Sunday, January 4, 2026

नारीवाद, पूंजीवाद और पारिस्थितिकी


2023 में नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी प्रेस से जोहान्ना ओकसाला की किताब ‘फ़ेमिनिज्म, कैपिटलिज्म, ऐंड इकोलाजी’ का प्रकाशन हुआ । लेखिका को लगातार यह डर रहा कि मानवता तेजी से पर्यावरणिक ध्वंस की ओर जा रही है । इस तरह के भय को अक्सर व्यर्थ कहा जाता है । इसके बावजूद बहुतेरे लोग समझते हैं कि धरती के वातावरण में होने वाले बदलावों को वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर सही सही बताया जा सकता है । हमारी नियति का बेहतरीन रूपक टाइटैनिक हो गया । उसके यात्रियों और चालकों की तरह ही लोग भी स्थिति की गम्भीरता से अनजान बने रहना चाहते हैं । वे इस आपदा से बचने के लिए जरूरी उपायों से भी नावाकिफ़ बने हुए हैं ।

अब जाकर जलवायु परिवर्तन को जीवन के लिए खतरा माना जाने लगा है । वैज्ञानिक तो बहुत पहले से इसके बारे में चेता रहे थे । अब उत्तरी गोलार्ध के लोग भी इसका अनुभव करने लगे हैं । गर्म हवाएं, दावानल, तूफान और बाढ़ की सूचना लगातार आती रहती है । अब तो जलवायु परिवर्तन और पूंजीवाद के बीच का संबंध भी साफ साफ नजर आने लगा है । नाओमी क्लीन ने कहा कि जो आर्थिक व्यवस्था इस परिवर्तन को तेजी प्रदान कर रही है उसे बदले बिना इस संकट से पार पाना लगभग असम्भव ही है । पूंजीवाद की यह पारिस्थितिकीय आलोचना हाशिये से अब मुख्य धारा में आ गयी है । फ़्रेडेरिक जेमेसन ने इसे फ़ैशन जैसा मानते हुए व्यंग्य किया था कि धरती के अंत की कल्पना तो हो रही है लेकिन पूंजीवाद के अंत की कल्पना भी नहीं की जा रही । इसके बावजूद अधिकाधिक लोगों को महसूस हो रहा है कि अगर अपनी इस सभ्यता को बचाना है तो पूंजीवाद का अंत ही एकमात्र वास्तविक विकल्प है । पूंजीवाद का अंत अनेकानेक वैचारिक कारणों से अब केवल वांछित नहीं है बल्कि जलवायु संकट के कारण अपरिहार्य हो गया है ।

लेखिका इस बात पर दांव लगाने को तैयार हैं कि इस समय की किसी भी कारगर नारीवादी आलोचना को इस मौके का फायदा तुरंत उठाकर पर्यावरणिक संकट के सवाल का सामना करना चाहिए । अगर नारीवादी सिद्धांत गम्भीरता के साथ पारिस्थितिकीजन्य इन  समस्याओं पर बातचीत नहीं करता और पर्यावरणवाद के साथ रिश्ता बनाने की नहीं सोचता तो हमारे भविष्य को आकार देने वाली राजनीतिक शक्ति के रूप में उसकी प्रासंगिकता को मानना मुश्किल होगा । इसी तरह पर्यावरणवाद को भी नारीवाद की जरूरत है । पर्यावरणिक समस्याओं को ठीक से समझने के लिए उनके लैंगिक पहलुओं और प्रभावों को समझना जरूरी है । लैंगिक विषमता के और विस्तार की कीमत पर पर्यावरण की सुरक्षा नहीं हो सकती । इसकी जगह लेखिका का प्रस्ताव है कि पर्यावरण सुरक्षा के इस काम के लिए पर्यावरण के विनाश और स्त्री पराधीनता के बीच वर्तमान और ऐतिहासिक संबंध की गहन समझदारी अपेक्षित है । प्रकृति के बारे में हमारी बुनियादी सोच स्त्री और जनानेपन के प्रति हिकारत की भावना के साथ बहुत गहरे जुड़ी है । यही नहीं पर्यावरणवाद और नारीवाद के बीच का संबंध ठोस भौतिक तरीकों से भी आपस में विशेषकर गहरा है । पर्यावरणिक खतरों और चुनौतियों से स्त्री का जीवन सीधे प्रभावित होता है । इसलिए भी पर्यावरण के सिद्धांत और राजनीति के प्रमुख सवालों की सही समझ के लिए आजकल पर्यावरणिक नारीवादी विश्लेषण जरूरी हो गया है । इससे और भी तरह तरह के ज्ञान और राजनीतिक हस्तक्षेप के नये पहलू सामने उभरकर आएंगे ।

लेखिका का कहना है कि पर्यावरणवाद और नारीवाद को साथ लाने के सैद्धांतिक और राजनीतिक प्रयास से वे दोनों ही पूंजीवाद की आलोचना के साथ व्यवस्थित तरीके से जुड़ जाते हैं । वर्तमान सदी में नारीवादियों को यह सुविधा नहीं रह गयी है कि वे पर्यावरणिक राजनीति के ऐसे ही रूपों का समर्थन करें जिसके तहत पूंजीवादी बाजार के परे प्रकृति के संरक्षण की गुंजाइश थी । अब तो समय है कि नारीवादी कार्यकर्ता पूंजीवादी अर्थतंत्र पर ही सवाल उठाएं क्योंकि उसकी वजह से ही पर्यावरण का विनाश और मानवजनित जलवायु परिवर्तन हो रहा है । मतलब कि पूंजीवाद को पराजित करने के साझा संघर्ष में नारीवादियों और पर्यावरणवादियों को साथ आना होगा । इससे न केवल जलवायु परिवर्तन जैसी गम्भीर पर्यावरणिक समस्याओं को हल करने में मदद मिलेगी बल्कि वैश्विक सामाजिक और पर्यावरणिक न्याय का काम भी आगे बढ़ेगा ।

इसी किस्म की राजनीतिक परियोजना की दार्शनिक पीठिका तैयार करना इस किताब का मकसद है । लेखिका ऐसी बुनियाद बनाना चाहती हैं जिस पर वर्तमान नारीवादी और पारिस्थितिकी आंदोलन मिलकर पूंजीवाद के विरुद्ध प्रभावी राजनीतिक मोर्चा खड़ा कर सकें । इसके तहत वे पूंजीवाद की वर्तमान व्यवस्था के उस बुनियादी तर्क को उजागर करना चाहती हैं जिसके लिए पर्यावरण का नाश और स्त्री की पराधीनता आवश्यक हो जाती है । इसके लिए वे भौतिकवादी पारिस्थितिकीय नारीवाद और मार्क्सवादी नारीवाद की मौजूदा परम्पराओं से शुरू करते हुए भी उनके अनेक तर्कों में सुधार और उन्हें नया बनाने की जरूरत को रेखांकित करना चाहती हैं ।

उनका कहना है कि पारिस्थीकीय नारीवाद की धारणा 1970 दशक में सामने आयी जब उदीयमान पर्यावरण आंदोलन का सामना नारीवाद जैसे तमाम तरह के सामाजिक न्याय आंदोलनों से पड़ा था । 1980 दशक में इस धारणा का विकास व्यापक सैद्धांतिक और राजनीतिक मंचों पर हुआ जब स्त्री और प्रकृति के साझा उत्पीड़न के मामले में नयी बातें कही गयीं । बहरहाल 1990 दशक में इसकी आलोचना शुरू हुई और इस पर बौद्धिकता विरोध और मनुष्य केंद्रीयता के आरोप लगाये गये । कहां तो इसे नारीवादी सैद्धांतिकी का अभिन्न पहलू होकर पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से उसकी मनुष्य केंद्रीयता को दुरुस्त करना था और कहां यह नाम ही बदनामी की बड़ी वजह बन गया । उस पर आरोप लगा कि वह धरती को स्त्री बनाकर देवी की तरह उसकी पूजा करने लगा और दुनिया भर में वीगन (ऐसा शाकाहार जिसमें दूध भी वर्जित है) का प्रसार ही सारी समस्याओं का समाधान समझने लगा । लेखिका का मानना है कि पारिस्थितिकीय नारीवाद की मान्यताओं का फिर से मूल्यांकन जरूरी हो गया है । यह काम सैद्धांतिक और राजनीतिक कारणों से आज के हालात में उनको महत्वपूर्ण लगता है ।

1970 और 1980 के इसी दशक में मार्क्सवादी नारीवाद भी विकसित हुआ । उसकी केंद्रीय सैद्धांतिक और राजनीतिक मान्यता थी कि स्त्री के उत्पीड़न को पूंजीवाद के साथ नाभिनालबद्ध सामाजिक भौतिक संबंधों में देखना होगा । बहरहाल 1990 दशक के दौरान ही उसकी दिशा भी भ्रम का शिकार हुई । पितृसत्ता और पूंजीवाद को एकीकृत व्यवस्था मानने की आलोचना सामने आयी । इसके साथ ही उत्पीड़न की दुहरी या तिहरी व्यवस्था की धारणा भी बहुत स्पष्ट नहीं हो सकी । 1970 दशक में निर्मित मार्क्सवादी नारीवाद में आज बहुतेरी सैद्धांतिक समस्याएं नजर आ रही हैं । उसके बाद उत्तर संरचनावाद, क्वैर सिद्धांत, पर्यावरण सिद्धांत और आलोचनात्मक नस्ल सिद्धांत जैसे बहुतेरे नये तरीके यथार्थ को समझने के क्रम में उभरे हैं । पूंजीवाद ने भी रूप बदला है । अब पूंजीवादी बाजार का  नया दौर है जिसमें पर्यावरण के विनाश के अतिरिक्त डिजिटलीकरण, बढ़ती अस्थिरता और अतिरिक्त आबादियों का उदय हुआ है । अब सूचना अर्थतंत्र, बायो पूंजीवाद, वित्तीकरण, निगरानी पूंजीवाद और अस्थिरता जैसी धारणाओं का निर्माण वर्तमान को समझने के लिए करना पड़ रहा है ।

किताब में पूंजीवाद के इन नये रूपों से उत्पन्न बहुरूपी चुनौतियों के अध्ययन के साथ ही उनके प्रतिरोध के पारिस्थितिकीय नारीवादी सम्भावनाओं को भी परखने का प्रयास किया जाएगा । इसमें जोर उन बदलावों पर होगा जिन्हें मोटामोटी बायो पूंजीवाद कहा जाता है । वर्तमान पूंजीवाद के खास लक्षणों के सैद्धांतिक विश्लेषण में सूचना पूंजीवाद और श्रम के अभौतिक रूपों पर बहुत अधिक बल दिया गया है । दावा यह है कि आज के उत्तर फ़ोर्डवादी अर्थतंत्र में वस्तुओं के निर्माण में शारीरिक तौर पर नहीं लगना पड़ता । इसकी जगह हम अभौतिक विचारों और नये तरीकों की खोज करते हैं और सूचना का आदान प्रदान करते हैं । बहरहाल लेखिका का कहना है कि यह कहानी समकालीन पूंजीवाद के चुनिंदा हिस्से की है और उत्तरी गोलार्ध के नजरिए से ही सुनाई गयी है । इसी कारण से लेखिका ने पूंजीवाद के आलोचनात्मक विश्लेषण में जोर दिया है कि इस तमाम तथाकथित अभौतिक या ज्ञानपरक पूंजीवाद का आधार मनुष्यों,  जानवरों और समूची पारिस्थितिकी की ठोस भौतिकता है । किताब में इस बात की भी छानबीन है कि बायो पूंजीवाद का नवीनतम रूप जैव प्रौद्योगिकी  के बाजारीकरण से होने वाला पूंजीवादी मुनाफ़ा है । इसमें भी जीवित शरीर के जीवन और भौतिकता को ही लक्ष्य बनाया जाता है । इससे जुड़े बायो अर्थतंत्र की भारी वृद्धि के पीछे भी समूची दुनिया में राजनीतिक संस्थाओं का जाल कार्यरत है । जैव विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी ऐसे प्रमुख साधन बन गये हैं जिनके सहारे वर्तमान पूंजीवाद में आर्थिक वृद्धि के साथ पर्यावरणिक सातत्य का सामंजस्य बिठाने की कोशिश हो रही है । आजकल हमारी आंखों के सामने सबसे बड़ा बदलाव औद्योगिक पूंजीवाद से इस बायो पूंजीवाद की ओर हो रहा है ।

पूंजीवाद की अपनी आलोचना की एक और विशेषता का जिक्र करते हुए लेखिका ने उत्तर संरचनावादी सिद्धांतों की प्रासंगिकता का नाम लिया है । इनमें बायो राजनीति और अधीनीकरण जैसी धारणाओं के साथ वे मार्क्सवादी सिद्धांत का मेल बिठाती हैं । पूंजीवाद की पारिस्थितिकीय नारीवादी आलोचना के लिए वे वैज्ञानिक या द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को पर्याप्त नहीं मानतीं । इन सबके साथ ही वे प्रकृतिवाद की उत्तर संरचनात्मक आलोचना को शामिल करना जरूरी समझती हैं । इसके साथ ही वे मानती हैं कि अधीनीकरण की उत्तर संरचनावादी धारणा, जिसके तहत अधीनस्थ के सामाजिक निर्माण का अध्ययन किया जाता है, के साथ मार्क्सवाद का भी मेल जरूरी है ताकि वस्तूकरण की आमूल नारीवादी आलोचना विकसित की जा सके । वस्तूकरण की आलोचना को जब पूंजीवाद विरोध की नारीवादी रणनीति का प्रमुख तत्व मान लिया जाएगा तो राजनीतिक अर्थतंत्र या राजनीतिक संस्थाओं का बदलाव ही पर्याप्त नहीं लगेगा बल्कि राजनीतिक अधीनस्थ का बदलाव भी जरूरी महसूस होगा ।

लेखिका मानती हैं कि असल में पूंजीवाद की नारीवादी आलोचना का धरातल बदल चुका है । वैसे भी समकालीन पूंजीवाद की नारीवादी आलोचना कभी शुद्ध तौर पर अकादमिक नहीं रही हमेशा ही उसके राजनीतिक निहितार्थ रहे हैं । अगर वर्तमान में अतीत की छाया नजर आ रही है तो अब भी पुरानी रणनीति, संगठन और राजनीतिक संघर्ष के रूप कारगर हैं । लेकिन अगर पूंजी संचय, मजदूर वर्ग की संरचना और राज्य की भूमिका में बदलाव आये हैं तो रणनीति पर भी फिर से विचार करना होगा । इसलिए लेखिका का कहना है कि पितृसत्ता, पूंजीवाद और प्रकृति के बीच संबंध के बारे में पुराने सवालों के नये उत्तर ही काफी नहीं हैं, हमें नये किस्म के सवाल पूछने होंगे और नये तरह का सैद्धांतिक तथा राजनीतिक रुख भी अपनाना होगा । उनको अपनी यह किताब इसी दिशा में कोशिश महसूस होती है ।

उनका कहना है कि पूंजीवाद के कट्टर समर्थक भी वर्तमान पूंजीवाद की गम्भीर समस्याओं से इनकार नहीं कर सकते । सस्ती ऊर्जा का युग समाप्त होने की ओर है । पूंजीवादी अर्थतंत्र को इतिहास में पहली बार ऊर्जा के स्रोत बदलने पड़ रहे हैं और यह ऊर्जा कार्बन उत्सर्जन के मामले में अधिक विनाशक है । 2008 के वित्तीय संकट के बाद अधिकतर विकसित अर्थतंत्र स्थिर तो हो चुके हैं लेकिन कोई भी उसके समाधान का दावा नहीं कर सकता । दुनिया भर में कर्ज का स्तर ऊंचा बना हुआ है और आर्थिक वृद्धि पहले के स्तर को नहीं छू पा रही है । मरियाना मज़ुकाटो ने लिखा कि वित्तीय संकट की अनुगूंज न केवल अभी आगामी अनेक वर्षों तक बनी रहेगी बल्कि इसने पूंजीवादी व्यवस्था में यकीन को भी हिला दिया है । समूची पूंजीवादी व्यवस्था की आलोचना में कहा जा रहा है कि इसमें सट्टेबाजी बहुत है, वास्तविक संपत्ति पैदा करने वालों के मुकाबले किरायाजीवियों को इसमें अधिक लाभ पहुंचता है और इसमें वित्त का अबाध विकास हुआ है । सबसे अधिक विकसित देशों में आमदनी की विषमता तो बढ़ ही रही है, दुनिया भर में कीमतें भी आसमान छू रही हैं । दावोस में जनवरी में विश्व आर्थिक मंच की बैठक के मौके पर प्रत्येक वर्ष आक्सफ़ैम सबसे अमीर लोगों की अमीरी में बढ़ोत्तरी का आंकड़ा जारी करता है । 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल की बढ़ी हुई समूची संपत्ति का 82 प्रतिशत हिस्सा दुनिया के सबसे अमीर एक फ़ीसद लोगों के पास गयी जबकि सबसे गरीब आधी आबादी की संपत्ति में कोई इजाफ़ा नहीं हुआ । अगले साल भी इन धनकुबेरों की संपत्ति में तो 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि सबसे गरीब आधी आबादी की संपत्ति में 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी । आर्थिक वैश्वीकरण के समर्थकों का कहना था कि इससे सबको लाभ होगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं । यह तो सही है कि इसने लाखों को गरीबी के दलदल से बाहर निकाला और बहुतेरे विकासमान देशों में मध्य वर्ग के विस्तार में इससे मदद मिली लेकिन निर्माण क्षेत्र के रोजगार को गरीब देशों में स्थानांतरित करने से विकसित देशों में रोजगार के अवसर कम हुए । इसके साथ ही सामाजिक असुरक्षा में भी बढ़ोत्तरी हुई । बड़े पैमाने पर प्रवास ने बचे खुचे रोजगार के लिए होड़ तेज कर दी और इसके कारण वेतन की दर में गिरावट आयी । वादा तो था कि पूंजीवादी विकास से समूचे संसार में संपत्ति, समानता और लोकतंत्र का प्रसार होगा लेकिन इस वादे पर भरोसा इस समय बहुत कम किया जा रहा है । परिस्थितिकीय तौर पर टिकाऊ और सबकी साझेदारी वाली समृद्धि के मुकाबले पूंजीवाद ने विषमता, गरीबी, बैंक संकट, दक्षिणपंथी पापुलिज्म और जलवायु विध्वंस को जन्म दिया । उसके तहत तमाम भौतिक लाभों के मुकाबले उसके द्वारा किया गया विनाश बहुत अधिक है ।

इन्हीं समस्याओं के चलते तमाम बौद्धिक लोग समाज के लिए समतामूलक और टिकाऊ भविष्य कल्पित करते हैं तो उनके लिए इस पूंजीवाद का आलोचनात्मक विश्लेषण जरूरी हो जाता है । बहुत दिनों तक तो मार्क्सवादियों के लेखन के बाहर पूंजीवाद का नाम भी सुनाई नहीं पड़ता था लेकिन अब तमाम तरह के लोग पूंजीवाद के सातत्य को लेकर चिंतित रहते हैं और उसके प्रभावों के विरुद्ध सारी दुनिया में प्रदर्शन हो रहे हैं । बहरहाल इन सबके लेखन में पूंजीवाद का अर्थ स्पष्ट नहीं होता । बहुत सारे वामपंथी लोग सभी तरह की सामाजिक समस्याओं के लिए पूंजीवाद को जिम्मेदार ठहराते हैं । उसे बहुधा ऐसी अर्थव्यवस्था बताया जाता है जिसमें उत्पादन के साधनों का मालिकाना निजी होता है, मजूरी श्रम का प्राधान्य होता है और खुली बाजार व्यवस्था होती है । उसका आंतरिक तर्क होता है जो उसके गति के नियम तय करता है । इन्हीं नियमों की खोज मार्क्सवादी अर्थशास्त्र का योगदान है । इन नियमों के कारण ही उससे जुड़ी सामाजिक समस्याओं का जन्म होता है । पूंजीवाद को समस्त व्यापार या बाजार के साथ जोड़ना सही बात नहीं है । इनकी तो मौजूदगी हमेशा रही है । पूंजीवाद के समर्थक बौद्धिक उसे मानव स्वभाव के समरूप बनाकर उसकी ऐतिहासिक उत्पत्ति के तथ्य पर परदा डालना चाहते हैं । इसलिए इसकी विशेषता को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए और अन्य आर्थिक संरचनाओं से इसे अलगाना भी चाहिए । बाजार तो पूंजीवाद से पहले भी रहा है लेकिन पूंजीवादी समाजों में बाजार भौतिक जीवन और सामाजिक पुनरुत्पादन की मध्यस्थता का एकमात्र साधन बन जाता है । मतलब यह कि जीवन चलाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी तरह बाजार संबंधों में प्रवेश करना होता है । जीने और पुनरुत्पादन के लिए बाजार पर निर्भरता के अभाव में किसी भी तंत्र को पूंजीवादी उत्पादन पद्धति नहीं कहा जा सकता । बाजार पर निर्भरता की इस अनुपम व्यवस्था से खास तरह की जरूरतों और बाध्यताओं का उदय होता है । होड़, पूंजी संचय, अधिकाधिक मुनाफ़ा और श्रम की उत्पादकता में बढ़ोत्तरी इस व्यवस्था की ही थोपी हुई बाध्यता है ।इनसे न केवल आर्थिक लेनदेन पर असर पड़ता है बल्कि सामाजिक संबंध भी इनसे तय होने लगते हैं । सामंतवाद में श्रम की उत्पादकता बढ़ाने की बाध्यता नहीं थी क्योंकि बाजारजनित होड़ पूरी तरह हावी नहीं हुई थी । उस समय के कुलीन समूह खेती लायक जमीन और पदों पर जबरन कब्जा जमाकर किसानों से जबरन अतिरिक्त श्रम हासिल कर सकते थे । इसके मुकाबले पूंजीवादी समाज में संपत्ति इकट्ठा करने के लिए अर्थेतर शक्तियों और विशेषाधिकारों की जरूरत नहीं पड़ती । इसके मुकाबले मुनाफ़ा बढ़ाने की अबाध इच्छा की पूर्ति के लिए उत्पादक शक्तियों के विकास का रास्ता अपनाया जाता है ।      

लेखिका का कहना है कि पूंजीवाद जिन नियमों से चलता है उन्हें नियति की तरह पेश करता है लेकिन वे इतिहास के अधीन होते हैं । वे जिन विशेष सामाजिक संबंधों और राजनीतिक आचरण के आधार पर काम करते हैं वे सभी मनुष्य के बनाये हुए हैं । इसका मतलब है कि उन्हें बदला जा सकता है । सामाजिक संदर्भ बदल जाने से उनका रूप भी बदल जा सकता है । असल में तो सामाजिक यथार्थ को समझने की सभी कोशिशें विमर्शात्मक होती हैं इसलिए उन्हें राजनीतिक चुनौती दी जा सकती है । फिलहाल वे इतना ही मानने का आग्रह करती हैं कि जिन समाजों में पूंजीवादी उत्पादन पद्धति का प्राधान्य है उनकी आर्थिक और राजनीतिक गतिविधि पर उससे जुड़ी बाध्यताओं के कारण कुछ विशेषता पहचानी जाती है । इसलिए ही इनमें व्याख्या की क्षमता होती है । उदाहरण के लिए मुनाफ़े बढ़ाने के लिए मजदूरी घटाने की प्रवृत्ति से पता चलता है कि हाल के दशकों में दुनिया का अधिकांश श्रम सघन उत्पादन दक्षिणी गोलार्ध के देशों में क्यों ले जाये गये । इसी तरह कच्चे माल की लागत में कटौती की प्रवृत्ति से पूंजीवादी विकास के साथ पर्यावरण के विनाश का जुड़ाव समझ आता है । इसलिए पूंजीवाद के आर्थिक तर्क अर्थात उसकी व्यवस्थाबद्ध बाध्यताओं की पहचान उसकी व्याख्या के लिए जरूरी है ।        

पूंजीवादी व्यवस्था की कार्यपद्धति की पहचान उसकी आलोचना के लिए तो जरूरी है ही इसके विकल्प की कल्पना और वकालत के लिए भी निहायत जरूरी है । अगर पूंजीवाद के अन्याय और नुकसान सांयोगिक होते तो उसमें कुछ सुधार करके इन्हें टाला जा सकता है समूची व्यवस्था को उलटने की जरूरत न होती लेकिन ये अन्याय उसमें निहित होते हैं इसलिए इसे पूरी तरह उलटे बिना उसकी इन समस्याओं से भी निजात नहीं मिल सकती । इसके आधार पर कहना होगा कि पूंजीवाद के बने रहने के साथ ये नुकसान और अन्याय कायम रहेंगे और इनको दूर करने के लिए बुनियादी बदलाव करने होंगे । केवल संपत्ति के समान बंटवारे की बात करने से काम नहीं चलेगा बल्कि हमें उस आर्थिक तंत्र की छानबीन करनी होगी और उसे उजागर करना होगा जो इस असमान वितरण को जन्म देता है । नारीवादी सिद्धांत के लिए तो पूंजीवादी व्यवस्था की लाक्षणिक विशेषताओं की छानबीन खासकर जरूरी है क्योंकि इनके जरिए ही  लैंगिक पराधीनता का जन्म होता है । इस छानबीन से ही विश्व पुनरुत्पादन बाजार जैसे समकालीन विवादास्पद राजनीतिक मुद्दों की समझ बन सकेगी । उदाहरण के लिए भारत में गरम मौसम के कारण किराये की कोख का धंधा इतने बड़े पैमाने पर नहीं फल फूल रहा । इसके पीछे वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था काम कर रही है ।                                               

लेखिका का कहना है कि परिस्थितिकी संकट और लैंगिक विषमता के मद्देनजर वे पूंजीवाद की उस आलोचना को आगे विकसित करना चाहती हैं जिसमें उसकी व्यवस्थागत विशेषताओं को पहचानने का प्रयास किया जाता है । वे इसे नियति समझे जाने का विरोध करती हैं । उनका मानना है कि विपरीत लिंगी पितृसत्ताक एकल परिवार में लैंगिक श्रम विभाजन पूंजीवाद के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन इस महत्व का मतलब यह नहीं कि पूंजीवाद ने इस तरह के परिवार को पैदा किया या इसके बिना उसका होना सम्भव नहीं है । असल में पूंजीवाद की खास आर्थिक बाध्यताओं को विशेष सामाजिक संबंधों और राजनीतिक आचरण के साथ ऐतिहासिक तौर पर नत्थी मान लेना बेहतर होगा उसके रूप तरह तरह के हो सकते हैं । पूंजीवाद की ऐसी आलोचना की लम्बी परम्परा रही है जिसमें दरिद्रीकरण से लेकर मुनाफ़े की गिरावट की प्रवृत्ति तक बहुत कुछ सूत्रबद्ध किया गया । इन आलोचनाओं में कहा यह जाता है कि असल में पूंजीवाद की कार्यपद्धति में आत्मघाती प्रवृत्ति होती है । लेकिन 1990 दशक के बाद जब तमाम देश समाजवाद से वापस पूंजीवाद की ओर गये तबसे इस आलोचना में गिरावट आयी । लगता है कि उत्पादकता के ही पैमाने पर आंकने से पूंजीवाद ने सर्वोत्तम अर्थतंत्र की वर्तमान प्रतियोगिता जीत ली है । यह भी अधिकाधिक स्पष्ट होता जाता लग रहा है कि आदतन हमेशा संकट में फंसे होने के बावजूद पूंजीवाद ने अद्भुत लचीलेपन का परिचय दिया, अनेकानेक संकटों के बाद भी खुद को खड़ा कर लिया और उत्पादकता को लगातार बढ़ाता जा रहा है । जब वामपंथ राजनीतिक तौर पर तर्क खो बैठा तब उसके पास केवल नैतिक आलोचना का सहारा रह गया और उसकी हार पूरी तरह तय महसूस हुई । सामाजिक न्याय और आर्थिक समता की मांगों को आर्थिक यथार्थ की दुनिया में ववजह की दया भावना ही कहा गया । इसी आधार पर बालश्रम की समस्या या मानवेतर प्राणियों के कष्ट को व्यक्तियों की ऐसी नैतिक समस्याओं के बतौर पेश किया गया जिनके समाधान के लिए उपभोक्ताओं की वरीयता बदलना ही सबसे बेहतरीन तरीका प्रतीत हुआ ।     

पूंजीवाद की आलोचना के लिहाज से इस समय नया सैद्धांतिक और राजनीतिक माहौल है । उसकी पारिस्थितिकीय आलोचना से प्रकट हो रहा है कि पूंजीवादी अर्थतंत्र टिकाऊ नहीं रह गये हैं । असल में इस समय का पर्यावरणिक संकट इससे पहले आये सभी  पूंजीवादी संकटों से गुणात्मक रूप से अलग है । यह पूंजीवादी व्यवस्था में निहित है, ठोस है और इसकी प्रकृति ढांचागत किस्म की है । अनंत पूंजी संचय की बाध्यता से इसका जन्म हुआ है और व्यवस्था को ही अस्थिर बना देता है । दांव पर न केवल आर्थिक तंत्र या जीवन पद्धति की निरंतरता है बल्कि धरती पर मौजूद समूचा जीवन ही खतरे में आ गया है । कम से कम 1972 के बाद से ही पूंजीवाद की इस पारिस्थितिकीय आलोचना पर सार्वजनिक चर्चा हो रही है । उस समय कंप्यूटर की सहायता से बता दिया गया कि संसाधनों के लगातार दोहन से उनकी उपलब्धता में कमी आ रही है और ऐसे में आर्थिक वृद्धि अनंत काल तक जारी नहीं रह सकती । उस समय इस अनुमान की बहुत चर्चा हुई लेकिन बाद के दशकों में इस दावे पर निराशाजनक कहकर हमले हुए और उसका असर जाता रहा । अब बहुत दिनों बाद जलवायु परिवर्तन ने पूंजीवाद की पारिस्थितिकीय आलोचना को नयी ऊर्जा दी है । वृद्धि की सीमा संबंधी 1970 दशक के दावे से बात बहुत आगे तो नहीं बढ़ी लेकिन वर्तमान सदी की सबसे बड़ी पर्यावरणिक समस्या सस्ते संसाधनों की समाप्ति की जगह सस्ते कूड़े का प्रसार हो गयी है । जलवायु परिवर्तन से प्रत्यक्ष हो रहा है कि हमारे पर्यावरण का ध्वंस विकास का दुखद सहउत्पाद ही नहीं समझा जा सकता जिसका असर भविष्य में कभी होना हो । इस ध्वंस से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का चलना ही दुश्वार हो गया है । पूंजीवाद की वर्तमान पर्यावरणिक आलोचना में पूंजीवादी अर्थतंत्र का वृद्धि का निहित तर्क और पारिस्थितिकी का तर्क आपस में विरोधी हो गये हैं । इस अंतर्विरोध को तरह तरह से सूत्रबद्ध किया जा रहा है । इसका सबसे लोकप्रिय रूप मार्क्सवाद की यह दृष्टि है कि पूंजीवाद में उत्पादन का उद्देश्य मनुष्य की जरूरत नहीं बल्कि निजी मुनाफ़े की तुष्टि होता है और इससे होने वाले विनाश का एक रूप पर्यावरण का ध्वंस है ।                                                                   

मार्क्स ने पूंजीवादी अर्थतंत्र के एक और नियम को पहचाना था । उसे उन्होंने पूंजीवादी संचय कहा था ।  इसे ही इस समय आर्थिक वृद्धि की अंधी दौड़ कहते हैं । दुनिया के लगभग सभी देशों की सरकारों का एकमात्र लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि बन गया है । किसी भी स्थिर पूंजीवादी अर्थतंत्र में वृद्धि की अनिवार्यता को अलग तरीके से भी समझा जा सकता है । लघु स्तर पर इसे निजी उद्यमियों द्वारा मुनाफ़े का संचय समझ सकते हैं जिसे वह उद्यम के विस्तार और नवीकरण पर खर्च करता है ताकि खुले बाजार में अन्य उद्यमियों के साथ होड़ में वह टिका रह सके । मतलब कि इस खेल में बने रहने के लिए उन्हें नये उत्पाद बाजार में लाने पड़ते हैं और नयी तकनीक अपनानी पड़ती है । साथ ही श्रम की उत्पादकता भी बढ़ानी होती है अन्यथा वे इस होड़ में टिक नहीं सकेंगे । मुनाफ़े के संचय की इसी बाध्यकारी वृत्ति के कारण श्रम को सस्ता रखना पड़ता है और बाजार को लगातार विस्तारित करना पड़ता है । साथ ही श्रम की उत्पादकता में सुधार लाना होता है और उत्पाद को नया रूप देना पड़ता है । बड़े स्तर पर आर्थिक वृद्धि जरूरी होती है ताकि श्रम की उत्पादकता में बढ़ोत्तरी के असर को संतुलित किया जा सके । श्रम की उत्पादकता में बढ़ोत्तरी से जो श्रमिक बेकार होते हैं उन्हें खपाने में आर्थिक वृद्धि का योगदान होता है । जब यह वृद्धि रुक जाती है तो बेरोजगारी बढ़ने लगती है, खर्च करने की क्षमता में गिरावट आने लगती है और उससे जुड़ी तमाम समाजार्थिक समस्याओं का भी जन्म होने लगता है । पूंजीवादी अर्थतंत्र में उद्यम को मानना होता है कि मुनाफ़ा होगा, उपभोक्ता को यकीन करना पड़ता है कि उसकी क्रय क्षमता और जीवन स्तर उन्नत होगा, सरकार को उम्मीद होती है कि टैक्स से कमाई बढ़ेगी तथा ॠणदाताओं और निवेशकर्ताओं को कर्ज वापसी तथा व्यवसाय में लाभांश का अनुमान रहता है ।     

आर्थिक वृद्धि की इसी दौड़ की आलोचना में पारिस्थितिकी के पक्षधरों का कहना है कि सीमित संसार में असीम वृद्धि असंभव है तो पूंजीवाद का अंतर्निहित अंतर्विरोध उजागर होता है । पूंजीवाद की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें आर्थिक अधिशेष के संचय के सहारे अनंत आत्मप्रसार का गुण होता है । इस अधिशेष का सृजन शोषण और होड़ के वशीभूत होने से होता है । इसके अनंत प्रसार की प्रवृत्ति के साथ पारिस्थितिकी की समूची प्रणाली का विरोध अनिवार्य है । आर्थिक वृद्धि के लिए ऊर्जा और संसाधनों का अधिकाधिक दोहन और उपभोग आवश्यक है । इससे पैदा कूड़ा लगातार बढ़ता जाता है जिसे पर्यावरण में ही खपाना होता है ।

जलवायु परिवर्तन के लिहाज से इस प्रक्रिया को देखें तो आर्थिक वृद्धि कार्बन आधारित पूंजीवादी अर्थतंत्र में होती है । इसके लिए जीवाश्म ईंधन की जरूरत बढ़ती जाती है और उसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ता जाता है । अगर जीवाश्म ईंधन की जगह नवीकरणीय ऊर्जा को अपना लिया जाए तो भी आर्थिक वृद्धि से पर्यावरण के सातत्य के लिए समस्या पैदा होगी ही । इस तरह की ऊर्जा के लिए भी जंगलों की कटाई, मिट्टी का क्षरण और कूड़े के पहाड़ की प्रक्रिया जारी रहेगी । इससे वातावरण में प्रतिवर्ष अधिकाधिक ग्रीनहाउस गैस की मात्रा बढ़ेगी । इस समस्या से निजात पाने के लिए ही हरित वृद्धि या सतत वृद्धि का नारा दिया जाता है । इसका मतलब यह कि आर्थिक वृद्धि को प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग तथा ग्रीनहाउस गैसों के नुकसानदेह पर्यावरणिक असर से अलगाना है । इस तरह उत्पादन की बढ़ती के साथ पर्यावरण प्रदूषण के अनिवार्य संबंध को समाप्त मान लिया जाता है । साफ ऊर्जा और उत्पादित वस्तुओं को वापस उपयोग में लाकर तथा सक्षम तकनीक के इस्तेमाल से आर्थिक वृद्धि का संबंध धरती के संसाधनों की सीमाओं के अतिक्रमण से नहीं रह जाएगा । भविष्य का हरित पूंजीवादी अर्थतंत्र संसाधनों के किफ़ायती इस्तेमाल पर आधारित होगा और अभौतिक आर्थिक गतिविधियों से चलेगा । इससे सकल घरेलू उत्पाद की बढ़ोत्तरी का पर्यावरण पर बहुत कम असर पड़ेगा ।

इस तरह की हरित वृद्धि की वकालत वाम के साथ दक्षिणपंथ की ओर से भी होती है । तर्क दिया जाता है कि इसमें बहुत ही कम आर्थिक नुकसान है । ऊपर से लाखों नयी नौकरियां पैदा होंगी । इसका अर्थ कि आर्थिक वृद्धि के फायदे तो मिलते ही रहेंगे, ऊपर से बिजली से चलने वाली कारों के साथ नयी नौकरियां भी पैदा होंगी । उस अर्थतंत्र में भौतिक वस्तुओं की मात्रा भी कम होती जाएगी । इस तरह टिकाऊ और लगातार वृद्धि की समस्या का हल खोज लिया गया । दुर्भाग्य से यह आशा फलीभूत नहीं हुई ।

ऐसी हालत में आंकड़ों की बाजीगरी के सहारे झूठ फैलाने की कोशिश की जाती है । इसके अतिरिक्त विकसित देशों ने दोहन, निर्माण और वितरण का काम अपने देशों से दूर कर लिया जिससे प्रदूषणकारी गतिविधियों का असर कम दिखाई देने लगा । आंकड़ों को देशों में बांटकर पर्यावरण के नुकसान को कम करके दिखाया जाता है । दुनिया भर में प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल में विगत सौ सालों में दस गुना से अधिक की वृद्धि हुई है और कुछ दशकों से इसकी रफ़्तार तेज हो गयी है । उत्पादन प्रक्रिया के हरितीकरण की कोशिश से होने वाले लाभ को उपभोग की बढ़त ने बराबर कर दिया है । आर्थिक मंदी ने केवल कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में मदद की है । एक ही उम्मीद की जा सकती है कि किसी तकनीकी खोज से साफ और सस्ती ऊर्जा का अपार भंडार खुल जाए या उपयोग की हुई वस्तुओं को फिर से उपयोग में आने लायक बनाने की विधि असीम हो जाए । इन सबके बावजूद एक सीमा तो भौतिकी के नियमों के कारण बनी हुई है । शून्य से कोई वस्तु नहीं बनायी जा सकती इसलिए तमाम खोजों के बावजूद संसाधनों की बरबादी से पूरी तरह नहीं बचा जा सकता । 

इसके बाद लेखिका ने अपने देश फ़िनलैंड का उदाहरण दिया है जो आकार में छोटा लेकिन तकनीकी रूप से उन्नत है । उसके लिए अनुमान है कि 2050 तक ही पर्यावरणिक रूप से टिकाऊ स्तर हासिल किया जा सकेगा । इसे हासिल करने के लिए उस देश को सामग्री के उपयोग में 70 प्रतिशत की कमी लानी होगी और प्रत्येक टन सामग्री से लगभग 7 गुना आर्थिक उत्पाद बढ़ाना होगा । इस लक्ष्य को हासिल करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती । जब एक छोटे से देश का यह हाल है तो जाहिर है कि दुनिया के पैमाने पर चुनौतियां और भी कठिन हैं । कार्बन उत्सर्जन का निर्धारित लक्ष्य पाने और धरती की सीमाओं में रहने के लिए जितनी तेजी से संसाधनों और उत्सर्जन के क्षेत्र में दक्षता हासिल करनी है वह दिमाग चकरा देने वाली है । नौ अरब लोगों की आमदनी में लगातार बढ़ोत्तरी लाने वाला कोई भी तरीका नहीं खोजा जा सका है जो सामाजिक तौर पर न्यायपूर्ण और पारिस्थितीय रूप से टिकाऊ साबित हो । इसका मतलब कि पर्यावरण के संकट को हल करने और नुकसानदेह गैसों के उत्सर्जन को कम करने का इस समय एकमात्र तरीका लगातार आर्थिक वृद्धि के पूंजीवादी तर्क को चुनौती देना है ।                                

इस तरह पूंजीवाद की पर्यावरणिक आलोचना भी यही बताती है कि पूंजीवादी व्यवस्था अपना दुश्मन आप ही है क्योंकि वह मनुष्य के रहने लायक एकमात्र सुरक्षित स्थान अर्थात धरती की सीमाओं का लगातार उल्लंघन कर रही है । इसका अर्थ यह नहीं कि पूंजीवाद का विनाश अपने आप हो जाएगा या आर्थिक वृद्धि अनिवार्य तौर पर समाप्त या धीमी हो जाएगी । खतरे का निशान पार किया जा चुका है और वृद्धि की रफ़्तार पर कोई रोक नहीं लगी है । उसकी जगह पूंजी ने वृद्धि के नये नये क्षेत्र खोज लिये हैं । समुद्र तट पर दीवार, सरहदों का फौजीकरण, आर्कटिक में खनन और मिट्टी को क्षारमुक्त करने के उद्यम जैसे नये क्षेत्र खुल रहे हैं । ऐसा हो सकता है कि सामाजिक और पारिस्थिकी का ढांचा तो चरमराकर ढहता जाए और सकल घरेलू उत्पाद भी बढ़ता जाए । सम्भव है यह परिघटना अल्पजीवी हो । अगर हम धरती की सीमाओं का उल्लंघन लम्बे समय तक करते रहें तो ऐसी प्रक्रियाएं शुरू हो जा सकती हैं जो पृथ्वी के विनाश की गति को त्वरित कर दें और उन्हें रोकना सम्भव न रह जाए । इसके बाद तो अकाल, सुखाड़, बाढ़, दावाग्नि, तूफान, समुद्र तल का ऊपर उठना, जानलेवा लू और पारिस्थितिकी तंत्र का खात्मा जैसी चीजें इतनी तेजी से घटित होना शुरू करेंगी कि सरकारों के लिए नागरिकों की जरूरत तुष्ट करना मुश्किल होता जाएगा, उनकी सारी अधिरचना चरमरा जाएगी, समाज में विक्षोभ बढ़ेगा, अप्रत्याशित पैमाने पर प्रवास होगा और अनगिनत मौतें होंगी । इसलिए पूंजीवाद द्वारा धरती की सीमाओं के उल्लंघन की वजह से खुद ब खुद खात्मे का इंतजार उचित नहीं है । जब तक ऐसा होगा तब तक उसके विकल्प के निर्माण में बहुत देर हो चुकी होगी । इस विवेचन से स्पष्ट है कि जो कुछ करना है अभी करना होगा ।  

पूंजीवाद से जो नुकसान हो रहे हैं उस सूची में पर्यावरण को भी शामिल कर लेने से ही काम नहीं चलेगा । इसको केंद्रीय मुद्दा मानना होगा । इससे पूंजीवाद के विकल्प की हमारी कल्पना और उसकी वकालत का सीधा संबंध है । ये विकल्प पीछेदेखू और अतीतमोह पर आधारित नहीं हो सकते । इसमें सोवियत संघ भी हमारे काम का नहीं है । वहां भी आर्थिक वृद्धि और ऊपर से चलने वाला प्रशासन रहा था । इसके लिए द्वितीय विश्वयुद्ध का सामाजिक जनवाद भी मददगार नहीं होगा क्योंकि उसका आधार उस समय की आर्थिक समृद्धि में था । द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति से लेकर 1970 दशक के पूर्वार्ध तक का समय पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में अक्सर स्वर्णयुग की तरह प्रचारित किया जाता है । उस समय आर्थिक वृद्धि, रोजगार और जीवन स्तर के मामले में प्रचुर उन्नति देखी गयी । उसी समय इन देशों में आर्थिक समता भी आयी और कल्याणकारी राज्य का निर्माण हुआ । इसलिए बहुतेरे नारीवादी और समाजवादी चिंतक समाजार्थिक सफलता और समाजवादी नीतियों के निर्माण में अन्योन्याश्रय समझते हैं । उनको लगता है कि कोई भी मजबूत कल्याणकारी राज्य न केवल जोरदार आर्थिक उन्नति के साथ बना रह सकता है बल्कि दोनों एक दूसरे के कारक भी हो सकते हैं इसलिए सामाजिक व्यय बढ़ाने और लिंग संवेदी बजट से उस स्वर्णयुग को वापस लौटाया जा सकता है ।

इसके बरक्स लेखिका का कहना है कि पर्यावरण की निगाह से विश्लेषण करते ही उस समय का आर्थिक इतिहास अलग नजर आने लगता है । उस समय का स्वर्ण युग सफल समाजवादी नीतियों के कारण नहीं आया था बल्कि उसकी वजह सस्ती अनवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता तथा धरती के संसाधनों की सीमाओं के प्रति उपेक्षा थी । उस समय की उन्नति सस्ते तेल के व्यापक उपयोग पर आधारित थी । इससे नयी जीवन पद्धति ही बन गयी  । मोटर उद्योग के साथ रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों से खेती की उत्पादकता में भी इजाफ़ा हुआ । इसके अतिरिक्त आवास, वस्त्र और चिकित्सा के प्रत्येक पहलू में प्लास्टिक का उपयोग बढ़ा । यह आर्थिक समृद्धि भौगोलिक रूप से सीमित रही । इसका निर्माण प्रतिबंधात्मक और असंतुलित विश्व व्यापार व्यवस्था पर हुआ था जिसमें तीसरी दुनिया का क्रूर शोषण शामिल था । विश्व व्यवस्था के केंद्र पर स्थित देशों में समता और समृद्धि तो जरूर आयी थी लेकिन उसकी कीमत परिधि को चुकानी पड़ी थी । स्वर्ण युग की यही प्रच्छन्न कीमत थी । 1970 दशक के उत्तरार्ध तक आते आते यह विकास रुक गया । इसके कारण आर्थिक अवरोध और बेरोजगारी फैले । फिर 1980 दशक में नवउदारवादी नीतियों की ओर जाना पड़ा ।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के कल्याणकारी राज्यों के पीछे लाखों लोगों द्वारा हालात के बदलाव की मांग थी । इस उन्नति के लिए धन आर्थिक वृद्धि से आया था । इसके लिए अर्थतंत्र में कोई बदलाव नहीं किया गया था । यहां तक कि मुनाफ़े के वितरण में भी कोई खास पुनर्गठन नहीं हुआ था । इस समय आर्थिक वृद्धि और सस्ती ऊर्जा के मामले में परिस्थिति बदली हुई है । ऐसी स्थिति में लेखिका के मुताबिक राजनीतिक गोलबंदी भी दूसरे तरीके से करनी होगी । इसका आधार मुनाफ़े में अपने हिस्से की बढ़ोत्तरी ही नहीं हो सकता । इस समय तो आर्थिक वृद्धि पर ही सवाल उठाना होगा ।

पूंजीवाद की ऐसी आलोचना नैतिक आधार पर नहीं की जाती । इसकी जगह बताया जाता है कि वह अपने दावों के लिहाज से भी संतोषजनक काम नहीं करता । करना यह है कि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर की गणना होगी और जनांकिकी के आधार पर जनसंख्या में बढ़ोत्तरी का अनुमान करना होगा । इसके बाद उपलब्ध संसाधनों तथा मनुष्य के जीने लायक कार्बन उत्सर्जन के स्तर को पारिस्थितिकी के हिसाब से पेश करना होगा । इससे पता चलेगा कि हमारी वर्तमान आर्थिक गतिविधि किसी भी मामले में टिकाऊ नहीं है । लगता तो है कि यह सब एकदम निष्पक्ष है लेकिन ऐसा होता नहीं है । वास्तविक दुनिया में इसका एकदम ही सीधा रिश्ता शक्ति संबंधों से बन जाता है । असल में शक्ति संबंध और पूर्व मान्यता तथा नैतिक सवाल आर्थिकी से जुड़े रहते हैं । इसलिए इस आलोचना की सीमा दिखाना भी लेखिका को जरूरी लगता है । यह आलोचना पूंजीवाद के आर्थिक तर्क के भीतर ही रहती है इसलिए पूंजीवाद की संकीर्ण आर्थिक समझ के आधार पर ही वह काम करती है । नैतिक सवालों को विचार के दायरे से बाहर निकाल देने का मतलब समकालीन पूंजीवाद की अनेक गम्भीर समस्याओं को भी ओझल कर दिया जाता है । किराये की कोख और वेश्यावृत्ति जैसे धन्धे समुचित क्षतिपूर्ति, सुरक्षित वातावरण तथा मांग और पूर्ति के बीच संतुलन तक सीमित रह जाते हैं । समकालीन पूंजीवादी समाजों की इन नैतिक समस्याओं पर ध्यान न देने से इन समाजों में अधिकाधिक वस्तूकरण पर बात नहीं होती ।

तमाम गतिविधियों, घटनाओं, उत्पादों और सामग्रियों को विक्रेय वस्तु में बदलना और इस तरह बाजार की पहुंच को विस्तारित करना पूंजीवाद की प्रधान प्रेरणा समझी जा सकती है । यह प्रवृत्ति हाल के दशकों में प्रभुत्वशाली रहे नवउदारवादी पूंजीवाद में खासकर प्रमुखता प्राप्त करती गयी है । शुद्ध आर्थिक तर्कों के आधार पर इसकी गलतियों को स्पष्ट करना असम्भव है । वस्तूकरण आर्थिक वृद्धि का प्रमुख साधन होता गया है क्योंकि सकल घरेलू उत्पाद को बाजार की लेनदेन के आधार पर नापा जाता है । जो सार्वजनिक सेवाएं, सांस्कृतिक उत्पाद, जीवन के रूप, भौतिक स्थान और सामाजिक संबंध व्यवसाय के बाहर थे उनका लगातार निजीकरण हो रहा है और उन्हें विक्रेय माल में बदला जा रहा है । इसका मतलब कि बाजार आधारित लेनदेन बढ़ेगा और इससे सकल घरेलू उत्पाद का सूचकांक ऊपर जाएगा ।                  

लेखिका का कहना है कि जिन वस्तुओं का भी व्यापार बाजार में होता है उनका आंतरिक स्वभाव और नैतिक अर्थ बाजार बदल देता है । जब अधिकाधिक गतिविधियों और वस्तुओं को विक्रेय माल बना दिया जाता है तो उनको देखने का लोगों का नजरिया भी बदल जाता है । उनके साथ मनुष्यों के रिश्ते भी नये हो जाते हैं । पूंजीवादी उदार समाजों में सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी रूप से स्थापित सीमाओं के भीतर ही किसी वस्तु या सेवा को माल समझा जाता है, उसका मूल्य तय होता है, उसे व्यक्ति से अलगाकर बाजार में बेचा जाता है (मसलन श्रम, कार, जानवर, सेक्स आदि), कुछ को अलगाया जाता है लेकिन बिक्री नहीं होती (मसलन गोद लिये गये बच्चे) और कुछ को अलगाया भी नहीं जाता (मसलन मतदान जैसे राजनीतिक अधिकार) । इनके बीच का अंतर राजनीतिक मोलतोल और नैतिक बहसों से तय होता है । पूंजीवाद की नारीवादी आलोचना को वस्तूकरण की उचित सीमा का सवाल उठाना चाहिए और इस पर राजनीतिक विवाद खड़ा करना चाहिए । हालांकि वस्तूकरण के आलोचकों को नारीवादी सिद्धांत में पीछे हटना पड़ा लेकिन नवउदारवादी पूंजीवाद के नारीवादी प्रतिरोध में उसकी प्रासंगिकता फिर से पैदा हो रही है । विश्व पूंजीवादी बाजार के साथ जैव प्रौद्योगिकी का जैसा गठबंधन हुआ है उसमें नये ही किस्म के राजनीतिक हस्तक्षेप की जरूरत महसूस हो रही है क्योंकि शरीर, यौनिकता, नातेदारी, स्वायत्तता और सम्मान से जुड़े कठिन और गहरे नैतिक समस्याओं का सामना करने की मजबूरी आ पड़ी है । अब बाजार के भेदभाव को कम करने की मांग से ही काम नहीं चलेगा । इसकी जगह बाजार के अबाध प्रसार की बुनियादी आलोचना जरूरी हो गयी है । इस आलोचना के लिए मुक्ति की उदारवादी धारणा के मुकाबले नयी धारणा बनानी होगी । उदारवाद तो आजादी को अबाध होड़ और मुक्त बाजार तक पहुंच ही समझता है । 

पूंजीवाद की आलोचना में अक्सर उसमें निहित संकट की प्रवृत्ति या संपत्ति के असमान वितरण पर ही जोर दिया जाता है । इस नैतिक आधार के मुकाबले लेखिका ने पूरी तरह नये मूल्यों की जरूरत बतायी है । उनका कहना है कि भौतिक संपदा से भी अधिक मूल्यवान की तलाश की जानी चाहिए । इस मामले में समाजवादी लोग अक्सर उदारवाद के मूल्यों से ही काम चलाते आ रहे हैं । समानता, लोकतंत्र, व्यक्ति की आजादी और अपने को सार्थक बनाना जैसे मूल्यों को अपनाकर साबित किया जाता रहा कि इन्हें पूंजीवादी समाजों के मुकाबले समाजवाद में अधिक अच्छी तरह साकार किया जा सकता है । हम मानकर चलते रहे हैं कि हमारे विरोधी भी बाल श्रम या गरीबी जैसी नैतिक बुराइयों का हल करने में साथ देंगे । लेखिका इस तरह की आलोचना को पर्याप्त नहीं समझतीं और उन मूल्यों, आदर्शों और सिद्धांतों को भी बुलंद करना चाहती हैं जिन्हें उदारवाद ने किनारे कर दिया । इनके बतौर वे देखरेख, घनिष्ठता, अंतरनिर्भरता, समानुभूति और सातत्य जैसे मूल्यों का उल्लेख करती हैं ।

उनका कहना है कि मार्क्सवादी नारीवाद में सामाजिक पुनरुत्पादन का अर्थ ऐसी गतिविधियों से लगाया जाता है जो श्रम शक्ति नामक माल को बनाये रखने और ताजा करने के लिए जरूरी हैं । इसका मतलब होता है मजदूर को बाजार में टिकाये रखने के लिए जरूरी काम । असल में मजदूर तो मशीन होते नहीं वे जीवित मनुष्य होते हैं जो खाते और सोते, बच्चे पैदा करते, अपने परिवारों की देखरेख करते और अपने समुदाय को कायम रखते हैं । पूंजीवाद इन सभी गतिविधियों का अवमूल्यन करता है और मानव समुदाय के पुन:सृजन तथा सामाजिक संबंधों को टिकाये रखने के लिए जरूरी सामूहिक और निजी क्षमता को कमजोर करता है । सामाजिक पुनरुत्पादन के संघर्ष इस समय विस्फोटक हो गये हैं क्योंकि नवउदारवादी माहौल में प्रत्येक घर से अधिकाधिक लोगों को वेतनभोगी काम में लम्बे समय तक लगना पड़ता है लेकिन सामाजिक कल्याण की सरकारी व्यवस्था घटती जा रही है । पूंजीवाद के तहत परिवार पर असहनीय बोझ पड़ता है । जब सब कुछ धन के लिए किया जाता हो तो अन्य मनुष्यों और मानवेतर प्राणियों से सार्थक संबंध, प्रेम, समानुभूति और करुणा जैसी अमूल्य भावनाएं तथा देखरेख के अनुभव भी वैकल्पिक सिद्धांत और राजनीति का आधार बन सकते हैं । इसका मतलब यह नहीं कि पूंजीवाद की आलोचना अमूर्त और नैतिक ढांचे के अंतर्गत ही बनानी होगी । कहने का अर्थ केवल यह है कि नारीवादी और पर्यावरणवादी राजनीति का नैतिक पहलू भी होना चाहिए ।   

लेखिका का मानना है कि पूंजीवाद के विरोधी राजनीतिक संघर्षों में नैतिकता के प्रवेश को देखते हुए पूंजीवाद की कोई स्थिर स्थायी धारणा बनाना सही नहीं होगा । पूंजीवाद के विश्लेषण को इतना जटिल और बहुस्तरीय होना चाहिए कि पूंजीवाद की विविधतापूर्ण और कभी कभी अंतर्विरोधी गतिकी को भी पकड़ा जा सके और पूंजीवादी संचय के अंतर्निहित तर्क को उजागर भी किया जा सके । अनेक नारीवादी चिंतक मानती भी हैं कि पूंजीवाद को महज अर्थतंत्र नहीं समझा जा सकता । इसे संस्थाबद्ध समाज व्यवस्था समझना होगा जिसमें वे अर्थेतर क्षेत्र भी आ जाते हैं जिनके सहारे यह अर्थतंत्र चलता है । इसमें सामाजिक पुनरुत्पादन, धरती की पारिस्थितिकी और राजसत्ता भी शामिल हैं । ऐसी धारणा के आधार पर ही पूंजीवाद की गहराई और व्यापकता का सही अनुमान किया जा सकता है । तभी हम वित्तीय, समाजार्थिक, पारिस्थितिकीय और राजनीतिक समस्याओं के साझा उद्गम को देख सकेंगे । तभी पूंजीवाद के विरोध में ऐसी व्यापक गोलबंदी हो सकेगी जिसमें सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मोर्चे पर नानाविध ताकतें शामिल होंगी । हमारे दौर में चलने वाले तमाम सामाजिक आंदोलनों में घनिष्ठ सहयोग के लिए भी यह जरूरी है ।

पूंजीवाद की यह व्यापक समझ नारीवादी सिद्धांत और राजनीति के लिए भी जरूरी है क्योंकि इससे लैंगिक भेदभाव के वे पहलू भी नजर आएंगे जो सीधे सीधे आर्थिक नहीं होते । इससे पूंजीवादी उत्पादन की अनिवार्य पृष्ठभूमि के बतौर स्त्री श्रम नजर आता है । जब हम पूंजीवाद को ऐसी व्यापक समाज व्यवस्था मानते हैं जो न केवल लैंगिक भेदभाव बल्कि नस्ल, यौनिकता, जातीयता, उपनिवेशिकता, साम्राज्यवाद, विपरीतलिंगी पितृसत्ता और सक्षमतावाद से भी जुड़ी है तो स्पष्ट है कि यह केवल अर्थतंत्र तक नहीं रह जाती, उसका प्रसार अर्थेतर क्षेत्र तक हो जाता है । इस तरह की समझ के आधार पर ही हम लिंग, नस्ल और वर्ग के आपस में जुड़े उत्पीड़न के विविध रूपों को पूंजीवाद के ही आयामों की तरह देख सकेंगे । 

                                                                             

Friday, January 2, 2026

इस सदी की कविता

 

                

                             

जिस सदी में हम रह रहे हैं उसकी विशेषताओं को दर्ज करने में कविता ने कोताही नहीं की है । सबसे पहले इन विशेषताओं पर एक नजर मारना उचित होगा । इस सदी की शुरुआत पिछली सदी के एक जघन्य कृत्य से हुई थी जब राजनीति, शासन और अदालत के देखते देखते उत्तर प्रदेश की राजधानी के पड़ोस में स्थित मस्जिद को संगठित गिरोह ने धराशायी कर दिया था । उसके दस साल बीतने पर देश के पश्चिमी किनारे के एक प्रांत में राज्य प्रायोजित जनसंहार हुआ और उसके दाग मिटाने में नवउदारवाद से उपजे थैलीशाहों ने प्रचार अभियान चलाया । इन्हीं प्रवृत्तियों की निरंतरता से इस सदी की कहानी बनती है ।

वैसे तो इस प्रवृत्ति का वैश्वीकरण हुआ और संसार भर में सौ साल पहले के भूत याद आने लगे । हम सबका सामूहिक दुर्भाग्य था कि जिस हिटलर को दफ़नाया जा चुका था उसने नाना रूप धारण किये और पहले की तरह ही सड़कों पर सीना फुलाकर मार्च भी करने लगा । इस खास परिघटना ने सारी चीजों को नयी रंगत प्रदान की । इसे हमारे समय के सबसे सजग और महत्वपूर्ण कवि देवी प्रसाद मिश्र ने दर्ज किया । उनकी कविता ने इस सच को बयान करने के लिए गद्य तक बन जाने का जोखिम कविता में उठाया । खासकर ‘फ़ासिस्ट’ शीर्षक कविता में इस समय का मखौल बेहद खुलकर व्यक्त हुआ है । इस मामले में वे हिंदी कविता की उस धारा के नवीनतम विकास हैं जिसमें निराला, मुक्तिबोध और नागार्जुन जैसे कवि रहे हैं । उनकी कविता में हमारे इस भीषण समय की छवि वक्तव्य की तरह तीखी भाषा में उनकी गहन वैचारिक समझ के कारण व्यक्त हुई है । समय को दर्ज करने में कविता के रूपबंध के साथ लगभग इतना ही साहसिक प्रयोग पंकज चतुर्वेदी ने भी अपने ताजा संग्रह ‘काजू की रोटी’ में किया है । असल में समय इतना भीषण है कि उसके सच को कहने में कविता का परम्पराप्राप्त विधान पर्याप्त नहीं महसूस हो रहा इसलिए उसमें तोड़फोड़ जरूरी हो गयी । यह काम छंद और बेछंद के मेल से मृत्युंजय ने भी अपने संग्रह ‘स्याह हाशिए’ और अन्य कविताओं में किया है ।

इन कवियों ने सत्ता पोषित क्रूरता और अन्याय को उसके लगभग सभी रूपों और आयामों में उजागर किया है । हमने पहले ही कहा कि इस हालिया परिघटना ने सारी सामाजिक सचाइयों को नयी रंगत प्रदान की है । इस मोर्चे पर जो कुछ भी भारत की जनता ने हासिल किया था उन सबको उलट देने का अभियान सा चल पड़ा है । जाति और लिंग संबंधी पूर्वाग्रह अब महीन और परिष्कृत सांचों और ढांचों के मुहताज नहीं रहे । सामाजिक प्रतिक्रिया का घनघोर उत्थान हुआ और इसके प्रतिकार ने स्त्री और दलित कविता को नया जुझारू तेवर दिया ।

स्त्री कविता की सबसे बड़ी खूबी यह है कि अनामिका और कात्यायनी से आगे बढ़ते हुए नयी पीढ़ी ने न केवल स्त्री पराधीनता की मुख्य वजह पितृसत्ता को उसके नवीनतम रूपों में बेनकाब किया बल्कि सभी तरह की वंचनाओं का विरोध करते हुए उत्पीड़ितों के बीच व्यापक एकता बनाने का माहौल निर्मित किया है । इस क्रम में उन्होंने स्त्री मुक्ति को समग्र सामाजिक मुक्ति का अंग बना दिया है । इसका सबसे पक्का सबूत यह है कि दलित और आदिवासी कविता में भी उनकी उपस्थिति मुखर है ।   

हमारे देश में वर्तमान शासक विचार जिस वैचारिकी के आधार पर कार्यरत है उसमें बहुसंख्यकवाद की प्रमुख भूमिका है । स्वाभाविक है कि इससे अल्पसंख्यक समुदायों का बहिष्करण देखा जा रहा है । कहने की जरूरत नहीं कि इसका भाषिक पहलू भी है । दुर्भाग्य से जिसे राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश के आधार पर इस प्रयास को औपनिवेशिक मानसिकता का उन्मूलन कहा जा रहा है उस हिंदी के साथ देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का गहरा रिश्ता है । पहचान के निर्माण के क्रम में बताया जा रहा है कि उर्दू नामक भाषा का रिश्ता धार्मिक रूप से इस अल्पसंख्यक समूह के साथ है । कठिनाई यह है कि बहुत दिनों से जारी इस प्रयास के बावजूद उर्दू के साथ हिंदुओं के और हिंदी के साथ मुसलमानों के संबंध को मिटाना अब भी असम्भव ही बना हुआ है । इसी वजह से हिंदी कविता में मुसलमान कवियों की उपस्थिति न केवल अतीत में बल्कि आज भी बनी हुई है । इस विशेषता के कारण इस धार्मिक अल्पसंख्यक समूह की व्यथा भी इस सदी की कविता में जोरदार तरीके से दर्ज हुई है । मस्जिद को धराशाई करने के कारनामे का अगला चरण इस समुदाय के राजनीतिक बहिष्करण का है जिसके लिए उनकी नागरिकता को प्रश्नांकित करने की संस्थाबद्ध कोशिश हाल के दिनों में की गयी । देशभक्ति की सांप्रदायिक व्याख्या भी आम लोगों के भीतर प्रविष्ट कराने के प्रयास ने इस कविता को खास तीखापन प्रदान किया है और उसने दायरे में देश की आजादी के दौरान हासिल देशभक्ति की उस व्यापक भावना को मुखरित किया है जिसे रवींद्रनाथ जैसे विश्वकवि ने व्यापक मानव मुक्ति के साथ जोड़ दिया था । सामाजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न करने की औपनिवेशिक चाल की विरासत को आज भी जिस तरह नया बनाया जा रहा है उस वातावरण में सामुदायिक सवाल को व्यापक लोकतांत्रिक आजादी के सवाल के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना जायज है । इस मामले में हिंदी कविता के कवि समस्त वर्तमान भारतीय कविता की धर्मनिरपेक्ष धारा के साथ खड़े हैं । इन कवियों में अदनान कफ़ील दरवेश के साथ आमिर अजीज़ का नाम लिया जा सकता है । आमिर अजीज़ ने तो कविता के पाठ के सौंदर्य को उजागर करने के लिए बहुत ही नये और रचनात्मक माध्यमों का सहारा लिया है ।             

जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव की संस्थाबद्ध व्यवस्था का प्रतीक हमारे धर्मग्रंथों की पवित्रता में व्यक्त हुआ है । इस तथ्य को 90 साल पहले अंबेडकर ने पहचाना था । इस व्यवस्था की उनकी इस समझ को नये समय के यथार्थ को पकड़ने के लिए नवीनतर बनाया गया है । हिंदी की दलित कविता में ओमप्रकाश वाल्मीकि के बाद की नयी पीढ़ी ने वंचना के नये रूपों को पहचानते हुए सामाजिक जीवन में सहभाग की अपनी दावेदारी को जोरदार तरीके से रखा है । उनकी भाषा की तुर्शी अलग से पहचानी जा सकती है । मोहन मुक्त, विहाग वैभव और पराग पावन दलित हिंदी कविता के नये चेहरे हैं ।

सभी जानते हैं कि हमारे समय में समस्त मध्ययुगीनता नवीनतम तकनीक के सहारे पुनरुत्पादित हो रही है । इसलिए उत्पीड़न और भेदभाव को वैधता प्रदान करने वाले औजार भी लगातार नये और परिष्कृत किये जाते रहते हैं । इनके ऊपर विकास और राष्ट्रवाद का मुलम्मा चढ़ा रहता है । इस धोखे की असलियत को सटीक भाषा में पकड़ना और सबके लिए सुबोध और कायल करने वाली अभिव्यक्ति में ढालना बहुत बड़ी चुनौती है । इस चुनौती को अन्य कवियों के अतिरिक्त दो ऐसे कवियों ने स्वीकार किया जो बुजुर्ग तो हैं लेकिन जिनका काव्य लेखन आज भी जारी और प्रासंगिक है । अष्टभुजा शुक्ल और दिनेश कुमार शुक्ल नामक इन कवियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनकी कविताओं में संस्कृत की क्लासिक कविता की अनुगूंज के साथ ही लोक के सहज बोध की भाषिक अभिव्यक्ति का दुर्लभ संयोग है । इन दोनों की कविताओं के स्वर अनेकविध हैं खासकर अष्टभुजा की कविता में मारक व्यंग्य की मौजूदगी है ।      

समय के यथार्थ का एक प्रमुख पहलू औपनिवेशिक जमाने का पुनरुत्थान है । यह पुनरुत्थान अन्य चीजों के साथ प्राकृतिक संसाधनों की लूट के रूप में सामने आया है । इन संसाधनों की अबाध लूट में सबसे बड़ी बाधा आदिवासी समुदाय है । उस पर बने नये संकट को हिंदी कविता के आदिवासी चेहरे ने व्यक्त किया है । इस कविता में भारतीय राज्य के दमनकारी स्वरूप की पहचान के साथ सांस्कृतिक अस्मिता की दावेदारी भी हो रही है । इस धारा में अनुज लुगुन के साथ जसिंता केरकेट्टा और पूनम वासम की आवाजें सबसे ऊंची हैं ।

इस सदी की हिंदी कविता इस सदी की चुनौतियों से जूझते हुए आकार ले रही है । पिछली सदी में नवउदारवाद का आरम्भ हुआ था । अब वह अपनी निष्पत्ति के साथ गरज रहा है । उसकी गरज में भारतीय समाज के प्रभु वर्गों का मर्दाना और जातिगत श्रेष्ठता का दर्प गूंज रहा है । पुराने समय के इस नवोत्थान को आज के शासन का निर्लज्ज साथ मिला हुआ है । इस नवोत्थान के साथ ही इस दर्प के प्रतिरोध की प्राचीन धारा भी नये समय को समझते हुए वैचारिक रूप से समृद्ध होकर जिस तरह की काव्यात्मक अभिव्यक्ति कर रही है उसे सराहने के लिए नया काव्यबोध अपेक्षित है । आशा है कि पुराने काव्यबोध से संघर्ष करते हुए धीरे धीरे यह नया काव्यबोध हिंदी का सहज संस्कार बन जाएगा ।                         

Saturday, December 27, 2025

लोकतंत्र से फ़ासीवाद की ओर

 

                               

                                                                      

2024 में कैननगेट से एस तेमेलकुरान की किताब ‘हाउ टु लूज ए कंट्री: द 7 स्टेप्स फ़्राम डेमोक्रेसी टु फ़ासिज्म’ के नये संस्करण का प्रकाशन हुआ । इसे सबसे पहले 1919 में 4थ एस्टेट से छापा गया था । लेखिका ने पाठकों के नाम पत्र के रूप में इस संस्करण की नयी प्रस्तावना लिखी है । शीर्षक में लोकतंत्र और फ़ासीवाद होने से किताब बहुत अच्छी होने की उम्मीद नहीं रह जाती । लेखिका ने बताया है कि इस किताब में जिस रास्ते का उन्होंने वर्णन किया है उस पर चलकर पाठक का देश भी गुम हो जा सकता है । ऐसा होने से बचाने की जिम्मेदारी पाठक की ही है । उनका कहना है कि इतिहास के शुरू से ही मनुष्य तीन तरह की अक्षमता से ग्रस्त रहा है । जब कभी राजनीतिक आपदा से देश को बचाना होता है तो हम सभी देर से जागते हैं । यह आदत बेहद मारक साबित हुई है । खतरे की आहट सुनने का समय आने पर हम बहरे हो जाते हैं । दिमाग की किसी गड़बड़ी के कारण बुरी खबर को हम अनसुना कर देते हैं और खबरची का गला दबाकर दिमागी सुकून हासिल करते हैं । समस्या पैदा होने पर हमें यकीन रहता है कि कोई न कोई कुछ करेगा । बाद में लगता है कि वह कोई तो हमें होना था । इसलिए हमें दस्तावेजी इतिहास पसंग आता है । इन सब बातों के जानने के बावजूद हममें से ही कुछ लोग भविष्य की बात करना बंद नहीं करते । इसकी भी तीन वजहें हैं । खतरे का संकेत मिलने पर चुप रहना मुश्किल होता है क्योंकि अन्यथा हम पागल हो सकते हैं । सच को उजागर होना चाहिए । हम मानकर चलते हैं कि शब्दों की ताकत से मूर्खता का इलाज सम्भव है । हालांकि अक्सर इसका नतीजा खूनखराबे में निकलता है । इसके पीछे कहीं न कहीं यकीन रहता है कि एक न एक दिन मनुष्य अपनी गलतियों से सीखेगा तथा अपने राजनीतिक और नैतिक पतन का विरोध करने में देर नहीं करेगा ।  

2016 में ही लेखिका को तुर्की छोड़कर यूरोप जाना पड़ा था । तब उन्होंने लोगों को बताया कि जो कुछ दुनिया में होना शुरू हुआ है वह सब तुर्की में हो चुका है । तब ट्रम्प को मजाक की चीज समझा जाता था और ब्रेक्सिट को भी हल्के में लिया जा रहा था । उस समय विश्व राजनीति में जो पागलपन चालू हुआ था वह ऐसा विश्वव्यापी प्रयोग लगता था जिसके करने वाले किसी अन्य ग्रह के प्राणी लगते थे जो मानो सर्वाधिक हास्यास्पद राजनेताओं को झेलने की मनुष्य की क्षमता की परीक्षा कर रहे हों । उस समय लेखिका ने सात ऐसे वैश्विक रास्ते महसूस किये जिनसे होकर बहुतेरे देश फ़ासीवाद की गिरफ़्त में आ रहे हैं और यह मजाक की बात नहीं लगी । इन रास्तों का एक आंतरिक तर्क था और इस परिघटना की कार्यपद्धति को पहचाना जा सकता था । उन्हें लगा कि अगर ज्यादातर लोग इसके तरीके को जान लें और तदनुसार कार्यवाही करें तो इस खतरे को रोका जा सकता है ।

समस्या यह थी कि तब इस खतरे को बहुत कम ही लोग लेखिका की तरह फ़ासीवाद कहने को तैयार थे । जब भी वे इस शब्द का खुला प्रयोग करती थीं तो बौद्धिक समुदाय उनसे इतना जल्दी न करने का आग्रह करता था । उनका कहना है कि कोई भी स्थापित व्यवस्था इसी तरह अपनी रक्षा का उपाय करती है । 2019 में किताब के छपने के समय बौद्धिक समूह को खतरा महसूस तो होने लगा था फिर भी व्यवस्था में सुधार का आधारहीन आत्मविश्वास बरकरार था । यह वैचारिक भ्रम अब भी कायम है कि पश्चिमी लोकतंत्र बहुत हद तक परिपक्व हैं । उदार लोकतंत्र की बचकानी बीमारियों से उनकी सेहत में बहुत अंतर नहीं पड़ेगा । ऐसा होना केवल तुर्की या भारत जैसे परिधि के देशों में सम्भव है । उसके बाद जो हुआ उसे बताने की जरूरत नहीं । जिसे दक्षिणपंथी पापुलिज्म कहा जा रहा था वह नासूर की शक्ल ले चुका है । ट्रम्प अब प्रमुख राजनेता है और यूरोप अंधकार के मुहाने पर खड़ा है । बीमारी अर्जेन्टिना में भी पहुंच गयी है । इन सबके ऊपर गाज़ा का जनसंहार पूरी दुनिया के सामने जारी है ।

किताब के पहली बार छपने के बाद से लेखिका को अनेक भाषाओं में सोशल मीडिया में एक ही तरह की बातें देखने में आती रही हैं । सभी कहते हैं कि उनके देश में भी यही सब हो रहा है इसलिए किताब देखें । दुर्भाग्य से ऐसा कहने वालों का बहुमत नहीं बन सका है । लोकतंत्र को बचाने के लिए जितना कम प्रयास हो रहा है वह समस्या की गम्भीरता को देखते हुए बेहद नाकाफी है । उन्होंने देखा कि विगत पांच सालों में मुख्य धारा के बुद्धिजीवियों और मध्यमार्गी राजनेताओं में लोकतंत्र को बचाने के लिए बहुत ऊंचे स्तर की बहसें आयोजित हुईं लेकिन ये लेखिका को अधिकतर अपनी झेंप मिटाने की कोशिश ही महसूस हुईं । वे भी इनमें से बहुत सारी बहसों में शरीक थीं इसलिए उनको मालूम है कि उनमें व्यवस्था की उस समस्या को स्वीकार ही नहीं किया जाता जिसने इस राक्षस को पैदा किया है । अगर मान भी लिया तो वे खुद को इतना ज्ञानी और गम्भीर समझते हैं कि जनता के राजनीतिक फैसलों में उनकी राय न लिये जाने की शिकायत रहती है । आज की दुनिया में तमाम वैज्ञानिक भी कोरोना के दौरान जनता को टीका लगवाने और मास्क पहनने के लिए नहीं समझा सके थे जबकि तमाम झक्की लोग भांति भांति के दैवी षड़यंत्र की कहानियों पर लाखों अंधभक्तों का विश्वास अर्जित कर सके थे । जो लोग राजनीतिक केंद्र को बचाना चाहते थे या लोगों को उनके सहजबोध की ओर लौटाना चाहते थे उनकी हालत चंद मुट्ठी भर समर्थकों को उपदेश देने वालों जैसी रह गयी । दूसरी ओर जनमत संग्रह से पता चल रहा था कि दक्षिणपंथी पापुलिज्म का कुछ देर मजा लेने के बाद लोग खुशी खुशी फ़ासीवाद के गड्ढे में गिर रहे हैं । उसके बाद से सर्वत्र जनता लोकतंत्र से मुख मोड़ रही है । दुखद रूप से उनके सामने कोई चारा भी तो नहीं है ।    

लेखिका को लगता है कि लोकतंत्र की वर्तमान हालत दिखावे से अधिक नहीं रह गयी है । मानवता के सबसे गम्भीर वादे, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को भद्दे मजाक में बदल दिया गया था । जीवन की हकीकत आर्थिक प्रणाली में व्यक्त होती है और उसने इन तीनों को निगल लिया था । सच्ची समानता की बात करना गुनाह था, स्वतंत्रता मांगने लायक भी बची नहीं रह गयी थी । बंधुत्व से सबके मनोरंजन में बाधा पड़ने की आशंका थी । मतदान अलबत्ता कर सकते थे । कुछ कहना हो तो उसके लिए गैर सरकारी संगठनों का रास्ता खुला था । लोकतंत्र तो वैसे भी हकीकत नहीं बन सका था, अब नवउदारवादी अर्थव्यवस्था से जुड़कर वह अपने आदर्शों से और भी दूर हो गया । उसकी इस हालत को हम सबके सामने मानवता की असली अवस्था के रूप में परोसा जा रहा था । इस व्यवस्था में दसियों साल बिता लेने के बाद जनता को उस व्यवस्था में भरोसा ही नहीं रह गया था जो उनकी असुरक्षा को दूर करने का हक भी नहीं दे रही थी । लोग जब इस मजाक से ऊब गये तो उनका गुस्सा जायज था । समस्या यह है कि दक्षिणपंथी झूठे प्रचार के असर में लोग असली दुश्मन की जगह लोकतंत्र, स्त्री, आजादी और प्रवासियों के विरुद्ध खड़े हो गये हैं । नफ़रत में वे अपनी असुरक्षा का इलाज खोज रहे हैं । नफ़रत ने उस खाली जगह को भरा है जो राजनीति की दुनिया से गायब हो चुके लोकतांत्रिक आदर्शों के कारण खाली हुई है । नवउदारवाद के प्रभुत्व की वजह से दुनिया भर के लोग सच सुन ही नहीं सके थे । लोकतंत्र ने नहीं, उसके अभाव ने उन्हें धोखा दिया है । समानता, न्याय और सम्मान के अभाव ने व्यवस्था के दुश्मन को जन्म दिया है । इस दुश्चक्र से जूझने के लिए लेखिका तीन कामों की सलाह देती हैं । सच को उजागर किया जाए, जनता में भरोसा रखा जाए और विफल होने पर बेहतर समझ दिखाई जाए ।

वे अब भी अपने लिखे के असर के बारे मे सोचती हैं । इसीलिए यह किताब उन्होंने अपनी एक किताब की निरंतरता में लिखी । वह किताब हृदयहीन दुनिया में एकजुटता के बारे में थी । मार्क्स ने कहा था कि धर्म हृदयहीन दुनिया का हृदय है । लेखिका ने राहनीति के केंद्र में हृदय को स्थापित करने को सोचा । ऐसा हृदय जो वर्तमान व्यवस्था में मनुष्यों को सभ्यता और सम्मान लायक समझे । हम सब आत्मकेंद्रित स्वार्थी पुतले मात्र नहीं हैं जो गलाकाट प्रतियोगिता के कारण ही सक्रिय रहते हों । अगर हमारी राजनीतिक स्थिति के बारे में गहराई से सोचा जाए तो पता लगेगा कि मनुष्य की नैतिकता के बारे में ऊपर बताई गयी मान्यता का भी इससे घनिष्ठ रिश्ता है । समस्या चूंकि गहरी है इसलिए इधर उधर कुछ छोटा मोटा सुधार कर लेने से ही लोकतंत्र स्वस्थ नहीं हो जाएगा । इसके लिए आमूल बदलाव की राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है । इसके लिए होने वाले संघर्ष में लेखिका ने पाठकों का भी साथ चाहा है । इस पागलपन में मनुष्यता में यकीन कायम रखना कठिन है लेकिन उनके अनुसार यह करना ही पड़ेगा । अन्यथा कोई रास्ता नहीं है ।

Tuesday, December 23, 2025

लोकतांत्रिक पूंजीवाद का संकट

 

                               

                                                     

2023 में पेंग्विन प्रेस से मार्टिन वोल्फ़ की किताब ‘द क्राइसिस आफ़ डेमोक्रेटिक कैपिटलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि जैसे जैसे दुनिया उनके सामने उजागर होती गयी, वैसे वैसे उनके विचार बदलते गये । जड़ विचार रहना अच्छी बात नहीं होती । इसके बावजूद उनके मूल्य नहीं बदले । माता-पिता हिटलर के कारण निर्वासित शरणार्थी थे । उनके कारण ही लोकतंत्र के प्रति उनकी निष्ठा अचल रही । साथ ही नागरिकता, स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, तार्किकता और सत्य की प्राथमिकता में भी उनका यकीन कायम रहा । चौथे खम्भे की भूमिका इन मूल्यों की सेवा करना है । इन मूल्यों के साथ ही वे इस सदी की तीसरी दहाई में पहुंचे हैं । पचासी साल की उम्र में उन्हें एक चक्र पूरा हुआ महसूस हो रहा है जिसमें उनके माता पिता भी शामिल हैं । लेखक के पिता के जन्म के साथ इसकी शुरुआत हुई । तब तक उद्योगीकरण, शहरीकरण, वर्ग संघर्ष, राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, नस्लभेद और महाशक्तियों के आपसी टकराव को काफी समय गुजर चुका था । चार साल बाद प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो गया । यूरोप की स्थिरता समाप्त हो गयी । माता का जन्म विश्वयुद्ध के खात्मे के दो महीने पहले हुआ था । तब रूसी क्रांति को संपन्न हुए नौ महीने ही बीते थे । बादशाहों को गद्दी छोड़नी पड़ी और यूरोपीय साम्राज्य ढह गये । नयी दुनिया की बेहतरी का भरोसा भी बहुत दिन कायम न रह सका । मुद्रा स्फीति और कुछ सुधार के उपरांत महामंदी आयी, स्वर्णमान खत्म हो गया, जर्मनी में हिटलर का उदय हुआ, स्पेनी गृहयुद्ध और फिर दूसरा विश्वयुद्ध । पिता ने जर्मनी छोड़ दिया । माता भी नाना-नानी के साथ भाग निकलीं । दोनों की मुलाकात 1942 में लंदन में हुई । एक साल बाद शादी हुई और तीन साल बाद जाकर लेखक का जन्म हुआ । उनका पालन पोषण ब्रिटेन में ही हुआ । पूरा परिवार लाखों परिवारों की तरह आफत के दौर का उत्पाद बना । बहुत मुश्किल से ये सभी लोग उस आफत से बाहर निकलने या बचने में कामयाब रहे । शेष रिश्तेदार इतने भाग्यशाली नहीं रहे ।

इस पूरे माहौल ने लेखक में निराशा को जन्म दिया । इसके कारण उनको जीवन के मुश्किल दौर में भी खुशी खोजने की धुन सवार हुई । दूसरे कि उनको आशावाद से बहुत धोखे मिले । सबसे ताजा धोखा वित्त के प्रबंधकों की बुद्धिमत्ता और निर्वाचकों की समझदारी के मामले में मिला । उनके माता पिता भी निराशावादी रहे थे । पिता को वियेना में नाटक लिखने से जो मानदेय मिला उसके सहारे वे अमेरिका की राह में लंदन चले आये । दादा मछली मारने के व्यवसाय में थे और जर्मन आक्रमण के समय समुद्र के रास्ते परिवार समेत निकल आये । चाहते तो थे कि रिश्तेदार भी आयें लेकिन रिश्तेदारों को सुधार की आशा थी । इस तरह दादा की निराशा ने उन्हें बचा लिया । इस पारिवारिक इतिहास के कारण उन्हें सभ्यता की भंगुरता का आभास रहा है । कोई भी जानकार यहूदी इस सच से इनकार नहीं कर सकता । मनुष्य बेवकूफी, क्रूरता और विध्वंस की राह पर फिसल जाते रहे हैं । वे कबीलाई ढंग से अपने और बाहरी के बीच भेद बरतने की आदत के शिकार हो जाते हैं । इसके बाद वे जिसे बाहरी मानते हैं उनका बिना किसी संकोच के संहार भी कर देते हैं । इसी वजह से लेखक ने शांति, स्थिरता और आजादी को कभी स्थायी नहीं समझा और जो लोग इस धोखे में रहते हैं उनकी समझ पर तरस खाते रहे । लंदन का जीवन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा । माता पिता का निधन 1993 और 1997 में हो गया । उनके बचपन और जवानी के दिनों के मुकाबले बाद की दुनिया बेहतर रही । लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण दुनिया में उनके भरोसे की विजय हुई । यूरोप पर से तानाशाही का खतरा टल गया लगता था । लोकतंत्र विजयी हुआ था । मध्य और पूर्वी यूरोप के समाजवादी शासन लौह दीवार से बाहर निकल रहे थे । यूरोप का फिर से एकीकरण हो रहा था । रूस के भी लोकतंत्र और व्यक्ति की आजादी की राह में आने की उम्मीद नजर आ रही थी । फ़्रांसिसी क्रांति से लेकर बीसवीं सदी तक के वैचारिक, राजनीतिक और आर्थिक विभाजन समाप्त होते नजर आ रहे थे ।

बाद की घटनाओं ने साबित किया कि ये उम्मीदें बेबुनियाद थीं । उदार वित्तीय व्यवस्था अस्थिर साबित हुई । एशियाई वित्तीय संकट के दौरान लेखक को इसका भान हुआ । हालिया वित्तीय संकट और महामंदी के बाद तो यह पूरी तरह सिद्ध हो गया । विश्व अर्थतंत्र अस्थिरता को जन्म देने वाले असंतुलन का स्रोत हो गया । वित्तीय अस्थिरता का कारण था कि विभिन्न देशों के बीच पूंजी प्रवाह को काबू में रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी निभाने में अक्षम हो गयी । यह वित्तीय अस्थिरता पश्चिमी अर्थतंत्र की एकमात्र विफलता नहीं थी । इसके साथ विषमता में बढ़ोत्तरी भी लगी हुई थी । निजी जीवन में असुरक्षा बोध घर कर गया था और आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार सुस्त पड़ गयी थी । व्यापारिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, राजनीतिक और प्रशासनिक शासक कुलीनों की इस विफलता ने जनता की निगाह में उन्हें अविश्वसनीय बना दिया ।

राजनीति की दुनिया में भी इसी तरह के बड़े बदलाव आये । 2001 में 11 सितम्बर को अमेरिका में हुए हमलों ने सबको सकते में डाल दिया । इसके बाद अफ़गानिस्तान और इराक में युद्ध हुए । दूसरी ओर वैश्वीकरण की आर्थिक सफलता के साथ ही चीन और कुछ हद तक भारत का उभार हुआ । इसके कारण राजनीतिक और आर्थिक शक्ति संतुलन में बदलाव आया । अब उसकी धुरी अमेरिका और पश्चिम से खिसककर पूरब की ओर जाने लगी । विश्व राजनीति में इसके साथ ही एक अन्य बदलाव भी आ रहा था । इक्कीसवीं सदी के आगे बढ़ने के साथ उदार लोकतंत्र की जगह अनुदार लोकतंत्र या गालबजाऊ तानाशाही का विस्तार होने लगा । ये तानाशाह पुराने तानाशाहों से अलग थे । इनमें लोकलुभावनवाद था । इनका उभार न केवल नये लोकतांत्रिक देशों में हुआ बल्कि संसार के बड़े और पुराने लोकतांत्रिक देश भी इसकी चपेट में आ गये । इन्होंने अपने देशों की अंतर्राष्ट्रीय विश्वसनीयता को भारी नुकसान पहुंचाया और पश्चिम की श्रेष्ठता को मटियामेट कर दिया । राजनीति के प्रति उनके गालबजाऊ रुख ने कानून के शासन को धूलधूसरित कर दिया, सत्य के प्रति निष्ठा को कमजोर किया और सारे अंतर्राष्ट्रीय समझौतों की ऐसी तैसी कर दी । इन्हीं बातों को उदार लोकतंत्र का लक्षण माना जाता था । पूर्ण मनमानी ही शायद इनका लक्ष्य था ।

लेखक को आज की चुनौतियों की तुलना बीसवीं सदी के पूर्वार्ध की चुनौतियों से करना उचित लगता है । उस समय भी विश्व का शक्ति संतुलन इंग्लैंड और फ़्रांस से खिसककर जर्मनी और अमेरिका की ओर जा रहा था जैसे आज वह अमेरिका से चीन की ओर खिसक रहा है । उस समय भी विश्वयुद्ध, स्पेनी एनफ़्लुएंजा, भारी मुद्रास्फीति और महामंदी की शक्ल में बड़े संकट आये थे । इस समय उसी तरह कोरोना और यूक्रेन युद्ध जैसे संकट आये । उस समय जर्मनी, इटली और स्पेन में लोकतंत्र का खात्मा और तानाशाही का उभार हुआ था । इस समय भी विकासशील देशों और पहले के समाजवादी देशों में यह प्रवृत्ति नजर आ रही है । इस बार लोकतंत्र का खात्मा उन भी देशों में हो रहा है (अमेरिका में ट्रम्प और इंग्लैंड में ब्रेक्सिट) जो बीसवीं सदी में लोकतंत्र का झंडा उठाये हुए थे । इस समय तो परमाणु युद्ध और जलवायु संकट की ऐसी हालत है जिसके बारे में 1980 दशक से पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । लेखक को अपनी पीढ़ी के बारे में लगता है कि उन्हें बीसवीं सदी के इन हालात का अंदाजा नहीं होगा लेकिन उनके माता पिता को अतीत की प्रतिध्वनि अवश्य सुनायी पड़ी होगी । रूसी साम्राज्य की फिर से स्थापना की चाह में उन्हें हिटलर द्वारा सभी जर्मन भाषी यूरोपीयों को एक ही शासन के मातहत लाने की इच्छा की अनुगूंज महसूस हुई होगी । इसी नये समय को समझने के क्रम में इस किताब का लेखन हुआ है ।

Sunday, December 7, 2025

युवा विक्षोभ की अभिव्यक्ति: देवेन्द्र का कथा संसार

 

               

                                             

साहित्य का इतिहास देखने में प्रवृत्ति केंद्रित दृष्टि की प्रधानता के कारण देवेन्द्र का कथाकार बहुधा अलक्षित रह जाता है । बेहतरीन कहानियों की संख्या प्रचुर होने के बावजूद मानदंड के मामले में उनको अक्सर अनदेखा कर दिया गया है । इसके कारणों की शिनाख्त करने के साथ ही हम उनको शरीक कर सकने वाली हिन्दी की कथा परम्परा को भी समझने का प्रयास करेंगे । साथ ही इसमें उनकी विशेषता और उनके योगदान को भी देखने की कोशिश की जाएगी ।   

देवेन्द्र की भाषा में काव्यात्मकता है लेकिन यह काव्यात्मकता उदय प्रकाश की तरह यथार्थ को धुंधला करने के काम नहीं आती । उनकी काव्यात्मकता में जीवन की विषम परिस्थितियों से उपजा तीखापन है । अक्सर यह तीखापन मारक व्यंग्य का रूप ले लेता है । उदय प्रकाश तो घोषित तौर पर कवि के साथ कथाकार हैं लेकिन देवेन्द्र के बारे में यह अल्पज्ञात है कि वे कहानियों की दुनिया में आने से पहले छंदोबद्ध कविताओं के लेखक रहे थे । इस तरह उनका कथाकार सिंहासनच्युत कवि कहा जा सकता है । उनकी एक मशहूर कहानी का शीर्षक ही है ‘शहर कोतवाल की कविता’ । इस शीर्षक में व्यक्त विडम्बना को पहचानना बहुत मुश्किल नहीं है । एकदम ही विपरीत समझे जाने वाले दो क्षेत्रों को इस शीर्षक में एक साथ अनायास नहीं रखा गया है । कोई कवि ही कोतवाली के साथ कविता का वैषम्य पकड़ सकता है । इस कहानी में कविता न केवल शीर्षक में है बल्कि सारी अफ़सरी हनक के बावजूद कोतवाल की आत्महत्या का कारण बनती है । बहुत सारी जगहों पर भीषण और अत्यंत गहन भावनात्मक अभिव्यक्तियों के लिए कविता की पंक्तियों का सीधे प्रयोग किया गया है । कविता इन कहानियों के पात्रों के जीवन में बेहद खतरनाक भूमिका निभाती है । इसी तरह एक और कहानी का शीर्षक है ‘महाकाव्य का आखिरी नायक’ । जो लोग महाकाव्य की गरिमा और त्रासद उदात्तता से परिचित नहीं उन्हें इस कहानी और शीर्षक के बीच का रिश्ता समझ ही नहीं आयेगा । समकालीन कहानी में शायद ही किसी कथाकार की कहानियों में इस हद तक कविता मौजूद हो । आधुनिक मुक्त छंद की कविता की क्षमता में ऐसा विश्वास कुछ हद तक आश्चर्यजनक है क्योंकि इस दौर की कविता को जीवन से कटा हुआ बताने वालों की भी जमात कमजोर नहीं है । कहानियों में कविता के प्रवेश का आकर्षण उनके यहां इतना प्रबल है कि ‘धर्मराज’ शीर्षक कहानी में उनका मुख्य पात्र धर्मराज भीड़ में घिरा ‘मैथिलीशरण गुप्त की कविता होता है, लेकिन अकेले होते ही अज्ञेय का गद्य बन जाता है’ । इसके बाद अज्ञेय के गद्य की व्याख्या भी ‘मतलब के दर्शन से भरा, रहस्यमय और अबूझ’ । दोनों के बारे में कहानीकार की राय से असहमत हुआ जा सकता है लेकिन इस फैसले से एक दौर के विद्रोही भाव का पता जरूर चलता है । उस विद्रोह में सभी विद्रोहों की तरह थोड़ा अतिवाद भी था ।

युवा, कविता और विक्षोभ के जिक्र से स्पष्ट है कि देवेन्द्र की कहानियों की प्रमुख कथावस्तु उच्च शिक्षा संस्थान हैं । इनमें भी हिंदी साहित्य के अध्ययन अध्यापन की दुनिया अर्थात हिंदी विभाग हैं । इन शिक्षा संस्थानों से जिस तरह देश के स्वाधीनता आंदोलन का रिश्ता है उसी तरह हिंदी की प्रतिष्ठा के साथ इन विभागों की खास तरह की केंद्रीयता जुड़ ही जाती है । ‘देवांगना’ और ‘रंगमंच पर थोड़ा रुककर’ जैसी कहानियों में इसके अपवाद हैं । ‘देवांगना’ शीर्षक कहानी में हमारे समाज के सबसे अधिक किनारे कर दिये गये पात्रों की अत्यंत दारुण कथा है तो ‘रंगमंच पर थोड़ा रुककर’ कहानी अपराधियों के जीवन में पाठक का प्रवेश कराती है । कहानियों की ऐसी विषयवस्तु ने ही शायद उनमें उच्च शिक्षा संस्थानों को आने से रोक दिया होगा । ये शिक्षा संस्थान हिंदी भाषी समाज के भीतर अवस्थित हैं । इनके पतन की कहानी ‘नालन्दा पर गिद्ध’ में बेहद मारक तीक्ष्णता के साथ आयी है । इसके अतिरिक्त भी ‘अनुपस्थित’ शीर्षक कहानी में शिक्षा के उस सांस्थानिक पतन की झांकी देखने को मिलती है जिसका विराट स्वरूप अब उजागर हुआ है । उनका एक पात्र कुलकर्णी है जो डीन की कुर्सी पर काबिज है और उनके ही एक विद्यार्थी की नियुक्ति के लिए सिफारिश करने वाले से कहते हैं कि ‘शिक्षक संघ होता था । कर्मचारी संघ था । और तो और तुम्हारा छात्र संघ था । कुलपति लोग दबकर रहते थे ।--अब कुछ नहीं । हर पद का रेट तय है ।--दलाल लोग कुलपति होने लगे हैं’ । देवेन्द्र जिस समय की बात कर रहे हैं उस समय के मुकाबले उच्च शिक्षा के संस्थानों में केवल भ्रष्टाचार बल्कि पदाधिकारियों की मनमानी और बढ़ी है कहानी में आये इस वक्तव्य की खास बात यह है कि छात्र संघ, कर्मचारी संघ और शिक्षक संघ की ऐसी भी भूमिका हुआ करती थी इसकी ओर पाठक का ध्यान जाता है अन्यथा समय तो इन संघों के भ्रष्ट होने की कथा सुनाने का है आश्चर्य कि यह बात डीन के पद पर काबिज व्यक्ति के मुख से कहलवाई गयी है

कहानीकार के इस रुख के साथ ही उनका वह रुख भी कायम है जिसमें छात्र संघ के प्रति सामान्य तौर पर बनी धारणा की अभिव्यक्ति होती है नालन्दा पर गिद्धकहानी में वामपन्थी प्रत्याशी मार्क्सवादी लेनिनवादी विचारधारा का है और सशक्त उम्मीदवार बनकर उभर रहा था उसकी विचारधारा से भी मजबूत पहचान उसकी जाति निकलती है । इसे वाणी देते हुए कहानी के पात्र आचार्य चूड़ामणि का कथन हैविचारधाराएं तो परिवर्तनशील होती हैं । उम्र और परिस्थिति से निर्धारित । मूल सत्य तो जाति हैऔर इसी समझ के आधार पर आर एस एस एस की राजपूत और भूमिहार लाबी ने वामपन्थी प्रत्याशी का समर्थन किया और वह विजयी रहा । विडम्बना यह किउसी पैनल का दूसरा हरिजन प्रत्याशी मात्र पचासी वोट पाकर वीरान और बेजान पसरी सड़क पर अकेले क्रान्तिवाद-जिन्दाबाद चिल्लाताजा रहा था । इस माहौल ने ज्ञान और विद्या के प्रति ऐसी हिकारत को जन्म दिया है कि लेखक अध्यापकों की लिखी किताबों तक के बारे में बताते हुए उनकी गुणवत्ता के मुकाबले रणनीति को ही देखता हैशान्तिकाल के बीस वर्षों में इस विभाग से सिर्फ तीन पुस्तकों का प्रकाशन हुआ था । इण्टरव्यू घोषित होने के बाद से पैंतालीसवीं पुस्तक की सूचना थी। इन्हें भी लेखक अध्यापकों के विद्यार्थियों ने ही तैयार किया था । हाल यह है कि पुस्तकालय की किताबों से सीधे सहायता लेकर भारतीय काव्यशास्त्र, समकालीन साहित्य की भूमिका, रीतिकाल का कलात्मक योगदान, आदि-आदि ग्रन्थ तैयार किये जा रहे थे । शिक्षा संस्थानों के समग्र पतन की यह तस्वीर आज भी दुर्भाग्यवश सच से बहुत दूर नहीं है । हो सकता है ये शीर्षक बहुतेरे आकांक्षी अभ्यर्थियों के लिए सहायक साबित हों!                                

जिस हिंदीभाषी समाज में ये संस्थान हैं स समाज के साथ गांव अभिन्न रूप से संबद्ध हैं । उपनिवेशवाद के विरोध के क्रम में गांवों के प्रति आम तौर पर थोड़ा रूमानी नजरिया हिंदी की विशेषता रही है । इस मामले में देवेन्द्र शेष लोगों से बहुत अलग रुख अपनाते हैं ।

युवा और उच्च शिक्षा संस्थानों के केंद्र में आने से प्रेम भी केंद्रीयता प्राप्त कर लेता है । हिंदी भाषी समाज में प्रेमी जोड़ों की हालत किसी से छिपी नहीं है । उनके साथ बरती जाने वाली समूची क्रूरता बहुत गहराई के साथ इन कहानियों में व्यक्त हुई है । इस विषयवस्तु की प्रमुखता के लिए यही तथ्य जानना पर्याप्त है कि उनकी दो कहानियों ‘एक खाली दिन’ और ‘सपने के भीतर’ के नायक और नायिका सत्तो और शांतनु ही हैं । समान स्त्री पुरुष चरित्रों को लेकर दो कहानियों की रचना भी उनकी प्रिय विषयवस्तु का सबूत देती है । प्रेम के साथ ही देवेंद्र अपनी कहानियों में देह संबंध के सवाल पर भी बहुधा विचार करते हैं । इस मामले में वे प्रेम की थोड़ी रूमानी धारणा के शिकार भी लगते हैं । ‘क्षमा करो हे वत्स!’ में उनका स्वयं कथन है ‘स्त्री और पुरुष के बीच आकर्षण और फिर प्रेम एक स्वाभाविक गुण है । शारीरिक सम्बन्धों का उच्चतम रूप प्राप्त करने के बाद यह प्रेम समाजोन्मुख होने लगता है । हमारी विवाह संस्थाओं में इस स्वाभाविक प्रक्रिया का ही विरोध है । वहां शारीरिक सम्बन्ध पहली रात बन जाते हैं । बाद के दिनों में तरह-तरह के समझौते करते हुए हम प्रेम पैदा करने की कोशिश करते हैं । वे सुखी और सफल लोग हैं जो प्रेम पैदा कर लेते हैं’ । लेखक ने यह स्वयं कथन अपने वैवाहिक प्रेम की असफलता के बारे में किया है । जो व्यापक यथार्थ है उसकी कुरूपता को उजागर करते हुए वे लिखते हैं ‘गांव में लोग पत्नियों को बैल की तरह पीटते हैं और रात के अंधेरे में चुपके से दस मिनट के लिए उनके पास जाते हैं और कुत्ते की तरह सम्भोग करके फिर दरवाजे की अपनी चारपाई पर आकर सो जाते हैं’ । इस सामाजिक यथार्थ ने नैतिक पाखंड को जन्म दिया है ‘घूस, भ्रष्टाचार, मक्कारी, दूसरे की जमीन हड़प कर जाना आदि आदि हमारे समाज का स्वीकृत यथार्थ है । ये सब हमारे चरित्र को प्रभावित नहीं करते । सिर्फ कमर के नीचे का गोपनीय हिस्सा अस्पृश्य रहकर हमारे चरित्र को तेजस्वी बनाता है’ । निष्कर्ष कि ‘एक मांस पिण्ड निर्धारित करता है हमारे चरित्र को’ । लेखक ने अपनी प्रतिक्रिया को इस तरह व्यक्त किया है ‘नैतिकता के इन भारतीय और अमानवीय मानदण्डों पर मैंने समूचे बलगम को खंखारकर थूक दिया’ ।       

उनका विक्षोभ अक्सर व्यंग्य के सहारे अभिव्यक्त होता है । यह लगभग उनका स्थायी भाव है । इसकी सफलता से वे इतना अभीभूत हैं कि परिवर्तन के प्रयासों को भी इसका शिकार बना लेते हैं । हिंदी की आधुनिक कहानी के इतिहास में क्रांतिकारियों का मजाक उड़ाने वाली कहानियों की लम्बी परम्परा है । देवेन्द्र की कहानी ‘क्रान्ति की तलाश’ भी इसी धारा का अंग बनकर रह गयी है । इस तरह की कहानियों को आचार्य शुक्ल की शब्दावली में सांप्रदायिक साहित्य कहा जा सकता है । अगर पाठक को ठोस संदर्भ न मालूम हो तो रेणु की ‘आत्मसाक्षी’ या काशीनाथ सिंह की ‘लाल किले का बाज’ को सराहना मुश्किल है । इस कहानी का जिक्र इसलिए जरूरी है कि उनकी अन्य कहानियों के भी विद्रोही पात्रों की आदर्श भाषा प्रकाश की उद्धत भाषा का अनुगमन करती है ।

गांव के प्रति रूमानी नजरिये का प्रतिकार उनकी कहानी ‘क्षमा करो हे वत्स!’ में सबसे अधिक मिलता है । कहानी न केवल सच्ची घटना का आभास देती है बल्कि सच है भी । कथावाचक के पुत्र का अपहरण हुआ और उसके अवशेष किसी खेत में मिले । उनके इस दुख में शामिल होने की जगह लोग भुना रहे थे । लेखक की टिप्पणी है ‘गांवों के सामाजिक ढांचे के भीतर निरंकुशता और स्वार्थपरता रोम-रोम में रची-बसी होती है’ । कहने की जरूरत नहीं कि भारत के गांव की यह आलोचना जातिप्रथा के दंश को भोगने वालों के अनुभव  से पूरी तरह अलग है ।