Saturday, March 29, 2025

नस्ली पूंजीवाद का विरोध

 


2023 में प्लूटो प्रेस से सलीम वाली और अनवर मोताला के संपादन में नेविल अलेक्जेंडर की किताब ‘अगेंस्ट रेशियल कैपिटलिज्म: सेलेक्टेड राइटिंग्स’ का प्रकाशन जान सैमुएल और कारेन प्रेस की प्रस्तावना के साथ हुआ । प्रस्तावना के मुताबिक नेविल अलेक्जेंडर ऐसे सार्वजनिक बौद्धिक थे जो विगत साठ सालों तक नये समाज का सपना संजोए रहे और नयी सम्भावनाओं के लिए संघर्ष करते रहे । उनका यह सपना दक्षिण अफ़्रीका के यथार्थ पर खड़ा था । मुश्किल समय भी उन्होंने प्रदत्त को चुनौती देना नहीं छोड़ा । उनके इस लेखन से दक्षिण अफ़्रीका की बेहतरी की कोशिश को बहुत बल मिलता रहा है । 27 अगस्त 2012 को 75 साल की परिपक्व उम्र में इस योद्धा का निधन हो गया । उनके साठ साल के लेखन के इस सुचिंतित संग्रह से दक्षिण अफ़्रीका के इस महान बौद्धिक के विचारों का परिचय तो मिलता ही है दक्षिण अफ़्रीका की बेहतरी के लिए लड़ने की प्रेरणा भी पैदा होती है । उनको पक्का यकीन था कि दक्षिण अफ़्रीका में न्यायपूर्ण और सुसंस्कृत समाज का निर्माण किया जा सकता है । किसी की शुभाकांक्षा की वजह से ही वे इसका बनना तय नहीं समझते थे । इतिहास और अनुभव के आधार पर उन्हें लगता था कि ऐसे समाज के सपने को जिंदा रखना सबसे जरूरी काम है ।

ऐसा केवल चिंतन की दुनिया में ही नहीं होना था बल्कि रोज रोज की गतिविधियों में भी उसे प्रतिबिम्बित होना था । इसके लिए मुक्ति संघर्ष हेतु नये रास्तों की खोज के साथ ही बच्चों की पढ़ाई के क्लबों, पहचान और नस्ल के सवाल पर अंतर्दृष्टिपूर्ण लेखन के साथ ही लोकतांत्रिक समाज के लिए शैक्षिक संघर्ष, भाषा और सत्ता संबंधी तात्कालिक सवालों के साथ ही अनुपनिवेशन की रणनीति पर भी काम करना उन्हें जरूरी लगता था । उन्होंने विचार और व्यवहार की एकता को हमेशा बनाये रखा । जिस भी क्षेत्र में उन्होंने हाथ लगाया उन्हें भविष्य की सम्भावना नजर आयी और इसी भरोसे के कारण उन्होंने उम्मीद की भाषा विकसित की । उनके काम्य समाज को बनाने में उनके लेखन से अनेकविध मदद मिलती है । दक्षिण अफ़्रीका के मुक्ति संघर्ष की उथल पुथल के बीच उनका यह लेखन हुआ और इसलिए देश की समस्याओं को समझने में रास्ता दिखाता है ।

इस समूचे दौर में दक्षिण अफ़्रीका में तीखी बहसें होती रही हैं । इनमें मुक्ति संघर्ष की रणनीति और कार्यनीति, राष्ट्र निर्माण, नस्ल और वर्ग के आपसी रिश्ते, आजादी के बाद नस्ली पूंजीवाद की निरंतरता, शिक्षा की भूमिका और मकसद तथा बहुभाषिकता संबंधी तमाम सवाल उठते रहे हैं । लेखक ने इन सवालों पर विचार करते हुए सिद्धांतों के साथ ही आसपास के ठोस यथार्थ पर भी निगाह रखी । वे जीवन भर बौद्धिक तटस्थता और निष्पक्षता का विरोध करते रहे थे । मुक्ति के बाद दक्षिण अफ़्रीका के शासन ने जो नवउदारवादी राह पकड़ी उसके विरोध में वे लगातार वैकल्पिक राह प्रस्तावित करते रहे । उनके इस विकल्प में सम्भावना के ठोस और प्रदर्शनीय नमूने हुआ करते थे । उनकी निगाह सामाजिक आलोचना और अकादमिक विश्लेषण के पार देखती थी । पारम्परिक विद्वत्ता द्वारा थोपी गयी नकली सीमाओं को उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया । उनके तईं कोई सैद्धांतिक गतिविधि सामाजिक संलग्नता से अभिन्न होती थी । वे सिद्धांत और व्यवहार के बीच किसी विभाजन को कभी मंजूर नहीं करते थे । अन्याय के विरुद्ध गरीबों और हाशिये के लोगों के संघर्ष में वे राजकीय तंत्र के भीतर सक्रिय रहने के साथ ही उसके बाहर की सक्रियता के भी पक्षधर रहे थे ।

उनकी अदम्य आशा का बड़ा स्रोत इतिहास था और वे इसके लिए लम्बी दूरी के इतिहास का हवाला देते थे । उनका मानना था कि समाज में विषमता है तो गरीब और कामगार समूह उसके विरुद्ध संघर्ष भी करते हैं और ऐसे ही परस्पर विरोध के बीच वास्तविक लोकतांत्रिक भविष्य की सम्भावना का जन्म होता है । आजादी के बाद के दक्षिण अफ़्रीका में राजकीय संसाधनों की लूट से वे विक्षुब्ध थे । इसके प्रतिरोध हेतु वे संघर्ष के मूल्यों को स्रोत के बतौर जगाने के इच्छुक थे । वे लगातार आत्म समीक्षा करते रहे और खुद को सृजनात्मक मार्क्सवादी, अफ़्रीकी सार्वभौमिकता के समर्थक और अंतर्राष्ट्रवादी कहते रहे । दूसरों को सुनने के लिए वे हमेशा तैयार रहे, अपने को हमेशा पीछे रखते रहे और क्रांतिकारी मानववाद में उनकी निष्ठा अटूट रही । उन्होंने भविष्य की पीढ़ियों के लिए कुतुबनुमा की तरह अपने विचारों को प्रस्तुत किया ताकि वे सुसंस्कृत समाज बनाने की दिशा में अविचल बढ़ते रहें । उनके लेखन में राजनीतिक और सामाजिक दर्शन, शिक्षा और संस्कृति, इतिहास, नैतिकता और समकालीन यथार्थ तो है ही, क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव के भी लिए उनका अपार महत्व है । 

नस्ल और वर्ग के आपसी रिश्ते को समझने के क्रम में वे दोनों ही धारणाओं का विस्तार करते हैं । सामाजिक बदलाव की व्यापकता को वे वर्ग तक ही सीमित नहीं मानते और नस्ल की कोटि का कोई स्थिर सार नहीं मंजूर करते । सामाजिक न्याय और सुसंस्कृत जीवन हेतु संघर्ष के क्रम में वे मुक्ति आंदोलन के तमाम तरह के अन्य नेताओं से राज्य और समाज की प्रकृति के सिलसिले में संवाद स्थापित करते हैं । उनके तर्क और उनकी धारणाओं का लक्ष्य हर हमेशा नस्लवादी, दमनकारी और शोषक नस्ली पूंजीवादी सत्ता को उखाड़ फेंकना है । नस्ली पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में सिद्धांत और व्यवहार के स्तर पर बहसों को जन्म देने के मामले में उनका लेखन अन्यतम रहा है ।

1985 में ही अपनी एक किताब में उन्होंने अपने योगदान का मूल्यांकन करते हुए कहा कि नस्लवाद और पूंजीवाद के आपसी संबंध को देखने के मामले में वे देश की समस्याओं के समाजवादी समाधान की ओर उन्मुख रहे हैं । इस समाधान के लिए वे संघर्षों में मजदूर वर्ग के नेतृत्व की गारंटी चाहते हैं । जातीय और नस्ली पूर्वाग्रहों से लड़कर राष्ट्र निर्माण के लिए भी ऐसा करना वे जरूरी समझते रहे हैं । साथ ही वे स्त्री मुक्ति, राष्ट्र मुक्ति और वर्ग मुक्ति को आपस में जुड़ा मानते हैं । शिक्षा और संस्कृति की दुनिया में ऐसे व्यवहार के पक्षधर रहे हैं जो नस्लभेदी समाज में प्रभु वर्गों के हितों के लिए अपनाई गयी विभाजनकारी और शोषक नीतियों को उलट सके । चूंकि उनका लेखन और व्यवहार समाजवादी परिप्रेक्ष्य का पोषक रहा है इसलिए मुक्ति संघर्ष में उदारवादी विचारधारा के हामी लोगों ने उनका विरोध भी किया । दक्षिण अफ़्रीका की नस्लभेदी सत्ता का जोरदार विरोध करने की कीमत उन्होंने दस साल की जेल और फिर पांच साल की घरेलू की पाबंदी के रूप में चुकायी लेकिन इनसे मुक्ति संघर्ष में उनकी भागीदारी और सक्रिय भूमिका पर कोई खास असर नहीं पड़ा । 

संपादकों का कहना है कि 22 साल की उम्र में ही उन्होंने महत्वपूर्ण सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और सांगठनिक सवालों पर अपनी दार्शनिक राय को सूत्रबद्ध करना शुरू कर दिया था । 1958 में वे केप द्वीप के छात्र संघ की पत्रिका के संपादक थे और इसमें उन्होंने विश्वविद्यालय की धारणा के बारे में एक लेख लिखा । इसमें उन्होंने एक कानून की तीखी आलोचना की जिसके तहत दक्षिण अफ़्रीका के विश्वविद्यालयों को नस्ली आधार पर परिभाषित किया जाना था । फिर आधुनिक दुनिया में शिक्षा के प्रसंग में लेख लिखा जिसमें शुद्ध शैक्षिक महत्व के सवालों के साथ सामाजिक परिघटना के बतौर शिक्षा का विश्लेषण किया गया था । इसका उद्देश्य लोकतांत्रिक दक्षिण अफ़्रीका में लोकतांत्रिक शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप पर बहस खड़ा करना था । इसमें उन्होंने पश्चिमी शिक्षा के उदय और उसके अंतर्विरोधों की भी परीक्षा की । इसमें ग्रीक नगर राज्यों में इसकी जड़ों की चर्चा के साथ शिक्षा पर धर्म के प्रभाव का भी उल्लेख था । दक्षिण अफ़्रीकी शिक्षा व्यवस्था में नस्लवादी विचारों और रूढ़ियों की चर्चा भी थी । साथ ही लोकतंत्र और लोकतांत्रिक शिक्षा व्यवस्था के बीच के रिश्तों पर भी सोच विचार किया गया था । जीवन के आखिरी दिनों तक वे समाज के सवालों पर हमेशा सार्वजनिक चर्चा पर बल देते रहे । आजादी मिलने के बाद के हालात में जब विफलता स्पष्ट होती गयी तब खासकर वे सार्वजनिक चर्चा को जरूरी मानने लगे थे ।

मरणोपरांत प्रकाशित एक लेख जिसमें नये दक्षिण अफ़्रीका की चर्चा उन्होंने की उसमें जनता के संसाधनों की लूट पर उन्होंने दुख जाहिर किया । चारों ओर उन्हें सामाजिक विध्वंस के निशान नजर आये । नेताओं के भ्रष्टाचार और लोभ के सबूत अभूतपूर्व रूप से व्याप्त थे जबकि उन्हें युवकों के लिए आदर्श होना था । आम लोग अपने दैनंदिन अनुभव में बच्चों, बुजुर्गों और स्त्रियों के साथ बेरहमी, बेईमानी, अनुशासनहीनता और जनता को सुविधा प्रदान करने में कोताही, जीवन रक्षक कानूनों की अवहेलना, देश के विभिन्न समुदायों में व्याप्त, युद्ध के दौरान भी अकल्पनीय हिंसा, मादक द्रव्यों की सीमाओं के आरपार तस्करी, कबाड़ स्वास्थ्य सेवा- यानी कुल मिलाकर अफरा तफरी और आत्मघाती अराजकता देख रहे थे । उनको यही उस समय की असली सचाई महसूस हुई । इससे पहले भी अस्सी दशक के एक विद्रोही की याद में उन्होंने नवउदारवादी पूंजीवाद में व्याप्त आत्ममुग्धता के चलते उस दौर के मूल्यों के ह्रास पर अफसोस जाहिर किया था । उनको चिंता थी कि नवउदारवादी बर्बरता के दौर में दक्षिण अफ़्रीका के युवाओं में भिन्न किस्म के मूल्य किस तरह रोपे जाएं जबकि उनकी आकांक्षा की राह में ढांचागत सीमाएं खड़ी हैं और दूसरी ओर मीडिया तथा सरकारी और गैर सरकारी वैचारिकता के प्रसारक नकारात्मक और आत्मघाती सोच फैलाते रहते हैं ।

उन्हें लगा कि नस्ली शासन की समाप्ति के बाद दक्षिण अफ़्रीका में नैतिकता विरोधी माहौल व्याप्त है । इसी लेख में उन्होंने पाठकों से थोड़ा पीछे हटकर नब्बे के बाद के दक्षिण अफ़्रीका की दशा और दिशा पर सोचने की गुजारिश की थी । उन्होंने अस्सी दशक के सपनों को फिर से जगाने की भी अपील पाठकों से की । खुद के लिए भी उन्होंने उस दौर की अपनी चिंताओं को ताजा करना शुरू किया ताकि इस जागरण में अपेक्षित सहयोग कर सकें । उस समय के अपने सक्रिय हस्तक्षेपों को दस्तावेज के बतौर पेश करने की जिम्मेदारी उन्हें महसूस हुई । जैसा समाज बन रहा था को देखने के लिए जैसा समाज सबको मिलकर बनाना था को याद करना सही लगा ।

दीर्घकालीन इतिहास को ध्यान में रखने की आदत की वजह से वे अक्सर ग्राम्शी की मोर्चेबंदी की लड़ाई का हवाला देते हैं । इससे ही उनके अदम्य आशावाद का जन्म हुआ था । इस लड़ाई में अपने दायित्व को पूरा करने के लिए वे लगातार बहस मुबाहिसों में लगे रहते थे । इस रणनीति को वे सिद्धांत के साथ ही व्यवहार के क्षेत्र में भी लागू करते थे । अपने लेखन की बहसधर्मी प्रकृति से वे परिचित थे और इसे राजनीतिक विकास के लिए जरूरी समझते थे । किसी भी बौद्धिक प्रेरणा के लिए वे ऐसा बहसधर्मी संवाद अपने लिए बहुत ही आवश्यक समझते थे । अपने बौद्धिक विकास के क्रम में वे जिनसे प्रभावित हुए उनके बारे में भी सचेत थे । बहुधा वे कहते कि उनके विचार संघर्षों की परम्परा में गहरे धंसे हैं तथा इन्हें आकार देने में संघर्षरत जनता और उनके नेता तथा संघर्ष की दिशा और महत्व को स्थापित करने बौद्धिकों का हाथ है । उनके लेखन, भाषण और सांगठनिक गतिविधि में खासी व्यापकता थी और उनसे सनसनी फैलती थी क्योंकि अक्सर वे मुक्ति संघर्ष और तत्कालीन बौद्धिक माहौल के स्थापित विचारों का वैचारिक विकल्प महसूस होते थे ।

संग्रह में संकलित लेखों के लेखक नेविल का प्रमुख वैचारिक योगदान राष्ट्रीयता की समस्या पर केंद्रित है । इसी प्रसंग में वे भाषा, शिक्षा और संस्कृति आदि पर विचार करते हैं । आलोचना के साथ संवाद के आधार पर उन्होंने वे सिद्धांत और व्यवहार तैयार किये जिनसे समस्याओं के समाजवादी समाधान में मदद मिलनी थी । दक्षिण अफ़्रीका में राज्य, समाज और संघर्ष पर विचार करते हुए 1979 में छपे एक लेख में उन्होंने यही रवैया अपनाया है । जेल में नेल्सन मंडेला के साथ उनकी जो बहस शुरू हुई थी उससे प्रेरित होकर 1974 से 1979 की पाबंदी के दौरान उन्होंने एक किताब लिखी । यह बहस नये अफ़्रीका, राष्ट्र निर्माण, नस्ली पूर्वाग्रह, नस्ली रुख तथा नस्ल, वर्ग और लिंग के रिश्तों को लेकर हुई थी । दो साल तक दोनों लोग प्रति सप्ताह इस सवाल पर विचार करते कि मुक्ति के बाद नये राष्ट्र का निर्माण कैसे किया जाएगा । इसके लिए शिक्षा, ढांचों में बदलाव और अस्मिता राजनीति के सवालों से सीधे ही  टकराना था । नेविल ने जो किताब लिखी उसका मकसद स्वाधीनता आंदोलन की ताकतों के बीच एकता कायम करना था । इसके लिए दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्र की पहचान के सवाल पर गम्भीर बहस जरूरी थी । नये समाज को गढ़ने वाली ताकतों को तैयार करने के लिए यह काम निहायत जरूरी था । उन्होंने इसी समझ के साथ संकीर्णता से ऊपर उठकर व्यापक मोर्चे में एकता की वकालत की । असल में नस्लभेदी शासन और मुक्ति आंदोलन की भी कुछ धाराओं में प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद के विचार व्याप्त थे । इसका नतीजा यह होता कि आंदोलन के भीतर वर्ग संघर्ष में कमी आती और समाज पर पिछड़ी सोच का दबदबा कायम रहता । इसके मुकाबले के लिए भी आंदोलन की यह तैयारी आवश्यक थी । इससे विषमता के समाजार्थिक आधार की समझ साफ होती और उस स्थिति की वैचारिक अभिव्यक्ति भी पहचानने में आसानी होती । नस्लभेदी शासन के अंत और देश की आजादी के लिए यह जरूरी लगा था । असल में उस समय दक्षिण अफ़्रीकी समाज में नस्ल की वैचारिकी इतनी प्रबल थी कि नेविल ने नस्ल-विरोधी समूहों के निर्माण का काम भी शुरू किया था । गैर नस्ली विकल्प के निर्माण की दिशा में इन समूहों को आधार का काम करना था । तत्कालीन नस्ली विचारों का नाश सबसे पहले चेतना के स्तर पर होना था । नस्ल-विरोधी समाज के जन्म के लिए आंदोलन को भ्रूणावस्था में इसका वाहक होना था । ऊपर से लगता है कि वे नस्ल के सवाल को वर्ग से अलगा रहे हैं लेकिन नस्ल की उनकी धारणा शोषक पूंजीवादी सामाजिक संबंधों से अभिन्न है । नस्लेतर समाज बनाने का उनका सपना तत्कालीन नस्ली पूंजीवाद का मजबूत प्रतिरोध भी है ।

राष्ट्र की समस्या के बारे में उनके लेखन का अर्थ एक ओर इस सवाल पर स्पष्टता के लिए था तो दूसरी ओर उसका लक्ष्य व्यापक एकता का निर्माण भी था । इसके जरिये वे तत्कालीन शासन के विरोध का भी दायित्व निभा रहे थे । वे सत्ता के आधार नस्लवाद के बेतुकेपन को उजागर करना चाहते थे । नस्लवादी विचारों का पूरी तरह विखंडन भी उनका उद्देश्य था । इसके सहारे ही नये समाज के निर्माण के लिए राजनीतिक और सामाजिक गोलबंदी हो सकती थी । उनका मानना था कि अगर आंदोलन के दौरान नस्ली पहचान की ही सुविधा का लाभ लेकर संगठन बनाया जाता है तो यह शासन की विचारधारा के समक्ष समर्पण होगा । इसके ही विरोध में वे राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय चेतना का सवाल ले आये थे । बहु नस्ली समाज के प्रस्ताव को भी वे उसी सोच की दलदल में फंसना समझते थे जिससे निकलने की लड़ाई लड़ी जानी थी । नस्ली विभाजन और विचारधारा ने राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को बाधित किया था । इसका अर्थ यह नहीं कि वे उत्पीड़न के अन्य रूपों को मानते नहीं थे । उत्पीड़क और शोषक शासन की अखंड और बहुमुखी प्रकृति को वे खूब अच्छी तरह समझते थे । इसके बावजूद उन्होंने विभाजक औजार के रूप में नस्ल की कोटि को प्रमुखता दी तो उसका कारण शोषितों और पीड़ितों के जीवन अनुभव में निहित है । इसके बावजूद वे मानते थे कि धर्म से लेकर राजनीति और अर्थव्यवस्था तक सब कुछ को ऐसी भाषा को व्यक्त और कल्पित करना होगा जो उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के बोझ से मुक्त हो ।

राष्ट्र की उन्होंने विस्तृत परिभाषा प्रस्तुत की क्योंकि उसके आम विवरण के नीचे उसके विविध रूप छिप जाते हैं । वे मानते थे कि अफ़्रीका को यूरोपीय इतिहास के ढांचे में देखना उचित नहीं है । उसे उसकी अपनी ही शर्तों पर देखने और समझने के वे पक्षधर थे । यूरोप में राष्ट्र की धारणा को समझने के लिए वे बेनेडिक्ट एंडरसन की कल्पित समुदाय की धारणा का उपयोग करते हैं । एंडरसन के अनुसार पश्चिमी यूरोप में छापे की भाषा और पूंजीवाद के उदय ने पवित्र भाषा लैटिन की जगह स्थानीय भाषाओं को स्थापित किया । इनसे फिर कल्पित समुदाय बने जो धार्मिक और शाही समुदायों से एकदम अलग थे । इन्होंने फिर आधुनिक राष्ट्रीय चेतना को जन्म दिया । इस तरह पूंजीवाद के विकास और राष्ट्रीय चेतना के बीच में सम्पर्क का काम छापे की भाषा ने किया था । अब राष्ट्र की कल्पना भाषाई समुदाय के बिना भी हो सकती है । इसका मतलब कोई भी राष्ट्र राजनीतिक और वैचारिक निर्मिति होता है । इसकी कल्पना की जरूरत होती है क्योंकि छोटे से छोटे राष्ट्र का व्यक्ति भी अपने अन्य सदस्यों के बारे में नहीं जान सकता । नेविल को यह परिभाषा थोड़ा आदर्शवादी महसूस हुई लेकिन इससे किसी निश्चित भूभाग के भीतर समाजवादी या पूंजीवादी उत्पादन संबंध की ठोस स्थिति के साथ नत्थी सामाजिक यथार्थ के रूप में कल्पित समुदाय को समझा जा सकता है । इसका अर्थ है कि राष्ट्र को भाषाओं की विविधता के बावजूद उत्पादन संबंधों के मुताबिक निर्मित राजनीतिक और वैचारिक प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है । इस तरह किसी राष्ट्र का निर्माण ऐतिहासिक प्रक्रिया बन जाता है ।

दक्षिण अफ़्रीका में नस्ल, वर्ग, जातीयता और राष्ट्र की समस्या से जूझते हुए उन्होंने नस्ली पूंजीवाद की अपनी धारणा विकसित की । इस धारणा की अभिव्यक्ति उन्होंने अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस से अधिक वामपंथी लोगों के एक सम्मेलन में की और कहा कि अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस की मुक्ति उद्घोषणा में समझौते के कारण उदारवाद की झलक बहुत अधिक आ गयी है । वे मानते थे कि नस्लभेदी शासन में इस नस्ली पूंजीवादी व्यवस्था की सामाजिक राजनीतिक अभिव्यक्ति हुई थी इसलिए मुक्ति संघर्ष का काम इस व्यवस्था का अंत है । उस व्यवस्था का विरोध रंगभेद को बरकरार रखने वाले ढांचे और हित का विरोध है । उनका कहना था कि अश्वेत मजदूरों को नस्ली उत्पीड़न और वर्ग उत्पीड़न की दो स्वायत्त व्यवस्थाओं से दबा बताना भूल है । इनको दो समझना विश्लेषण के लिए जितना भी मददगार हो, राजनीति और विचार की दुनिया में वे उन्हें अलगाकर देखना असम्भव है । शासक सत्ता उनकी इस एकता को परदे के पीछे छिपाने के लिए उन्हें दो दिखाती है । इस नस्ली पूंजीवाद को वे तीन ऐसे काम करते बताते हैं जो आपस में मजबूती से जुड़े हुए हैं । ये काम हैं- नस्लभेदी बेदखली, नस्लभेदी शोषण और रोजगार में नस्लभेदी आरक्षण । बेदखली का मतलन गोरे उपनिवेशकों द्वारा जमीन पर कब्जा, अफ़्रीकियों की जबरन बेदखली और 87 प्रतिशत दक्षिण अफ़्रीका में कानूनन जमीन पर उनके कब्जे पर रोक । उनका कहना था कि दक्षिण अफ़्रीका में यह बेदखली लगातार जारी है । दक्षिण अफ़्रीका में नस्ली पूंजीवाद की विशेषता है कि उसके कानून उपनिवेशकों के अवैध कब्जों को मान्यता प्रदान करते हैं और विस्थापन तथा बेदखली को जारी रखते हैं । उनके अनुसार यह नस्ली पूंजीवाद औपनिवेशिक नस्लभेदी शासन में भौतिक जीवन का आधार तो था ही, सामाजिक चेतना के रूपों में भी इस कदर समा गया था कि मुक्ति आंदोलन की सांगठनिक रणनीति में भी खुद को अक्सर अभिव्यक्त करता था । इसका असर वे आर्थिकी के साथ ही समाज भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक, नैतिक, शैक्षिक और लैंगिक क्षेत्रों तक में देखते हैं ।

शिक्षा संबंधी उनके लेखन में स्कूल की चिंता बहुत अधिक व्यक्त हुई है । शिक्षा संबंधी चर्चा की शुरुआत आम तौर पर वे देश की स्थिति पर चर्चा के साथ करते हैं । असल में शिक्षा संबंधी उनकी धारणाओं को उनकी आम सैद्धांतिक और व्यावहारिक मान्यताओं से अलग करना लगभग असम्भव है । इसके साथ ही वे शिक्षा और संस्कृति के सवालों को भी जोड़ते हैं ताकि ये सभी मिलकर राष्ट्र निर्माण के उनके व्यापक सरोकार को मजबूती प्रदान कर सकें । इसमें अचरज की कोई बात नहीं क्योंकि मुक्ति संग्राम को वे सीधे आगामी समाज के सपने के साथ जुड़ा देखते थे । राष्ट्र निर्माण और सामाजिक बदलाव में शिक्षा की भूमिका को वे महत्वपूर्ण मानते थे । दक्षिण अफ़्रीका की समाज व्यवस्था से उसकी शिक्षा प्रणाली गहराई से जुड़ी थी । नब्बे के दशक में दक्षिण अफ़्रीका का शासक वर्ग भी विश्व पूंजीवादी संकट के कारण संकटग्रस्त था । उस समय दक्षिण अफ़्रीका में निवेश करने के विरोध में अभियान चल रहा था जिसके कारण आर्थिक कष्ट बढ़ गया था । मुनाफ़े में गिरावट आ रही थी, बेरोजगारी बढ़ रही थी, मुद्रास्फीति में बढ़ोत्तरी का असर आमदनी पर सीधे सीधे पड़ रहा था । व्यवस्था के लिए काम देना मुश्किल हो गया था, जीवन चलाने लायक पगार नहीं मिल रही थी, रहने लायक घर उनकी पहुंच से बाहर हो गये थे और सरकार उनके बच्चों को सोलह साल की उम्र तक मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा देने से इनकार कर रही थी ।

यह संकट शासक वर्ग के राजनीतिक संकट में बदल गया । मजदूरों की हड़तालों और विद्यार्थियों के विद्रोह ने रंगभेदी शासन की चूलें हिला दी थीं । ऐसी स्थिति में अश्वेत मध्यवर्ग को शासन के आधार के भीतर लाने की कोशिश की गयी । शासन में रंगभेद इतने गहरे बैठा था कि अश्वेत समुदाय के बहुत छोटे हिस्से को समाहित करने का यह राजनीतिक सुधार भी एकदम विफल हो गया । दूसरी ओर देहातों और शहरों में मजदूर वर्ग इस शासन को उखाड़ फेंकने की निर्णायक लड़ाई में उतर गया और उसने सुधारों तथा समावेशन की इस कोशिश को पूरी तरह खारिज कर दिया । शिक्षा की समूची व्यवस्था इसी माहौल से प्रभावित हो रही थी क्योंकि अधिकतर स्कूल शहरों में मजदूरों के इलाकों और देहातों में अवस्थित थे और उन जगहों पर यह टकराव सबसे तीखा था । राजनीतिक और आर्थिक संकट स्कूल के साथ ही जीवन के अन्य पहलुओं को भी प्रभावित कर रहा था । इन हालात के बावजूद रंगभेदी शासन की नौकरशाही और उसकी नीतियों में कोई बदलाव नहीं नजर आ रहा था । शिक्षा पर व्यय, अध्यापक और विद्यार्थी का अनुपात तथा शुल्क में कोई बदलाव नहीं आ रहा था । किताब और ड्रेस पर भी सरकारी व्यय जस का तस ठहरा हुआ था । मतलब कि रंगभेद की भौतिक और वैचारिक स्थितियों को पूर्ववत कायम रखा गया था । पाठ्यक्रम में बदलाव और कौशल निर्माण जैसे कदम भी अपर्याप्त साबित हुए ।

शिक्षा के सवाल को नेविल ने एक और संदर्भ में देखा है । देहाती और शहरी इलाकों में मुक्ति आंदोलन के जोर पकड़ने के साथ संघर्ष को आगे ले जाने वाले कार्यकर्ताओं की नयी पौध सामने आयी । उत्पीड़ितों के जीवन में मौजूद समस्याएं भी उनके साथ चली आयीं । विद्यार्थियों, उनके माता-पिता और अध्यापकों के संघर्ष के मुद्दे अलग अलग थे लेकिन नेविल का कहना है कि मुक्ति आंदोलन को उनके इस अलगाव को दूर करने के तरीके खोजने होंगे ताकि उनकी ऊर्जा को एक दिशा में लगाया जा सके । विद्यार्थियों में मुक्ति संघर्ष का अगुआ होने की रोमांटिक धारणा भी मौजूद थी जो इस लड़ाई में मजदूर वर्ग का नेतृत्व स्थापित होने में रोड़े अटका रही थी । नेविल का मानना था कि लड़ाई चाहे स्त्री, युवा, चर्च या विद्यार्थी की हो अगर उसे सुधारवादी विचलन से बचाना है तो उसे संगठित मजदूर वर्ग के आंदोलन से जोड़ना होगा ।   

शिक्षा व्यवस्था के भीतर लोकतांत्रिक गोलबंदी के बहुतेरे अवसरों का वे संकेत करते हैं और स्कूल के संकट से उभरती वैकल्पिक शिक्षा की सम्भावना देखते हैं । इसके लिए वे तमाम स्तरों पर अनेकानेक तरह की पहलों का उल्लेख करते हैं । शिक्षा के प्रति उनका यह रुख समाज के व्यापक समाजार्थिक, राजनीतिक, सांगठनिक और सांस्कृतिक सवालों से अलगाया नहीं जा सकता । 2008 में उन्होंने शिक्षा के सवाल पर जन हस्तक्षेप हेतु एक संगठन बनाया जिसने घोषित किया कि शिक्षा प्रणाली की विफलता ने विभिन्न समुदायों, शिक्षकों, स्कूल प्रबंधकों और सरकारी अधिकारियों में संशयवाद को जन्म दिया है । खतरा यह था कि इससे शक्तिहीनता की भावना का जन्म होता और समाज के लिए किसी सार्थक नतीजे की सम्भावना की उम्मीद मर जाती । नेविल ने इस संकट को मानते हुए भी इस प्रवृत्ति को उलट देने के उपायों पर बल दिया । उनका कहना था कि शिक्षा संबंधी अधिकांश नीतियों और धारणाओं का जन्म 1993 से 1998 के दौरान रंगभेदी निजाम के अंत और नयी सत्ता में संक्रमण के दौरान हुआ था । इसी वजह से शिक्षा की कुछ वरीयताओं को गलत जगह रख दिया गया । इनको दुरुस्त करने की कोशिशें भी विफल रहीं और सुधारों के वांछित नतीजे नहीं निकले । असल में स्कूलों की भौगोलिक स्थिति के कारण नस्ली और वर्गीय विभाजन गहराये और संसाधनों का असमान बंटवारा हुआ । अध्यापकों का प्रशिक्षण भी ठीक से न हो सका और स्कूलों में भाषा की नीति में गड़बड़ी बनी रही । वे शिशु विकास, सामुदायिक स्कूलों में बहुभाषिकता, ज्ञान के लिए इसके महत्व, विभाजनों को दूर करके राष्ट्र के निर्माण और देश में असमान शक्ति संबंधों की समस्या को हल करने के लिए सभी अफ़्रीकी भाषाओं को प्रोत्साहन देने की जोरदार वकालत करते रहे ।

नेविल के लिए भाषा का सवाल राजनीति और विश्लेषण के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण था । वे शिक्षा, संस्कृति और चेतना से इसका अभिन्न संबंध समझते थे । राष्ट्र के बारे में उनके विचार संस्कृति संबंधी उनके चिंतन से जुड़े हैं । इसी तरह शिक्षा भी समाज से अभिन्न है और यह सब कुछ ज्ञान की प्राप्ति से जुड़ा है । वैकल्पिक समाज की उनकी तलाश ही उनके सभी प्रयासों को सही संदर्भ देती है । उस नस्ली पूंजीवाद के बर्बर इतिहास से वे बखूबी परिचित थे जिसकी छाया से दक्षिण अफ़्रीका बाहर आया था । नस्ली चेतना के तहत ही यदि पूंजीवादी संचय जारी रहता तो भविष्य भी क्रूरतापूर्ण ही होना था । लेकिन वे अलग तरह का भविष्य गढ़ने को प्रतिबद्ध थे । इस भविष्य को उनकी सोच के मुताबिक समाजवादी होना था । उन्होंने वामपंथ के भीतर पारम्परिक शब्दावली और सूत्रों को जपते रहने का विरोध किया और जीवन तथा समय के अनुरूप युवकों के सपनों के मेल में नयी शब्दावली और सूत्र अपनाने पर जोर दिया । वे शिक्षा के जरिये नये समाज को आकार देने में दिलचस्पी रखते थे । इसी कारण शिक्षा के सवालों पर सोचते समय बहुत ही व्यापक परिदृश्य उनकी नजर के सामने रहता था । अस्मिता के सवाल उनके लिए आखिरकार राष्ट्र निर्माण के साथ जुड़े थे और अस्मिता के निर्माण में शिक्षा की भूमिका थी । इस नयी अस्मिता को रंगभेदी विभाजन की नस्ली समस्या को हल करना था । भाषा को वे शक्ति संबंधों के साथ रखकर देखते थे । उनके मुताबिक इसके जरिये समावेशन और बहिष्करण की प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है ।

इस तरह भाषा और उसका व्यवहार व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रिया का अंग बन जाते हैं । भाषा संबंधी उनकी सोच राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष की उनकी धारणा और सामाजिक विषमता के उन्मूलन की उनकी योजना का ही विस्तार है । उनका मानना था कि सामाजिक विषमता के होते भाषा का सवाल वर्गीय सवाल बन जाता है । इसलिए नेविल कहते थे कि भाषा का सवाल अनिवार्य रूप से उससे जुड़े समाज का सवाल है । इसी वजह से भाषा की परीक्षा करते हुए सत्ता, राजनीति और इतिहास के सवाल भी साथ ही खड़े हो जाते हैं ।

Tuesday, March 25, 2025

सिद्ध–नाथ साहित्य का महत्व

 

 

 

               

                                  

1. सिद्धों एवं नाथों के साहित्य से हिंदी साहित्य का आरंभ माना जाता है। क्या हिंदी की शुरुआत प्रतिवाद से हुई थी?

इस बात को तो आज अधिक बल देकर कहने की जरूरत है कि हिंदी शब्द ही उर्दू का है । शुरू में हिंद की भाषा वही थी जिसे बाद में उर्दू कहा गया । स्वाभाविक रूप से इसका संबंध आधुनिक हिंदी से है लेकिन अगर हम हिंदी साहित्य का समूचा इतिहास देखें तो उसकी विकासधारा साहित्य की भाषा जनता की भाषा के पास आने की है । यह बात केवल भाषा के बारे में ही नहीं लागू होती । आखिरकार भाषा मनुष्य की चेतना की सबसे पहली अभिव्यक्ति है । अर्थ कि साहित्य की भाषा के जनता की भाषा के करीब आने की प्रक्रिया साहित्य की चेतना के भी भीतर जनता के आने की है । आज भी जनता की भाषा में हिंदी और उर्दू को अलग करना सम्भव नहीं । नाथपंथ के गुरु गोरखनाथ तो कविता की उस सामान्य भूमि का निर्माण करते हैं जिस पर बाद में चलकर कबीर खड़े हुए । दुर्भाग्य की बात कि उनके नाम से स्थापित मठ का महंत इस साझेपन की निंदा करता है । गोरखनाथ के साथ योग का गहरा रिश्ता है और बताने की जरूरत नहीं कि गोपीचंद और राजा भरथरी के गीत गाने वाले अधिकांश योगी मुसलमान होते हैं और गेरुआ वस्त्र पहनते हैं फिलहाल उनके इस दोरंगे आचरण पर दोनों ही धर्मों में कट्टरता आने से संकट बढ़ा हुआ है ये योगी गोपीचंद और राजा भरथरी के गीत गाने से पहले गोरखनाथ की वंदना करते हैं कबीर खुद भी लालन पालन से मुसलमान थे । बाद में उनके हिंदूकरण की परियोजना के तहत उनकी माता कल्पित की गयी कबीरपंथ में उनके जन्म की जगह प्राकट्य का जिक्र होता है अली सरदार जाफ़री ने कबीर की कविता का एक संग्रह किया है जिसमें उनका सूफी तत्व प्रधान नजर आता है  एक और बात कि हिंदी की जननी संस्कृत नहीं है यह बात हिंदी शब्दानुशासन के लेखक किशोरीदास बाजपेयी से लेकर राधावल्लभ त्रिपाठी तक मानते हैं । हिंदी के स्वरूप के बारे में इन स्पष्टीकरणों की अधिक जरूरत आज पैदा हो गयी है । जाहिर है हिंदी की शुरुआत देववाणी की प्रतिष्ठा से लड़कर हुई । सिद्ध साहित्य की बात जाने दीजिए तुलसीदास तक को लोकभाषा की प्रतिष्ठा का दंश झेलना पड़ा था । सिद्ध साहित्य के प्रसंग में तो यह जगजानी बात है कि इसकी उत्पत्ति ही अकुलीन है इसलिए प्रतिवाद उसके आदि में है । उसकी रहस्यात्मकता भी इस प्रतिवाद का पता सहज ही देती है । सामाजिक रूप से गोप्य को ही रहस्य बनाकर पेश करने की जरूरत पड़ती है । भाषा स्वयं मनुष्य पर थोपी गयी नियति का प्रतिवाद करने की प्रक्रिया में उपजी है । सिद्धों के साहित्य से जुड़ी परिस्थितियों का विवेचन करते हुए हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही बताया कि हिंदी लोगों के कंठ में थी लेकिन अनुकूल माहौल मिलते ही साहित्य के माध्यम के रूप में आ गयी । जनता के बीच उसकी मौजूदगी का सबूत कालिदास के पुरुरवा के शोकाकुल होने पर उसके मुख से निकले अपभ्रंश दोहे में मिलता है । जनता के बीच लोकप्रिय इसी अपभ्रंश के आसपास की भाषा सिद्धों के कथनों की भाषा बनी । उनकी सामाजिक स्थिति और उनकी आध्यात्मिक मान्यताओं से पता चलता है कि वे बहिष्कृत और हाशिये पर थे । उनके कथनों में स्थापित धार्मिक मान्यताओं का प्रतिरोध उनके नये धार्मिक आचरण में व्यक्त होता है क्योंकि आधुनिक काल से पहले के अधिकांश प्रतिरोध धार्मिक आवरण में व्यक्त होने के लिए मजबूर थे । बुद्ध द्वारा संचालित धर्म ने ही उन सिद्धों को यह रास्ता उपलब्ध कराया । खुद बौद्ध धर्म के उपदेशों के लिए पालि का चुनाव भी उसकी इस वैकल्पिकता को पुष्ट करता है ।               

2. सिद्धों और नाथों की मुख्य स्थापनाओं और उनकी विशिष्टताओं के बारे में कुछ बताएं। उनका परंपराओं के बारे में नया रुख क्या था?

सिद्धों के बारे में हमने बात की । उन्होंने परम्परा का पुनराविष्कार किया । अत्यधिक कर्मकांड के विरोध के लिए उन्होंने बुद्ध के धर्म का सहारा लिया । यह समझना जरूरी है कि जब भी कोई नया उभार किसी पुरानी धारा को अपनाता है तो उसे जस का तस नहीं ग्रहण करता । परम्परा को नवीनता इसी तरह प्राप्त होती है कि नयी जरूरतों के लिहाज से उसे ढाला जाता है । अंबेडकर ने जिस बुद्ध को अपनाया वे नये थे । इसी तरह सिद्धों ने भी बुद्ध के धर्म को अपने समय की जरूरत के हिसाब से रंगा । पवित्रता के अपने भीतर अवस्थित होने पर उनका जोर उसको बाहर खोजने का प्रतिवाद है । बहुधा उनके कथन नास्तिकता की सीमा तक छू आते हैं । गोरखनाथ के प्रसंग में रामविलास शर्मा ने उनकी अखिल भारतीय व्याप्ति पर जोर दिया है । इससे पता चलता है कि तत्कालीन स्थापित धार्मिक आचार व्यवहार के प्रति विक्षोभ इस समूचे महाद्वीप में व्याप्त था । बाह्याचार तत्कालीन ब्राह्मण धर्म का प्राण था इसलिए उसका प्रतिवाद सबसे अधिक हुआ । यह बात सर्वभारतीय थी क्योंकि क्योंकि ब्राह्मण धर्म भी इस भूभाग में सर्वव्याप्त था । जिस दोहे को रैदास के साथ जोड़ा जाता है उसके रचयिता गोरखनाथ अनायास नहीं थे । आज पवित्रता के प्रतीकों में जिस तरह गंगा और गाय को राष्ट्र की तरह का दर्जा दे दिया गया है उसमें रैदास के चमड़ा गीला रखने वाली कठौती के जल को गंगा की तरह पवित्र बता देना उनके साहस का जितना भारी सबूत है उससे भारी सबूत वह उस समय समाज के भीतर मौजूद सामाजिक ताकतों के प्रभाव का है जिनके कारण चमड़े वाली कठौती को गंगा जैसी पवित्रता प्रदान करके गंगा की पवित्रता की धारणा का प्रतिवाद करने वाले इस संत को नुकसान पहुंचाने की हिम्मत नहीं की जा सकी । इतना ही नहीं उनके इस कथन के जिंदा बचे रहने की वजह भी उस प्रतिवाद के फिर फिर जीवित होते रहने से में निहित है । प्रतिवाद का यह नवीकरण केवल विचार के स्तर पर ही नहीं रहा होगा बल्कि कुछ सामाजिक ताकतों और कई संस्थाओं का ऐसा ढांचा रहा होगा जहां ऐसी प्रतिवादी वैकल्पिकता का पोषण और संवर्धन होता रहा होगा । इस मामले में सबसे अधिक अचरज मीरां के बारे में होता है जो न केवल कथनों में विद्रोही थीं बल्कि घुमंतू संतों के साथ रहीं । इससे यह भी अनुमान होता है कि यह वैचारिक विद्रोह जरूर ही किसी ठोस सामाजिक आधार पर खड़ा था अन्यथा तत्कालीन समाज उन्हें जिंदा न रहने देता । इसी कारण यह धारणा भी सत्य से बहुत दूर नहीं प्रतीत होती कि भक्ति आंदोलन बहुत गहरा सामाजिक आंदोलन था अन्यथा रैदास को मीरां के गुरु की मान्यता न मिली होती ।             

3. सिद्धों और नाथों का लोक से कैसा संबंध था? वे इस देश में एक वैकल्पिक समाज का निर्माण किस हद  तक कर सके? वे कहां और क्यों असफल हुए?

मार्क्स के अभिन्न मित्र एंगेल्स ने जोर देकर कहा कि आधुनिक काल से पहले के लगभग सभी विद्रोह धर्म के आवरण में हुए । इसी किस्म का विद्रोह सिद्धों और नाथों के रूप में भी सामने आया था । हमारे देश में बहुत सारे समुदाय हैं जो प्रभुताशाली सामाजिक ढांचे से भिन्न जीवन बिताते हैं । एक ही किस्म के आचरण को राज और समाज की मान्यता देने और स्थापित करने की हताशा भरी कोशिश से ही सिद्ध है कि इनकी मौजूदगी आज भी बनी हुई है । अगर ऐसा न होता कि धन और राजसत्ता का एक ही संप्रदाय को इतना भारी समर्थन होने के बावजूद अन्य पंथ जीवित ही न होते । उनकी मौजूदगी ही सिद्धों मौर नाथों के विद्रोह से बनी धारा के प्रभाव का सबूत है । इस सिलसिले में याद रखना होगा कि हिंदू धर्म के भीतर ही वैष्णव के साथ साथ शैव और शाक्त परम्परा भी रही है । इस समय के उन्माद की संकीर्णता इससे ही सिद्ध है कि केवल वैष्णव और उसमें भी एक शाखा ही एकमात्र मान्य आचरण के बतौर थोपने की कोशिश हो रही है ।          

4. नाथ पंथ का मूल जातिवाद और पाखंड का विरोध था, फिर हिंदी क्षेत्र जातिवाद और कर्मकांड का इतना बड़ा गढ़ कैसे हो गया ?

समाज की किसी भी परिघटना का विकास अन्य घटकों से पूरी तरह स्वतंत्र होकर नहीं हो सकता । चूंकि उसके वाहक मनुष्य होते हैं इसलिए वह परिघटना भी मानव इतिहास के अधीन होती है । धर्मों के मामले में ही देखें तो जो इस्लाम पिता की जायदाद में पुत्री के अधिकार को मान्यता देने वाला एकमात्र धर्म है वही स्त्री मुक्ति पर सबसे अधिक बंदिश लगाने वाला बन गया है या माना जाने लगा है । उसी तरह सिख धर्म भी उदार होने के बावजूद एक दौर में आतंकवाद के चंगुल में फंसा हुआ था । बौद्ध धर्म करुणा के लिए प्रसिद्ध होने के बावजूद म्यांमार में रोहिंग्या के उत्पीड़न का औजार बन गया है । इसाई धर्म भी सहिष्णुता वाला होने के बावजूद गोरों के हाथों दूसरे ही रूप में बदल गया । किसी भी पंथ या संप्रदाय का कोई अपरिवर्तनीय सार नहीं होता । वह ऐतिहासिक बदलावों से प्रभावित होता रहता है ।          

5. सिद्ध और नाथ साहित्य से भक्ति आंदोलन ने कुछ बिंदुओं पर दूरी रखते हुए भी कौन सी प्रेरणा ली?

भक्ति आंदोलन भी उसी विद्रोह का विकास है जो सिद्धों और नाथों के रूप में सामने आया था । स्वयं गोरखनाथ ने भी सिद्धों से सब कुछ नहीं ले लिया । मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ के बीच के टकराव की कथा प्रसिद्ध ही है । इसी तरह विकास होने का अर्थ ही है कि भक्ति ने संग्रह और त्याग का तरीका अपनाया । कोई भी कवि या चिंतक पहले से आते हुए को जस का तस नहीं अपनाता । परम्परा का परिष्कार सबके लिए आवश्यक होता है । यदि परिष्कार न हुआ तो परम्परा सड़ने लगती है । दमघोंटू सामाजिक यथार्थ का विरोध ही वह तत्व है जो इन तीनों को आपस में जोड़ता है ।   

6. आज सिद्ध नाथ साहित्य का क्या महत्व है?

कहने की जरूरत नहीं कि धर्म तक के मामले में जितना प्रत्यक्ष है उतना ही नहीं होता । देख हम केवल उसी को पाते हैं जो स्थापित होता है । स्थापितों के बीच भी वर्चस्व की लड़ाई जारी रहती है । फिलहाल हिंदू धर्म के भीतर भी एक ही प्रकार को सत्ता का साथ मिला हुआ है इसलिए केवल वही नजर आ रहा है लेकिन ध्यान दें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिंदू धर्म से कोई संबंध नहीं है । इसीलिए वह अपने आपको सांस्कृतिक संगठन कहता है लेकिन रामजन्म भूमि आंदोलन और राम मंदिर का निर्माण, प्रधानमंत्री के लोकसभा क्षेत्र होने से बनारस कारीडोर और विश्वनाथ मंदिर तथा इसी क्रम में मथुरा में भी दावेदारी ने अन्य संप्रदायों के समक्ष उसकी हैसियत बहुत बढ़ा दी है । इसने धार्मिक हलकों में गंभीर तनाव को जन्म दिया है । संघ प्रमुख द्वारा लगातार संतों-महंतों से मुलाकात के जरिये वे धार्मिक क्षेत्र में भी अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं । उनकी इन हताशा भरी कोशिशों से ही पता चलता है कि अभी उनके प्ततिद्वंद्वी मौजूद हैं । संसदीय राजनीति की दुनिया में एकाधिकार की स्थापना के बाद अब व्यापार-व्यवसाय तथा धर्म की दुनिया में एकाधिकार पाने की इन कोशिशों के पीछे हिंदू धर्म की विविधता का तथ्य छिप जाता है । इन नवीन स्थितियों में अनेकानेक पंथों और आचारों की मौजूदगी के उद्घाटन से ही सिद्धों-नाथों की धार्मिक पहचान प्रकट हो सकती है । इस पहचान को स्वीकार किये जाने के उपरांत ही उनके साहित्य का महत्व समझा जा सकता है । फिलहाल तो मंदिरों के उन्माद में मूर्ति पूजा के विरोध की आर्यसमाजी धारा की भी बात करना मुश्किल हो गया है । कभी इस देश में ही एक आर्यसमाजी प्रधानमंत्री थे जिन्होंने किसी मूर्ति को माला नहीं  पहनायी । अगर इस उल्लेख से आपको पंडित नेहरू की याद आ रही हो तो बताना जरूरी है कि उनका नाम चरण सिंह था । आज समाज और राजनीति की दुनिया में जैसी कट्टर और उग्र धर्मांधता व्याप्त है वैसे में उस साहित्य का स्मरण साहित्य के अपने धर्म की याद दिलाने के लिए जरूरी है । साहित्यकार को अगर फिर से चारण या बधाई गाने वाला नहीं बनना है तो उसे जनता की बेहतरी के सामाजिक प्रयास का अंग होना चाहिए । बेहतरी की कोशिश का साथ देने का अर्थ है उन चीजों की आलोचना जो बेहतरी की राह में बाधा हैं । इस आलोचना की धारा बहुत पुरानी है और लगातार पुनर्नवा होती रहती है । इससे प्रेरणा लेकर आज भी बहुत कुछ किया जा सकता है ।              

Saturday, March 22, 2025

आधुनिक हिंदी कविता के सौ साल

 

          

                                    

राजपाल प्रकाशन से 2018 में सुरेश सलिल के संपादन में छपी ‘’कविता सदी: आधुनिक हिंदी कविता का प्रतिनिधि संचयन’ एकाधिक कारणों से चर्चा के लायक है । संग्रह इतना समृद्ध है कि इसके सहारे आधुनिक हिंदी काव्य साहित्य का समूचा इतिहास भी समझा जा सकता है । संपादक ने अपनी भूमिका में इसका खाका विस्तार से खींचा है । आधुनिक हिंदी कविता के प्रारम्भ को उन्होंने हिंदी नवजागरण से जोड़ा है और कविता में खड़ी बोली के इस्तेमाल के अभियान को इसका उत्प्रेरक प्रस्तुत किया है । आधुनिकता के आगमन को उन्होंने यूरोप के साथ भारत के सम्पर्क से जोड़ा है । इटली, इंग्लैंड और फ़्रांस में इसके विभिन्न आयामों का विकास हुआ था । भारत के साथ इसका सम्पर्क वैसे तो दक्षिण भारत में सबसे पहले हुआ लेकिन हिंदी में हुए बदलाव को समझने के लिहाज से सभी इसे बंगाल से शुरू हुआ मानते हैं । बिहार-उत्तर प्रदेश से बंगाल से सटे होने के कारण यह असर हिंदी पर भी पड़ा ।

आम तौर पर हिंदी का विद्यार्थी भारतेंदु के बाद सीधे द्विवेदी काल पर आता है लेकिन संपादक ने उसके बाद श्रीधर पाठक, हरिऔध और सनेही को रखा है । याद दिलाने की जरूरत नहीं कि पाठक जी को आचार्य शुक्ल ने हिंदी की स्वाभाविक स्वच्छंद कविता का पुरस्कर्ता माना था । उन्होंने छायावाद को अस्वाभाविक साबित करने के लिए उनका उल्लेख किया था इसलिए उनकी कविता की नवीनता बहुत हद तक छायावाद के सामने लुप्त हो जाती है लेकिन संग्रह में शायद उनके योगदान को ही रेखांकित करने के लिए कालक्रम के लिहाज से उन्हें मैथिली शरण गुप्त से पहले स्थान दिया गया है । हरिऔध की काव्यभाषा को देखकर सहज ही अनुमान लग जाता है कि कविता में खड़ी बोली हिंदी के प्रयोग के मामले में मैथिली शरण गुप्त ने कितनी बड़ी छलांग लगायी थी । सनेही जी की कविता से हमें हिंदी कविता की मूल धारा का अनुमान होने लगता है । यह मूल धारा देश के किसानों की समस्याओं को कविता की दुनिया में ले आना था । भारत की आजादी के आंदोलन और आधुनिक भारतीय साहित्य में किसानों का आगमन अनायास नहीं हुआ । इसके पीछे भारत की कृषि में औपनिवेशिक हस्तक्षेप था । इस हस्तक्षेप ने देश के किसान समुदाय को इस कदर विपन्न बना डाला था कि उस दौरान अकाल से मरने वालों की तादाद किसी भी शासन के लिए लज्जा की बात है ।

कदाचित इसीलिए बाद की कविता का अनुक्रम बनाते हुए भी संपादक ने ऐसे कवियों को प्रमुखता दी है जिनकी कविताओं में देश का हाल मुखर रहा । इसी क्रम को आगे बरकरार रखते हुए उन्होंने राष्ट्रवादी धारा के ऐसे कवियों को स्थान दिया है जिनकी कविता में जोश और उमंग के साथ देश की चिंता भी शामिल थी । संग्रह ने उचित ही प्रगतिशील कविता को हिंदी कविता की इस मुख्य धारा का विकास समझा है । यहां भी मान्य तीन प्रगतिशील कवियों के साथ ही शील और शंकर शैलेंद्र को शामिल करके संपादक ने प्रगतिशील कविता का दायरा बढ़ाया है । इन दोनों के आगमन के कारण ही फ़ैज़, साहिर और कैफ़ी की भी उपस्थिति की जरूरत महसूस होती है । रामविलास शर्मा की आम छवि आलोचना में ही उनकी सक्रियता ही है लेकिन उसके उलट संपादक ने संग्रह में उनको भी कवि के रूप में शामिल किया है ।     

पहले ही हमने उम्मीद जताई कि अगर फ़िल्म से जुड़े होने के बावजूद शंकर शैलेंद्र इस संग्रह में हो सकते हैं तो कुछ अन्य लोकप्रिय गीतकारों की जगह भी बन सकती थी लेकिन दुर्भाग्य से इतना बड़ा संग्रह होने के बावजूद इसमें उर्दू पूरी तरह अनुपस्थित है । वह भी तब जब जिसे हिंदी कहा जाता है उसका अर्थ कभी उर्दू ही हुआ करता था । इससे अधिक प्रातिनिधिक तो आचार्य शुक्ल थे ही जिनकी आलोचना बहुधा इसी विंदु पर की जाती रही है । उर्दू से यह दुराव इस हद तक है कि भारतेंदु की रसा उपनाम से लिखी ग़ज़लो को जगह नहीं  मिल सकी है । त्रिलोचन की कविताओं में भी ग़ालिब पर लिखी उनकी कविता अनुपस्थित है । तर्क दिया जा सकता है कि कविताओं की अधिकता से परहेज किया गया है और बहुत लोकप्रिय रचनाओं को ही शामिल किया गया है । यहीं आकर संपादक का नजरिया स्पष्ट होता है कि वह खास तरह की परम्परा को इस संग्रह के आधार पर पुष्ट और पुनरुत्पादित करना चाहता है । इसके लिए विसंवादी स्वरों का लोप उसे आवश्यक प्रतीत होता है ।

कहने का तात्पर्य यह नहीं कि इस तरह का संग्रह अनावश्यक है । इस समय जब हिंदी साहित्य के नाम पर हिंदीतर भाषाओं के उग्र विरोध की छवि को उभारा जा रहा है तो उसके ऐसे प्रातिनिधिक संग्रह का आना सही ही है जिससे हिंदी कविता की मुख्यधारा जनपक्षधर दिखायी पड़े । हिंदी कविता की छवि साम्राज्यवाद विरोधी स्वाधीनता आंदोलन से उपजी नजर आना भी आज के समय बहुत जरूरी है । उसकी बड़ी वजह स्वाधीनता आंदोलन के बारे में अगंभीर किस्म की बातों का जिम्मेदार व्यक्तियों की ओर से उद्घोष है । हास्यास्पद रूप से स्वाधीनता की तिथि को लेकर भी मनमानी टिप्पणियों की बाढ़ आयी है । कोई उसे 2014 तो कोई 2024 बता रहा है । यहां तक कि वर्तमान समय जिस तरह नक्सलवाद की बात को देशद्रोह समझा जा रहा है उस समय उससे प्रेरित कविताओं को संग्रह में शामिल करना साहस की बात है । इसके लिए संपादक निश्चित रूप से प्रशंसा के हकदार हैं । उन्होंने भूमिका में दर्ज किया ‘1967 में नक्सलबाड़ी से धधकी किसान क्रांति की ज्वाला ने देश को, दुनिया को जिस तरह प्रभावित किया उस पर बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है । लगभग सभी भारतीय भाषाओं का साहित्य उससे प्रभावित हुआ ।’ स्वाभाविक था कि उनमें हिंदी के भी कवि शरीक थे । इनमें जाने पहचाने नामों के साथ वे ज्ञानेंद्रपति की भी शुरुआती कविताओं को शामिल मानते हैं । इतना ही नहीं पहले के धूमिल और कुमार विकल की कविताओं में भी उसकी अनुगूंज सुनते हैं । साथ ही संपादक ने विश्व कविता के अनुवादों की बात करके इस समय की साहित्यिक उठान को वैश्विकता के साथ भी जोड़ दिया ।

संग्रह में कुछ उपेक्षित कवियों को उचित ही जगह प्रदान किया गया है । उदाहरण के लिए मैथिली शरण गुप्त के सामने उनके छोटे भाई सियाराम शरण गुप्त को बहुतेरे लोग भूल जाते हैं लेकिन सुरेश सलिल ने उनकी कविताओं को भी यथोचित जगह दी है । नब्बे के बाद की हिंदी कविता में दलित और स्त्री स्वर बेहद मजबूती के साथ उभरा । संपादक ने इन हस्ताक्षरों को जगह देने के साथ ही स्त्री स्वर के मामले में पहले की लेखिकाओं को भी पर्याप्त जगह दी है । महादेवी को तो सभी लोग जानते हैं लेकिन सुरेश सलिल ने सुमित्रा कुमारी सिन्हा, विद्यावती, तारा पांडे, कीर्ति चौधरी और स्नेहमयी चौधरी को जगह देकर परम्परा की निरंतरता को सही तरीके से पहचनवाया है ।                 

इस संग्रह पर बात करते हुए आधुनिक हिंदी कविता की एक और समस्या को पहचाना जा सकता है । यह समस्या कविता में प्रकृति की उपस्थिति का कम होते जाना है । छायावाद तक तो फिर भी उसकी स्वतंत्र छटा मिलती है लेकिन उसके बाद से लगातार उसका वर्ण्य विषय के रूप में क्षरण होता गया । इसके कुछ अपवाद भी रहे जिनकी मौजूदगी इस संग्रह में भी है लेकिन हैं वे अपवाद ही । इस विंदु पर भी आचार्य शुक्ल को गहराई से याद किया जाना चाहिए । वे कविता को परिभाषित करते हुए शेष सृष्टि के साथ रागात्मक संबंधों की रक्षा का सवाल उठाते हैं । उनकी शेष सृष्टि में प्रकृति के साथ ही मानवेतर प्राणी भी आते हैं । अकारण नहीं कि मानव समाज और उसकी समस्याओं की सर्वाश्लेषी उपस्थिति ने मानवेतर प्राणियों को भी कविता से बाहर कर दिया । 

किसी भी संग्रह से अपेक्षा बहुत हो सकती है और कोई भी चयनित संग्रह सभी अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकता । फिर भी इसे आधुनिक हिंदी कविता का पर्याप्त भरा पूरा संचय कहा जा सकता है । हिंदी कविता के उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों के साथ ही इसकी उपयोगिता हिंदी के आम पाठक के लिए भी कुछ कम नहीं है । एक समय था जब हिंदी क्षेत्र के मध्य वर्ग को हिंदी साहित्य में रुचि हुआ करती थी । नब्बे दशक की समृद्धि ने उसे सांस्कृतिक दरिद्रता से भर दिया और अब तो उसकी चेतना पर इतना गाढ़ा सांप्रदायिक खोल चढ़ गया है कि उससे हिंदी कविता की इस विरासत पर गर्व करने की आशा व्यर्थ है । इस निराशा के बावजूद उम्मीद पर ही दुनिया कायम है ।              

Friday, March 21, 2025

कामरेड चंदू और आज का समय

 

                 

                                          

कामरेड चंदू के समय जिन राजनीतिक प्रवृत्तियों की शुरुआत हुई थी आज वे अपनी परिणति को प्राप्त हो चुकी हैं । जब पिछली सदी की आखिरी दहाई में सोवियत संघ के विखंडन के साथ उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण वाला नवउदारवाद, भाजपाई उग्र हिंदू सांप्रदायिकता और सामाजिक न्याय की प्रवृत्तियों का आगमन हमारे देश में एक साथ हुआ तो स्वाभाविक रूप से विद्यार्थी राजनीति में भी बहसें तेज हुईं । जेएनयू का परिसर वैसे भी वामपंथ की तीखी आपसी बहसों के लिए मशहूर रहा है । उसके पारम्परिक राजनीतिक माहौल में उपर्युक्त बदलावों की वजह से आइसा और अभाविप का आगमन भी एक ही साथ हुआ । जो पारम्परिक संगठन थे उनको भी इन प्रवृत्तियों के हिसाब से ढलना पड़ा । उदाहरण के लिए फ़्री थिंकर्स नाम का एक संगठन था जो धीरे धीरे आरक्षण विरोध और हिंदू सांप्रदायिकता का पोषक बनता गया । जिनका जिक्र अभी हुआ उन दोनों नये संगठनों का उभार और प्रवेश परिसर से बाहर की सामाजिक हलचल का नतीजा था । उसके बाद से तीस से अधिक साल गुजर चुके हैं । इन सालों में इन तीनों ही प्रक्रियाओं का स्वरूप बदला और इनके आपसी रिश्ते भी एक दूसरे को गहरे प्रभावित करते रहे । इन्हीं सामाजिक राजनीतिक बदलावों का असर विद्यार्थी राजनीति में सक्रिय दोनों संगठनों पर भी पड़ा ।  

हिंदू सांप्रदायिकता का पोषण करने वालों ने शुरू में वैश्वीकरण के विरोध में स्वदेशी का राग अलापा लेकिन जल्दी ही अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के साथ उसके रिश्ते साफ होते गये । उनका सोच और काम किसी आम सांप्रदायिक संगठन का नहीं था बल्कि उसमें फ़ासीवादी प्रवृत्ति की गहरी मौजूदगी थी । इस बात को कहने में पारम्परिक वाम के प्रमुख संगठन एस एफ़ आई को हिचक होती थी और इसके कारण वे साहस के साथ पहल करने में बाधा महसूस करते थे । जब उनके ही साथ सहानुभूति रखने वाले संगठन सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट) ने अयोध्या में ‘हम सब अयुध्या’ नाम से प्रदर्शनी लगायी तो उसके एक चित्र पर मचे कोहराम की वजह से संसद ने सर्वसम्मति से उसकी निंदा की । उस संसद में प्रधानमंत्री के पद पर विश्वनाथ प्रताप सिंह थे और सरकार को भाजपा के साथ ही वाम का भी समर्थन हासिल था । जाहिर है उग्र हिंदू सांप्रदायिकता के विरोध में खड़ी ताकतों को इस तरह के विचलनों से निराशा होती थी । आइसा ने इसके बरक्स सांप्रदायिक फ़ासीवाद के मुकाबले के लिए साहस के साथ पहल की इसलिए एस एफ़ आइ का भी एक हिस्सा टूटकर आइसा के साथ आ मिला । इस राजनीतिक प्रवृत्ति की पहचान और उसके विरोध के सवाल पर वामपंथ की इन दोनों धाराओं के बीच मतभेद अब भी जारी है । अभी माकपा ने वर्तमान शासन को फ़ासीवादी कहने से परहेज बरता हुआ है ।         

सांप्रदायिक फ़ासीवाद से लड़ने के मामले में एस एफ़ आई ने माकपा की सीमा ही अपना रखी थी । वह सीमा सरकार के भरोसे उसका मुकाबला करने की थी । सरकार की सीमा के प्रसंग में हमने ऊपर संकेत किया कि उसे भाजपा के भी समर्थन की जरूरत होती थी । इस दबाव में बहुधा माकपा और उसी तरह एस एफ़ आई भी धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में मजबूत लड़ाई लड़ने वालों की उम्मीद से धोखा कर जाते थे । इसके मुकाबले माले ने संघर्ष की ताकतों को साथ लेने पर बल दिया । खासकर जब भाजपा ने अयोध्या को झांकी कहकर काशी और मथुरा का भी अपना मकसद जाहिर किया तो बनारस में विनोद मिश्र द्वारा इस सवाल पर जनप्रदर्शन और उनकी गिरफ़्तारी के बाद आइसा द्वारा प्रदर्शन और उसमें कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी ने आइसा की छवि को धर्मनिरपेक्षता के लिए समझौताविहीन संघर्ष करने वाले संगठन के रूप में स्थापित कर दिया । केंद्र सरकार के अलावे बिहार की सरकार भी माकपा की उम्मीद का मजबूत सहारा थी । खासकर आडवाणी की रथयात्रा के रोके जाने के बाद लालू सरकार पर उदारवादी बौद्धिक लट्टू थे । इस सरकार के साथ लेकिन एक और तथ्य यह था कि रणवीर सेना द्वारा बिहार में दलित संहार की घटनाएं भी सबसे अधिक इसी सरकार के काल में घटित हो रही थीं । रणवीर सेना ने सवर्ण सामंती दबदबे को कायम रखने के अपने मकसद के पक्ष में भाजपाई उभार को भी इस्तेमाल किया । इस तरह आइसा के लिए हिंदू सांप्रदायिकता से लड़ने का काम समग्र सामंतवाद विरोध की लड़ाई का अंग हो गया था । रणवीर सेना समाज की पुरानी व्यवस्था को कायम रखने के लिए ही दलित संहार का अभियान चलाये हुए थी । इस तरह जातिवाद के विरोध से भी सांप्रदायिकता का विरोध मिल गया । इस विशेषता ने आइसा के सांप्रदायिकता विरोध को तत्कालीन सामाजिक उथल पुथल में दमित समुदायों की राजनीतिक दावेदारी की आकांक्षा के साथ जोड़ दिया । इसका ही स्वाभाविक प्रतिफलन अंबेडकर के संवैधानिक मूल्यों को धर्मनिरपेक्षता के समर्थन में खड़ा करने के बतौर सामने आया । जातिप्रथा का उनका विरोध हिंदू राष्ट्र को घोर विपत्ति मानने से जुड़ गया ।   

इस सवाल पर आइसा की वैचारिकता का एक और पहलू भी प्रासंगिक बना हुआ है । उसने उदार हिंदू की ओर से लड़ने के मुकाबले धर्मनिरपेक्षता का पक्ष लिया । नागभूषण पटनायक ने इसे एक रैली में राज्य की नीति को ‘सर्व धर्म वर्जयेत’ कहकर परिभाषित किया था । हिंदू सांप्रदायिकता और मुस्लिम सांप्रदायिकता को एक ही सुर में समान समझकर खारिज करने की मांग अक्सर वामपंथियों से की जाती थी । आइसा ने हमेशा यह कहा कि भारतीय समाज में सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार स्वाभाविक रूप से बहुसंख्यक धर्म की पक्षधरता में बदल जाता है । सांप्रदायिक फ़ासीवाद का खतरा भी बहुसंख्यक सांप्रदायिकता से पैदा होता है । इसलिए सांप्रदायिकता से लड़ाई देश में धर्मनिरपेक्ष राज्य के निर्माण से अभिन्न तौर पर जुड़ी है ।

नवउदारवादी आर्थिकी के सवाल पर सर्वानुमति पर भी आइसा ने सवाल उठाये और माना कि मानवीय चेहरे वाले पूंजीवाद के निर्माण की बात हवाई सपना है । आर्थिक सुधारों को लागू करने के क्रम में उठने वाले जनता के विक्षोभों के दमन हेतु इसने दुनिया भर में तानाशाही की स्थापना को प्रेरित किया है । कोई कारण नहीं कि भारत में इसका चरित्र अपवाद के बतौर मानवीय बना रहे । जमीन पर इस आर्थिकी के हमले का सबसे बड़ा शिकार छतीसगढ़ के ट्रेड यूनियन नेता शंकर गुहा नियोगी थे । उसके बाद तो किसी भ्रम की गुंजाइश ही नहीं थी । अब तो सबके सामने हमारे देश के फ़ासीवाद का कारपोरेट चेहरा नंगा हो चुका है । आइसा की इस समग्र समझ ने उसे व्यापक लोकतांत्रिक गोलबंदियों के साथ सहकार विकसित करने का मौका दिया । यह इसकी एक और विशेषता थी जिसका सबसे चरम रूप कामरेड चंद्रशेखर द्वारा सीवान जाकर कृषि संघर्ष के साथ एकजुट होने का फैसला था । आइसा ने विद्यार्थी आंदोलन को कभी परिसर के भीतर सीमित रखने के बारे में सोचा भी नहीं । न केवल वह खुद बाहरी सामाजिक हलचल का प्रतिबिम्ब था बल्कि विद्यार्थी आंदोलन को हमेशा उसने व्यापक लोकतांत्रिक आंदोलन के अभिन्न अंग के बतौर देखा । इसी कारण दलितों के संहार, मजदूर आंदोलन के दमन से लेकर इराक पर अमेरिकी हमले की मुखालफ़त तक के साथ खुद को जोड़े रखा । स्त्री आंदोलन और पर्यावरण के प्रश्न से भी उसने रचनात्मक संवाद विकसित किया ।                  

वर्तमान शासन की वैचारिकता का वाहक संगठन अभाविप लगभग सभी परिसरों में प्रशासन का पक्ष लेता है । उसका बुनियादी ध्येय अधिकार की जगह कर्तव्य पर जोर देना है । उसके अध्यक्ष आम तौर पर अध्यापक होते हैं । सभी शिक्षा परिसरों में प्रशासन के सहारे वह अपना एजेंडा लागू करवा रहा है । विद्यार्थी राजनीति की यह विचित्र परिघटना है जब कोई विद्यार्थी संगठन प्रशासन के पक्ष की वकालत करे । उसके साथ भाजपा की अकूत धनशक्ति, समाज के चरम प्रतिक्रियावादी तत्व और राजसत्ता का खुला संरक्षण है । इस नयी स्थिति ने शिक्षा के मोर्चे पर संघर्ष को बहुआयामी वैचारिकता प्रदान की है । अब उसके साथ शिक्षा के सामाजिक दायित्व को फिर से जगाने का दायित्व भी जुड़ गया है । विद्यार्थी आंदोलन को अब कुछ सुविधाओं को हासिल करने तक सीमित नहीं रखा जा सकता । शिक्षा में निहित आलोचनात्मकता ही उसे सामाजिक लोकतंत्र का सहायक बनाती है । इस कठिन समय में शिक्षा को उसकी इस बुनियादी भूमिका में ले आने के कर्तव्य से पीछा छुड़ाकर कोई भी सार्थक विद्यार्थी आंदोलन खड़ा नहीं किया जा सकता । चंद्रशेखर और आइसा की विरासत का विकास इसी दिशा में वांछित है । इसी रास्ते पर चलकर शिक्षण संस्थान राष्ट्र निर्माण में अपेक्षित योगदान कर सकते हैं । उनका एकमात्र कर्तव्य युवा बौद्धिक को यथास्थिति में बदलाव हेतु मदद करने लायक बनाना है, अन्यथा वे अपनी भूमिका से चूक जाएंगे । विद्यार्थी आंदोलन शिक्षा केंद्रों को उनकी इस भूमिका में उतरने की प्रेरणा देकर ही अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा सकेगा ।                   

Saturday, March 8, 2025

फ़्रायड और आलोचना सिद्धांत

 

                              

                                                                   

2025 में ब्रिल से डस्टिन जे बिर्ड और सैयद जवाद मिरी के संपादन में ‘सिगमंड फ़्रायड ऐज ए क्रिटिकल सोशल थियरिस्ट: साइकोएनालीसिस ऐंड द न्यूराटिक इन कनटेम्पोरेरी सोसाइटी’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब के छह हिस्सों में उन्नीस लेख हैं । पहले में फ़्रायड के पुनर्जागरण के बारे में, दूसरे में फ़्रायड और फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के बारे में, तीसरे में फ़्रायड और धर्म, चौथे में फ़्रायड और राजनीतिक क्षेत्र, पांचवें में फ़्रायड, नैतिकता और मृत्यु तथा आखिरी हिस्से में फ़्रायड, नव फ़्रायडवादी और फ़्रायडेतर आदि के बारे में लेख संकलित हैं । संपादकों के अनुसार 2020 के दशक में फ़्रायड और मनोविश्लेषण में फिर से रुचि पैदा हुई है । वैसे तो फ़्रायड के बारे में शिक्षा जगत और मनोविज्ञान की व्यापक दुनिया में हमेशा ही किताबें छपती रही हैं फिर भी इसमें उतार चढ़ाव भी आता रहा है । उन्हें गम्भीर वैज्ञानिक, समाजशास्त्री या दार्शनिक की जगह कितना भी रहस्यवादी कहा जाय उन पर बात हमेशा होती रही । जब भी संसार में अराजकता बढ़ी, सामाजिक अस्थिरता की वजह से दुश्चिंता पैदा हुई, अलगाव महसूस हुआ या जीवन से मोहभंग हुआ उनकी वापसी हुई । जो संसार अक्सर व्यर्थ महसूस होता है उसमें अर्थ की खोज ही फ़्रायडीय प्रयास साबित होता है । उन्हें अनिश्चितता के युग का गहन सिद्धांतकार माना जाता है । उनका जीवन और सिद्धांत यूरोप के मुश्किल भरे जीवन से आक्रांत रहा ।

लम्बे समय तक वे उन्माद की चिकित्सा के लिए सम्मोहन का इस्तेमाल करने वाले एक फ़्रांसिसी स्नायु चिकित्सक के प्रभाव में थे । उन्हें लगा कि व्यक्ति का व्यवहार उसके अचेतन से निर्धारित होता है । बहुत हद तक अचेतन की इस अज्ञेय परिघटना को मनोविश्लेषण के आधार पर ही समझा जा सकता है । इसके जरिये मनुष्य के मन की आंतरिक गतिविधियों तक भी खूब आसानी से पहुंचा जा सकता है । इसकी जानकारी फ़्रायड से पहले उस हद तक नहीं थी । इसके बाद अपराधों की अचेतन प्रेरणाओं का भी पता लगाना सम्भव लगने लगा । सिनेमा में भी फ़्रायड की पद्धतियों का उपयोग करते हुए ढेर सारी कहानियों का निर्माण किया गया । एक समय उन्हें फ़िल्मों के सलाहकार का काम भी सौंपने की कोशिश हुई थी जिससे उन्होंने इनकार कर दिया था । अन्य मनोविश्लेषकों से भी उन्होंने इस तरह का काम न करने की गुजारिश की थी । इसके पीछे अमेरिकी व्यापारिकता से उनकी चिढ़ थी । उन्हें लगा कि इससे मनोविश्लेषण में तो हलकापन आयेगा ही उसे मनोरंजन की सामग्री बना दिया जायेगा । इसके बावजूद फ़िल्म उद्योग ने मनोविश्लेषण का इस्तेमाल भारी पैमाने पर किया । ऐसा लगता है कि आधुनिक जीवन की किसी अनसुलझी गुत्थी का समाधान मनोविश्लेषण में मिलने की उम्मीद बनी रहती है ।

दार्शनिकों ने भी फ़्रायड में रुचि ली है । ऐसा फ़्रैंकफ़र्त स्कूल और ज़िज़ैक के बाद विशेष तौर पर हुआ है । अनेक सामाजिक व्याधियों की चिकित्सा और लोकतंत्र को समाप्त कर देने पर आमादा पापुलिज्म के उभार को समझने के लिए मनोविश्लेषण की मदद ली जा रही है । वर्तमान नवउदारवाद के विरोध में दक्षिणपंथी पापुलिज्म के उभार को समझने के लिए समूह की मनोवृत्ति संबंधी फ़्रायडीय चिंतन को देखा परखा जा रहा है । डोनाल्ड ट्रम्प की लोकप्रियता को समझने के लिए भी गोरे अमेरिकी लोगों के सांस्कृतिक अलगाव और उनके राजनीतिक विक्षोभ को समझने की कोशिश की जा रही है । इस पड़ताल के लिए फ़्रायड के साथ ही परवर्ती व्यक्तित्व के मनोविज्ञान, सामाजिक मनोविज्ञान और वक्तृता के विश्लेषण की भी मदद ली जा रही है । फ़्रायड के मनोविश्लेषण के आधार पर ऐसी तमाम जटिल कोटियों और धारणाओं का विकास हो रहा है जिनसे वर्तमान सामाजिक राजनीतिक परिघटनाओं की भी व्याख्या की जा सके । इसी वजह से इस समय मनोचिकित्सक होने की जगह समाजवैज्ञानिक होने के लिए फ़्रायड को अधिक उपयोगी माना जा रहा है । कुछ लोग वर्तमान परिस्थितियों में व्यक्ति और समाज के सुकून और बेहतरी के लिए दर्शन और मनोविश्लेषण के सहमेल की जरूरत भी बताते हैं  क्योंकि वर्तमान समाज मानसिक व्याधियों का जनक हो गया है ।

मनोविश्लेषण के इस प्रयोग के बारे में वाद विवाद भी जारी है । इसके बावजूद क्रांतिकारी राजनीति द्वारा अन्य अनुशासनों की तरह इसे भी उपनिवेशवाद, नस्लभेद, पूंजीवादी शोषण, लिंग विभेद और वर्गयुद्ध की विरासत को समझने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है । हमारे जीवन के मनोसामाजिक आयामों के उद्घाटन हेतु सामाजिक, राजनीतिक और निजी मामलों को हिंसा और टकराव, जेंडर और यौनिकता, नस्लभेद और प्रवासी अनुभव तथा देखरेख और जन कल्याण के प्रसंग में विवेचित किया जा रहा है । वर्तमान सदी में फ़्रायड की वापसी के साथ ही उनका यह सामाजिक अनुप्रयोग जुड़ा हुआ है । हमारे उथल पुथल भरे समय के अनुरूप ही इस कोशिश में भूलें होंगी, धक्के लगेंगे और कुछ अतियों की भी सम्भावना होगी । इसके बावजूद मनोविश्लेषण को क्लिनिक की सुरक्षित दुनिया से बाहर निकालकर सामाजिक क्षेत्र में ले जाने का दबाव समाज की मांगों के चलते कायम रहेगा । इसी क्रम में ऐसे मनोविश्लेषण का भी विकास हुआ जिसमें पराधीन देशों में उपनिवेशित जनता के मनोविज्ञान पर उपनिवेशवाद के विनाशकारी असर को देखने की कोशिश हुई है । पहले भी लोगों ने नस्लवाद के सवाल पर मनोविज्ञान की खामोशी पर एतराज जाहिर किया था । उसी क्रम में पूंजीवाद और उपनिवेशवाद के साथ उसको जोड़ने की कोशिश हो रही है ताकि उसकी सामाजिक प्रासंगिकता साबित हो । इस कोशिश के विरोधी निष्पक्षता और वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठता का तर्क दे रहे हैं ।  

इस तरह मनोविश्लेषण की दुनिया टकराव का क्षेत्र बन गयी है । इसमें एक ओर नस्लवाद, लिंगभेद, वर्ग संघर्ष और उपनिवेशीकरण की पड़ताल में मनोविश्लेषण के उपकरणों के उपयोग की हिमायत करने वाले हैं तो दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जो इस अनुशासन को बौद्धिक घेरेबंदी से आजाद करने और व्यक्तिगत समस्याओं के विश्लेषण के मुकाबले सामाजिक समस्याओं को समझने में उसके उपयोग का कड़ा विरोध करते हैं । वैसे तो फ़्रायड ने भी अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करने का प्रयास किया था इसलिए उनके सामाजिक आयाम की यह धारा उतनी नयी नहीं समझी जानी चाहिए । फ़्रायड की विरासत का विकास उनके समाजीकरण में ही निहित है । मनोविश्लेषण केवल चिकित्सा का साधन नहीं है बल्कि वह ऐसी धारणाओं का भी जन्मदाता है जिनके सहारे सवाल उठाये जा सकते हैं । इसे व्यक्ति की चिकित्सा तक सीमित समझने वाले फ़्रायड को संकुचित घेरे में बांध देते हैं ।

संपादकों का मानना है कि इस समय न केवल फ़्रायड और मनोविश्लेषण में नयी रुचि पैदा हुई है बल्कि उसमें विविधता भी आयी है । उनके सहारे मनोचिकित्सक बनने के साथ ही मानव जीवन को समझने और बेहतर करने में भी उनके इस्तेमाल के हामी लोग सामने आये हैं । इस प्रवृत्ति का विकास वर्तमान सदी के आगामी कुछेक बरसों में दिखाई देगा । सम्भव है कि इससे मनोविश्लेषण की दुनिया ही बुनियादी रूप से बदल जाय । फ़्रायड को पुराना और व्यर्थ कहने की जगह उनकी प्रासंगिकता बहुत हद तक इस विकास पर भी निर्भर होगी । इस समय मनुष्य की हालत के विश्लेषण के लिए फ़्रायड को खारिज करने की जगह उनकी तमाम भूलों और असंगतियों के बावजूद उनकी अंतर्दृष्टि को पैना करने की जरूरत है ।

अतीत के विचारकों के साथ द्वंद्वात्मक बरताव की मांग यही है कि उनके अंतर्विरोधों को सही संदर्भ में समझा जाय । उनके किसी एक पहलू के ही आधार पर उनके समूचे लेखन को खारिज करना सही नहीं होगा । इस तरह का बरताव हेगेल के साथ भी बहुधा करने की कोशिश हुई है । देशकाल की सीमा से कोई भी चिंतक कभी मुक्त नहीं रहा है । हेगेल की तरह ही फ़्रायड की भी सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए उनकी आलोचना का विकास किया जाना चाहिए ।

Saturday, March 1, 2025

विश्वविद्यालय बंद करो आयोग

 

जिस संस्था की स्थापना विश्वविद्यालयों को अनुदान हेतु की गयी थी उसने अपना दायित्व उन्हें खत्म करना तय किया है । धन या अनुदान के लिए एक अन्य संस्था स्थापित की गयी है जिसे आद्यक्षरों के आधार पर हेफ़ा (Higher Education Funding Agency) कहा जा रहा है । शिक्षा के महंगा होने की वजह से शिक्षार्थी को कर्ज देने का चलन तो था ही, अब शिक्षण संस्थाएं भी कर्जखोर होंगी । अनुदान का कार्यभार त्याग देने के बाद यू जी सी नामक इस संस्था ने शेष सभी काम आरम्भ कर दिये हैं । इसका सबसे ताजा फ़रमान विश्वविद्यालय नामक संस्था को शिक्षा से मुक्त कर देने के मकसद से जारी किया गया है ।

यह आदेश इस साल के आरम्भ में जारी किया गया और धमकी दी गयी कि इस आदेश को न मानने वाले विश्वविद्यालयों को दंडित किया जा सकता है । इस धमकी के बारे में थोड़ा रुककर सोचने की जरूरत है । हम जानते हैं कि सभी विश्वविद्यालय संसद या विधानसभा में पारित कानूनों के जरिये स्थापित होते हैं । यह प्रक्रिया निजी विश्वविद्यालयों के साथ भी अपनायी जाती है । दंडित करने का अधिकार अपने हाथ में लेकर यूजीसी ने निर्वाचित विधायिका से भी ऊपर की हैसियत हासिल कर ली है । उसने इस तरह के तमाम फ़रमान जारी करके संविधान के एक प्रावधान का उल्लंघन भी किया है । हमारे संविधान में शिक्षा समवर्ती सूची में है । इसका अर्थ है कि यदि प्रांतीय सरकारों ने कोई कानून बनाया है तो केंद्र उसे मटियामेट नहीं कर सकता । शिक्षा को समवर्ती सूची में रखने का एक कारण भाषा भी है जो विभिन्न प्रांतों में अलग अलग है । कहने की जरूरत नहीं कि भाषा के मामले में भी एकरूपीकरण का पागलपन छाया हुआ है। केंद्र सरकार द्वारा संघीय ढांचे के साथ छेड़छाड़ का एक नमूना यह आदेश भी है । हमारे नये निजाम की निर्णय प्रक्रिया का सर्वोत्तम प्रतीक बुलडोजर यूं ही नहीं है । 

इस नये आदेश से इस तथ्य का का भी पता लगता है कि सरकार ने मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा तो किया लेकिन उसकी सोच में भारतीयता से अधिक कारपोरेट का मुनाफ़ा है । ढेर सारे पाठ्यक्रम और उन सबके लिए अतिरिक्त धन की वसूली के पीछे और क्या नजरिया हो सकता है । इस मकसद को किसी परदे में छिपाने की जगह साफ घोषित कर दिया गया है कि कुलपति का पद शिक्षा जगत के व्यक्तियों के मुकाबले अन्य लोगों और खासकर उद्योग जगत के लिए खोला जा रहा है । पुरानी वाली नयी शिक्षा नीति में इस काम के लिए प्रति कुलपति का पद ही बनाया गया था । अचरज नहीं कि उसमें साहित्य शब्द ही कहीं नहीं था । शिक्षा में साहित्य और मानविकी की जगह प्रबंधन आदि की प्रमुखता स्थापित करने में इसका योगदान था । इस बार शिक्षण संस्थान ही पूंजी के शिकार बना दिये गये हैं । इस कार्य को सरकार की देखरेख में संपन्न करने के लिए कुलपति के चयनकर्ताओं में राष्ट्रपति या राज्यपाल को निर्णायक बना दिया गया है । विभिन्न विश्वविद्यालयों की अलग अलग चयन प्रक्रिया को बाधा मानकर सबके लिए समान रूप से इसी प्रक्रिया को अपनाने का सख्त निर्देश दिया गया है । इसे हम वर्तमान शासन के एकरूपीकरण की सनक का पक्का सबूत भी मान सकते हैं ।

फिलहाल यूजीसी नामक संस्था लगातार नये नये आदेश निकालने और उन्हें वापस लेने की आदी हो चली है । हाल हाल तक शोध और अध्यापन की दुनिया में इस संस्था द्वारा निर्धारित पत्रिकाओं में लेखों का प्रकाशन अनिवार्य रखा गया था और इसके इर्द गिर्द अवैध वसूली का गिरोह खड़ा हो गया था । शोधार्थियों को शोधोपाधि पाने के लिए इस सूची में शामिल पत्रिकाओं में शोधालेख छपाने होते थे और अध्यापकों को भी चयन तथा प्रोन्नति हेतु इनकी आवश्यकता होती थी । घूस देकर इस सूची में शामिल इन पत्रिकाओं में जरूरत के लिहाज से छपाने का शुल्क लगता था । अगर शोध के लिए छापने की कीमत एक या दो तथा तीन हजार थी तो प्रोन्नति हेतु छपाने का शुल्क दस हजार तक हुआ करता था । नये आदेश में इस चक्र से आजाद तो कर दिया गया है लेकिन इससे मनमानी की आशंका भी पैदा हो गयी है । इसकी जगह नया झमेला यह खड़ा हुआ है कि मानविकी के अध्यापकों को अध्यापन की प्रयोगशाला विकसित करने, स्टार्टअप व्यवसाय चलाने या धनप्राप्त परियोजनाओं में सलाहकार बनने का कौशल अपनाना होगा क्योंकि इन गुणों को प्रोन्नति हेतु गणनीय बना दिया गया है । इसी तरह विज्ञान या गणित के अध्यापकों को अपने अनुशासनों को भारतीय ज्ञान प्रणाली के साथ जोड़ने की जहमत उठानी होगी ।

अध्यापन की शुरुआत में एकाध प्रोन्नतियों में आंतरिक स्तर की समितियों से काम चल जाता था, अब सभी स्तरों पर साक्षात्कार अनिवार्य कर दिया गया है । साथ ही समयबद्ध अनिवार्य प्रोन्नति का भी प्रावधान समाप्त कर दिया गया है । इससे अध्यापक की प्रोन्नति उसके अधिकार से अधिक नियोक्ता की कृपा बन जाने की आशंका है । प्रोन्नति को सेवासमय की जगह उपलब्धियों के साथ जोड़ देने से येन केन प्रकारेण उपलब्धि हासिल करने की नयी आपाधापी का मार्ग खुलने की सम्भावना बन गयी है । इन उपलब्धियों में वास्तविक कक्षा का अध्यापन कहीं भी दर्ज नहीं है । किसी भी शिक्षण संस्थान की खूबी कक्षा का वास्तविक अध्यापन होता है । इसी प्रक्रिया में अध्यापक और विद्यार्थी का प्रत्यक्ष सम्पर्क होता है । खुद विद्यार्थी भी अन्य विद्यार्थियों के साथ मिलकर ज्ञान के पिपासुओं की नयी पीढ़ी का निर्माण करता है । इसी जगह समाज और पुस्तक का आपस में एक दूसरे से सामना होता है और ज्ञान का समाज सापेक्ष उत्पादन तथा अभिग्रहण होता है । वास्तविक कक्षा अध्यापन से परहेज की आदत शासकों को कोरोना के दौरान लगी थी और उन्हें इसका सबसे बड़ा लाभ विद्यार्थी आंदोलन की अनुपस्थिति महसूस हुआ था । कदाचित इसी उद्देश्य से छात्र संघों के स्वरूप में बदलाव की कोशिश की जा रही है । दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ की ताकत खत्म करने के ही मकसद से उसे अध्यक्ष आदि पदाधिकारियों के प्रत्यक्ष चुनाव वाला होने की जगह विभिन्न कालेजों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के परोक्ष मत से बने संघ के ढांचे वाला बनाने की योजना ली गयी है । इसी तरह जनेवि में प्रशासन चुनाव ही कराने से परहेज करता महसूस हो रहा है जिसके विरुद्ध विद्यार्थी आंदोलनरत हैं । कोरोना के समय से ही कक्षा के अध्यापन की झंझट खत्म करने का कोई न कोई उपाय खोजा जाता रहा है । मूक्स या ज्ञान जैसे इंटरनेट आधारित पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देने या अनिवार्य करने के पीछे यही सोच काम कर रही है ।

कक्षा के अध्यापन के मुकाबले धन जुटाने, प्रयोगशाला बनाने, इंटरनेट आधारित पाठ्यक्रम की सामग्री तैयार करने और सामुदायिक सेवा आदि को प्रोन्नति की अर्हता बना दिया गया है । कहने की जरूरत नहीं कि इन गुणों के साथ अध्यापक की जगह उद्यमी अधिक बना जा सकता है । इन गुणों की परख का वस्तुनिष्ठ पैमाना बनाना न केवल मुश्किल है बल्कि सामुदायिक सेवा के नाम पर वर्तमान समाज की आलोचना के मुकाबले रूढ़ियों को मजबूत करने वाली प्रथाओं और संस्थाओं को ही प्रोत्साहन दिये जाने की आशा की जा सकती है । अध्यापन को उपेक्षित करते हुए न्यूनतम अध्यापन का प्रावधान भी समाप्त कर दिया गया है । यदि प्रत्यक्ष अध्यापन की कोई निश्चित अवधि ही नहीं होगी तो इस मामले में भी नियोक्ता की मनमानी की गुंजाइश पैदा होगी । नतीजा यह होगा कि अध्यापक के पास शोध का अवसर नहीं होगा । उसे अध्यापन की तैयारी का भी मौका नहीं मिलेगा । नीति निर्माताओं की यह सोच अध्यापन के बुनियादी चरित्र की नासमझी से पैदा होती है ।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नये निजाम ने भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के ऊँचे कीर्तिमान स्थापित किये हैं । प्रवेश परीक्षा का दायित्व सीयूईटी नामक जिस संस्था को प्रदान किया गया है उसने सभी सरकारी विश्वविद्यालयों के शिक्षा सत्र की ऐसी तैसी कर दी है । विश्वविद्यालयों में श्रेणीकरण की नियामक संस्था नैक से जुड़े सात लोग उच्च अंक देने के लिए करोड़ों की घूस लेने के आरोप में गिरफ़्तार हैं । यूजीसी के नये अध्यक्ष देश की सर्वोत्तम शिक्षण संस्था, जनेवि को बरबाद करने की योग्यता के आधार पर इस पद पर बिठाये गये । अब उन्होंने समूचे देश के विश्वविद्यालयों को दंडित करने का अभिनव दायित्व ओढ़ लिया है जिसमें उनकी मान्यता रद्द करने से लेकर उनकी उपाधियों को अवैध और अनुपयुक्त बनाना भी शामिल है ।