जिस सदी में हम रह रहे हैं उसकी
विशेषताओं को दर्ज करने में कविता ने कोताही नहीं की है । सबसे पहले इन विशेषताओं
पर एक नजर मारना उचित होगा । इस सदी की शुरुआत पिछली सदी के एक जघन्य कृत्य से हुई
थी जब राजनीति, शासन और अदालत के देखते देखते उत्तर प्रदेश की राजधानी के पड़ोस में
स्थित मस्जिद को संगठित गिरोह ने धराशायी कर दिया था । उसके दस साल बीतने पर देश
के पश्चिमी किनारे के एक प्रांत में राज्य प्रायोजित जनसंहार हुआ और उसके दाग
मिटाने में नवउदारवाद से उपजे थैलीशाहों ने प्रचार अभियान चलाया । इन्हीं
प्रवृत्तियों की निरंतरता से इस सदी की कहानी बनती है ।
वैसे तो इस प्रवृत्ति का वैश्वीकरण
हुआ और संसार भर में सौ साल पहले के भूत याद आने लगे । हम सबका सामूहिक दुर्भाग्य
था कि जिस हिटलर को दफ़नाया जा चुका था उसने नाना रूप धारण किये और पहले की तरह ही
सड़कों पर सीना फुलाकर मार्च भी करने लगा । इस खास परिघटना ने सारी चीजों को नयी
रंगत प्रदान की । इसे हमारे समय के सबसे सजग और महत्वपूर्ण कवि देवी प्रसाद मिश्र
ने दर्ज किया । उनकी कविता ने इस सच को बयान करने के लिए गद्य तक बन जाने का जोखिम
कविता में उठाया । खासकर ‘फ़ासिस्ट’ शीर्षक कविता में इस समय का मखौल बेहद खुलकर
व्यक्त हुआ है । इस मामले में वे हिंदी कविता की उस धारा के नवीनतम विकास हैं
जिसमें निराला, मुक्तिबोध और नागार्जुन जैसे कवि रहे हैं । उनकी कविता में हमारे
इस भीषण समय की छवि वक्तव्य की तरह तीखी भाषा में उनकी गहन वैचारिक समझ के कारण
व्यक्त हुई है । समय को दर्ज करने में कविता के रूपबंध के साथ लगभग इतना ही साहसिक
प्रयोग पंकज चतुर्वेदी ने भी अपने ताजा संग्रह ‘काजू की रोटी’ में किया है । असल
में समय इतना भीषण है कि उसके सच को कहने में कविता का परम्पराप्राप्त विधान
पर्याप्त नहीं महसूस हो रहा इसलिए उसमें तोड़फोड़ जरूरी हो गयी । यह काम छंद और
बेछंद के मेल से मृत्युंजय ने भी अपने संग्रह ‘स्याह हाशिए’ और अन्य कविताओं में
किया है ।
इन कवियों ने सत्ता पोषित क्रूरता और
अन्याय को उसके लगभग सभी रूपों और आयामों में उजागर किया है । हमने पहले ही कहा कि
इस हालिया परिघटना ने सारी सामाजिक सचाइयों को नयी रंगत प्रदान की है । इस मोर्चे
पर जो कुछ भी भारत की जनता ने हासिल किया था उन सबको उलट देने का अभियान सा चल पड़ा
है । जाति और लिंग संबंधी पूर्वाग्रह अब महीन और परिष्कृत सांचों और ढांचों के
मुहताज नहीं रहे । सामाजिक प्रतिक्रिया का घनघोर उत्थान हुआ और इसके प्रतिकार ने
स्त्री और दलित कविता को नया जुझारू तेवर दिया ।
स्त्री कविता की सबसे बड़ी खूबी यह है
कि अनामिका और कात्यायनी से आगे बढ़ते हुए नयी पीढ़ी ने न केवल स्त्री पराधीनता की
मुख्य वजह पितृसत्ता को उसके नवीनतम रूपों में बेनकाब किया बल्कि सभी तरह की
वंचनाओं का विरोध करते हुए उत्पीड़ितों के बीच व्यापक एकता बनाने का माहौल निर्मित
किया है । इस क्रम में उन्होंने स्त्री मुक्ति को समग्र सामाजिक मुक्ति का अंग बना
दिया है । इसका सबसे पक्का सबूत यह है कि दलित और आदिवासी कविता में भी उनकी
उपस्थिति मुखर है ।
हमारे देश में वर्तमान शासक विचार
जिस वैचारिकी के आधार पर कार्यरत है उसमें बहुसंख्यकवाद की प्रमुख भूमिका है ।
स्वाभाविक है कि इससे अल्पसंख्यक समुदायों का बहिष्करण देखा जा रहा है । कहने की
जरूरत नहीं कि इसका भाषिक पहलू भी है । दुर्भाग्य से जिसे राष्ट्रभाषा बनाने की
कोशिश के आधार पर इस प्रयास को औपनिवेशिक मानसिकता का उन्मूलन कहा जा रहा है उस
हिंदी के साथ देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का गहरा रिश्ता है । पहचान के
निर्माण के क्रम में बताया जा रहा है कि उर्दू नामक भाषा का रिश्ता धार्मिक रूप से
इस अल्पसंख्यक समूह के साथ है । कठिनाई यह है कि बहुत दिनों से जारी इस प्रयास के
बावजूद उर्दू के साथ हिंदुओं के और हिंदी के साथ मुसलमानों के संबंध को मिटाना अब
भी असम्भव ही बना हुआ है । इसी वजह से हिंदी कविता में मुसलमान कवियों की उपस्थिति
न केवल अतीत में बल्कि आज भी बनी हुई है । इस विशेषता के कारण इस धार्मिक
अल्पसंख्यक समूह की व्यथा भी इस सदी की कविता में जोरदार तरीके से दर्ज हुई है ।
मस्जिद को धराशाई करने के कारनामे का अगला चरण इस समुदाय के राजनीतिक बहिष्करण का
है जिसके लिए उनकी नागरिकता को प्रश्नांकित करने की संस्थाबद्ध कोशिश हाल के दिनों
में की गयी । देशभक्ति की सांप्रदायिक व्याख्या भी आम लोगों के भीतर प्रविष्ट
कराने के प्रयास ने इस कविता को खास तीखापन प्रदान किया है और उसने दायरे में देश
की आजादी के दौरान हासिल देशभक्ति की उस व्यापक भावना को मुखरित किया है जिसे
रवींद्रनाथ जैसे विश्वकवि ने व्यापक मानव मुक्ति के साथ जोड़ दिया था । सामाजिक
ताने बाने को छिन्न भिन्न करने की औपनिवेशिक चाल की विरासत को आज भी जिस तरह नया
बनाया जा रहा है उस वातावरण में सामुदायिक सवाल को व्यापक लोकतांत्रिक आजादी के
सवाल के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना जायज है । इस मामले में हिंदी कविता के कवि समस्त
वर्तमान भारतीय कविता की धर्मनिरपेक्ष धारा के साथ खड़े हैं । इन कवियों में अदनान
कफ़ील दरवेश के साथ आमिर अजीज़ का नाम लिया जा सकता है । आमिर अजीज़ ने तो कविता के
पाठ के सौंदर्य को उजागर करने के लिए बहुत ही नये और रचनात्मक माध्यमों का सहारा
लिया है ।
जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव की
संस्थाबद्ध व्यवस्था का प्रतीक हमारे धर्मग्रंथों की पवित्रता में व्यक्त हुआ है ।
इस तथ्य को 90 साल पहले अंबेडकर ने पहचाना था । इस व्यवस्था की उनकी इस समझ को नये
समय के यथार्थ को पकड़ने के लिए नवीनतर बनाया गया है । हिंदी की दलित कविता में
ओमप्रकाश वाल्मीकि के बाद की नयी पीढ़ी ने वंचना के नये रूपों को पहचानते हुए
सामाजिक जीवन में सहभाग की अपनी दावेदारी को जोरदार तरीके से रखा है । उनकी भाषा
की तुर्शी अलग से पहचानी जा सकती है । मोहन मुक्त, विहाग वैभव और पराग पावन दलित
हिंदी कविता के नये चेहरे हैं ।
सभी जानते हैं कि हमारे समय में
समस्त मध्ययुगीनता नवीनतम तकनीक के सहारे पुनरुत्पादित हो रही है । इसलिए उत्पीड़न
और भेदभाव को वैधता प्रदान करने वाले औजार भी लगातार नये और परिष्कृत किये जाते
रहते हैं । इनके ऊपर विकास और राष्ट्रवाद का मुलम्मा चढ़ा रहता है । इस धोखे की
असलियत को सटीक भाषा में पकड़ना और सबके लिए सुबोध और कायल करने वाली अभिव्यक्ति
में ढालना बहुत बड़ी चुनौती है । इस चुनौती को अन्य कवियों के अतिरिक्त दो ऐसे
कवियों ने स्वीकार किया जो बुजुर्ग तो हैं लेकिन जिनका काव्य लेखन आज भी जारी और
प्रासंगिक है । अष्टभुजा शुक्ल और दिनेश कुमार शुक्ल नामक इन कवियों की सबसे बड़ी
विशेषता यह है कि इनकी कविताओं में संस्कृत की क्लासिक कविता की अनुगूंज के साथ ही
लोक के सहज बोध की भाषिक अभिव्यक्ति का दुर्लभ संयोग है । इन दोनों की कविताओं के
स्वर अनेकविध हैं खासकर अष्टभुजा की कविता में मारक व्यंग्य की मौजूदगी है ।
समय के यथार्थ का एक प्रमुख पहलू
औपनिवेशिक जमाने का पुनरुत्थान है । यह पुनरुत्थान अन्य चीजों के साथ प्राकृतिक
संसाधनों की लूट के रूप में सामने आया है । इन संसाधनों की अबाध लूट में सबसे बड़ी
बाधा आदिवासी समुदाय है । उस पर बने नये संकट को हिंदी कविता के आदिवासी चेहरे ने
व्यक्त किया है । इस कविता में भारतीय राज्य के दमनकारी स्वरूप की पहचान के साथ
सांस्कृतिक अस्मिता की दावेदारी भी हो रही है । इस धारा में अनुज लुगुन के साथ
जसिंता केरकेट्टा और पूनम वासम की आवाजें सबसे ऊंची हैं ।
इस सदी की हिंदी कविता इस सदी की
चुनौतियों से जूझते हुए आकार ले रही है । पिछली सदी में नवउदारवाद का आरम्भ हुआ था
। अब वह अपनी निष्पत्ति के साथ गरज रहा है । उसकी गरज में भारतीय समाज के प्रभु
वर्गों का मर्दाना और जातिगत श्रेष्ठता का दर्प गूंज रहा है । पुराने समय के इस
नवोत्थान को आज के शासन का निर्लज्ज साथ मिला हुआ है । इस नवोत्थान के साथ ही इस
दर्प के प्रतिरोध की प्राचीन धारा भी नये समय को समझते हुए वैचारिक रूप से समृद्ध
होकर जिस तरह की काव्यात्मक अभिव्यक्ति कर रही है उसे सराहने के लिए नया काव्यबोध
अपेक्षित है । आशा है कि पुराने काव्यबोध से संघर्ष करते हुए धीरे धीरे यह नया
काव्यबोध हिंदी का सहज संस्कार बन जाएगा ।
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