Wednesday, April 22, 2026

चौथी कांग्रेस में कोमिंटर्न संयुक्त मोर्चे की ओर

 

                                 

2012 में ब्रिल से जान रिडेल के संपादन में और उन्हीं के अनुवाद की किताबटुवर्ड्स द यूनाइटेड फ़्रंट: प्रोसीडिंग्स आफ़ द फ़ोर्थ कांग्रेस आफ़ द कम्युनिस्ट इंटरनेशनल, 1922’ का प्रकाशन हुआ । संपादकीय भूमिका में रिडेल ने बताया है कि इस कांग्रेस में जो कुछ हासिल किया गया उसका महत्व इक्कीसवीं सदी में भी है । 1917 के क्रांतिकारी उभार के खात्मे और पूंजी के हमलावर होने की हालत में यह कांग्रेस 1922 में पेत्रोग्राद और मास्को में 5 नवम्बर से 5 दिसम्बर तक हुई थी । उसकी समाप्ति पर जिनोव्येव ने संतोष जाहिर किया कि इसमें पिछली कांग्रेसों के फैसलों को और अधिक ठोस रूप दिया गया है । क्रांतिकारी उभार के खात्मे के बाद कोमिंटर्न की नीतियों में बदलाव की जरूरत महसूस हो रही थी लेकिन बदलाव के विषय में खुद रूस में भारी मतभेद थे । ये मतभेद पिछली कांग्रेस में जाहिर हुए थे । इटली में मुसोलिनी का सत्ता पर कब्जा हो चुका था । वर्साई संधि से हासिल संतुलन पर दबाव पैदा हो रहा था । पिछली कांग्रेस ने जनता को अपने पक्ष में जीतने का आवाहन किया था । पांच महीने बाद एकताबद्ध पूंजीपति वर्ग से लड़ने के लिए सभी मजदूर संगठनों में व्यापकतम सम्भव एकता के लिए संयुक्त मोर्चा बनाने का आवाहन किया गया । इसे गैर कम्युनिस्ट मजदूर संगठनों के नेताओं के साथ समझौतों के जरिए हासिल किया जाना था । इस संयुक्त मोर्चा रणनीति का विरोध बहुतेरी कम्युनिस्ट पार्टियों ने किया था । इसके बावजूद अगली कांग्रेस ने उसे अनुमोदित करते हुए ठोस रूप दिया । पूंजीवादी और फ़ासीवादी हमले के विरोध में मजदूरों के नेतृत्व में जुझारू संयुक्त आंदोलन तैयार करने, साम्राज्यवादियों के आपसी संघर्षों के मुकाबले के लिए मजदूर वर्गीय अंतर्राष्ट्रवाद को खड़ा करने और औपनिवेशिक मुक्ति के लिए प्रभावी संयुक्त आंदोलन चलाने का फैसला लिया गया ।

असल में प्रथम विश्वयुद्ध के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी आंदोलन में फूट पड़ गयी थी । बड़ी पार्टियों के अधिकतर नेता अपने देश के शासकों के साथ हो गये थे । युद्ध का मजदूर वर्गीय प्रतिरोध शुरू में छोटी समाजवादी धाराओं की ओर से आया । 2015 के ज़िम्मरवाल्ड सम्मेलन में उनकी जुटान हुई थी । धीरे धीरे प्रतिरोध में जनता भी शरीक होने लगी । aय्ह प्रतिरोध प्रदर्शनों, हड़तालों और विद्रोहों के रूप में सामने आया । इसके कारण युद्ध से पहले का एकताबद्ध आंदोलन दो धाराओं में बंट गया । युद्ध समर्थक पार्टियों ने उस शासक वर्ग का खुलकर साथ दिया जिसने क्रूरता के साथ मजदूरों और सिपाहियों के विरोध का दमन किया । इन समाजवादियों ने अक्टूबर 1917 की बोल्शेविक क्रांति का भी विरोध किया । नयी सोवियत सत्ता के विरोध में प्रतिक्रांतिकारी युद्ध अभियान चलाने वाली ताकतों का भी उन्होंने साथ दिया । इसके विपरीत क्रांतिकारी समाजवादियों ने मजदूरों और सिपाहियों के प्रतिरोध का समर्थन किया, विश्वयुद्ध का विरोध किया और सोवियत शासन का पक्ष लिया ।    

नवंबर 1918 में जर्मनी में मजदूरों और सिपाहियों के विद्रोह के कारण सरकार पलट गयी और विश्वयुद्ध अचानक रुक गया । एक अस्थायी सरकार बनी जिसमें सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी का दबदबा था । सरकार ने क्रूर दमन चलाया जिससे पूंजीवादी शासन फिर से कायम हुआ । इस दमन में रोजा और लीबक्नेख्त की हत्या हुई जिसमें सरकार में शामिल पार्टी की सहमति थी । विजयी मित्र राष्ट्रों के ये दक्षिणपंथी समाजवादी अपनी सरकारों की दमनकारी शांति शर्तों के पक्ष में थे और क्रांतिकारी समाजवादी इन संधियों का विरोध कर रहे थे । दक्षिणपंथी समाजवादी धारा को सामाजिक जनवादी भी कहा जाता है । ये लोग अफ़्रीका, एशिया और अन्य स्थानों पर औपनिवेशिक शासन का समर्थन कर रहे थे जबकि क्रांतिकारी ताकतें उपनिवेशों में उठे विद्रोह के समर्थन में थीं ।

युद्ध विरोधी समाजवादियों में भी दो तरह के लोग थे । कुछ लोग सरकारों पर दबाव डालकर समझौते के जरिए शांति स्थापित करने के पक्ष में थे तो कुछ अन्य साम्राज्यवादी युद्ध का अंत समाजवादी क्रांति से करना चाहते थे । जर्मनी में इन दोनों धाराओं ने दो पार्टियों का गठन किया । क्रांतिकारी लोग स्पार्टाकस लीग में एकताबद्ध हुए और बाद में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण किया । इनके अलावे जो लोग अस्थायी सरकार में शामिल रहे थे उन्होंने अलग स्वतंत्र पार्टी बनायी जिसमें कुछ क्रांतिकारी मजदूर भी शामिल थे ।

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर आंदोलन में भी इसके ही अनुरूप तीन धड़े बन गये । जर्मनी के दक्षिणपंथी सामाजिक जनवादी ब्रिटेन की लेबर पार्टी के साथ मिल गये और उन्होंने इंटरनेशनल सोशलिस्ट कमीशन बनाया । क्रांतिकारी समाजवादियों ने आगे चलकर कोमिंटर्न का गठन किया । इन दोनों के बीच की कुछ ताकतों ने वियेना यूनियन का गठन किया । इसको मजाक में ढाई इंटरनेशनल भी कहा गया । इसी हिसाब से ट्रेड यूनियनों में भी विभाजन हुआ और एम्सटर्डम इंटरनेशनल तथा कोमिंटर्न से संबद्ध रीलू के बतौर दो खेमे उभरे ।

1920 के आते आते यूरोपीय युद्धोत्तर क्रांतिकारी उभार में गिरावट आने लगी । 1921 में पूंजीवादी शासकों ने मजदूर वर्ग पर संगठित राजनीतिक और आर्थिक हमला बोल दिया । सामाजिक जनवादी नेतागण पूंजीवाद की रक्षा करना चाहते थे और उन्हें मजदूरों में बहुमत का समर्थन हासिल था इसलिए वे न केवल समाजवादी क्रांति की राह में बल्कि मालिकों के हमलों के विरुद्ध मजदूरी और काम के हालात की बेहतरी की लड़ाई में भी बाधा बने हुए थे ।

1919 में जब कोमिंटर्न की मास्को में स्थापना हुई थी तब भी पूंजीवाद विश्वव्यापी संकट तले कराह रहा था । प्रथम विश्वयुद्ध से संकट और भी तीखा हुआ । युद्ध में हुए विनाश के बाद यूरोप भर में उत्पादन में भारी गिरावट आयी । देशों के बीच प्रत्यक्ष लड़ाई के अंत के बावजूद सामाजिक संकट नहीं खत्म हुआ । बुनियादी सामाजिक बदलाव के लिए उथल पुथल भरे आंदोलनों ने रूस में 1917 की दोनों क्रांतियों और जर्मनी की 1918 की क्रांति को जन्म दिया । इन क्रांतियों से मजदूरों और किसानों के हाथ में मानव इतिहास में पहली बार सत्ता आयी और इसने करोड़ो मेहनतकशों में मुक्ति और बेहतर भविष्य की उम्मीद पैदा की । मित्र राष्ट्रों के प्रतिबंधों को तोड़कर 1919 की प्रथम कांग्रेस में केवल नौ प्रतिनिधि शामिल हो सके थे । इसके बावजूद लेनिन ने इसे कम्युनिज्म के झंडे का अलमबरदार कहा और इसके इर्द गिर्द क्रांतिकारी सर्वहारा ताकतों के इकट्ठा होने की आशा जतायी । जिनोव्येव ने जोर देकर कहा कि तथ्यत: सभी महत्वपूर्ण देशों में सर्वहारा क्रांति की वस्तुगत परिस्थितियां परिपक्व हैं । अभाव बस आत्मगत तत्व अर्थात वर्ग संगठन और वर्ग चेतना का है । कोमिंटर्न का लक्ष्य इसी अभाव को दूर करना था । एक साल के भीतर ही इसे फ़्रांस, जर्मनी, इटली, चेकोस्लोवाकिया, नार्वे तथा अन्य देशों में समर्थन मिला । इस समर्थन को मजबूती दूसरी कांग्रेस और बाकू कांग्रेस से मिली । इनमें कार्यक्रम, रणनीति और संगठन आदि के बारे में फैसले हुए । दूसरी कांग्रेस में ही कोमिंटर्न की सदस्यता की इक्कीस शर्तें भी तय हुईं । इससे अन्य सुधारवादी वामपंथियों और मध्यमार्गियों से कोमिंटर्न की भिन्नता निश्चित हुई । 1920 से यूरोप में क्रांतिकारी ज्वार के उतरने के संकेत मिलने लगे । मालिकों की ओर से मजदूरों के अधिकारों पर हमले शुरू हो गये । नये हालात ने निराशा और हताशा को जन्म दिया ।

इस पर विजय पाने के लिहाज से संयुक्त मोर्चे की नीति का उदय हुआ । जर्मनी के मजदूरों की पहल में इस नीति को सबसे पहले अभिव्यक्ति मिली । दक्षिणपंथी तख्तापलट के विरोध में अन्य समाजवादी धाराओं का भी साथ लिया गया । स्टुटगार्ट के मजदूरों ने मजदूरों के हालात सुधारने के लिए संयुक्त संघर्ष छेड़ने का प्रस्ताव पारित किया । इसके लिए ऐसी मांगों पर बल दिया गया जिनसे सभी मजदूर प्रभावित हों । इनमें भोजन की कीमत में कमी से लेकर दक्षिणपंथी गिरोहों से रक्षा तक की मांगें थीं । नेताओं ने तो इस पहल को खारिज किया लेकिन मजदूरों में इसे व्यापक समर्थन मिला । इस अपील को खुला पत्र के नाम से भी जाना जाता है । इसे मिले भारी समर्थन के कारण दक्षिणपंथी समाजवादियों को इसके विपरीत वक्तव्य जारी करना पड़ा । स्टुटगार्ट और इस खुले पत्र से कम्युनिस्टों की रणनीति में बदलाव का पता चलता है । अब वे सामाजिक जनवादियों की पूंजीवाद समर्थक नीतियों की निंदा करने की जगह व्यवहार में उनके ही औपचारिक कार्यक्रम की प्रगतिशील मांगों पर लड़ने की मांग उनसे कर रहे थे । इससे कम्युनिस्टों के एक हिस्से को लगा कि उनकी पार्टी सरकार को उखाड़ फेंकने के लक्ष्य से पीछे हटकर सामाजिक जनवादियों के लिए स्वीकार्य मांगों पर जोर दे रही है ।

इस पहलकदमी पर विदेश के कम्युनिस्टों ने भी आपत्ति दर्ज की । बेला कुन समेत हंगरी के कम्युनिस्टों ने नारों को अधिक धारदार बनाने की मांग की । उनका कहना था कि संख्या में कम होने पर भी ऐसी साहसिक कार्यवाहियों को अंजाम दिया जा सकता है जिससे मजदूरों की हिचक टूटे । इसे आक्रामकता का सिद्धांत कहा गया । लेनिन ने इस मत की आलोचना की लेकिन कोमिंटर्न के नेतृत्व में बहुतेरे लोग आक्रामकता के पक्षधर थे । इसी बीच संयुक्त मोर्चे के समर्थक नेताओं को किनारे कर दिया गया और आक्रामकता की नीति के अनुसार विद्रोही आम हड़ताल की कोशिश हुई लेकिन इसका असर बहुत कम रहा । बहरहाल कांग्रेस में इस सवाल पर प्रतिनिधि एकमत नहीं थे । लेनिन और त्रात्सकी आक्रामकता के विरोध में थे इसलिए प्रस्ताव में यही रुख पारित हुआ । इसके कारण संयुक्त मोर्चे की नीति के पक्ष में माहौल बना । प्रस्ताव में कम्युनिस्ट पार्टियों से व्यवहार में सम्भवतम व्यापक जन भागीदारी के प्रयास की अपील की गयी । इसके लिए आवश्यक अनुशासन मानने का भी अनुरोध किया गया तथा मजदूर आंदोलन की दूसरे और ढाई इंटरनेशनल की अन्य धाराओं के साथ सहमति भी तलाशने की बात कही गयी ।

इस फैसले को लागू करने के लिए अन्य प्रतिनिधियों के साथ सम्मेलन भी किया गया । सम्मेलन में कुछ लोग इसके विरोध में थे लेकिन बहुमत ने संयुक्त मोर्चे की नीति का पक्ष लिया और ढाई इंटरनेशनल द्वारा आहूत मजदूर पार्टियों की आगामी कांग्रेस में शरीक होने का फैसला किया । 1922 में इस संयुक्त मोर्चे की परीक्षा हुई । कोमिंटर्न के सकारात्मक रुख की वजह से ही जिस सम्मेलन का ऊपर जिक्र हुआ है वह तीन इंटरनेशनलों का सम्मेलन बन गया । 2 से 5 अप्रैल तक 1922 में बर्लिन में दूसरे, ढाई और कोमिंटर्न के प्रतिनिधि जुटे । दूसरे इंटरनेशनल के प्रतिनिधियों ने आपसी विश्वास की गारंटी हेतु सोवियत संघ की आंतरिक नीतियों में सुधार की मांग की लेकिन इसे कोमिंटर्न के प्रतिनिधियों ने नामंजूर कर दिया । सम्मेलन से संवाद जारी हुआ और एक कमेटी भी बनी लेकिन महीने भर में सब कुछ बिखर गया । अलबत्ता दूसरे और ढाई इंटरनेशनल का 1923 के मई माह में विलय हो गया ।

जर्मनी में संयुक्त मोर्चे के स्तर पर बहुतेरी कार्यवाहियां हुईं और उनके नतीजे अलग अलग निकले । 24 जून 1922 को जर्मनी के यहूदी नेता की चरम दक्षिणपंथियों ने हत्या कर दी । यह हत्या जर्मनी में 1918 की क्रांति से हासिल लोकतांत्रिक माहौल और मजदूर वर्ग के आंदोलन के विरुद्ध फ़ासीवादी हमलों का अग्रसूचक थी । इसके विरोध में संयुक्त कार्यवाही करते हुए भारी विरोध प्रदर्शन आयोजित हुआ । इस कार्यवाही पर कांग्रेस में चर्चा भी हुई । ऊपरी स्तर पर कोई टिकाऊ मोर्चा तो नहीं बन सका लेकिन नीचे की कतारों में काफी संयुक्त कदम उठाये गये । इससे कम्युनिस्टों की सदस्यता और चुनावी समर्थन में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई । अन्य देशों में इसके लागू होने की गति अलग अलग रही । कांग्रेस में इस नीति की आलोचना भी एकाधिक देशों के प्रतिनिधियों ने की लेकिन बहुधा इस नीति की आलोचना को लागू करने की गड़बड़ी की तरह पेश किया जाता था । इसके समर्थकों में भी मात्रा संबंधी मतभेद थे ।

कांग्रेस के प्रतिनिधियों में इस बात पर सहमति थी कि युद्ध के बाद एकाध साल में मजदूर वर्ग की सत्ता कायम होने का माहौल अब बदल चुका है । यह लहर विश्व पूंजीवाद तो क्या यूरोपीय पूंजीवाद को भी उखाड़ नहीं सकी । अब नये हालात में प्रत्येक देश में मजदूर वर्ग की एकता पर आधारित व्यवस्थित आक्रमण के लिए संयुक्त मोर्चे की ही नीति अपनाने पर भी सहमति थी । इस नीति की व्याख्या के बारे में जरूर मतभिन्नता थी । जिनोव्येव की रिपोर्ट में संयुक्त मोर्चे की जरूरत मजदूर वर्ग के रक्षात्मक होने के कारण बतायी गयी थी । यूजेन वर्गा का कहना था कि इस बदलाव के कारण कम्युनिस्ट पार्टी की सेना को विस्तारित करने हेतु नयी सहायक शक्तियों को पास ले आने के लिए इसकी जरूरत है । इन वक्तव्यों से लगा कि संयुक्त मोर्चा अस्थायी कार्यनीति है और मजदूर वर्ग के ताकतवर होते ही इससे पीछा छुड़ा लिया जाएगा । जिनोव्येव ने अलबत्ता इसे वर्तमान युग की दीर्घकालीन कार्यनीति कहा । त्रात्सकी के अनुसार इस समय सर्वहारा में विभाजन की वजह से संयुक्त मोर्चे की जरूरत पैदा हुई है । 1917 की क्रांति के दौरान बोल्शेविकों द्वारा मजदूरों की व्यापक एकता की कोशिशों का जिक्र औपचारिक अधिवेशनों में नहीं नजर आता । इसके बावजूद संयुक्त मोर्चे का प्रस्ताव पारित हुआ जिसके तहत लेनिन ने 1903 से अब तक इसके लागू करने के तमाम प्रयोगों और प्रयासों का जिक्र किया । इस दौरान पीछे हटना भी पड़ा था और क्रांतिकारी अग्रगति भी हासिल हुई थी ।

संयुक्त मोर्चे की इसी समावेशी नीति के तहत सुझाव आया कि क्रांति के बाद मजदूरों की सरकार में कम्युनिस्टों के साथ गैर कम्युनिस्ट भी रह सकते हैं । इस सुझाव पर बहुत बहस हुई और सहमति बनी कि शुद्ध कम्युनिस्टों की सरकार की ओर जाने की राह में यह नीति संक्रमणकालीन हो सकती है । इस नीति के इस व्यावहारिक पहलू पर भी बहस हुई कि संयुक्त मोर्चे का प्रस्ताव सामाजिक जनवादी नीतियों की धोखाधड़ी को उजागर करने के लिए है या कोई फलप्रद मोर्चा भी कायम किया जा सकता है । कुछ लोग यह मानते थे कि सामाजिक जनवादी प्रतिक्रियावादी ताकतें हैं । दूसरे इंटरनेशनल को पूरी तरह दुश्मन मानने वाले ऐसे लोग नहीं समझ रहे थे कि इन पार्टियों का आधार मजदूर वर्ग में है । इस तरह की एकांगी समझ के कारण ही फ़ासीवाद पर कांग्रेस में चली बहस के दौरान संयुक्त मोर्चे को इन पार्टियों के समर्थकों को अपने साथ खींच लाने का औजार कहा गया । इसे सामाजिक जनवादियों ने कोमिंटर्न की ओर से साथ रखकर धोखा देने की तरह पेश किया । इस आरोप का जवाब देते हुए रादेक ने कहा कि संघर्ष का माद्दा दिखाइए तो कम्युनिस्ट आपके साथ चलेंगे । लेनिन ने भी संयुक्त मोर्चे के प्रस्ताव पर कहा था कि सामाजिक जनवादियों को विश्व पूंजीवाद का सहधर्मी कहने से परहेज करना चाहिए अन्यथा वे साथ नहीं देंगे । इसकी जगह उन्होंने बुनियादी राजनीतिक मतभेद के बावजूद संघर्ष में एकता पर मजदूरों के बल को मूल बात के रूप में रखना चाहते थे । इससे पहले 1916 में लेनिन ने एंगेल्स के हवाले से सामाजिक जनवाद के दुहरे चरित्र को रेखांकित किया था । उनके कार्यक्रम और दिशा पूंजीवादी हैं लेकिन उनकी सामाजिक जड़ और गठन मजदूर वर्ग का है । कांग्रेस में इस बात की किसी ने भी चर्चा नहीं की ।

मोर्चा बनाने में भी कोमिंटर्न की यह दुविधा प्रकट हुई । कुछ लोगों ने नेताओं के बीच एकता की जगह नीचे से एकता की पैरोकारी की । बल्कि नेताओं के बीच वार्ता और साथ काम करने पर अतिरिक्त जोर पर थोड़ी आपत्ति भी उठायी गयी । संयुक्त मोर्चे के लिए इसे पूर्वशर्त बनाने पर एतराज भी जाहिर किया गया । कोमिंटर्न के मुख्यालय ने जर्मनी के साथियों से कहा कि इस बहस का कोई अर्थ नहीं है । अगर कार्यकर्ताओं के स्तर पर एकता नहीं होगी तो नेताओं के बीच सहमति महीने भर भी नहीं चल सकती । अगर नेता लोग इसमें पलीता लगाना बंद कर दें तो व्यापक मजदूरों के बीच एकता बहुत आसानी से बन जाएगी । मजदूरों के बीच यह एकता हासिल करने के लिए कम्युनिस्ट नेता ईमानदारी से लगे हुए थे । त्रात्सकी ने इस विषय को 1922 में उठाया और कहा कि कामगार जनता को अपनी ही झंडे तले या अपने तात्कालिक व्यावहारिक नारों के इर्द गिर्द एकताबद्ध कर लेते और सुधारवादी संगठनों को दरकिनार कर पाते तो संसार में इससे बेहतर कुछ भी नहीं होता लेकिन मजदूरों की बहुसंख्या तो सुधारवादी संगठनों को छोड़ने को तैयार नहीं है इसलिए सुधारवादी संगठनों को उनकी नींद से जगाना और संघर्षशील जनता के सामने खड़ा करना जरूरी है । रादेक ने सुधारवादी नेताओं के बारे में संदेह को शुद्ध सैद्धांतिक आशंका कहा और संयुक्त मोर्चे को नीचे के साथ ही ऊपर से भी बनाने का प्रस्ताव किया और इस योजना को साकार करने में दोगुनी ताकत लगाने की अपील की । संयुक्त मोर्चे की नीति संबंधी प्रस्ताव में सुधार की प्रक्रिया सभी कांग्रेसों के सभी प्रस्तावों से अधिक जटिल और लम्बी रही । इस तरह के मतभेदों के बावजूद संयुक्त मोर्चे की नीति के बारे में अधिकांश प्रतिनिधि एकमत थे ।                                                                  

कांग्रेस शुरू होने से पांच दिन पहले मुसोलिनी ने इटली में सत्ता पर कब्जा कर लिया । इससे पहले दो साल के फ़ासीवादी अभियान ने देश भर में मजदूर संगठनों को ध्वस्त कर दिया था । सितम्बर 1920 की धातुकर्मियों की महान हड़ताल का अंत निराशा में हुआ था और उसके बाद इटली का मजदूर आंदोलन उतार पर आ गया था । आक्रामक फ़ासीवादी गिरोहों के हमले पुलिस और सरकार के खुले समर्थन से जारी थे । इन्हें मालिकों के हमलों की तरह समझा जा सकता है । आर्थिक मंदी के कारण छंटनी से मजदूरों का प्रतिरोध और भी कमजोर हुआ । बोलोना मजदूरों का गढ़ था लेकिन वहां 21 नवम्बर 1920 की हिंसक फ़ासीवादी विजय ने उनकी बढ़ी ताकत का मुजाहिरा किया । उसके बाद तो फ़ासिस्टों ने एक के बाद दूसरे इलाके में मजदूरों की संस्थाओं, यूनियनों और संगठनों पर हमलों का तांता लगा दिया । हमले देहाती इलाकों से आरम्भ हुए लेकिन धीरे धीरे औद्योगिक इलाकों तक फैलते गये ।

दुर्भाग्य से कोमिंटर्न से जुड़ी इटली की पार्टी में उस समय आंतरिक संघर्ष चल रहा था । बहुमत ने संबद्धता की इक्कीस शर्तों को मानने से इनकार कर दिया । कोमिंटर्न ने जोर दिया कि सुधारवादियों को पार्टी से तत्काल बाहर निकाला जाए । पार्टी से एक हिस्सा बाहर आ गया और उसने खुद को कम्युनिस्ट पार्टी घोषित किया । कोमिंटर्ने ने इसे तत्काल मान्यता दे दी । विभाजन में कोमिंटर्न की भूमिका के बारे में शिकायतें की गयीं । इस घटना का सीधा संबंध उस पार्टी में 1921 के पूर्वार्ध में पैदा संकट से बताया जाता है । इटली का फ़ासीवादी आंदोलन अभूतपूर्व था और इसे नये तरह का खतरा समझने में कम्युनिस्ट ताकतों को थोड़ा समय लगा । रीलू के 1921 के एक प्रस्ताव में फ़ासीवादी हमलों का जिक्र संक्षेप में हुआ और तीसरी कांग्रेस के दस्तावेज में इसे शासक वर्ग की हिंसा की एजेंसी कहा गया लेकिन इसके विश्लेषण की कोशिश नहीं दीखती । इटली के कम्युनिस्ट नेता बुर्जुआ लोकतांत्रिक शासन और फ़ासीवाद के बीच में कोई बुनियादी अंतर नहीं मानते थे । सत्ता पर फ़ासीवादी कब्जे की कोशिश को वे शासक वर्ग की आंतरिक कलह मानते थे जिसमें वे मजदूरों के दखल की जरूरत ही नहीं समझते थे ।

इन वजहों से फ़ासीवादी हमलों का प्रतिरोध खड़ा करने में बाधा आयी । कम्युनिस्ट इस दौरान सुधारवादियों से लड़ रहे थे और ये सुधारवादी ऐसे सरकारी तंत्र के वादों पर यकीन कर रहे थे जो दरअसल फ़ासीवादी हिंसा में भागीदार था । ऐसे में हमलों के विरोध में मजदूर पार्टियों की ओर से रक्षा दल अपने आप बनने लगे । इन दलों को मजदूरों में सबका समर्थन था और राष्ट्रीय स्तर पर इनकी सदस्यों की संख्या बीस हजार तक पहुंच गयी । इसके बावजूद दोनों पार्टियों ने इन दलों का विरोध किया । कोमिंटर्न के नेतृत्व को भी इटली के हालात की सही सूचना नहीं मिल रही थी । जब रोम में पचास हजार लोगों ने फ़ासीवाद के विरोध में जोरदार प्रदर्शन किया तो लेनिन ने इसे कम्युनिस्टों के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चे की पहल बताया जबकि वह प्रदर्शन मजदूरों के इन्हीं स्वतंत्र दलों का था ।

कोमिंटर्न ने इटली समेत सबके लिए संयुक्त मोर्चे की नीति की घोषणा की थी । महीने भर बाद मुख्यालय में बहस हुई । इसमें शामिल कम्युनिस्ट नेता ने इस नीति का विरोध किया । उनका कहना था कि इससे सुधारवादियों के साथ अंतर धुंधला जाता है । इस नीति को केवल ट्रेड यूनियन के मोर्चे पर लागू किया जा रहा है । जनता के फ़ासीवाद विरोधी स्वतंत्र दलों के बारे में भी उनकी राय नकारात्मक थी । इसके बावजूद उनके पुनरोदय की स्थिति में अपनी राय पर फिर से विचार करने को तैयार थे । बुखारिन का कहना था कि इन दलों के मामले में चूक हुई है । इनके जरिए कम्युनिस्टों के नेतृत्व में व्यापक जनता को गोलबंद किया जा सकता था । इटली की पार्टी को इस राय से अवगत कराया गया लेकिन विस्तारित सम्मेलन में भी इटली के प्रतिनिधि अड़े रहे । इस सवाल पर मुख्यालय ने पार्टी को कड़ी चिट्ठी लिखी लेकिन कुछ ही महीनों बाद फ़ासीवाद के उभार के लिए सुधारवादियों को जिम्मेदार ठहराते हुए दूसरा पत्र जारी किया गया । सुधारवादी ट्रेड यूनियन नेताओं ने 1922 के अगस्त में फ़ासीवादी खतरे के विरोध में बिना तैयारी के आम हड़ताल की । सरकार और फ़ासीवादी दमन के समक्ष यह टिक नहीं सकी । जहां कहीं मजदूर वर्ग के नेता एकताबद्ध हुए वहां फ़ासीवाद पर रोक लगी लेकिन आम तौर पर यह एकता कायम नहीं हुई जिसके कारण फ़ासीवाद को सत्ता पर कब्जा करने में आसानी हुई ।

इधर इटली के सुधारवादियों ने कोमिंटर्न के साथ एकता बनाने के लिए दक्षिणपंथी लोगों को निकाला और कांग्रेस हेतु प्रतिनिधि चुने । मुख्यालय ने प्रयास किया कि एकता हो जाए लेकिन कम्युनिस्ट राजी नहीं हुए । कांग्रेस के भीतर इटली के बारे में बहस इस प्रस्तावित एकता पर केंद्रित रही । अधिकांश कम्युनिस्ट प्रतिनिधि इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे थे जबकि सुधारवादी प्रतिनिधि शंकाकुल थे । एकता का खाका तैयार हुआ जिसमें कोमिंटर्न के दूतों की निर्णायक भूमिका होनी थी । फ़ासीवादी दमन के बावजूद सुधारवादी खेमे ने समझौते को खारिज कर दिया । इसके बाद 1924 में इनका एक हिस्सा कोमिंटर्न में शामिल हुआ । इटली में संयुक्त मोर्चे का सवाल इन दोनों धाराओं की एकता पर केंद्रित रहा लेकिन इस सिलसिले में फ़ासीवाद का जिक्र नहीं हुआ । यह था कि फ़ासीवाद के उभार में सुधारवादियों की भूलों का जरूर जिक्र हुआ और कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका को आदर्श की तरह पेश किया गया । एअकाधिक बार मुसोलिनी और एक सुधारवादी नेता को मजदूरों पर संयुक्त प्रहार का जिम्मेदार कहा गया । सुधारवाद और फ़ासीवाद के विरुद्ध संघर्ष हेतु संयुक्त मोर्चे की जरूरत बतायी गयी । इस समझ के साथ संयुक्त मोर्चा बनना मुश्किल था । सही बात तो यह है कि इन सुधारवादी नेताओं और संगठनों पर भी फ़ासिस्टों ने हमले किये । इस दुविधा के कारण रादेक ने कहा कि सुधारवादी मजदूरों के साथ धोखा करते हैं लेकिन मजबूरी होने पर वे पूंजीपतियों के साथ भी धोखा कर सकते हैं ।

फ़ासीवादी जीत के बारे में कोमिंटर्न के नेताओं ने तरह तरह की बातें कीं । इसे शुरू में नौटंकी मानकर कुछ महीनों या सालों में इसके खात्मे का अनुमान किया गया । इसके अगले ही दिन इसकी अवधि लम्बी होने की आशंका के साथ अन्य देशों में इसके विस्तार की भी सम्भावना व्यक्त की गयी । इटली के नेता ने इसके उदारपंथी और लोकतांत्रिक तथा यदा कदा हिंसा के उभार से ग्रस्त होने की बात कही । ग्राम्शी ने कहा कि न केवल 4 लाख लोगों की निजी सेना फ़ासीवादी संगठनों के पास है बल्कि सत्ता पर काबिज होने के पहले ही राज्य की मशीनरी पर फ़ासीवादियों  का कब्जा हो चुका है । उन्हें अधिकांश अधिकारियों का सक्रिय या खामोश समर्थन भी मिला हुआ है । रादेक ने इसे समाजवाद और कम्युनिस्ट आंदोलन की सबसे बड़ी हार बताया । लेकिन फ़ासीवादी हमलों का मुकाबला करने के बारे में कोई बहस नहीं हुई । इस मुद्दे को इटली के पड़ोसी देशों के प्रतिनिधियों ने उठाया । कांग्रेस उद्घाटन से दो दिन पहले जर्मनी के प्रतिनिधियों ने फ़ासीवाद के विरुद्ध विभिन्न रूपों में अंतर्राष्ट्रीय अभियान का अनुरोध किया । फ़ासीवाद विरोधी मोर्चे में विभिन्न ताकतों को एक साथ लाने की योजना भी बनी । जर्मनी में आस्ट्रिया की स्वतंत्रता पर खतरा इसके कारण था इसलिए उसके पक्ष में एकजुटता की कोशिश की गयी । जर्मनी की पार्टी ने फ़ासीवाद को जनता के लिए खतरा मानकर सर्वहारा आत्मरक्षा का आवाहन किया । स्विट्ज़रलैंड ने फ़ासीवाद के विरुद्ध दीवार खड़ी करने के लिए संसदीय के साथ गैर संसदीय तरीकों का भी इस्तेमाल करते हुए मजदूर वर्ग का संयुक्त मोर्चा बनाने का सुझाव जर्मनी के साथियों को दिया । जर्मनी के साथी भी फ़ासीवादी गोलबंदी के विरुद्ध मजदूर वर्ग के संयुक्त मोर्चे की जरूरत महसूस कर रहे थे । कांग्रेस से ही बर्लिन के एक मजदूर सम्मेलन को जर्मन फ़ासीवाद के विरुद्ध मजदूर वर्ग के रक्षा दलों का निर्माण करके संयुक्त सर्वहारा मोर्चा बनाने का सुझाव भेजा गया । इन सबके बावजूद कांग्रेस के समापन के अवसर पर फ़ासीवाद को लाने में सुधारवादी तत्वों की भूमिका पर ही जोर दिया गया । इस धारा का विरोध करते हुए कम्युनिस्टों से फ़ासीवाद विरोधी संघर्ष की अगुआई करने का आवाहन किया गया ।                             

सवाल पैदा होता है कि कोमिंटर्न को फ़ासीवाद से क्या बचाना था । मजदूर वर्ग का बचाव तो समझ आता है लेकिन कुछ पूंजीवादी सरकारों को भी चरम दक्षिणपंथ के हमले से बचाने का प्रयास किया गया । यहां तक कि एक पूंजीवादी राजनेता की हत्या के विरोध में अभियान भी चलाया गया । आस्ट्रिया की रक्षा भी पूंजीवादी गणतंत्र की संप्रभुता की रक्षा करने की कोशिश थी । फिर भी इस मामले में भ्रम थे कि लोकतंत्र को बचाने के नाम पर मजदूर विरोधी पूंजीवादी राजनीति की किस हद तक रक्षा की जाए ।  

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