2023 में नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी प्रेस से जोहान्ना
ओकसाला की किताब ‘फ़ेमिनिज्म, कैपिटलिज्म, ऐंड इकोलाजी’ का प्रकाशन हुआ । लेखिका को
लगातार यह डर रहा कि मानवता तेजी से पर्यावरणिक ध्वंस की ओर जा रही है । इस तरह के
भय को अक्सर व्यर्थ कहा जाता है । इसके बावजूद बहुतेरे लोग समझते हैं कि धरती के
वातावरण में होने वाले बदलावों को वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर सही सही बताया जा
सकता है । हमारी नियति का बेहतरीन रूपक टाइटैनिक हो गया । उसके यात्रियों और
चालकों की तरह ही लोग भी स्थिति की गम्भीरता से अनजान बने रहना चाहते हैं । वे इस
आपदा से बचने के लिए जरूरी उपायों से भी नावाकिफ़ बने हुए हैं ।
अब जाकर जलवायु परिवर्तन को जीवन के लिए खतरा माना जाने
लगा है । वैज्ञानिक तो बहुत पहले से इसके बारे में चेता रहे थे । अब उत्तरी
गोलार्ध के लोग भी इसका अनुभव करने लगे हैं । गर्म हवाएं, दावानल, तूफान और बाढ़ की
सूचना लगातार आती रहती है । अब तो जलवायु परिवर्तन और पूंजीवाद के बीच का संबंध भी
साफ साफ नजर आने लगा है । नाओमी क्लीन ने कहा कि जो आर्थिक व्यवस्था इस परिवर्तन
को तेजी प्रदान कर रही है उसे बदले बिना इस संकट से पार पाना लगभग असम्भव ही है ।
पूंजीवाद की यह पारिस्थितिकीय आलोचना हाशिये से अब मुख्य धारा में आ गयी है ।
फ़्रेडेरिक जेमेसन ने इसे फ़ैशन जैसा मानते हुए व्यंग्य किया था कि धरती के अंत की
कल्पना तो हो रही है लेकिन पूंजीवाद के अंत की कल्पना भी नहीं की जा रही । इसके
बावजूद अधिकाधिक लोगों को महसूस हो रहा है कि अगर अपनी इस सभ्यता को बचाना है तो
पूंजीवाद का अंत ही एकमात्र वास्तविक विकल्प है । पूंजीवाद का अंत अनेकानेक
वैचारिक कारणों से अब केवल वांछित नहीं है बल्कि जलवायु संकट के कारण अपरिहार्य हो
गया है ।
लेखिका इस बात पर दांव लगाने को तैयार हैं कि इस समय की
किसी भी कारगर नारीवादी आलोचना को इस मौके का फायदा तुरंत उठाकर पर्यावरणिक संकट
के सवाल का सामना करना चाहिए । अगर नारीवादी सिद्धांत गम्भीरता के साथ
पारिस्थितिकीजन्य इन समस्याओं पर बातचीत
नहीं करता और पर्यावरणवाद के साथ रिश्ता बनाने की नहीं सोचता तो हमारे भविष्य को
आकार देने वाली राजनीतिक शक्ति के रूप में उसकी प्रासंगिकता को मानना मुश्किल होगा
। इसी तरह पर्यावरणवाद को भी नारीवाद की जरूरत है । पर्यावरणिक समस्याओं को ठीक से
समझने के लिए उनके लैंगिक पहलुओं और प्रभावों को समझना जरूरी है । लैंगिक विषमता
के और विस्तार की कीमत पर पर्यावरण की सुरक्षा नहीं हो सकती । इसकी जगह लेखिका का
प्रस्ताव है कि पर्यावरण सुरक्षा के इस काम के लिए पर्यावरण के विनाश और स्त्री
पराधीनता के बीच वर्तमान और ऐतिहासिक संबंध की गहन समझदारी अपेक्षित है । प्रकृति
के बारे में हमारी बुनियादी सोच स्त्री और जनानेपन के प्रति हिकारत की भावना के
साथ बहुत गहरे जुड़ी है । यही नहीं पर्यावरणवाद और नारीवाद के बीच का संबंध ठोस
भौतिक तरीकों से भी आपस में विशेषकर गहरा है । पर्यावरणिक खतरों और चुनौतियों से
स्त्री का जीवन सीधे प्रभावित होता है । इसलिए भी पर्यावरण के सिद्धांत और राजनीति
के प्रमुख सवालों की सही समझ के लिए आजकल पर्यावरणिक नारीवादी विश्लेषण जरूरी हो
गया है । इससे और भी तरह तरह के ज्ञान और राजनीतिक हस्तक्षेप के नये पहलू सामने
उभरकर आएंगे ।
लेखिका का कहना है कि पर्यावरणवाद और नारीवाद को साथ
लाने के सैद्धांतिक और राजनीतिक प्रयास से वे दोनों ही पूंजीवाद की आलोचना के साथ
व्यवस्थित तरीके से जुड़ जाते हैं । वर्तमान सदी में नारीवादियों को यह सुविधा नहीं
रह गयी है कि वे पर्यावरणिक राजनीति के ऐसे ही रूपों का समर्थन करें जिसके तहत
पूंजीवादी बाजार के परे प्रकृति के संरक्षण की गुंजाइश थी । अब तो समय है कि
नारीवादी कार्यकर्ता पूंजीवादी अर्थतंत्र पर ही सवाल उठाएं क्योंकि उसकी वजह से ही
पर्यावरण का विनाश और मानवजनित जलवायु परिवर्तन हो रहा है । मतलब कि पूंजीवाद को
पराजित करने के साझा संघर्ष में नारीवादियों और पर्यावरणवादियों को साथ आना होगा ।
इससे न केवल जलवायु परिवर्तन जैसी गम्भीर पर्यावरणिक समस्याओं को हल करने में मदद
मिलेगी बल्कि वैश्विक सामाजिक और पर्यावरणिक न्याय का काम भी आगे बढ़ेगा ।
इसी किस्म की राजनीतिक परियोजना की दार्शनिक पीठिका
तैयार करना इस किताब का मकसद है । लेखिका ऐसी बुनियाद बनाना चाहती हैं जिस पर
वर्तमान नारीवादी और पारिस्थितिकी आंदोलन मिलकर पूंजीवाद के विरुद्ध प्रभावी
राजनीतिक मोर्चा खड़ा कर सकें । इसके तहत वे पूंजीवाद की वर्तमान व्यवस्था के उस
बुनियादी तर्क को उजागर करना चाहती हैं जिसके लिए पर्यावरण का नाश और स्त्री की
पराधीनता आवश्यक हो जाती है । इसके लिए वे भौतिकवादी पारिस्थितिकीय नारीवाद और मार्क्सवादी
नारीवाद की मौजूदा परम्पराओं से शुरू करते हुए भी उनके अनेक तर्कों में सुधार और
उन्हें नया बनाने की जरूरत को रेखांकित करना चाहती हैं ।
उनका कहना है कि पारिस्थीकीय नारीवाद की धारणा 1970 दशक
में सामने आयी जब उदीयमान पर्यावरण आंदोलन का सामना नारीवाद जैसे तमाम तरह के
सामाजिक न्याय आंदोलनों से पड़ा था । 1980 दशक में इस धारणा का विकास व्यापक
सैद्धांतिक और राजनीतिक मंचों पर हुआ जब स्त्री और प्रकृति के साझा उत्पीड़न के
मामले में नयी बातें कही गयीं । बहरहाल 1990 दशक में इसकी आलोचना शुरू हुई और इस
पर बौद्धिकता विरोध और मनुष्य केंद्रीयता के आरोप लगाये गये । कहां तो इसे
नारीवादी सैद्धांतिकी का अभिन्न पहलू होकर पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से उसकी मनुष्य
केंद्रीयता को दुरुस्त करना था और कहां यह नाम ही बदनामी की बड़ी वजह बन गया । उस
पर आरोप लगा कि वह धरती को स्त्री बनाकर देवी की तरह उसकी पूजा करने लगा और दुनिया
भर में वीगन (ऐसा शाकाहार जिसमें दूध भी वर्जित है) का प्रसार ही सारी समस्याओं का
समाधान समझने लगा । लेखिका का मानना है कि पारिस्थितिकीय नारीवाद की मान्यताओं का
फिर से मूल्यांकन जरूरी हो गया है । यह काम सैद्धांतिक और राजनीतिक कारणों से आज
के हालात में उनको महत्वपूर्ण लगता है ।
1970 और 1980 के इसी दशक में मार्क्सवादी नारीवाद भी
विकसित हुआ । उसकी केंद्रीय सैद्धांतिक और राजनीतिक मान्यता थी कि स्त्री के
उत्पीड़न को पूंजीवाद के साथ नाभिनालबद्ध सामाजिक भौतिक संबंधों में देखना होगा ।
बहरहाल 1990 दशक के दौरान ही उसकी दिशा भी भ्रम का शिकार हुई । पितृसत्ता और
पूंजीवाद को एकीकृत व्यवस्था मानने की आलोचना सामने आयी । इसके साथ ही उत्पीड़न की
दुहरी या तिहरी व्यवस्था की धारणा भी बहुत स्पष्ट नहीं हो सकी । 1970 दशक में
निर्मित मार्क्सवादी नारीवाद में आज बहुतेरी सैद्धांतिक समस्याएं नजर आ रही हैं ।
उसके बाद उत्तर संरचनावाद, क्वैर सिद्धांत, पर्यावरण सिद्धांत और आलोचनात्मक नस्ल
सिद्धांत जैसे बहुतेरे नये तरीके यथार्थ को समझने के क्रम में उभरे हैं । पूंजीवाद
ने भी रूप बदला है । अब पूंजीवादी बाजार का
नया दौर है जिसमें पर्यावरण के विनाश के अतिरिक्त डिजिटलीकरण, बढ़ती
अस्थिरता और अतिरिक्त आबादियों का उदय हुआ है । अब सूचना अर्थतंत्र, बायो
पूंजीवाद, वित्तीकरण, निगरानी पूंजीवाद और अस्थिरता जैसी धारणाओं का निर्माण
वर्तमान को समझने के लिए करना पड़ रहा है ।
किताब में पूंजीवाद के इन नये रूपों से उत्पन्न बहुरूपी
चुनौतियों के अध्ययन के साथ ही उनके प्रतिरोध के पारिस्थितिकीय नारीवादी
सम्भावनाओं को भी परखने का प्रयास किया जाएगा । इसमें जोर उन बदलावों पर होगा
जिन्हें मोटामोटी बायो पूंजीवाद कहा जाता है । वर्तमान पूंजीवाद के खास लक्षणों के
सैद्धांतिक विश्लेषण में सूचना पूंजीवाद और श्रम के अभौतिक रूपों पर बहुत अधिक बल
दिया गया है । दावा यह है कि आज के उत्तर फ़ोर्डवादी अर्थतंत्र में वस्तुओं के
निर्माण में शारीरिक तौर पर नहीं लगना पड़ता । इसकी जगह हम अभौतिक विचारों और नये
तरीकों की खोज करते हैं और सूचना का आदान प्रदान करते हैं । बहरहाल लेखिका का कहना
है कि यह कहानी समकालीन पूंजीवाद के चुनिंदा हिस्से की है और उत्तरी गोलार्ध के
नजरिए से ही सुनाई गयी है । इसी कारण से लेखिका ने पूंजीवाद के आलोचनात्मक
विश्लेषण में जोर दिया है कि इस तमाम तथाकथित अभौतिक या ज्ञानपरक पूंजीवाद का आधार
मनुष्यों, जानवरों और समूची पारिस्थितिकी
की ठोस भौतिकता है । किताब में इस बात की भी छानबीन है कि बायो पूंजीवाद का नवीनतम
रूप जैव प्रौद्योगिकी के बाजारीकरण से
होने वाला पूंजीवादी मुनाफ़ा है । इसमें भी जीवित शरीर के जीवन और भौतिकता को ही
लक्ष्य बनाया जाता है । इससे जुड़े बायो अर्थतंत्र की भारी वृद्धि के पीछे भी समूची
दुनिया में राजनीतिक संस्थाओं का जाल कार्यरत है । जैव विज्ञान और जैव
प्रौद्योगिकी ऐसे प्रमुख साधन बन गये हैं जिनके सहारे वर्तमान पूंजीवाद में आर्थिक
वृद्धि के साथ पर्यावरणिक सातत्य का सामंजस्य बिठाने की कोशिश हो रही है । आजकल
हमारी आंखों के सामने सबसे बड़ा बदलाव औद्योगिक पूंजीवाद से इस बायो पूंजीवाद की ओर
हो रहा है ।
पूंजीवाद की अपनी आलोचना की एक और विशेषता का जिक्र करते
हुए लेखिका ने उत्तर संरचनावादी सिद्धांतों की प्रासंगिकता का नाम लिया है । इनमें
बायो राजनीति और अधीनीकरण जैसी धारणाओं के साथ वे मार्क्सवादी सिद्धांत का मेल
बिठाती हैं । पूंजीवाद की पारिस्थितिकीय नारीवादी आलोचना के लिए वे वैज्ञानिक या
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को पर्याप्त नहीं मानतीं । इन सबके साथ ही वे प्रकृतिवाद की
उत्तर संरचनात्मक आलोचना को शामिल करना जरूरी समझती हैं । इसके साथ ही वे मानती
हैं कि अधीनीकरण की उत्तर संरचनावादी धारणा, जिसके तहत अधीनस्थ के सामाजिक निर्माण
का अध्ययन किया जाता है, के साथ मार्क्सवाद का भी मेल जरूरी है ताकि वस्तूकरण की
आमूल नारीवादी आलोचना विकसित की जा सके । वस्तूकरण की आलोचना को जब पूंजीवाद विरोध
की नारीवादी रणनीति का प्रमुख तत्व मान लिया जाएगा तो राजनीतिक अर्थतंत्र या
राजनीतिक संस्थाओं का बदलाव ही पर्याप्त नहीं लगेगा बल्कि राजनीतिक अधीनस्थ का
बदलाव भी जरूरी महसूस होगा ।
लेखिका मानती हैं कि असल में पूंजीवाद की नारीवादी
आलोचना का धरातल बदल चुका है । वैसे भी समकालीन पूंजीवाद की नारीवादी आलोचना कभी
शुद्ध तौर पर अकादमिक नहीं रही हमेशा ही उसके राजनीतिक निहितार्थ रहे हैं । अगर
वर्तमान में अतीत की छाया नजर आ रही है तो अब भी पुरानी रणनीति, संगठन और राजनीतिक
संघर्ष के रूप कारगर हैं । लेकिन अगर पूंजी संचय, मजदूर वर्ग की संरचना और राज्य
की भूमिका में बदलाव आये हैं तो रणनीति पर भी फिर से विचार करना होगा । इसलिए
लेखिका का कहना है कि पितृसत्ता, पूंजीवाद और प्रकृति के बीच संबंध के बारे में
पुराने सवालों के नये उत्तर ही काफी नहीं हैं, हमें नये किस्म के सवाल पूछने होंगे
और नये तरह का सैद्धांतिक तथा राजनीतिक रुख भी अपनाना होगा । उनको अपनी यह किताब
इसी दिशा में कोशिश महसूस होती है ।
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