उल्लंघन करने वालों को दंडित करना होगा ।
लेखक
के लिए खुशी की बात है कि बीसवीं सदी में ही समतापरक अनुपभोगीकरण की प्रक्रिया
शुरू हो चुकी है । सामाजिक राज्य का निर्माण और सामाजिक जनवाद की जीत को बीसवीं
सदी में इस प्रक्रिया की सफलता के सबूत की तरह देखा जा सकता है । इसके लिए
संस्थाओं में जिस तरह के बदलाव की जरूरत है उसका एक प्रमाण अनिवार्य कराधान है ।
इनमें प्रत्यक्ष और परोक्ष टैक्स समेत सामाजिक सुरक्षा हेतु सभी अंशदान शामिल हैं
। प्रथम विश्वयुद्ध के मुहाने पर यूरोप में राष्ट्रीय आय का महज 10 प्रतिशत हिस्सा इस
मद से आता था जबकि
1980 और
1990
के
दशकों में बढ़कर यह 40
से
50
प्रतिशत
पर पहुंच गया है । उन्नीसवीं सदी से लेकर प्रथम विश्वयुद्ध तक राज्य की जिम्मेदारी
व्यवस्था और सुरक्षा जैसे पारम्परिक कर्तव्य तक सीमित थी । शिक्षा और स्वास्थ्य की
उसे कोई भी चिंता नहीं होती थी । बीसवीं सदी में सरकारों को तरह तरह की सार्वजनिक
सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा के व्यापक इंतजाम में हाथ डालना पड़ा । स्कूल, अस्पताल, आवास, यातायत और पेंशन
जैसे कामों से सरकारें अब पीछा नहीं छुड़ा सकतीं । पिकेटी ने इस भारी बदलाव को
सामाजिक जनवादी क्रांति कहा है । 1910
में
अगर किसी से कहा जाता कि राष्ट्रीय आय का आधा समाज के काम आएगा तो आर्थिक तबाही की
आशंका जाहिर की जाती । ऐसी कोई तबाही तो नहीं ही हुई बीसवीं सदी को अभूतपूर्व आर्थिक
समृद्धि के लिए जाना गया । श्रम की उत्पादकता भी पहले कभी इतना अधिक नहीं रही थी ।
आय में अंतर भी कम हुआ और संपत्ति का भी कुछ हद तक बंटवारा हुआ । इस समृद्धि की कुंजी
शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मानव पूंजी तक व्यापक और समावेशी पहुंच तथा सामूहिक अधि
संरचना का विस्तार थी । स्वामित्व के चरम संकेंद्रण और वर्गीय विशेषाधिकारों की दुनिया
में यह कतई सम्भव नहीं था ।
उनका
मानना है कि बीसवीं सदी में सामाजिक राज्य का निर्माण अर्थतंत्र में अनुपभोगीकरण
की प्रक्रिया से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था । शिक्षा, स्वास्थ्य, शोध, सामाजिक सुरक्षा
और कुछ हद तक यातायात,
ऊर्जा
और आवास जैसे क्षेत्र बीसवीं सदी में अधिकांश पश्चिमी देशों में मुनाफ़े के
पूंजीवादी तर्क से बाहर रखे गये थे । इनसे जुड़ी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन भी
तरह तरह के गैर पूंजीवादी कर्ताओं द्वारा होता था । यूरोप के मुकाबले अमेरिका में
सामाजिक राज्य का विकास धीमा हुआ । इसका एक कारण नस्ली शत्रुता का बोझ भी था ।
वहां स्वास्थ्य को मुनाफ़े के पूंजीवादी तर्क के अधीन ही रखा गया । इसके बावजूद
अनुपभोगीकरण की यह प्रक्रिया यूरोप में भी पूरी न हो सकी । अर्थतंत्र का चौथाई
हिस्सा ही बीसवीं सदी में बाजार के तर्क के बाहर रखा जा सका । शेष तीन चौथाई
हिस्सा बाजार,
पूंजीवाद
और शोषण के तर्क के अधीन ही रहा ।
बीसवीं
और वर्तमान सदी की आर्थिक समृद्धि दुनिया भर के प्राकृतिक संसाधनों के अबाध शोषण
पर आधारित है । सुविदित है कि इसके नतीजे तापवृद्धि और पर्यावरण के नाश के रूप में
सामने आ रहे हैं । अल्पकालिक मुनाफ़े का तर्क दीर्घकालिक साझा सामूहिक हित पर
सर्वत्र हावी है । जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के नाश की चेतना यूरोप में फैल तो
रही है लेकिन उत्सर्जन में कमी अब भी ऐतिहासिक जिम्मेदारी को देखते हुए बहुत ही कम
है और संपत्ति के पुनर्वितरण का खयाल तो अभी शैशवावस्था में ही है । यूरोप के
सामाजिक जनवादी काम के घंटों में घटोत्तरी के पक्ष में हैं लेकिन उपभोगवाद और दोहन
को चुनौती देने के मामले में उनकी भागेदारी अपर्याप्त ही बनी हुई है ।
पिकेटी
के अनुसार बीसवीं सदी में यूरोप में घटित सामाजिक जनवादी क्रांति ने दिखा दिया कि
पूंजीवाद पर विजय सम्भव है और अर्थतंत्र के कुछ क्षेत्रों को पूंजीवाद और बाजार के
तर्क से बाहर भी रखा जा सकता है । दुर्भाग्य से यह बीच में ही रुक गयी । जरूरी है
कि इस बुनियादी अनुभव को आगे ले जाया जाए तथा उसकी खूबियों और खामियों का
मूल्यांकन करके वर्तमान सदी में अनुपभोगीकरण की प्रक्रिया को पूरा किया जाए ।
No comments:
Post a Comment