Saturday, February 21, 2026

संघर्ष और प्रेम का सहकार

 

               

                                                   

नोकिल सिंह की प्रस्तुत काव्य पुस्तिका में कवि की दो कविताओं को रखा गया है । उनके विषय क्रमश: संघर्ष और प्रेम हैं । बहुधा इन दोनों को परस्पर विरोधी भाव माना जाता है लेकिन उनकी सह उपस्थिति का इतिहास भी काफी लम्बा रहा है इसका कारण शायद यह है कि प्रेम एक ऐसा मूल्य है जो मनुष्य की निजी गरिमा को मान्यता देता है जबसे समाज में विषमता की स्थापना हुई तबसे ही प्रेम पर बंधन भी लगने लगे उन सभी बंधनों का प्रतिकार प्रेम का अभिन्न अंग हो गया कहने की जरूरत नहीं कि एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से यदि लगाव होगा तो इसका आधार समानता की भावना ही हो सकता है इतिहास में भी देखा गया कि क्रूरता और विषमता का सह अस्तित्व रहा है अतीत के साथ ही यह बात वर्तमान के लिए भी सच है । आश्चर्य नहीं कि जैसे जैसे विषमता में इजाफ़ा हो रहा है उसी मात्रा में प्रेम के स्थान पर क्रूरता और घृणा की प्रशंसा के गीत गाये जा रहे हैं ।

सभी जानते हैं कि प्रेम के दमन में स्त्रीद्वेष का गहरा असर होता है । सामाजिक रूप से ऊंच नीच की व्यवस्था में प्रेम के गीत जिन्होंने गाये उन्हें बहुतेरा ईश्वरीय प्रेम का सहारा लेना पड़ा । आज उस तरह के किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ती इसलिए उसके साथ संघर्ष का अभिन्न जुड़ाव हो जाता है । इस प्रेम को जितना अधिक दबाने की कोशिश की गयी उतनी ही मजबूती से उसने समाज के साथ साहित्य में भी अपनी जगह बनायी है । हो सकता है नफ़रत के पक्ष में माहौल ऐसा बना दिया जाय कि अब साहित्य में प्रेम की केंद्रीयता का तथ्य भी दुहराना पड़े अन्यथा कौन नहीं जानता कि समूची दुनिया में खासकर कविता के क्षेत्र में प्रेम की भावना प्रधान रही है । हमारे देश के सामंती वातावरण में भी प्रेम और रति के भाव से उपजे रस को ही रसराज कहा जाता रहा है । कविता के सिलसिले में प्रेम के महत्व का कथन ही साबित करता है कि प्रेम के लिए माहौल कितना विषाक्त हो गया है । हिन्दी के सभी अध्येता प्रेम के मामले में सूरदास की गोपियों के साहस और मीराबाई के त्याग के अतिरिक्त जायसी नामक सूफी कवि के नाम से परिचित हैं । न केवल इतना बल्कि प्रेम के वर्णन में स्त्री की पराधीनता के प्रत्याख्यान की गुंजाइश पैदा हुई और उसकी झलक नोकिल की कविता में भी मिलती है ।

उत्तर प्रदेश के जायस नामक स्थान के निवासी सूफी कवि ने प्रेम को इतना ऊपर उठा दिया कि उसने प्रेम में मनुष्य को देवत्व प्रदान कर दिया । न केवल सूफी बल्कि उर्दू की समूची कविता में प्रेम की प्रतिष्ठा का जिक्र करने की जरूरत नहीं, वह प्रत्यक्ष है । इस प्रेम का संघर्ष से रिश्ता कू-ए-यार से सू-ए-दार की ओर ले जाने वाले फ़ैज़ से अधिक शायद ही कोई और स्पष्ट कर सके । इसलिए भी इन कविताओं के शिल्प पर रुबाइ का गहरा असर नजर आता है । चार पंक्तियों के इस सुपरिचित काव्य रूप के आकर्षक होने के बावजूद हिन्दी की कविता में इसका अनुकरण नहीं हुआ । इसके मुकाबले ग़ज़ल के अनुकरण में अधिक लोगों ने हाथ आजमाया । थोड़ा बहुत मधुशाला के शिल्प पर इसका प्रभाव नजर आता है । नोकिल की कविता के दोनों ही खंडों में चार पंक्तियों में बात कहने की शैली अपनायी गयी है और यह अनायास नहीं लगता । किन्हीं कारणों से उनके काव्य संस्कार में इस काव्य रूप ने बहुत ही मजबूत जगह बनायी है ।

मनुष्य का सांसारिक अस्तित्व सभी चिंतकों के लिए व्याख्या की चुनौती पेश करता रहा है । एक ओर उसे पशु भी कहा जा सकता है । संस्कृत में आहार, निद्रा, भय और मैथुन को पशुओं और मनुष्यों के बीच साझा कहा गया है । दूसरी ओर उसके किसी भी जैविकीय कर्म में केवल शारीरिक तत्व नहीं होता । मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता शरीर की सीमा के अतिक्रमण की उसकी क्षमता और प्रवृत्ति में निहित है । इसी भूमि पर उसके शुद्ध दैहिक कर्मों में भी अध्यात्म की आभा आ जाती है । इब्न रोश्द ने मनुष्य की समझ बनाते हुए उसके भीतर किसी जड़ पदार्थ, मानवेतर प्राणी और दैवी झलक के तीन स्तरों को पहचाना था । यही खूबी मनुष्य के प्रेम को निरा शारीरिक कर्म नहीं रहने देती और उसे संघर्ष की प्रेरक बना देती है । इसी अर्थ में प्रेम और संघर्ष की आस्तित्विक सहगामिता को देखा जा सकता है । संघर्ष संबंधी नोकिल की काव्य पंक्तियों में उद्बोधन की गूंज अक्सर सुनायी देती रहती है ।

संघर्ष भी प्रेम की तरह ही कविता का सर्वकालिक विषय है । इसका कारण इस संसार में मनुष्य का अस्तित्व है । सभी प्राणियों में सबसे कम सुरक्षा कवच मनुष्य के पास है । इसी वजह से उसे अपने अस्तित्व के लिए लगातार विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करते रहना पड़ा । ये परिस्थितियां प्राकृतिक थीं जिनसे जूझने के क्रम में मनुष्य को आवास, वस्त्र और पके भोजन का प्रबंध करना पड़ा । एक समय के बाद ये हालात सामाजिक भी हो गये और मनुष्य को जीवित रहने के लिए अन्य मनुष्यों से ही जानलेवा संघर्ष चलाना पड़ा । इस संघर्ष की भी गूंज साहित्य में हमेशा सुनायी देती रही ।  

कविता को छंद के बंधन से आजादी दिलाने वाले जानते थे कि कविता में छंद का निर्वाह बहुत कठिन साधना है । आधुनिक मनुष्य की विवेक चेतना की सहज अभिव्यक्ति गद्य में होती है लेकिन कविता मनुष्य की आदिम अभिव्यक्ति होने के कारण सांद्र अभिव्यक्ति के माध्यम के बतौर आकर्षित करती रहती है । सभी युगों में मनुष्य की सबसे तीव्र और सबसे सूक्ष्म अभिव्यक्ति कविता में होती रही है इसलिए उसकी ओर खिंचाव हमेशा ही बना रहता है । उसकी अभिव्यक्ति की रूपगत परिष्कृति के कारण ही काव्य हेतुओं में प्रतिभा के साथ अभ्यास को भी महत्व प्रदान किया गया है । नोकिल की कविताओं को पढ़ने से उनमें अभ्यास की कमी महसूस होती है लेकिन यह ऐसा रास्ता है जिस पर चलकर ही आसानी हासिल होती है । इसका बहुत बड़ा कारण उसका भाषा नामक माध्यम है । यह माध्यम भी मनुष्य के संघर्ष से ही उपजा है । प्राकृतिक और सामाजिक वैपरीत्य के मुकाबिल अपनी सामाजिकता की रक्षा के क्रम में मनुष्य ने भौतिक औजारों के साथ इस अत्यंत जटिल तंत्र का भी निर्माण अपने शरीर में उपलब्ध सीमित साधनों से किया । इसने मनुष्य को शेष प्राणियों के मुकाबले गुणात्मक विशेषता प्रदान कर दी । अब वह अपने आसपास के हालात का मुकाबला करने की कोशिश की सफलता या विफलता की विरासत अगली पीढ़ियों को सौंप सकता था ।      

भाषा में कविता को सम्भव करने के लिए उसे पालतू बनाना पड़ता है । उसकी ध्वनियों से लय का सृजन करते हुए भी उससे उत्पन्न अर्थ की रक्षा करनी पड़ती है । भाषा में रचना करने वाले सभी लोग कमोबेश इस प्रक्रिया की जटिलता और समस्याओं से परिचित होते हैं । साथ ही वे इससे हासिल फल से वंचित भी नहीं रहना चाहते । इससे रचनाकार को मानव समुदाय को आगे बढ़ाने वाले का जो सम्मान और सुख मिलता है वही किसी भी कवि की उपलब्धि और विशेषता का स्रोत होता है । कोई भी साहित्यकार इस खासियत से दूर नहीं होना चाहता इसलिए तमाम अपमान, उपहास और अलगाव के बावजूद वह सृजन की जिद नहीं छोड़ता ।

नोकिल की कविता में इस समय के युवा की भाषा से कविता के निर्माण का प्रयास नजर आता है । उनकी इस भाषा में अनेक अपरम्परित शब्द मिलते हैं । कविता में इन शब्दों के प्रयोग से हिंदी की दुनिया अभ्यस्त नहीं है लेकिन बोलचाल में ये शब्द इन्हीं नये अर्थों में प्रयुक्त हो रहे हैं । पढ़ते हुए ये शब्द अक्सर भोजन में कंकड़ की तरह चुभते हैं लेकिन इसी प्रक्रिया में वे हिंदी के नये पाठक तक कविता को लेकर भी जायेंगे । पाठकों से आग्रह है कि इन कविताओं को वे प्रयास की तरह ही देखें । यदि वे इन्हें आलोचनात्मक निगाह से पढ़ेंगे तो लेखक को खुशी मिलेगी । इससे भी आगे बढ़कर वे इस कोशिश को परिष्कृत और संपन्न करें तो इससे बड़ा फल किसी भी लेखक के लिए और कुछ नहीं हो सकता । सभी ईंटें कलश पर ही नहीं लगतीं । कुछ नींव में गुम भी हो जाती हैं । अगर बुनियाद में खप जाने वाले प्रयोगकर्ताओं का जत्था न हो तो किसी भी भाषा में काव्य और साहित्य रचना ठहर जायेगी । उसका विकास ही इसी तरह के कच्चे पक्के प्रयासों की मार्फत होता है । ये कविताएं मंजिल या पड़ाव नहीं उसकी ओर जारी यात्रा का छोटा सा सबूत हैं ।

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