Monday, April 13, 2026

प्रगतिशील आलोचना के गौरव

 

                  

                                    

श्रीनारायण पाण्डेय की 2025 में शतरंग प्रकशन से छपी ‘पत्रों के बहाने रामविलास शर्मा’ बेहद महत्व की पुस्तक है । अगर इसमें दुहराव और छपाई की भूलें कम होतीं तो और भी अच्छा होता । लेकिन जो नहीं है बकौल शमशेर जैसे सुरुचि उसका गम क्या । किताब से पहली बार में ऐसा लगता है जैसे रामविलास जी के पत्रों का एक और संग्रह देखने का अवसर मिलेगा लेकिन पाठक को निराशा हाथ लगती है । इसकी भरपाई कुछ हद तक किताब के अंत में लेखक को मिले पत्रों की प्रतिलिपि से हो जाती है । इनकी संख्या कम तो है लेकिन इनसे एक कहानी उभरती है ।

अच्छा होता कि पत्रों की तस्वीर की जगह पत्रों में लिखी इबारत भी पढ़ने को मिलती किताब के मुखपृष्ठ पर भी रामविलास जी के एक पत्र की हस्तलिखित तस्वीर छपी है इस तस्वीर में अक्षर पढ़ने में दिक्कत नहीं होती क्योंकि पोस्टकार्ड में अक्षर भी बड़े बड़े हैं लेकिन किताब के अंत में पत्रों की जो तस्वीरें एक साथ दी गयी हैं उनमें पोस्टकार्ड के दोनों तरफ पढ़ने में असुविधा होती है बेहतर होता कि इन पर लिखे को भी टाइप कराकर छापा गया होता          

पुरानी शब्दावली का इस्तेमाल करें तो श्रीनारायण पाण्डेय बड़भागी हैं जो उन्हें हिंदी आलोचना के शीर्ष का स्नेह मिला । हिंदी की प्रगतिशील आलोचना पर जिस तरह विश्वविद्यालयों की छाया रही उसे देखते हुए रामविलास जी की उपस्थिति विकल्प की तरह महसूस होती थी । वे अध्यापक थे तो लेकिन अंग्रेजी के इसलिए पुरस्कारादि के तंत्र से बहुत दूर थे । पाण्डेय जी ने उनके साथ नामवर सिंह का नाम लिया है लेकिन इस सिलसिले में याद रखना चाहिए कि रामविलास जी का वैचारिक विकास तेलंगाना के संघर्ष की आंच में हुआ था । इसी वजह से वे जीवन भर 1946 को ऐसा क्रांतिकारी अवसर मानते रहे जिसमें नौसेना विद्रोह भी शामिल था । उसके बाद का इतिहास तेलंगाना के ऐतिहासिक किसान संग्राम की वापसी और नेहरू के नवोदित शासन तंत्र के साथ क्रमिक समायोजन का रहा है । इस अंतर पर ध्यान न देने से दोनों समयों के व्यक्तित्वों का नाम एक ही सांस में लेना सम्भव होता है ।

इसीलिए रामविलास शर्मा के साथ लेखक की निकटता मूल्यवान है । इसका सबूत है कि इन पत्रों की शुरुआत तो सम्मानसूचक संबोधनों से होती है लेकिन धीरे धीरे संबंध की निकटता के सूचक संबोधन उनकी जगह लेने लगते हैं । लेखक के साथ हिंदी के गम्भीर आलोचकों की निकटता का एक कारण उनका बंगाल में रहना भी है । सभी जानते हैं कि बंगाल और हिंदी साहित्य का घनिष्ठ रिश्ता रहा है । अखबारों और साहित्यकारों की उस प्रांत में उपस्थिति की बात छोड़ भी दें तो उसके प्रमुख नगर कलकत्ते के राजधानी होने की वजह से नयी सोच का उद्गम वहां से होता रहा है और इसलिए राष्ट्रीय पुस्तकालय का खजाना हिंदी के सभी अध्येताओं के लिए प्रचंड आकर्षण का केंद्र रहा है । इसके अतिरिक्त बंगाल में हिंदीभाषी समुदाय भी है जो बंगाल के असर से कुछ हद तक साहित्यप्रेमी भी बना हुआ है । इसलिए श्रीनारायण जी उस समय के उत्सुक अध्येताओं के लिए सम्पर्क सूत्र भी रहे । इसका प्रमाण रामविलास जी की पत्रिका समालोचक के लिए लिखे उनके लेख का प्रसंग है । रामविलास जी के लिए 1857 बहुत क्रांतिकारी संदर्भ रहा है । इसका भी उल्लेख श्रीनारायण जी ने प्रसंगवश किया है । यह तो सर्वविदित है कि 1857 का विद्रोह बंगाल आर्मी में हुआ था । उस विद्रोह के प्रति बांग्ला बौद्धिकों के रुख को लेकर श्रीनारायण जी के प्रेषित लेख को प्रासंगिक सामग्री को खंगालकर फिर से लिखने का अनुरोध उनके सजग संपादन का जाग्रत प्रमाण है । इस सिलसिले में उन्होंने अपने देखने के लिए भी सामग्री भेजने का अनुरोध किया इनसे उनके शोधकर्ता व्यक्तित्व की थाह लगती है इसी तरह से बनारस में रहते हुए भी उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पुस्तकालय की सामग्री का उपयोग करते बहुतों ने देखा है       

किताब का रिश्ता पत्रों से होने के कारण केदारनाथ अग्रवाल के साथ उनके पत्र व्यवहार के संग्रह मित्र संवाद का जिक्र एकाधिक बार हुआ है । कहने की जरूरत नहीं कि ये पत्र ऐसे मित्रों के हैं जो साहित्य में कुछ हद तक समानधर्मा हैं उनके बीच रिश्ता बराबरी का होते हुए भी वैचारिक रूप से रामविलास जी की परिपक्वता का है उनमें सभी सवालों पर सहमति ही नहीं है कुछ सवालों पर मतभेद भी हैं इन मतभेदों में तुलसीदास के प्रति दोनों के रुख का जिक्र श्रीनारायण जी ने विस्तार से उद्धरणों के साथ किया है इस तरह के निजी संवाद की खूबी यह होती है कि पाठक भी दोनों के मन में झांक लेता है । तुलसी के इस प्रसंग में मतभेद का कारण रामविलास जी की उनके साहित्य के सामतंवाद विरोध पर जोर तथा इसके बरक्स केदारनाथ अग्रवाल द्वारा इन्हीं पाखंडी तत्वों द्वारा तुलसी के दुरुपयोग पर जोर देने से उपजा है । इस विवाद में रामविलास जी धीरे धीरे केदारनाथ अग्रवाल को कायल कर लेते प्रतीत होते हैं । तुलसी के अतिरिक्त दोनों के बीच निराला भी साझा संदर्भ हैं । श्रीनारायण जी ने उद्धरण देकर साबित किया है कि निराला पर लिखने का इरादा रामविलास जी ने बहुत पहले बनाया । एकाधिक जगहों पर तो दोनों के बीच निराला को लेकर बातचीत कारुणिक हो उठती है । रामविलास जी के भीतर के भावुक मनुष्य की झलक भी इस प्रसंग में पाठक को मिलती रहती है । उनकी यह छवि हिंदी के आलोचना जगत में निर्मित लड़ाकू छवि से पूरी तरह से अलग है ।

श्रीनारायण जी ने बार बार इस बात पर जोर दिया है कि रामविलास जी मार्क्सवाद के प्रति जीवन भर समर्पित रहे । इस तथ्य का महत्व बढ़ जाता है जब हम देखते हैं कि उनकी इस प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने की सचेत रूप से कोशिश बार बार हुई । इस अभियान को चलाने में नामवर सिंह का भी नाम लिया जाता रहा है । उन्हें इस अभियान में न केवल निजी रूप से बल्कि अन्य समर्थकों को भी शरीक करते माना जाता है । श्रीनारायण जी ने इस अभियान का संकेत भर किया है । इस किताब से रामविलास जी की उस छवि की पुष्टि होती है जो इस अभियान के बावजूद हिंदी के आम पाठक के मन में बैठी हुई है । श्रीनारायण जी ने उनके जीवन की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है उससे भी इस पर मुहर लगती है । परिवार में विद्रोही सिपाहियों के संगी साथी, झांसी की आरम्भिक शिक्षा के बहाने 1857, फिर लखनऊ की उच्च शिक्षा में पुन: 1857, जीवन भर आगरा में शिक्षण से कुल मिलाकर पाठक के मन में रामविलास जी की तस्वीर महात्वाकांक्षा रहित बौद्धिक की उभरती है । तमाम पुरस्कारों की राशि को हिंदी के विकास के लिए दान कर देने की उनकी आदत ने साहित्यकार के स्वाभिमान का बहुत ऊंचा मानदंड निर्मित किया । उन्हें साहित्य और विश्वविद्यालय की दुनिया में व्याप्त व्याधियों से उनकी इस निष्ठा ने बचाया । इसके कारण उन्हें हिंदी के सामान्य पाठकों का बहुत गहरा प्रेम भी मिला । यह किताब उनकी इस महानता का एक और सबूत प्रस्तुत करती है ।                                          

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