Sunday, November 28, 2010

भूमंडलीकरण और भारत

आज का समय संभवतः चीजों को उनके विपरीत नाम से पुकारने का समय है । राजनीति में जहाँ अनुदारता पैदा हो रही है,उसे उदारीकरण कहते हैं । सरकार के घनघोर हस्तक्षेप से जो प्रक्रिया चल रही है,उसे निजीकरण कहा जा रहा है ।यही किस्सा उदारीकरण का भी है ।जो हो रहा है वह दरअसल पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद के एक ही केंद्र का आर्थिक,सामरिक और सांस्कृतिक प्रसार है पर इसे सन्दर्भ से काटने के लिये भूमडलीकरण कहा जा रहा है । ऐसा कहने से यह प्रक्रिया सहज मानवीय क्रियाकलाप के रूप में प्रकट होती है ।संभवतः जब अमेरिकी प्रभुत्व हमारे यहाँ दस्तक देगा तोअतिथि देवो भवका उल्लेख करके क्रीतदास उसके स्वागत के लिये पलक पाँवड़े बिछायेंगे ।

अगर भूमडलीकरण का अर्थ संसार के विभिन्न भागों के मनुष्यों में आपसी आदान-प्रदान समझा जाये तो ऐसा अनादि काल से चला आ रहा है । हमारे देश के अंडमान निकोबार द्वीप समूह में अफ़्रीकी मूल के आदिवासियों की मौजूदगी इस प्रक्रिया की प्राचीनता को बताने के लिये पर्याप्त है । अरस्तू के वनस्पतिशास्त्रीय शोधों के लिये सिकंदर द्वारा दुनिया भर से पेड़ पौधे मँगवाए गये थे । अरबी भाषा में अनुवाद के लिये संसार भर की पुस्तकों और विद्वानों का एकत्र होना जगत प्रसिद्ध है । मिथकों,लोककथाअओं और भाषाओं के क्षेत्र में यह आपसदारी देखी जा सकती है । किंतु आज जो भूमंडलीकरण हम देख रहे हैं उसकी जड़ें यूरोपीय इतिहास के एक विशेष दौर में अवस्थित हैं ।

इसीलिये अनेक विद्वान भूमंडलीकरण को पूंजीवाद से जोड़कर देखते हैं । मार्क्स की 1848 में लिखित किताबकम्युनिस्ट घोषणापत्रमें पूंजीवाद और भूमंडलीकरण का जिस तरह आपसी रिश्ता बताया गया है उसे आज की दुनिया में प्रत्यक्ष होते अनेक विचारक देख रहे हैं । उदाहरण के लिये बाजार की तलाश में गरीब मुल्कों में पूंजीवाद का प्रवेश मार्क्स की शब्दावली में बहुत कुछ बलात्कार का रूपक बन जाता है ।

मार्क्स ने पूंजीवाद का विश्लेषण करते हुए मुनाफ़े की घटोत्तरी और अति उत्पादन को पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली का अंतर्निहित घटक माना था और इसे दस वर्षों के चक्रीय संकट की संज्ञा दी थी ।इस संकट से निजात पाने के लिये पूंजीवाद नेपूंजीके लिखे जाने तक उपनिवेशीकरण का तरीका अप्नाया था । इतिहास के लंबे दौर में विउप्निवेशीकरण तो हुआ पर नवस्वतंत्र मुल्कों के शासकों से पूर्व प्रभुओं के प्रति वफ़ादारी की गारंटी ले लेने के बाद ।

आश्चर्य की बात यह है कि भारत जैसे देशों के,जिसने दीर्घकालीन स्वतंत्रता संग्राम चलाया, बुद्धिजीवी भी राष्ट्र राज्य की सीमाओं के टूटने का जश्न मना रहे हैं । असल में भूमंडलीकरण को तार्किकता देने के लिये उत्तर आधुनिकता की वैचारिकी का जन्म हुआ है । ये विचारक साम्राज्यवाद को आर्थिक शोषण और राजनीतिक पराधीनता में नहीं देखते । वे इसे सांस्कृतिक धरातल पर चिन्हित करते हैं ।स्वतत्रता संग्राम को भी वे सांस्कृतिक परिघटना ही मानते हैं । इन्हीं विचारकों का दावा है कि राष्ट्र राज्य की सीमायें टूट रही हैं । उपनिवेशीकरण के दौरान भी ये सीमायें तोड़कर गरीब मुल्कों का बाजार प्रभु देशों के लाभ के हिसाब से ढाला गया था ।

रष्ट्र राज्य के कमजोर होने के मिथक के बारे में थोड़ी बात्चीत जरूरी है ।सच्चाई यह है कि पश्चिमी देशों में कहीं राज्य कमजोर नहीं पड़ा है । आज भी आयात प्रतिबंध उनकी नीतियों का प्रमुख अंग है । असल में तीसरी दुनिया के राष्ट्रों की संप्रभुता का उल्लंघ्न करने के लिये इस मिथक का वैचारिक अस्त्र के रूप में उपयोग किया जा रहा है । पहले जब पूंजीवाद को राष्ट्र राज्य अपने विकास के लिये जरूरी लगा था तो राष्ट्रवाद पर जोर दिया गया । आज उसे अपने अबाध विकास के लिये कमजोर देशों की सीमायें बाधक लग रही हैं और अब वह इन देशों के उपभोक्ता से सीधा संपर्क बनाना चाहता है तो जरूरी होने पर हमला करके नहीं तो बाँह मरोड़कर उन्हें कमजोर किया जा रहा है ।

भारत दुनिया के जिस हिस्से में अवस्थित है वह विश्व बैंक संचालित नीतियों की गिरफ़्त में सबसे हाल में आया है ।इससे पहले लैटिन अमेरिका,अफ़्रीका और पूर्वी एशियाई शेर इसके शिकार हो चुके हैं । इन नीतियों ने अफ़्रीका को एड्स का उपहार दिया । लैटिन अमेरिका धीरे धीरे इनके विरुद्ध ठोस राजनीतिक गोलबदी का केंद्र बनता जा रहा है और क्यूबा की घेरेबदी के अमेरिकी मंसूबों को धूल चटाते हुए एक के बाद दूसरा देश क्यूबा के नक्शे कदम पर चला आ रहा है । हमारा देश इससे सीख लेने की बजाय ऐसे रास्ते पर कदम बढ़ा चुका है जिसमें अंगरेजी राज में अकाल से हुई मौतों का दुहराव खेती के विनाश और किसानों की आत्महत्या में हो रहा है ।

यह कहना गलत होगा कि भारतीय शासक वर्ग ने किसी बाहरी दबाव के कारण इन नीतियों को अपनाया है । हमारे देश का शासक वर्ग द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नवस्वतंत्र देशों में सबसे परिपक्व था । बाकी सभी देशों में चुनावी लोकतंत्र की संस्थायें दीर्घजीवी न हो सकीं । दबाव में वे किसी न किसी महाशक्ति के अतिनिकट होने को बाध्य हुए । लेकिन भारत लोकतंत्र एक हद तक स्थिर रहा है भले ही उसे कारगर अराजकता कहा जाये । लेकिन इसका आधार कभी मजबूत नहीं हो सका । आम जनता ने जब कभी इसका स्वाद चखना चाहा उसकी आँखों से आंसू ही निकले ।आजादी और लोकतंत्र दोनों का ही आधार मिश्रित अर्थव्यवस्था थी ।इस अर्थव्यवस्था को अपनाने का कारण भले ही समाजवादी किस्म के समाज का निर्माण घोषित किया गया लेकिन सच्चाई यह है कि अधिसंरचना निर्मित करने की निजी पूँजीपतियों की अक्षमता के कारण राज्य ने यह दायित्व अपने ऊपर लिया ।इस सरकारी निवेश का लाभ उठाकर जैसे ही निजी पूँजीपतियों ने अपनी अवस्था को सुधारा उन्होंने अपना हिस्सा मांगना शुरू कर दिया ।

इस काम को अंजाम देने में दो ऐसे पूंजीपति सामने आये जो निजीकरण की सारी बुराइयों के साकार रूप हैं । इनमें एक थे धीरूभाइ अंबानी दूसरे थे सुब्रत राय सहारा । एनका विशाल आर्थिक साम्राज्य किसी उत्पादक गतिविधि की देन नहीं था बल्कि वित्तीय गतिविधि,खेलों के आयोजन तथा भूखण्डों की कीमतों में आये इजाफ़े पर निर्भर था । इन दोनों ने अखबार निकाले और मीडिया के असर का इस्तेमाल अपने व्यापारिक हितों के लिये किया तथा सरका री कानूनों को अपने फ़ायदे के लिये लागू करवाया अथवा नहीं लागू करवाया ।

भूमडलीकरण के लाभों का कीर्तन करने के लिये बुद्धिजीवियों को अनेक मानव मूल्यों को तिलांजलि देनी पड़ती है । शायद इसीलियेसार्वभौमिक नैतिकताकी जगह सापेक्षिक नैतिकताका ढोल पीटा जा रहा है । आउट्सोर्सिंग को भारत के शुभ भविष्य का सूचक पुनः उपनिवेशीकरण की चिंता को दरकिनार करके ही बताया जासकता है ।सेक्स इंडस्ट्रीको स्त्री मुक्ति का आख्यान भी बेशर्म होकर ही कहा जा सकता है । शायदएंपायरके लेखक अंतोनियो नेग्री की यह बात सही है कि तीसरी दुनिया के देशों में एक पहली दुनिया पैदा हो चुकी है । वरना क्या कारण है कि दक्षिण एशिया के सभी देशों के शासक अमेरिकी राष्ट्रपति के दरबार में सबसे बड़ी मनसबदारी पाने के लिये एक दूसरे को अपमानित होते देखकर प्रसन्न होते हैं ।

भूमंडलीकरण ने हमारी अर्थव्यवस्था को स्टाक मार्केट के हवाले कर दिया है । लोगों के जीवन से स्थिरता को छीन लिया है । देश को मोबाइल और कंप्यूटर के कूड़ेदान में बदल डाला है । यही नहीं उसने समूची मानवजाति से कर्ता का अहसास छीनकर उसे उपभोक्ता में बदल डाला है । शिक्षा के क्षेत्र में इसने परिणामवाद के दर्शन को स्थापित किया है और उसके व्यवसायीकरण को बढ़ावा दिया है । गरीबों के व्यस्थित हाशियाकरण से उपजे विक्षोभ के प्रबंधन के लिये नागरिक समाज को आदर्श के बतौर पेश कर उसे सीधे विदेशी आर्थिक मदद उपलब्ध कराई जा रही है ।

कोई कह सकता है कि ये परिवर्तन भारतीय समाज के पारंपरिक ढाँचे को तोड़ देंगे और उस पर आधारित शोषण दमन भी खत्म हो जयेगा लेकिन अतीत के अनुभव बताते हैं कि ऐसे परिवर्तन पहले से मौजूद ढाँचे को तोड़ने की जगह उसे पुनर्जीवन ही प्रदान करते आये हैं ।

औपनिवेशिक दौर से इस दौर की भिन्नता इस बात में जरूर है कि साम्राज्यवाद का विरोध पहले के मुकाबले अधिक सार्वदेशिक हुआ है । हमारे देश में भी प्रशंसकों की तादाद ज्यादा है लिकिन जैसे जैसे इसके प्रभाव प्रत्यक्ष होंगे भारत भी लैटिन अमेरिकी देशों की राह पर आगे बढ़ेगा ।

1 comment:

  1. सच है कि भूमंडलीकरण के साथ राज्य और ज्यादा अत्याचारी हुआ है.और यह भी सच है कि भूमंडलीकरण के साथ साम्प्रदायिक-फासिस्ट शक्तियां,पितृसत्तात्मकत्तात्मक व्यवस्था भी पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई हैं,डंडे का जोर और सामंतवादी प्रवृति भी बढ़ी है...
    उत्तम लेख

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