Sunday, November 23, 2014

नए अपराधी कबीलों का जन्म

                     
आज जो कुछ देखा उसने मुझे सुन्न कर दिया । असम विश्वविद्यालय, सिलचर में है । पूरे पूर्वोत्तर भारत में सिलचर अकेली ऐसी जगह मिली जहां भिक्षुक टहलते हुए मिल जाते हैं । पैसे, कपड़े आदि आपके यहां छोटा मोटा काम करनेवाला कोई भी निर्लज्जतापूर्वक मांग सकता है । अगर किसी ने उधार लिया तो वापस मिलने की आशा न करना ही हितकर होता है । इसका कारण बहुत कुछ शरणार्थी जीवन की विवशता और चाय कर्मियों की बढ़ती दरिद्रता में खोजा जा सकता है । लेकिन आज जो कुछ दिखाई पड़ा वह इससे पूरी तरह अलग था ।
दरअसल हुआ कुछ यूं कि इंटरनेट और कंप्यूटर को शिक्षण से जोड़ने की जुनूनी ख्वाहिश के चलते इस विश्वविद्यालय पर विद्यार्थियों और अध्यापकों को कंप्यूटर उपलब्ध कराने का दबाव था । छात्रावास में इंटरनेट उपलब्ध कराने का ठेका एच सी एल नामक कंपनी को दिया गया । कंपनी ने यह काम रोबोटिक्स नामक एक और कंपनी को सौंपा । रोबोटिक्स में पांच हजार रुपए महीने की तनख्वाह पर काम करनेवाले नौजवानों ने यह सुविधा छात्रावास के कामन रूम में बिठा दी । सर्वर, इंटरनेट से जोड़नेवाले प्वाइंट, दस कंप्यूटरों को जीवित रखने योग्य यू पी एस, 6 बैटरियां- सब कुछ उसी कामन रूम में । छात्रों के पास लैपटाप थे, सूचना प्रौद्योगिकी विभाग ने दस बी कार्ड दिए और छात्र ज्ञान के विश्व भांडार से लिंकित होने लगे । कुल चार-पांच दिनों तक यह खेल चला । फिर इंटरनेट की सुविधा अनुपलब्ध हो गई । छात्रों को इस सुविधा के बारे में बताते हुए अध्यापक ने कहा था कि अगर वे पोर्नोग्राफिक साइटें देखेंगे तो यह सुविधा वापस ले ली जाएगी । सो छात्रों ने मान लिया कि उनकी गलती के कारण ही ऐसा हुआ होगा ।
खेल तो कुछ और ही चल रहा था । रहस्य का उद्घाटन तब हुआ जब एक माह बाद अचानक सुबह यू पी एस गायब पाया गया । सफाई कर्मचारी ने उसे सीढ़ियों के पीछे बिजली वितरित करनेवाले लोहे के आलमारीनुमा बक्सों के पीछे छिपा पाया । प्रशासन को खबर हुई । सारा प्रशासन छात्रावास में । पता चला कि सर्वर जिस फ़्रिजनुमा आलमारी में रखा था उसका सामने का दरवाजा बंद होने के बावजूद भीतर से सर्वर गायब है । कीमत लगभग 15 लाख रुपए । कालाबाजार में इसे खरीदने पर लगभग 10 लाख में मिलेगा । बेचनेवाले को 6 लाख तक मिलने की संभावना है । ये सब बातें सूचना प्रौद्योगिकी के अध्यापक सुदीप्तो सरकार ने बताईं । यह भी बताया कि इस यंत्र के लिए कालाबाजार भी कलकत्ते से पहले शायद ही मिले ।
याद आया पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक कादिर ने परमाणु तकनीक का अंतर्राष्ट्रीय कालाबाजार खोल रखा था । अभी कुछ दिनों पहले अमेरिका ने खुद ही छोड़ी गई जासूसी सेटेलाइट को आसमान में नष्ट किया था जिसके बारे में उसे छोड़कर और किसी को खबर नहीं थी । क्या हो रहा है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि तकनीकी उफान का यह नया दौर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महज विशाल कालाबाजारी पैदा करने के लिए आया हो । और तीसरी दुनिया के लोगों को नए अपराधी कबीलों में बदला जा रहा हो!
अपराध और चोरी का यह नया वातावरण पैदा हुआ और इसमें कुलीगिरी करनेवाले तकनीकी नौजवानों से लेकर बड़े बड़े लोग शामिल हैं । जब प्रशासन के अधिकारी छात्रावास में भीड़ लगाए हुए थे तो हर कोई हास्यास्पद ढंग से शरलाक होम्स की भूमिका में था । कोई सूंघनेवाला कुत्ता खोज रहा था तो कोई उंगलियों की छाप पढ़नेवाला विशेषज्ञ । कोई चोरी की तारीख निश्चित करने की जुगत लगा रहा था तो कोई धमकाने की कला का प्रदर्शन कर रहा था । एक सज्जन, जिन्हें सी बी आई जांच से पूर्व कुलपति ने दो लाख रुपए लेकर बचाया था, मौका मिलते ही छात्रावास के एक कर्मचारी को थप्पड़ लगा बैठे ।
विश्वविद्यालय के कुछेक अधिकारियों को छोड़कर अधिकांश का कोई कार्यालय नहीं है इसलिए सभी नोटशीट के पन्नों पर ही गुणा-भाग कर रहे थे । प्राक्टर ने मुझे तीन रजिस्टर मंगाकर छात्रावास के तीनों ब्लाक कैप्टनों को देने की सलाह दे दी जिन पर शाम साढ़े सात बजे छात्रों की हाजिरी ली जानी थी । रजिस्ट्रार छात्रावास को जेल बना देने की धमकी दे रहे थे और कुत्ता न मिलने की स्थिति में स्वयं कोई न कोई चीज सूंघ रहे थे । कुलपति और प्रति कुलपति स्थितिप्रज्ञ अवस्था में बैठे थे । कुलपति कवि हैं इसलिए चोरों के विश्वविद्यालय का नेतृत्व करने पर पछता रहे थे । प्रति कुलपति नागालैंड विश्वविद्यालय से भ्रष्टाचार के आरोप में निकाले जा चुके थे और दो दिन पहले ही मुझे पेड़ लगाने में छात्रों का सहयोग लेने की सलाह देकर गए थे । छात्र सभी भाग्य विधाताओं को अपने बीच पाकर किंकर्तव्यविमूढ़ थे और पेयजल की सुविधा तथा अन्य दीर्घकालीन मांगों को भूल गए थे ।
यहां से चोरी मेरे लिए नैतिक और कानूनी विचार का मुद्दा हो जाती है । सिर्फ़ निजी संपत्ति की पवित्रता की धारणा के कारण चोरी नैतिक और कानूनी रूप से दंडनीय कृत्य हो जाती है । सहस्राब्दियों पहले मानव सभ्यता में यह दरार पड़ी । तभी से संपत्ति की रक्षा के लिए न जाने कितने कवच बनाए गए । ऐसा नहीं कि यह सब निरपेक्ष रूप से होता हो । बड़े चोरों का कोई भी अपराध माफ है । उन्हें किसी नैतिक संकट से नहीं गुजरना होता । राज्य और समाज की सभी संस्थाओं में यह भेदभाव देखा जा सकता है । सामान्य लोगों को ही समाज में लज्जा भी उठानी पड़ती है । बड़े चोरों के सामाजिक घेरे से तो उन्हें सुरक्षा और प्रोत्साहन ही मिलता है । मेरे जानते तो ऐसा भी हुआ है कि चोरी को सामान्य लोग इस कदर पाप मानते हैं कि चोरी करने के बाद के नैतिक संकट से बचाने के लिए दिमाग उसकी स्मृति को पूरी तरह मिटा डालता है ।       

4/3/2008 

Friday, November 21, 2014

प्रवास इत्यादि के बारे में

                      
बचपन में जाड़े की शुरुआत में एक नया पक्षी नजर आना शुरू होता था जिसे लोग खड़रिच कहते । उसकी खासियत चंचलता थी । हमारी ईर्ष्या का कारण उसकी यही अस्थिरता थी । बड़े बुजुर्ग उसे ईशान कोण पर देखना शुभ बताते । जाड़े के बीतते ही परीक्षा शुरू होने वाली होती इसलिए उसे ईशान कोण पर देखकर परीक्षा में सफलता की आशा पैदा होती । बाद में उस पक्षी का प्रतिष्ठित नाम ‘खंजन’ का पता चला । तुलसी के शरद ॠतु के साथ इसके आगमन को जोड़ने और सूर साहित्य पर अमृत लाल नागर के उपन्यास का नाम ‘खंजन नयन’ जानकर इसके साहित्यिक महत्व का बोध हुआ । अध्यापन के दौरान भी यह ज्ञान काम आता । देहात में तो उस पक्षी की विशेषताओं से विद्यार्थी वाकिफ होते लेकिन शहर में उन्हें इसे पहचानने में दिक्कत आती है । कुछ जानकारी बढ़ी तो पता चला कि यह उन अनेक पक्षियों में से एक है जिन्हें साइबेरियाई पक्षी कहा जाता है । ये ऐसे पक्षी होते हैं जो ठंडे मुल्कों में रहते हैं लेकिन उन मुल्कों में ठंड में चारा न मिलने की संभावना के मद्दे नजर भारत जैसे गर्म मुल्कों की ओर बाकायदे झुंड बनाकर प्रयाण करते हैं । पता चला कि साल दर साल इनका आना लगा रहता है और कभी ये रास्ता नहीं भटकते । लाखों किलोमीटर का उनका सफर वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय है ।
पक्षियों को तो खैर जैविकीय कारणों से हवाई यात्रा का प्रजातिगत आनंद उठाना पड़ता है लेकिन मानव समुदाय के साथ यही परिघटना भिन्न रूप में घटित होती है । इस मामले को तब से भारत के बौद्धिक जगत में उठता हुआ देखा गया जबसे नव उदारवाद का उदय हुआ । उसके बाद से पश्चिमी दुनिया की हैसियत तीसरी दुनिया के देशों के भाग्य विधाता की हो गई । कांग्रेसी निजाम की शुरुआत को परवान चढ़ाते हुए वाजपेयी सरकार ने प्रवासी दिवस के रूप में इन पक्षियों को प्रतिष्ठा देने का नया अभियान चलाया । इसी के साथ हिंदी अध्यापकों और साहित्यकारों के भीतर विदेश गमन की इच्छा को पूरा करने के पुराने माध्यम के खात्मे से बने खालीपन को भरने का अभियान भी इन प्रवासी लेखकों ने आरंभ किया ।

अकादमिक दुनिया के सभी लोग जानते हैं कि दिसंबर से उस राशि को खर्च करने की कोशिश शुरू हो जाती है जिसे बजट कहते हैं । अंतिम रूप से मार्च में उसे निपटाना होता है इसीलिए सबसे अधिक गोष्ठियां मार्च में होती हैं । एक और बवाल यूजीसी ने लगाया है गोष्ठियों में भागीदारी पर अंक प्रदान करने का । इनमें हमारे देशभक्तों का कहना है कि राष्ट्रीय के मुकाबले अंतर्राष्ट्रीय को अधिक अंक प्राप्त होंगे । सामाजिक विज्ञानों में तो अंतर्राष्ट्रीयता का यह आलम है कि विदेश न जाने के लिए प्रयास करना पड़ता है । हिंदी में अंतर्राष्ट्रीय किस विधि होय! रास्ता निकाला गया कि इन्हीं पक्षियों के आगमन के समय एकाध को पकड़ लेने से यह तमगा जुटाना आसान होगा । इस प्रकार सार्वजनिक क्षेत्र के विश्वविद्यालयों और निजी क्षेत्र के प्रवासियों के सहयोग से संगोष्ठियों के आयोजन और अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी का दुखद धंधा मराठी में ‘चालू आहे’ ।        

Tuesday, November 4, 2014

समग्र संघर्ष की महाकाव्यात्मक गाथा

             
                                       
तुलसी राम की आत्मकथा ने हिंदी साहित्य को गरिमा प्रदान की है । उसने हिंदी साहित्य की परंपरा के एक विशेष पहलू को इस आधुनिक समय में भी सच साबित किया है । साहित्येतिहास की यह एक गुत्थी है कि भारतीय साहित्य की अन्य भाषाओं में जो प्रवृत्तियां पहले प्रकट होती हैं वे हिंदी में देर से आने के बावजूद उस प्रवृत्ति की सर्वाधिक परिपक्व अभिव्यक्ति बन जाने वाली रचनाओं के जरिए प्रकट होती हैं । इतिहास में ऐसा भक्ति आंदोलन के समय हुआ जब दक्षिण भारत में पैदा होने वाली वैष्णव भक्ति की धारा हिंदी प्रदेश में आई तो पूरब से आने वाली शाक्त धारा और पश्चिमोत्तर से आई सूफी धारा के साथ मिलकर ऐसे सृजनात्मक विस्फोट के रूप में प्रकट हुई कि शायद अन्य किसी भाषा में उसका ऐसा रूप न दिखाई पड़ा होगा । इसी तरह उपन्यास विधा भी हिंदी में देर से आई लेकिन उसे जैसी परिपक्वता हिंदी में मिली वैसी किसी अन्य भाषा में न मिली होगी । ऐसी विशिष्टता का तीसरा उदाहरण नक्सलबाड़ी के साहित्यिक प्रभाव का है । अन्य भाषाओं के मुकाबले हिंदी में वह अधिक मूलगामी तेवर के साथ सामने आया । इसी कड़ी में दलित आत्मकथा लेखन की गतिकी में तुलसी राम की आत्मकथा है । हिंदी के अपने प्रसंग में एक और बात कहना जरूरी है । हिंदी में लिखी ज्यादातर दलित आत्मकथाओं के लेखन से पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दलित सामाजिक जीवन उजागर होता है । उनमें लेखक मध्यवर्गीय हैसियत हासिल कर लेता है और स्त्रियों के प्रति उसका पितृसत्तात्मक नजरिया दर्ज हुआ है । सर्वाधिक महत्वपूर्ण आत्मकथा ‘जूठन’ के लेखक का जीवन ज्यादातर महाराष्ट्र में बीता है । तुलसी राम की आत्मकथाओं के जरिए पूर्वी उत्तर प्रदेश का दलित सामाजिक जीवन हिंदी दलित लेखन के केंद्र में आ गया है ।
‘मणिकर्णिका’ उनकी आत्मकथा का दूसरा खंड है । इस अर्थ में यह पहले खंड ‘मुर्दहिया’ की निरंतरता भी बनाए रखती है और एक स्वतंत्र पुस्तक की हैसियत से भी पढ़ी जा सकती है । पहले खंड में जहां वर्णन का विषय लेखक के बचपन का संसार था वहीं इस दूसरे खंड में परिपक्वता की ओर बढ़ता हुआ नौजवान है । खास बात यह है कि लेखक की उम्र ही नहीं बढ़ती, बल्कि उसका अनुभव संसार भी साथ ही साथ विस्तारित होता है और यही उस युवक की परिपक्वता की प्रक्रिया है । जिस तरह रणधीर सिंह का ‘आत्मवृत्त के बहाने’ केवल व्यक्ति रणधीर सिंह की कहानी नहीं है वरन उस पीढ़ी के दुनिया में दाखिले की कहानी है उसी तरह आत्मकथा का यह खंड भी केवल व्यक्ति तुलसी राम की कहानी होने की बनिस्बत बनारस के आस पास जवान होते दलित समुदाय की उस पीढ़ी की कहानी है ।
इसके लिए मैं सिर्फ़ एक प्रसंग का उदाहरण दूंगा क्योंकि अन्य लोगों के लिए उस कथा का उत्तरार्ध अनजाना है । आत्मकथा में आजमगढ़ के ही फूल चंद राम आए हैं जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में कम्युनिस्ट विरोधी दलित राजनीति में मोहरे की तरह इस्तेमाल होते हैं । बाद में यही फूल चंद राम एफ़ सी आई के बड़े पदाधिकारी हुए और असम में एक अत्यंत दुखद घटना में पुलिस की गोली से मारे गए । उनका अपहरण उल्फ़ा ने किया था । बड़े अधिकारी होने के नाते उन्हें छिपाना उल्फ़ा के लिए संभव नहीं रहा तो उन्हें पुलिस को सौंपने के लिए आतंकवादी ला रहे थे । ये लोग जिस जगह छिपे थे वहां पुलिस ने छापा मारा और दोनों ओर से गोलीबारी होने लगी । फूल चंद राम को लगा कि चूंकि पुलिस उन्हीं के लिए गोली चला रही है इसलिए अगर वे बाहर आ जाते हैं तो गोलीबारी बंद हो जाएगी । ऐसा सोचकर वे दोनों हाथ ऊपर उठाए हुए अपना नाम जोर से बोलते हुए बाहर निकले । बहुत से लोगों का कहना है कि इन दिनों में समर्पण संबंधी बातचीत में फूल चंद जी ने पुलिस प्रशासन के ढेर सारे रहस्य जान लिए थे इसलिए उन्हें जिंदा छोड़ देना खतरनाक था । संभव है तरक्की के लिए एनकाउंटर करने की जरूरत के चलते ऐसा हुआ हो । कारण जो भी हो पुलिस की गोली से वे मारे गए । इस तरह के तमाम पात्र और घटनाएं जो बाद के दिनों में महत्वपूर्ण साबित हुईं उनकी सजीव उपस्थिति ने इस खंड को लगभग ऐतिहासिक दस्तावेज बना दिया है ।
इसी तरह का दस्तावेजी प्रसंग गोरख पांडे का है । हिंदी साहित्य में उनकी उपस्थिति को मिटाने और उनके योगदान को नकारने का व्यवस्थित प्रयास किया गया है । ऐसे में लगभग पूरी आत्मकथा में उनकी अविस्मरणीय मौजूदगी उनके व्यक्तित्व के कुछ अनजाने पहलुओं को देखने का मौका देती है । शुरू में जातिगत भेदभाव के विरुद्ध जान की परवाह किए बिना तन कर खड़े होने वाले गोरख पुलिस थाने में गिरफ़्तारी और पिटाई के बाद गंभीर मार्क्सवादी अध्येता की तरह उभरकर आते हैं । आगे चलकर संकल्पित नक्सल कार्यकर्ता बनने की उनकी जद्दो जहद अपने और साथियों के साथ आलोचनात्मक संघर्ष में बदल जाती है । उनके प्रसिद्ध गीत ‘जनता की आवे पलटनियां, हिलेले झकझोर दुनिया’ की धुन की पहचान भोजपुरी इलाके के लोकगीत ‘रामजी की आवे बरियतिया, परेले झीर झीर बुनिया’ के बतौर की गई है । इससे गोरख पांडे की काव्य प्रतिभा का सबूत मिलता है । कौन कल्पना कर सकता है कि ऐसे लोकगीत में ऐसा प्रयाण गीत लिखा जा सकता है । इस आत्मकथा में गोरख पांडे जिस तरह उभरते हैं वह उनकी शक्ति और समस्या दोनों का ही सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पर्यवेक्षण साबित होता है । उनकी छवि उदय प्रकाश की कहानी ‘रामसजीवन की प्रेमकथा’ और जे एन यू में उनकी मानसिक समस्याओं के बारे में फैले किस्सों से जैसी बनती है उससे गुणात्मक तौर पर भिन्न गोरख इस आत्मकथा में प्रकट होते हैं । सबसे पहले उनका प्रवेश जातिवाद विरोधी प्रचंड योद्धा के रूप में होता है । धीरे धीरे उनका पढ़ाकू रूप सामने आता है । अन्याय के विरुद्ध जान पर खेल जाने वाले गोरख अंत में रोमांटिक क्रांतिकारी की तरह तो दिखाई पड़ते ही हैं, लेकिन दोस्ती निभाने वाले व्यावहारिक मनुष्य भी सिद्ध होते हैं ।  
शेरपुर गांव में दलितों की बस्ती को जलाने की घटना का उल्लेख भी बेहद साहसिक बात है । जिस तरह ‘हंग्री टाइड’ में मरिचझांपी के उल्लेख को भारत के पारंपरिक वाम बौद्धिक पचा नहीं पाते और उसी अपराध के चलते इस या उस बहाने से अमिताभ घोष को महत्वपूर्ण भारतीय उपन्यासकारों में शरीक करने में आनाकानी करते हैं उसी तरह शेरपुर की घटना का उल्लेख हिंदी के अनेक साहित्यकारों के उस क्षेत्र से होने के बावजूद पहली बार एक दलित लेखक के हाथों होना हिंदी के स्थापित साहित्यकारों के अनुभव संसार के बारे में केवल टिप्पणी नहीं है । उस घटना को लेकर सामाजिक विज्ञानों के भीतर भी शोध न होना भारत के शोध कार्य के एजेंडे के बारे में बहुत कुछ कहता है । इसी क्रम में हम अरुंधती राय के ‘गाड आफ़ स्माल थिंग्स’ में व्यक्त वामपंथ के भीतर समाए जातिवाद की भी याद कर सकते हैं । शेरपुर वाली पूरी घटना का जिक्र संयोग से ‘वैचारिक अंतर्द्वंद्व’ शीर्षक अध्याय में नहीं हुआ है । यह घटना उस द्वंद्व के साथ गहराई से जुड़ी हुई है । उस क्षेत्र में यह द्वंद्व बाद के दिनों तक बना रहा । व्यक्तिगत रूप से यह समीक्षक भी उस द्वंद्व का गवाह रहा है । स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ही वह इलाका भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में जमींदारी विरोधी गोलबंदी का केंद्र बन चुका था । गाज़ीपुर जिले में सरयू पांडे और आज़मगढ़ में झारखंडे राय इस गोलबंदी के नेता बनकर उभरे थे लेकिन दोनों ही जिलों में आरंभिक चुनावी सफलता ने कम्युनिस्ट नेताओं में उसे टिकाए रखने के लिए दलित जातियों की जगह थोड़ा दबंग जातियों के साथ मेलजोल बढ़ाने की प्रेरणा दी । नतीजा यह निकला कि नक्सल आंदोलन के प्रति इन जातियों में आकर्षण पैदा हुआ । तुलसी राम भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ थे लेकिन दलित भी थे । सो इसी अंतर्द्वद्व के क्रम में शेरपुर की दलित बस्ती को सवर्णों द्वारा जलाने की घटना का आना अत्यंत स्वाभाविक है ।
इस अंतर्द्वंद्व के अंग के बतौर लेखक नक्सल कार्यकर्ताओं को खोजने के लिए बंगाल की दोबारा यात्रा करता है । इस बार वह कलकत्ता हमारी आंखों के सामने आता है जिसकी हवा में सनसनी थी । शायद ही किसी अन्य हिंदी लेखक की रचना में वह कलकत्ता आया होगा जहां मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं में नक्सलवादियों के प्रति सहानुभूति दिखाई पड़ी हो । आज तो शायद लोग भूल भी गए होंगे कि नक्सल नेता चारु मजुमदार मूल रूप से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के दार्जिलिंग जिले के नेता थे । यह खदबदाता हुआ कलकत्ता भी ऐतिहासिक शोध की समृद्ध सामग्री है । खुद नक्सलबाड़ी का ब्यौरा भी बहुत हद तक तथ्यात्मक है । नक्सलबाड़ी के बारे में तमाम लेखन वैचारिक पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होता है लेकिन असहमति के बावजूद यह चित्रण उसी साक्षी भाव के चलते विश्वसनीय बन पड़ा है जिसकी चर्चा हमने पहले की है । फिर भी यह उल्लेख करना जरूरी है कि यह साक्षी भाव निरपेक्ष नहीं है बल्कि एक तरह की निस्सगता के कारण और भी प्रभावी हो उठा है । दस दिन भूखे रहने के बाद भोजन के लिए शेक्सपियर के नाटक की बिक्री का समूचा प्रसंग इस बात की पुष्टि के लिए उद्धृत किया जा सकता है ।    
इस आत्मकथा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि तुलसी राम जी ने विभिन्न स्थानों और व्यक्तियों को जिस कालखंड में दर्ज किया है वे उस समय की जीवंत झांकी प्रस्तुत करते हैं । ऐसा नहीं कि ये चित्र स्थिर हों बल्कि उनमें पर्याप्त गतिमयता है लेकिन किसी कुशल चित्रकार की कूंची से दर्ज गतिमयता । इसका सबसे बड़ा प्रमाण कलकत्ते का बयान है । लेखक अनेक यात्राओं में ‘बिदेसिया’ के इस शहर के अनेक रूप प्रस्तुत करता है । बनारस में पढ़ाई के लिए पैसे की जरूरत थी , इस विडंबना को सबसे अधिक बेचैनी के साथ रवींद्रनाथ ठाकुर ने दर्ज किया कि शिक्षा के लिए धन की वसूली अंग्रेजी राज में शुरू हुई । बहरहाल पैसे के लिए कलकत्ते की यात्रा दिल दहलाने वाली स्थितियों में हुई । रेल के डिब्बे के बाहर लोहे के डंडे से लटककर रात भर की यात्रा इतनी भयानक थी कि उसे शब्दों में उतारना लेखक के लिए लगभग असंभव रहा होगा । जीवन की कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिन्हें याद करने में भी तकलीफ होती है । इस आत्मकथा में ऐसे बीसियों प्रसंग हैं । शायद इसी कारण लेखक ने बिना कोई अतिरिक्त भावुकता जोड़े केवल परिस्थिति का साक्षी भाव से बयान कर दिया है । इसी साक्षी भाव के चलते कलकत्ते के जीवन के वे यथार्थ सामने आए हैं जो उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी मजदूरों के जीवन में रोजमर्रे की बातें थीं । मसलन मजदूरों के मुहल्ले में हल्ला गाड़ी का आना । हल्ला गाड़ी का वर्णन यह साबित करता है कि वर्गीय भेदभाव एक स्तर पर नस्ली भी हो जाता है । मजदूरों के जीवन के उस समय के इस प्रामाणिक बयान से ट्रेड यूनियन आंदोलन की अनेक गुत्थियां भी उभरकर प्रकट होती हैं । रेल के मुख्यालय बदलने की आशंका के मद्देनजर बंगाली कर्मचारियों का ‘छातू लंका खाबो ना’ का नारा इस जटिलता को समझने की अंतर्दृष्टि देता है । इसी तरह काशी हिंदू विश्वविद्यालय जहां से लेखक को उच्च शिक्षा हासिल होती है में प्रवेश हेतु भरे जाने वाले आवेदन पर भेदभाव बढ़ाने वाली जानकारी मांगी जाती थी । उच्च शिक्षा के केंद्र बनारस में किराए पर कमरा लेकर सम्मान के साथ जीवन बिताना किसी दलित विद्यार्थी के लिए असंभव सा काम नजर आता है । यह तथ्य भारत के शहरों के सामाजिक मनोविज्ञान पर भी बड़ी टिप्पणी है । इन विशेषताओं के चलते यह पूरी आत्मकथा भारत में और खासकर हिंदी में सामाजिक विज्ञानों के विकास को प्रेरित करेगी । अगर हम पहले और वर्तमान खंड के पात्रों की गिनती करें तो सचमुच इस आत्मकथा के महाकाव्यात्मक विस्तार की थाह ले सकेंगे । खिलौने की बंदूक और क्रिकेट की गेंद से हवाई जहाज का अपहरण करने वाले भोला पांडे और आरंभिक नक्सली जोश में बदमाश जमींदार का सिर काटने के लिए चल पड़ने वाले आजमगढ़ के इंद्रसेन सिंह का अन्य किसी की यादों में नजर आना मुश्किल ही है । ये पात्र इस आत्मकथा में मानो पत्थर पर उकेर दिए गए हैं ।
शुरुआत से ही पाठक का सामना लोकतंत्र की सम्मानित संस्थाओं के ढकोसले से होता है । जातिगत भेदभाव के प्रति गुस्सा पूरी आत्मकथा में अंतर्धारा की तरह बहता रहता है । इस सिलसिले में भक्त कवि तुलसी का उद्धरण यह बताता है कि जातिगत भेदभाव का दंश वास्तव में बहुत मारक होता है । इसी के सहारे हम आर्थिक शोषण के मुकाबले आत्म सम्मान की लड़ाई पर जोर देने वाली पार्टियों की निचली जातियों में लोकप्रियता का कारण समझ सकते हैं । साथ ही यह भी कि इस सवाल को समरसता के कुल जुबानी जमा खर्च के बावजूद परदे के पीछे नहीं ढकेला जा सकता है । परिवर्तनकामी राजनीति करने वालों के लिए अनिवार्य सवाल के रूप में लेखक इस समस्या को उठा देता है । तुलसी राम ने दिखा दिया है कि कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर भी कितने सूक्ष्म रूप में यह मौजूद रहता है । भारत में संघर्षरत कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए अब इस सवाल को टालने का कोई अवसर नहीं बचा है । परिवर्तन की व्याख्या केवल राजनीतिक रहेगी तो ऐसे विचलनों की संभावना बनी रहेगी । बदलाव को अंतत: सामाजिक होना होगा जिसका प्रतिफलन राजनीतिक सत्ता के बदलाव में होगा । इसी अर्थ में यह आत्मकथा समग्र संघर्ष की परिकल्पना को फौरी कार्यभार बना देती है ।
अंतिम बात यह कि बहुत दिनों बाद ऐसी सृजनात्मक भाषा हिंदी के व्यापक पाठक समुदाय को पढ़ने के लिए मिली है जिसमें हिंदी की बोलियों का सत्व है । ध्यान दें तो व्यापक रूप से ऐसी हिंदी बहुत दिनों से लिखी जा रही है जिसमें व्यक्तित्व नहीं होता । शायद ऐसा अखबारी भाषा के प्रभुत्व से हुआ होगा । एक बार फिर से प्रमाणित हुआ कि भाषा में चित्रात्मकता और बिंबात्मकता उसकी बोलियों से आती है । डबल, ट्रिपुल और चर्पुल सिंह हाथ में बंदूक पकड़े हुए ‘गनगन गनगन’ कांपते हुए बिना इस भाषा के प्रत्यक्ष नहीं हो सकते हैं ।
शारीरिक अस्वास्थ्य के बावजूद तुलसी राम जी की सक्रियता स्पृहणीय है । उन्होंने लेखन को सचमुच राजनीतिक कर्म में बदल दिया है । आशा है आत्मकथा का तीसरा खंड भी इतना ही भेदक होगा । उनके जीवनानुभव और व्यस्था जनित रहस्य भेद कर सचाई को उजागर कर देने वाली अंतर्दृष्टि उन्हें सारी कमियों के बावजूद बाकी लेखकों से बीसियों गज ऊंचा उठा देती है, न केवल दलित लेखकों से बल्कि हिंदी के तमाम वर्तमान कलाकार लेखकों से भी । भक्तिकालीन कवि तुलसी के अलावे केदारनाथ अग्रवाल और गोरख पांडे के संदर्भ लेखक की विस्तृत संवेदनशीलता के प्रमाण हैं और अन्य समाजशास्त्रियों के मुकाबले भी उनको विशिष्ट बनाते हैं । कलकत्ते का पहला प्रसंग बंद करते हुए गालिब की पंक्तियां हास्य के सहारे अकथनीय कष्ट को और भी विषण्ण बना देती हैं ।             
                


Friday, October 31, 2014

साहित्य में भी ज्ञान वर्धन की जरूरत है

                  
                                                 
हिंदी में साहित्य के अतिरिक्त ज्ञान का सृजन अरसे से बंद नहीं है तो मम से कम उसकी चर्चा तो जरूर बंद है । कुल मिलाकर हिंदी की दुनिया में साहित्य का ऐसा आत्ममुग्ध वातावरण शायद ही पहले कभी रहा हो । प्रमाण यह है कि भारतेंदु से लेकर छायावाद-प्रगतिवाद के समय तक हिंदी के प्रबुद्ध पाठक को अन्य भारतीय भाषाओं में लिखे साहित्य का पता तो होता ही था, दुनिया भर में चल रही साहित्यिक हलचल से भी वह अनजान नहीं रहता था । हिंदी में जानकारी का यह स्तर गिरा है और एक खास तरह की पारस्परिक प्रशंसा का छिछला माहौल तारी हुआ है । आश्चर्य की बात है कि जिस समय हिंदी में श्रेष्ठ लेखन हो रहा था तब हिंदी के पाठक दुनिया में रचित अधिकांश महत्वपूर्ण लेखन से परिचित होते थे । हिंदी साहित्य की वर्तमान केंद्रित आत्ममुग्धता का स्तर यह है कि लोगों के भुला दिए जाने के भय से विवादप्रियता का जन्म हो रहा है । ऐसे में विजय शर्मा की किताब ताजा हवा की तरह है । 2014 में वाणी प्रकाशन से ‘अफ़्रो-अमेरिकन साहित्य : स्त्री स्वर’ शीर्षक से लगभग 350 पृष्ठों की यह किताब अनेक कारणों से पठनीय और विचारणीय है ।
पुस्तक के शीर्षक से ही स्पष्ट है कि लेखक अमेरिकी समाज में अफ़्रीकी मूल के बाशिंदों के सिलसिले में जारी भाषिक बहसों से परिचित हैं । इन्हें शुरू में नीग्रो कहा जाता था जो एक तरह का अपमानजनक संबोधन था । उनके द्वारा आपत्ति जताने के बाद इन्हें ब्लैक कहा जाने लगा जो साहित्य के प्रसंग में अब भी प्रयुक्त होती है । लेकिन सरकारी भाषा में इन्हें अफ़्रो-अमेरिकन ही कहा जाने लगा है । सही बात है कि अभिधान में बदलाव असली हालात में बदलाव नहीं लाते फिर भी इसे लेकर होने वाली लड़ाई यही साबित करती है कि नाम में भी कुछ रखा है । इसे व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखा है ‘अफ़्रो-अमेरिकन लोगों के लिए पहले कई शब्दों का प्रयोग किया जाता था । काफी समय तक उन्हें काले, हब्शी, नीग्रो, दास, गुलाम, ढोर की संज्ञा दी जाती रही । इनमें से अधिकांश शब्द हीनता बोध कराने वाले शब्द थे । उन्हें मनुष्य से कम दर्जे का साबित करने वाले शब्द थे । बाद में भी कभी अश्वेत, कभी नीग्रो, कभी अफ़्रो-अमेरिकन कहा जाता रहा । इन सब शब्दों में सदा थोड़ा भ्रम, थोड़ा कन्फ्यूजन बना रहा । आज अमेरिका की अश्वेत प्रजाति के लिए अफ़्रीकन-अमेरिकन अथवा अफ़्रो-अमेरिकन शब्द का प्रयोग प्रचलन में है । यह सम्मानजनक संज्ञा है ।’ इस लेखन में भी यदि स्त्री के लेखन पर विचार होगा तो स्वाभाविक तौर पर कला की जगह उन सामाजिक हालात पर सोचा जाएगा जिन्होंने इस लेखन को जन्म दिया । इस पर भी ध्यान दिया ही जाएगा कि लेखन की भूमिका अपने आपमें एक तरह की मुक्ति की भावना की प्रतिष्ठा है । इस तथ्य को सोजर्नर ट्रूथ के प्रसंग में रेखांकित करते हुए उन्होंने दर्ज किया है ‘इस स्त्री को अपने लोगों, अन्य स्त्रियों की आलोचना का शिकार होना पड़ा । अन्य स्त्रियों की आलोचना का क्योंकि बहुत कम स्त्रियां अपना स्वतंत्र नजरिया रखती हैं, अधिकांश पुरुष के नजरिए को ही आत्मसात किए हुए जीती हैं ।’ इस वक्तव्य से स्त्री लेखन के समर्थकों को आपत्ति हो सकती है लेकिन उनका उद्देश्य इन लेखकों की विद्रोही भूमिका को उजागर करना है । इस साहित्य के पीछे की आंदोलनात्मक शक्ति को चिन्हित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘न्यूयार्क सिटी में हारलम नामक स्थान में बहुतायत में अश्वेत रहते आए हैं । यहां बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में एक अफ़्रो-अमेरिकन सांस्कृतिक आंदोलन चला ।---इस आंदोलन के कारण पहली बार अफ़्रो-अमेरिकन साहित्य की ओर लोगों का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित हुआ ।’ अस्मितामूलक इन संघर्षशील विमर्शों की यही खूबी है कि इनके आधारभूत साहित्य के बारे में बात करते हुए उस सामाजिक समुदाय के हालात को भी लगातार ध्यान में रखना पड़ता है । बिना इस संदर्भ के इनकी रणनीतिक और राजनीतिक दखलंदाजी के योगदान का मूल्यांकन असंभव होता है ।
अफ़्रो-अमेरिकन साहित्य की विविधता का एक पक्ष यह भी है कि इसमें गोरों और कालों के संसर्ग से उत्पन्न मुलातो भी शामिल किए जाते हैं । विजय शर्मा ने भी ऐसी एक लेखिका को किताब में शरीक किया है । पहले लेखिका का परिचय ‘उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में एक अफ़्रो-अमेरिकन (मुलातो) लेखिका हुई जिसने दास जीवन की कठिनाइयों को सरल बनाने का अपने लेखन में उपाय बताया । हैरियट जैकब्स ने “इंसिडेंट्स इन द लाइफ़ आफ़ ए स्लेव गर्ल” में अपने लिए लिंडा ब्रेंट नाम अपनाया और चित्रित किया कि कैसे एक युवा गुलाम लड़की अपने मालिक के द्वारा किये जाने वाले बलात्कार के खतरे से बचने का उपाय करती है ।’ उनके लेखन का विश्लेषण स्त्री लेखन की विशेषताओं को रेखांकित करने का भी अवसर बन जाता है । ‘लेखन लेखन होने के बावजूद एक पुरुष और एक महिला के लेखन में कुछ मूलभूत अन्तर होता है ।’ इसके उदाहरण के रूप में ‘उस समय के समाज में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार औरत के जो गुण बताए गए थे उनसे जैकब्स इनकार करती हैं ।---लिंडा अपने यौन अनुभवों के द्वारा यह दिखाती हैं कि वह आदर्श स्त्री की परिभाषा पर खरी नहीं उतरती हैं ।’
अफ़्रो-अमेरिकन लेखिकाओं द्वारा आत्मकथा लिखने के कारणों की व्याख्या करते हुए उसके तीन कारण बताए गए हैं । ‘पहला कारण इस प्रथा के एजेंट गुलामों पर जो अत्याचार करते थे, कोड़े मारकर खाल उधेड़ना, बलात्कार जैसे शारीरिक अत्याचार जो यह स्थिति पैदा करती थी, उसे दिखाना ।’ लेकिन इससे भी बड़ा अत्याचार था दासों के ‘परिवार को नष्ट करना, बच्चों को तितर-बितर कर देना, यौन शोषण, अपभाषा का निरंतर प्रयोग, अपमान, घृणा आदि ।’ दूसरा कि ‘अमेरिका के उत्तर में एक धारणा प्रचलित थी और जिसे अमेरिका के दक्षिणी श्वेतों ने जानबूझकर फैलाया हुआ था । यह धारणा थी कि अश्वेत दास अपनी स्थिति से बहुत खुश और संतुष्ट, बहुत सुरक्षित हैं ।’ इस धारणा के खंडन के लिए बड़े पैमाने पर इन स्त्रियों ने अपने कथन को विश्वसनीय बनाने के लिए इस विधा का सहारा लिया । तीसरा कारण कि ‘दास लोगों, खासकर दास अश्वेत स्त्री को स्वतंत्र और श्वेत स्त्री के मापदंड पर नहीं जांचा जा सकता है, नहीं जांचा जाना चाहिए ।’ स्पष्ट है कि उद्देश्य पूर्ण होने के कारण ही यह लेखन मुख्य धारा के लेखन से भिन्न था ।          
किताब एक हद तक हाल में सामने आई विशेष किस्म की विधा में रची गई है । किसी उपयुक्त नाम के अभाव में इसे विविधा कहा जा रहा है जिसमें विषय-वस्तु की विविधता नहीं होती बल्कि एक ही विषय पर अनेक तरह के लेख संकलित किए गए रहते हैं । शोध प्रबंधों की अरुचिकर एकरसता की जगह यह विविधता आकर्षक है । इसका प्रमाण यह है कि किताब के अलग अलग अध्यायों की पृष्ठ संख्या भिन्न भिन्न है और आश्चर्य की बात कि उनकी संख्या का उनके महत्व से कोई खास लेना देना नहीं है । उदाहरण के लिए हाल ही में दिवंगत माया एंजेलो को महत्वपूर्ण आत्मकथा लेखिका मानकर लगभग चालीस चालीस पृष्ठ दिए गए हैं । इनके साथ ही टोनी मारीसन के उपन्यासों और एलिस वाकर के समूचे लेखकीय कर्म को समेटते हुए उन्हें भी इतनी ही जगह दी गई है । इसके अलावा पहले अध्याय ‘अफ़्रो-अमेरिकी स्त्री रचनाकार : एक विहंगम परिदृश्य’ को भी इतने ही पृष्ठों में समेटा गया है । ऊपर गिनाई गई इन सभी लेखिकाओं को उनकी रचनात्मकता के भिन्न भिन्न आयामों के हिसाब से किताब के केंद्र में रखा गया है । सबसे अधिक जगह लिंडा ब्रेंट को उचित ही दी गई है क्योंकि इस लेखिका का लेखन सामने आना ही परम साहस का उदाहरण है । इन बड़े लेखों के अतिरिक्त सोजर्नर ट्रूथ को 5 पृष्ठ, क्लोटेल शीर्षक उपन्यास को 15 पृष्ठ, इसके अलावा लगभग 30 पृष्ठों में एक ही जगह 11 फुटकर लेखिकाओं के बारे में, अफ़्रो-अमेरिकन स्त्री लेखन से फ़िल्मों के संबंध पर 15 पृष्ठ तथा सबसे मार्मिक प्रसंग अंतिम 4 पृष्ठों में । यह संगठन इस बात की पुष्टि करता है कि किताब किसी किस्म के औपचारिक बंधन से आजाद होकर विषय में डूबकर लिखी गई है ।
किताब का सबसे छोटा अंतिम अध्याय ‘अंडरग्राउंड रेलरोड : बिना रेल, बिना रोड कर दिया कमाल’ सबसे अधिक महत्वपूर्ण है । गुलामी से मुक्ति का यह ऐसा मिथकीय आख्यान है जिसे थोड़ी ज्यादा जगह मिलनी चाहिए थी । यह एक मिथकीय रास्ता था जिससे होकर गुलामों को दक्षिण से उत्तर लाया जाता था । कानून था कि भागे हुए गुलामों को देखते ही गोली मार दी जाए इसलिए यह रास्ता अंडरग्राउंड था । इसमें दासता के विरोधी गोरे भी शामिल थे लेकिन मुख्य रूप से अफ़्रीकी लोग ही, खासकर स्त्रियों ने, यह रास्ता बनाया था । इस रास्ते पर चलते हुए ज्यादातर लोग मारे गए, बहुत कम बच सके । रात के अंधेरे में एक मंजिल से दूसरी मंजिल तक अनजान लोग खामोशी से भागे हुए दासों को ले जाते । दिन में ऐसी जगहों पर छिपाया जाता जिसकी याद भी बाद में न रह जाती । जो लोग भी लोकप्रिय किस्म के भूमिगत आंदोलनों के भोक्ता रहे होंगे वे इस अनुभूति की आंच को समझ सकते हैं । अकेले इस अध्याय ने पूरी किताब को साहित्य के व्यापक सरोकारों और पहलुओं तक ऊँचा उठाने में मदद की है ।                 
यह किताब साहित्य के भीतर की नैतिकता को भी उजागर करती है जो नैतिकता के पाखंड का भंडाफोड़ करता है । समाज में आम तौर जिस किस्म के नैतिक मानदंडों का प्राधान्य रहता है उस पर साहित्य सवाल तो उठाता ही है, कई बार ऊपर से अनैतिक लगने वाले कामों के भीतर की गहन नैतिकता से हमें परिचित कराता है और इस तरह हमारे नजरिए को विस्तारित करके विपथगामियों को सहानुभूतिपूर्वक देखने की दृष्टि देता है । प्रसिद्ध कवि गुरदयाल सिंह ने अपनी आत्मकथा ‘चोला टांकियावाला’ में एक वाकये का जिक्र किया है । एक स्त्री के आचरण की निंदा यह कहकर की जा रही थी कि जब उसकी संतान मर रही थी तो वह संभोग का आनंद उठा रही थी । गुरदयाल सिंह ने इसे एक जीवन के खात्मे के अंदेशे के समय एक और जीवन को रचने की उदग्रता के रूप में व्याख्यायित किया है । एक संस्कृत की कहावत का सहारा लेकर कह सकते हैं कि साहित्य की गति सूक्ष्म होती है । इसी तरह इस किताब में एक लेखक के उपन्यास में वर्णित एक घटना का जिक्र है जिसमें नायिका गुलामी से बचने के लिए भाग जाती है । भागते हुए वह अपने बच्चों को मार डालती है । उसके इस आचरण को हत्यारा आचरण कहा जा सकता है लेकिन उपन्यासकार के लिए इसके पीछे उसके मन में बच्चों के प्रति इतना गहरा प्रेम था कि वह उन्हें गुलामी की तकलीफ भोगने के लिए जिंदा नहीं छोड़ना चाहती है । पूरी किताब ही ऐसे प्रसंगों से भरी हुई है जिन्हें सामान्य मान्यताओं के तराजू में नहीं तोला जा सकता । जो लोग अंग्रेजी में उपलब्ध यह विपुल साहित्य भाषाई दूरी या समय की कमी के चलते नहीं पढ़ सकते उनके लिए संक्षेप में बेहद उपयोगी तरीके से मूल लेखन और उसमें वर्णित जीवन की झांकी प्रस्तुत कर दी गई है ।
किताब में इन गुलाम स्त्रियों की आत्मकथाओं में व्यक्त कथा-व्यथा तो है ही उस समूचे माहौल के घिनौनेपन को भी उभारा गया है जो गोरों के जीवन के लिए भी बहुत उपकारी नहीं था । इसका वर्णन कुछ इस तरह किया गया है ‘श्वेत मां के अश्वेत बच्चे को कई बार गला घोंटकर मार डाला जाता । अश्वेत मां के श्वेत बच्चे को नीलामी के तख्त पर चढ़ा दिया जाता ।’ हैरियट के बहाने दर्ज किया गया है ‘गुलामी की प्रथा श्वेत-अश्वेत दोनों के लिए शाप थी । यह प्रथा श्वेत पुरुष को कामुक और क्रूर बनाती । लड़कियां भी संक्रमण से बच नहीं पातीं । स्त्रियां दिन-रात बेवफाई का शिकार होतीं, ईर्ष्या-द्वेष की अग्नि में जलती रहतीं । अश्वेत को भी इस प्रथा ने मनुष्य नहीं रहने दिया । उनकी पहचान, उनके अधिकार, उनकी इज्जत नहीं होती ।’ यही तो इन आत्मकथाओं का मकसद था गुलामी प्रथा की अमानवीयता को संसार के सामने ले आना । लिंडा का मालिक एक डाक्टर था । उससे बचने के लिए वह भागकर अपनी नानी के घर की नौ फ़ीट लंबी, सात फ़ीट चौड़ी और तीन फ़ीट ऊंची दुछत्ती में छिप गई । स्वाभाविक रूप से इसमें खड़ा होना या बैठना असंभव था । लेटे लेटे उसके शरीर के अंग जकड़ गए तो रात को नीचे उतरकर थोड़ा शरीर सीधा कर लेती । इसी तरह उसने चूहों के साथ पांच साल काटे थे । इसके बाद अपने प्रेमी के प्रयासों से वह भागकर उत्तर गई और आजाद हुई । सचमुच अपनी आजादी के लिए इन स्त्रियों ने कितने महाकाव्यात्मक प्रयास किए । असली जीवन की भयानकता के कुछेक ही दृश्य इस लेखन से व्यक्त हुए होंगे !    

अगर धीरज और ध्यान के साथ किताब को पढ़ा जाय तो इस सवाल का भी जवाब मिलता है कि आखिर क्यों वंचित समुदाय अपने हालात से विद्रोह को मुखरित करने के लिए आत्मकथा का सहारा लेते हैं लेकिन इसी जगह इस रणनीति की एक समस्या भी सामने आती है । जीवन की विडंबना को सामने लाने की कोशिश तो इनमें की जाती है लेकिन आलोचक अक्सर उस चीख को सुनने के बदले सराहने लगते हैं । उदाहरण के लिए स्त्री लेखन में सिलाई की उपस्थिति को उबाऊ श्रम के प्रतिकार के बदले उसका गुण समझा जाना । आशा की जानी चाहिए कि हिंदी में लिखित होने के कारण इस किताब के बहाने अस्मिता लेखन की खूबियों और खामियों पर बहस होगी ।