Monday, May 9, 2016

देशप्रेम, देशभक्ति और राष्ट्रवाद

                
                                          
जिस समय हम इस सवाल पर विचार कर रहे हैं, वह समय भी हमारे विचार की दिशा को बहुत कुछ निर्देशित और नियंत्रित कर रहा है यह समय हमारे देश के लिए अब तक का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण समय है पिछले डेढ़ सौ सालों में भारत के पिछड़े हुए समाज को आगे ले जाने की जितनी भी कोशिशें हुई थीं उन सब पर खतरा मंड़रा रहा है इन कोशिशों को आप समाज और राजनीति में लोकतंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष से जोड़कर देख समझ सकते हैं यह संघर्ष बहुरंगी और बहुआयामी था इसमें कुछ मोर्चों पर थोड़ा दीर्घकालीन सफलता मिली, कुछ मोर्चों पर निहायत अल्पकालीन लेकिन इन्हीं दीर्घावधि या अल्पावधि तक टिकने वाली सफलताओं ने आज के देश और समाज की तस्वीर बनाई है
आम तौर पर हमारे इस धार्मिक समाज में धर्म की जकड़बंदी और प्रभाव से मुक्त राजनीति का जो आदर्श प्रस्तुत करने की कोशिश की गई थी उसे हमारे राजनेताओं ने शुरू ही नहीं होने दिया । हम सभी जानते हैं कि पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से लेकर नरसिंहा राव तक उन कांग्रेसी राजनेताओं की लंबी कतार है जो इस या उस धर्म गुरु के प्रति अपनी भक्ति सार्वजनिक रूप से देश के सांविधानिक पदों पर रहते हुए जाहिर करते रहे हैं जिसे हम धर्मनिरपेक्ष राजनीति कहते हैं उसके अमल की जगह धार्मिक भावनाओं को उभारकर जनता को गोलबंद करना भारत की राजनीति का अनिवार्य अंग रहा है भारतीय राज्य आम तौर बहुसंख्यक हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों का पालन खुलेआम सांस्कृतिक परंपरा के नाम पर करता रहा है असल में हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता कोसर्व धर्म समभावके रूप में व्याख्यायित किया गया जो बहुत आराम से धार्मिक बहुसंख्या की पक्षधरता में बदल जाता है धर्म और राजनीति के इसी घालमेल ने वर्तमान सत्ता संस्कृति के लिए स्वीकार्यता बनाई है यही हाल लोकतंत्र का भी रहा है
आंबेडकर ने संविधान को स्वीकार करते हुएएक मनुष्य- एक वोटऔरएक वोट- एक मूल्यके आधार परएक मनुष्य- एक मूल्यकी भावना को समाज में स्थापित करने की जो चुनौती पेश की थी उसे धनतंत्र से हमेशा खतरा रहा है लोकतंत्र के नाम पर शुद्ध रूप से अगर चुनाव की ही बात करें तो हमारी चुनाव प्रणाली नए राजनीतिक मंचों को चुनाव में उभरने से रोकती है मतदाता सूची नि:शुल्क उपलब्ध कराने से लेकर सरकारी संचार माध्यमों पर प्रचार के लिए समय के आवंटन तक इसके इतने सारे रूप हैं कि उन्हें गिनाने में ही लेख पूरा हो जाएगा इस प्रणाली के कारण स्थापित और मान्यताप्राप्त राजनीतिक दलों के मुकाबले नए उभरे राजनीतिक दल हमेशा घाटे में रहते हैं ठोस उदाहरणों से अलग इसे सैद्धांतिक स्तर पर समझने की कोशिश में एरिक हाब्सबाम ने विस्तार से यह दिखाया और बताया है कि पूंजी के मालिक मजबूरी में ही लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को स्वीकार करते रहे हैं सार्वभौमिक बालिग मताधिकार में सबका मूल्य समान समझने की भावना निहित होती है इसके उलट पूंजीवाद अल्पतंत्र का पक्षधर होता है इसीलिए शुरुआती जोश के बाद दुनिया में हर कहीं उसने सामंती मूल्यों के साथ समझौता किया जनता के मताधिकार को सीमित करने की व्यवस्थित कोशिशों के पीछे आम लोगों को अधिकार संपन्न मानने में हिचक है यह हिचक लोकतांत्रिक भागीदारी पर रोक लगाने के तमाम किस्म के बहानों की शक्ल में सामने आती है औपचारिक शिक्षा को पंचायत में चुने जाने की जरूरी अर्हता बनाना ऐसे ही है जैसे पहले संपत्ति के आधार मताधिकार सीमित कर दिया जाता था असल में देखा गया है कि जब भी पूंजी ने आत्मविश्वास अर्जित किया उसने लोकतंत्र को उखाड़ फेंकने में कोई कोताही नहीं की यही कारण है कि फ़ासीवाद बिना किसी अपवाद के उन्हीं देशों में आया जहां संसदीय लोकतांत्रिक शासन था
मार्क्सवादी विद्वान हमेशा कहते हैं कि लोकतंत्र प्याज की तरह होता है जैसे ही आप उसके उपभोग की कोशिश करेंगे आपकी आंखों से आंसू निकलने शुरू हो जाएंगे लोकतंत्र केवल संसद के चुनाव में नहीं निहित होता वह सभी मामलों में सामान्य नागरिकों को शासन में भागीदार बनाने में निहित होता है इस नाते से उसकी परीक्षा बहुसंख्यक समुदाय की जगह अल्पसंख्यकों को पूरी तरह अधिकार संपन्न नागरिकता का अहसास कराने में उसकी सफलता/असफलता के आधार पर होनी चाहिए भारत में सहज बोध लोकतंत्र को चुनाव होने और चुने हुए प्रतिनिधियों की सर्वोच्चता से जोड़कर देखता है इस स्थिति में पूंजीपति वर्ग संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को वैचारिक रूप से गुलाम बनाकर इस सर्वोच्चता का लाभ लेता है भारत में इस सहमति के निर्माण में देशभक्ति का अकल्पनीय योगदान है आर्थिक नीतियों को राजनीति से स्वतंत्र रखने के नाम पर नव-उदारवादी अर्थतंत्र के लिए सहमति निर्मित की गई पूरी दुनिया में आर्थिक मसले को समाज के नियंत्रण से मुक्त करके उसे कुछेक विशेषज्ञों के बुद्धि के योग्य ठहराने का माहौल बनाया जा रहा है इसी तरह तमाम मामलों को राजनीति से अलग रखने का तर्क देकर उन्हें असल में समाज की निगरानी से मुक्त कर लिया गया है वैसे भी हमारे देश में संसद से कार्यपालिका लगभग स्वतंत्र रही है और उसमें लोकतांत्रिक मूल्य शायद ही कभी विचारणीय रहे हों पुलिस और सेना का लोकतंत्र से कोई लेना देना नहीं इसलिए इन संस्थाओं को लोकतंत्र का स्पर्श तक नहीं मिला है । तमाम मामलों में देखा गया है कि विभिन्न राज्यों में अलग अलग पार्टियों की सरकारें होने के बावजूद तथा पुलिस का मसला संबंधित राज्य के तहत होने के बावजूद समूचे देश की पुलिस समान किस्म का आचरण करती है । सेना भी लगभग एक ऐसी संस्था होने की ओर है जिसके अपने स्वतंत्र न्यस्त स्वार्थ विकसित हो चुके हैं । इसका इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि पूर्व-गृहमंत्री पी चिदंबरम ने स्वीकार किया कि वे तो आफ़्सपा हटाना चाहते थे लेकिन रक्षा मंत्रालय से इसकी मंजूरी मिलनी असंभव थी । सैनिक साजो-सामान की खरीदारी में रिश्वत और दलाली लगभग सर्वमान्य तथ्य बन चुका है फिर भी साल दर साल रक्षा बजट की वृद्धि पर सवाल उठाने से देशभक्ति में संदेह पैदा हो जाता है !      
ऐसी स्थिति में सबसे पहले इसी बात को स्पष्ट कर देना जरूरी है कि देश और उसकी सरकार में अंतर हो सकता है आम तौर पर वे दोनों अलग तो होते हैं लेकिन कभी कभी एक दूसरे के विरोध में भी हो सकते हैं यह स्पष्टीकरण इसलिए भी जरूरी है कि हाल की घटनाओं में राजद्रोह और राष्ट्रद्रोह को समान करार दिया गया इस स्पष्टीकरण की जरूरत इसलिए भी है कि सरकार के भी देशद्रोही होने की संभावना को खारिज कर दिया जाए कभी कभी ऐसा होता है कि किसी देश की सरकार उस देश के हितों के साथ विश्वासघात करती है और ऐसी स्थिति में उस सरकार को उखाड़ फेंकना किसी भी देशप्रेमी का जरूरी कर्तव्य हो जाता है भारत की आजादी से पहले औपनिवेशिक अंग्रेजी शासन के समय ऐसा ही था जब इस देश की सरकार इस देश के मुकाबले इंग्लैंड के धनी लोगों के हितों के लिए काम करती थी इसीलिए उसे अपने विरोधियों को जेल में डालने के लिएराजद्रोहको दंडनीय बनाने वाले कानून की जरूरत पड़ी थी । इस उदाहरण से केवल हम इस संभावना की ओर संकेत कर रहे हैं कि औपनिवेशिक शासन ही नहीं, लोकतंत्र के रास्ते चुनकर आई हुई सरकार भी इस तरह की राष्ट्रविरोधी भूमिका निभा सकती है । इसीलिए किसी भी राष्ट्र की प्रभुसत्ता आखिरी तौर पर शासन या सरकार की बजाए उस देश के निवासियों में निहित होती है । इसी वजह से किसी भी देश के शासन या सरकार का प्राथमिक कर्तव्य देश की जनता के हितों की सेवा करना निश्चित किया गया है ।  
इस प्रसंग में इस बात को भी ध्यान में रखना जरूरी है कि कोई भी देश भूगोल मात्र नहीं होता । भौगोलिक इकाई के रूप में देशों का उदय बहुत ही आधुनिक परिघटना है । वाल्मीकि रामायण में राम ने जिसे जन्मभूमि कहा है वह अयोध्या है, भारत नामक कोई देश नहीं । इसीलिए देहाती इलाकों में अब भी परदेश और देश की धारणा एक छोटी सी स्थानीयता के पार नहीं जाती । भूगोल के रूप में राष्ट्र इतिहास में राजनीतिक उलट फेर से प्रभावित होकर बनते बिगड़ते रहे हैं । सीमाओं के लिहाज से हम जानते हैं कि हाल हाल तक बांगलादेश के कुछेक गांव भारत आए थे और उसी तरह भारत से कुछेक गांव बांगलादेश गए । यूरोप में तो बीसवीं सदी के पूर्वार्ध और उत्तरार्ध में भी मनुष्यों के देश बदलते रहे । भारतीय उपमहाद्वीप में भी यह परिघटना अनजानी नहीं रही है । यदि बांगलादेश के किसी नागरिक की उम्र सत्तर साल से अधिक हो तो उसने बिना जगह बदले तीन देशों की नागरिकता हासिल कर ली होगी । उसका जन्म भारत में हुआ रहा होगा । उसके कुछ ही वर्ष बाद वह पाकिस्तान का नागरिक हो गया होगा । जवानी में वह तीसरे देश, बांगलादेश का नागरिक हो गया होगा । इससे सिद्ध है कि समुद्र या पहाड़ जैसे भौगोलिक विभाजकों के अतिरिक्त राजनीतिक कारणों से भी देशों का टूटना बनना होता रहा है । स्काटलैंड को अलग करने या न करने के सवाल पर कुछ ही समय पहले जनमत संग्रह हुआ है । भारत की स्वाधीनता के लिए लड़ने वाले सभी नेताओं के सोच विचार में आयरलैंड की स्वाधीनता का सवाल प्रमुख रूप से शामिल रहा है । उस समय का देश प्रेम किसी अन्य देश के प्रति नफरत के जरिए नहीं परिभाषित होता था । इसकी बजाए किसी देश की मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाले नेता अन्य देशों की आजादी के लिए चलने वाले आंदोलनों के साथ सहानुभूति की वकालत करते थे और स्वाधीनता के लिए लड़ना किसी भी देश का अधिकार समझते थे । इसी के साथ एक दूसरी चौंकाने वाली बात यह थी कि वे राष्ट्रवाद को अच्छी बात नहीं समझते थे । रवींद्रनाथ ठाकुर और प्रेमचंद ने खुलेआम राष्ट्रवाद की आलोचना की है । इसका अर्थ है कि वे देश प्रेम से अलग ऐसी भावना के नुकसान समझते थे जिसमें अपने देश के प्रति किसी के लगाव के लिए किसी अन्य देश से नफरत करना जरूरी समझा जाता था । इस देश प्रेम का अस्तित्व जिस समाज में था उस समाज की मानसिकता ने देश प्रेम को देशभक्ति में परिवर्तित किया । भक्ति के लिए समर्पण की भावना जरूरी होती है ।
हमारे देश के इतिहास के प्रसंग में यह सवाल बार बार उठता रहा है कि भारत की एकता किसके चलते हासिल हुई । औपनिवेशिक चेतना से अनुप्राणित लोग इसे अंग्रेजी शासन का नतीजा मानते रहे हैं । उपनिवेशवाद विरोधी चिंतकों ने इसे स्वाधीनता संग्राम का परिणाम साबित किया है । उदाहरण के लिएहिंद स्वराजमें गांधी ने कांग्रेस को इसका कारण बताते हुए लिखा कि अलग अलग स्थान के लोगों को एक स्थान पर एकत्र करके कांग्रेस ने भारत मेंएक राष्ट्रकी भावना पैदा की । अलग अलग स्थानों पर अपने अधिवेशन के जरिए भी उसने आबादी के एक (छोटे ही सही) हिस्से में एकसूत्रता को जन्म दिया । हमारे देश में राजनीतिक एकता स्थापित करने के लिए प्रचुर कल्पना शक्ति का प्रयोग किया गया । याद दिलाने की जरूरत नहीं कि जिन सामंती रजवाड़ों का शासन देश के विभिन्न हिस्सों में था वे, काश्मीर के महाराजा से लेकर हैदराबाद के निजाम तक, भारत से अलग और स्वतंत्र रहना चाहते थे । स्वाधीनता संग्राम में रियासतों की जनता का ब्रिटिश भारत की जनता के साथ संघर्ष की जो एकता स्थापित हुई उसी में रियासतों के विलय को देखना उचित होगा । शेख अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ़रेन्स के बिना काश्मीर की भारत के साथ जुड़ने की आकांक्षा की व्याख्या संभव नहीं है । इसी तरह हैदराबाद के निजाम के विरुद्ध जारी तेलंगाना संघर्ष की पृष्ठभूमि को देश के उस हिस्से के भारत में रहने की परिघटना से गायब नहीं किया जा सकता । भारत की एकता के निर्माण की इस समूची प्रक्रिया से एक ही बात सिद्ध होती है कि भारत में देशप्रेम का ठोस आधार साम्राज्यवाद का विरोध है । इस बात पर जोर देना इसलिए भी जरूरी है कि आज जो सत्ता देशभक्ति का राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है उसके भीतर साम्राज्यवाद विरोध की बात तो जाने दीजिए साम्राज्यवाद के हितों के लिए देश को नीलाम कर देने की इच्छा पहचानना मुश्किल काम नहीं । इसके साथ ही हमें कुछ अन्य पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा जिनके चलते राष्ट्रवाद का ऐसा रूप निर्मित हुआ जिसमें भौगोलिक अस्तित्व और भक्तिपरक पूजा जैसी प्रतीकात्मकता ही उसके साथ जुड़ी प्रतीत होती है ।                   
स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जिस तरह की राष्ट्रवाद की धारणा बनी वह इकहरी नहीं थी तथा उसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं की निरंतरता स्वाधीन भारत में बनी रही इसका बड़ा कारण यह था कि खुद स्वाधीनता आंदोलन भी इकहरा नहीं था स्वाधीनता आंदोलन की कोई भी मुकम्मल तस्वीर गांधी के साथ आंबेडकर और भगत सिंह को शामिल किए बिना नहीं बनाई जा सकती हिंदी साहित्य का कोई भी विद्यार्थी प्रेमचंद को पढ़ते हुए इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकता कि वे उभरते हुए राष्ट्रवाद के अंतर्विरोधों को समझ रहे थे फणीश्वरनाथ रेणु ने भी आजादी के आंदोलन में शामिल हो रहे इस उदीयमान शासक समुदाय की समस्याओं को व्यक्त करने का प्रयास किया है आजादी के आंदोलन के दौर के इन परस्पर विरोधी पहलुओं का टकराव आजादी के बाद भी जारी रहा इस टकराव को हम कथनी में धर्म निरपेक्षता लेकिन करनी में इसके विपरीत यानी अल्पसंख्यक विद्वेष, कथनी में लोकतंत्र लेकिन करनी में पूंजी की सेवा में सत्ता संस्थान, की विडंबना में फलीभूत होते हुए देखते हैं
भारत की आजादी के साथ ही उसका विभाजन भी हुआ विभाजन भौगोलिक तो था लेकिन उसका आधार धार्मिक था इस विभाजन ने नए बने दोनों मुल्कों के इतिहास, राजनीति और सामाजिक चेतना में इतनी गहरी फांक पैदा की जिसके दुष्परिणाम देश को अब भी भुगतने पड़ते हैं समय बीतने के साथ उसके प्रभाव और भी प्रत्यक्ष हो रहे हैं कहते हैं कि परमाणु दुर्घटनाओं के प्रभाव अकल्पनीय हैं क्योंकि वे सैकड़ों या हजार वर्ष बाद भी प्रकट हो सकते हैं प्रकृति में होने वाले अपरिवर्तनीय बदलावों के प्रभाव का अकल्पनीय होना समझ में आता है लेकिन मानव निर्मित भारत विभाजन की दुर्घटना के प्रभाव भी लगभग उसी तरह समय बीतने के साथ प्रत्यक्ष हो रहे हैं उस विभाजन का आधार धार्मिक होना ऐसी चीज था जिसके चलते जिस समय विभाजन हुआ वहीं ठहर नहीं गया, बल्कि लगता है कि वहां से शुरू हुआ था और दिन प्रतिदिन और गहराता जा रहा है शायद मंटो जैसे लेखकों ने जिस तरह इसे पागलपन समझा था वह समझदारी अधिक भविष्यदर्शी प्रतीत हो रही है । कुछ तो विभाजन के घाव ने और कुछ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने दोनों को एक दूसरे से खाद पानी लेने वाली परिघटनाएं बना दिया । पाकिस्तान का विरोध खूब आसानी से मुस्लिम विरोध में बदल जाता है । उसकी अमेरिका से करीबी के चलते उसका विरोध साम्राज्यवाद विरोध के रूप में भी समझा दिया जाता है । भारत के अंध-राष्ट्रवाद को परिभाषित करने वाले इसी तरह के तत्वों ने उसे देश की जनता की खुशहाली से जोड़ने की जगह पाकिस्तान या चीन के साथ होड़ से जोड़ दिया है । इस होड़ में मदद लेने के नाम पर भारत के शासक वर्ग ने साम्राज्यवाद के साथ संघर्ष को भी तिलांजलि दे दी है ।
जब आप राष्ट्रवाद को जनता की खुशहाली और अधिकार संपन्नता से जोड़कर देखना बंद कर देते हैं तो राष्ट्र प्रतीकों तक सीमित रह जाता है । ये प्रतीक सारहीन होकर मिथक में परिवर्तित हो जाते हैं । जब राष्ट्र का झंडा देश के प्रति किसी की मोहब्बत के इजहार का एकमात्र रूप रह जाए तो समझ लीजिए कि वह देशप्रेम की जगह देशप्रेम का दिखावा मात्र है और दिखावे की जरूरत वहीं अधिक पड़ती है जहां वह असल में होता नहीं है । यह अस्वाभाविक नहीं है कि जो मध्य वर्ग इसका सबसे अधिक दिखावा करता है वही देश छोड़कर स्थायी तौर पर विदेश बसने के लिए सबसे अधिक व्याकुल भी रहता है ।
आजादी के बाद से क्रिकेट में पाकिस्तान के विरुद्ध भारत की जीत का जश्न, वाघा सीमा पर गेट बंद करते हुए एक दूसरे के विरुद्ध नफरत का सार्वजनिक प्रतीकात्मक इजहार, सियाचिन की बर्फीली चोटी पर कब्जा जमाए रखने के अहंकारपूर्ण संतोष के लिए सैनिकों की कुर्बानी जैसे बेवकूफाना प्रतीकात्मक तरीकों से देश की बरतरी को सिद्ध करने की मानसिकता ने देशभक्ति को नशे में बदल दिया है । परमाणु बम विस्फोट के साथ इस नशे को खतरनाक आत्मघाती रूप दे दिया गया । जब परमाणु बम का विस्फोट किया गया तो इसे परमाणु बम रखने वाले मुट्ठी भर देशों की पांत में हमारे देश को भी शामिल कर लेने के गौरव की तरह पेश किया गया । यह गौरव बोध निहायत तर्कहीन था क्योंकि युद्ध के हथियार के रूप में भी परमाणु बम की उपयोगिता संदिग्ध है । उसके तुरंत बाद पाकिस्तान ने भी विस्फोट करके इस क्षेत्र में अपनी समानता सिद्ध कर ली । अब तो और भी हास्यास्पद प्रतीक खोज लिए गए हैं जिनका हिंसक इस्तेमाल दैनंदिन तौर पर किया जा रहा है । राष्ट्रवाद के प्रतीकों के सहारे सरकारें आम तौर पर जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाती हैं । जनता के लिए बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करने में अपनी नाकामी को ढकने के लिए सरकारें अक्सर उग्र राष्ट्रवाद का सहारा लेती हैं ।
प्रतीकों के सहारे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सामान्य बोध बना देने के लिएएक राष्ट्र, एक झंडा, एक भाषा, एक ग्रंथको एकता की बुनियाद के बतौर प्रचारित किया जा रहा है । ध्यान देने की बात है कि देश के रूप में भारत का अस्तित्व ही विविधता के बाध्यतामूलक नहीं, बल्कि सकारात्मक स्वीकार पर निर्भर है । इसका बड़ा कारण इस देश की विशालता और प्राचीनता है । इतने लंबे अरसे से इतने बड़े भूभाग के भीतर साथ साथ रहते हुए इस विराट आबादी में जितनी एकता पैदा हुई है उससे अधिक विविधता का निर्माण हुआ है । भाषा, परिधान, भोजन से लेकर संस्कृति और आचार व्यवहार तक इस विविधता का ऐसा प्रसार है कि इसकी गिनती भी असंभव प्रतीत होती है । वर्तमान राष्ट्रवाद इसी विविधता को कुचलकर संकीर्ण वैचारिक आधार पर देश को संगठित करने की कोशिश कर रहा है । इसके लिए उसे सबसे पहले बहुसंख्यक धर्म को ही कट्टर बनाना होगा । फिर समाज ने कानून से शासित होने की जो आदत विकसित कर ली है उसे मटियामेट करके समाज पर धर्म की जकड़बंदी मजबूत करनी होगी । जिस भाषा के सहारे इस राष्ट्रवाद को देशी रंग देने का भ्रम पैदा किया जाता है वह हिंदी है । शुरू में सरकार ने इस हथियार का सहारा लिया लेकिन जल्दी ही सरकारी योजनाओं में सब कुछ इंडिया हो गया-‘स्किल इंडिया’,’मेक इन इंडिया’,’स्टैंड अप इंडियाआदि । हिंदी तो केवल झाड़ू लगाने के लिए गांधी के जन्म के दिन कास्वच्छ भारतबनकर रह गई । इसी तरह स्वदेशी की भावना कोमेक इन इंडियासे बदल दिया गया लेकिन इसके लिए विदेशी कंपनियों को न्यौता देकर सरकार ने उन्हें संदेश दिया कि पुन:उपनिवेशीकारण का काम रुका नही, जारी रहेगा । देशी और अंतर्राष्ट्रीय निजी पूंजी की सेवा में पूरी सरकारी मशीनरी का लग जाना ही वह सत्य है जिसे छिपाने के लिए राष्ट्रवाद का वर्तमान हिंसक उभार निर्मित किया गया है । यह उभार देश को टुकड़ों में बांट और बरबाद कर देने की योजना पर काम करना शुरू कर चुका है । इस परियोजना के समर्थक वे ही लोग हैं जो लोकतंत्र के विरोध में कभी राजे रजवाड़ों की प्रभुसत्ता के समर्थक रहे थे । यह उभार स्त्रियों और समाज के पददलित समुदायों में अधिकार की उपजी चेतना के विरोध में रचा गया है इसीलिए जातिवाद और स्त्री दमन इसके आंगिक घटक हैं । यहां तक कि हिंदू धर्म को भी उस ढांचे में ढाला जा रहा है जो कथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के काम आ सके । इसके लिए इसका राजनीतीकरण और सैन्यीकरण आवश्यक है । इस सैन्यीकरण के लिए नफरत को धार्मिक जामा पहनाया जा रहा है ।      
सरकारों की इस तिकड़म को उजागर करने के लिए हिंदी साहित्य में व्यंग्य, हास्य और विडंबना का सहारा लिया गया है । कारण यह है कि साहित्य ने सदा से अपने लिए समाज और शासन की आलोचना का जिम्मा लिया हुआ है । किसी भी देश और समाज को अपने भीतर सुधार की जरूरत पड़ती है और इसीलिए उसे आलोचना के रूपों का पोषण करना पड़ता है । स्वस्थ समाज की यह विशेषता होती है कि वह झूठे गौरव बोध से तुष्ट हो जाने की जगह अपनी आलोचना का सम्मान करता है । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सार अप्रिय आलोचना करने की छूट है । वर्तमान राष्ट्रवाद इसी आलोचना को खत्म करने पर उतारू है । इसका जन्म बीमार मानसिकता से हुआ है और यह अधिक गंभीर बीमारी की ओर समाज और देश को धकेल रहा है । इसका असली मकसद देश की जनता को धोखे में रखकर देशी और विदेशी पूंजी के मुनाफे की गारंटी करना है । इसके लिए राष्ट्रवाद का नशे की लत की तरह इस्तेमाल खतरनाक है । हम सभी जानते हैं कि जिसे लत लग जाती है उसे न केवल रोज नशा चाहिए होता है बल्कि प्रत्येक नशा बहुत जल्दी असर करना बंद कर देता है तब और गंभीर नशे की जरूरत पड़ती है । यही कारण है कि राष्ट्रवाद के प्रतीक तेजी से बदल रहे हैं और रोज देशभक्ति साबित करने का एक नया पैमाना खोजा जा रहा है ताकि अधिकांश जनता को देशद्रोही कहकर उनके विक्षोभ को कुचला जा सके ।
जिस देश अमेरिका को पिछले कुछेक सालों से सत्ता अपना आदर्श देश मान रही है उसके कुछेक कामों को याद करना हमें बता सकता है कि हमारे देश का कैसा भविष्य गढ़ने की साजिश की जा रही है । सबसे पहले अमेरिका की जिस उपलब्धि की छाया हमारे देश पर पड़नी शुरू हो चुकी है वह है लगातार बढ़ती अश्लील विषमता । इस विषमता ने अमेरिका में एक नए किस्म के जातिवाद को जन्म दिया है । उच्च शिक्षा को हासिल करना उन्हीं लोगों के लिए संभव रह गया है जिनके पास संपत्ति है । जिस तरह भारत में सवर्णों को ही शिक्षा सुलभ थी उसी तरह आजकल अमेरिका में संपत्तिशाली लोगों को ही शिक्षा मिल पा रही है । दूसरी बात कि अनेक उद्योगों की शाखाओं में सबसे अधिक उत्पादन जेलों में स्थित उनके कारखानों में हो रहा है । असल में ज्यादातर जेलें वहां निजी क्षेत्र में हैं और उनमें बंद कैदियों से उत्पादक काम करवाया जाता है । इस तरह निजी पूंजी के लिए बिना किसी हुज्जत के अनुशासित मजदूर मिलने की सबसे आसान जगह जेलें हैं । इसके कारण भी अधिक से अधिक लोगों को जेल भेजना अमेरिकी प्रशासन का स्वार्थ बन गया है । विचारकों ने गणना करके बताया है कि इन जेलों में ज्यादातर कैदी अश्वेत गरीब होते हैं । ऐसे कानून बनाए जाते हैं जिससे अधिकाधिक अश्वेत जेलों में भेजे जा सकें । दास प्रथा के खात्मे के बाद भी चमड़ी के रंग पर आधारित भेदभाव नए नए रूपों में संस्थाबद्ध तौर पर प्रकट हो रहा है । पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद के नवीनतम अवतार के अंदरूनी समाज में पुराने भेदभाव लौट रहे हैं । आतंकवाद के विरुद्ध लड़ने के नाम पर कड़े कानून बनाकर न केवल नागरिकों की स्वतंत्रता में कटौती हो रही है, बल्कि मंदी की मार भी सामान्य लोगों पर ही पड़ रही है । दीर्घकालीन बेरोजगारी, कर्ज न चुकाने की वजह से खरीदे हुए घरों की जब्ती, अश्वेतों की पुलिस द्वारा सरेआम हत्या आदि के साथ मिलकर घरेलू और विदेशी बाजार में हथियारों के विक्रेताओं के बोलबाले ने उस मुल्क को किसी के लिए भी अनुकरणीय नहीं रहने दिया है लेकिन हमारे औपनिवेशिक अतीत ने हमें पश्चिमी देशों की मानसिक गुलामी का आदी बना दिया है । वर्तमान खोखले राष्ट्रवाद का उत्पादन भी वहीं हुआ है ।                          
   

        

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