Sunday, March 30, 2014

मैनेजर पांडे के सरोकार




(अध्यापकों के बतौर जिनसे सीखा उनमें मैनेजर पांडे अनन्य हैं । इस आयु में भी उनका परिश्रम हमारे लिए स्पृहणीय है । जे एन यू में उनकी कक्षा में बहुधा ऐसा हुआ कि डेढ़ दो घंटे तक कलम रुकती ही नहीं थी और कई बार ऐसा भी हुआ कि लिखने में तर्क की धारा छूट जाएगी यह सोचकर कुछ नोट ही नहीं किया । शोध करते हुए उनसे एक संकोचपूर्ण नजदीकी बनी जो अब तक जारी है । उनके लिखे को पढ़कर चुपचाप गर्व करना और मिलने पर कुछ न कहना आदत सी बन गई । बहरहाल गोरखपुर में उनके सम्मान समारोह के अवसर पर यह पर्चा लिखा लेकिन जा न सका । बाद में समकालीन जनमत में छप गया और अब इसे कुछ जोड़ तोड़ कर आपके पास भेज रहा हूँ शीर्षक बदले बगैर । गोपाल प्रधान)
नागार्जुन, प्रेमचंद, रामचंद्र शुक्ल और मुक्तिबोध- यह सूची उन लेखकों की है जिनकी ओर से मैनेजर पांडे ने आज के समय में आलोचना की भूमिका तलाशी है । इस सूची के अधूरा होने पर बहस की जा सकती है लेकिन एक बात सिद्ध है । ये सभी लेखक आधुनिक हिंदी साहित्य के स्तंभ हैं । जो लेखक प्रामाणिक रूप से हिंदी में जनपक्षधर लेखन की परंपरा का निर्माण करते हैं, आखिर उनकी रक्षा की जरूरत क्या है ? असल में हरेक दौर में वैचारिक लड़ाई चलती रहती है और उस लड़ाई में फिर फिर जनता से जुड़े रचनाकारों को गलत व्याख्या से बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है । इससे ही वह समकालीन संदर्भ बनता है जिसमें आलोचना की एक खास तस्वीर मैनेजर पांडे बनाते हैं । सबसे पहले इस समय की जो पहचान मैनेजर पांडे ने की है उसे देखना जरूरी है ।
'आलोचना की सामाजिकता' की भूमिका में वे लिखते हैं- 'आजकल भारत पूँजीवादी सभ्यता के आतंककारी प्रभावों का सामना कर रहा है ।' यह महत्वपूर्ण वाक्य उन्होंने 2005 में लिखा जब प्रख्यात मार्क्सवादी चिंतक रणधीर सिंह ने चिंता जाहिर की थी कि उत्तर आधुनिक चिंतकों के मुताबिक पूँजीवाद लुप्त और गुप्त हो गया है, न सिर्फ़ इतना बल्कि मार्क्सवादी बौद्धिक विमर्श से भी यह अभिधान गायब होता जा रहा है । कुछ दिनों पहले ही नक्सलबाड़ी से संबंधित एक संपादित पुस्तक की भूमिका में वीरभारत तलवार ने अपने लेनिनवादी अतीत को श्रद्धांजलि अर्पित की थी । मार्क्सवादी शब्दावली से पीछा छुड़ाने की इस भगदड़ के माहौल में ही उस जिद के महत्व को समझा जा सकता है जिसके साथ मैनेजर पांडे वर्तमान दौर को समझने और इसमें आलोचना का कार्यभार तय करने के लिए निरंतर इस शब्दावली का उपयोग करते हैं । इस बात पर एक और कोण से विचार करना जरूरी है । मार्क्सवाद के अनेक विरोधियों का कहना है कि मार्क्सवाद न सिर्फ़ विदेशी है बल्कि उसका संबंध तो लोहा लक्कड़ और रुपये पैसे जैसी ठोस चीजों से है साहित्य संस्कृति जैसे अमूर्त व्यवहार से उसका क्या लेना देना । मैनेजर पांडे ने इस धारणा से लड़ने के लिए सांस्कृतिक व्यवहार की सामाजिकता को पहचाना और उसे व्याख्यायित करने में विश्लेषणात्मक बुद्धि और अध्यवसाय के बल पर मार्क्सवाद की भूमिका को स्थापित किया । 
पूँजीवाद के वर्तमान दौर ने आलोचनात्मक विवेक को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया है । इस स्थिति की शिनाख्त करते हुए वे 'आलोचना : सार्थक और निरर्थक' शीर्षक निबंध में लिखते हैं- 'यह ठीक है कि हिंदी में आलोचना की स्थिति अच्छी नहीं है । लेकिन आलोचना की यह स्थिति केवल हिंदी में हो, ऐसा नहीं है । आजकल सारी दुनिया में आलोचना संकट में है, बल्कि आलोचना का संकट व्यापक सांस्कृतिक संकट का हिस्सा है । आज के उत्तर आधुनिक दौर में एक वैचारिक अनुशासन और साहित्य विधा के रूप में आलोचना कई तरह के संकटों का सामना कर रही है । पूँजीवाद के विजय, उपभोक्तावाद के सर्वग्रासी प्रसार, विवेक के साथ अर्थ के अंत और सामाजिक की मृत्यु की घोषणा के कारण जब आलोचनात्मक चेतना ही संकट में है तब उसकी क्रियाशीलता का एक रूप साहित्य की आलोचना उस संकट से कैसे बच सकती है ?'
आलोचनात्मक विवेक के इस विनाश का एक प्रमुख कारण मार्क्सवादी बौद्धिक विमर्श में आई गिरावट है । आजाद भारत में एक तो शिक्षा संस्थानों के जरिए ही आलोचनात्मक प्रभुत्व पाने की रणनीति ने इसे सभी तरह के दक्षिणपंथी प्रभावों के समक्ष अरक्षणीय स्थिति में पहुँचा दिया और इसीलिए सोवियत संघ के बिखरते ही लाभान्वितों ने दूसरे चरागाहों की ओर मुँह फेरा । इसके विपरीत खासकर नक्सलवादी आंदोलन के उभार ने इसके सकारात्मक मूल्यों- मान्यताओं के विकास का दबाव बनाया । मैनेजर पांडे को इसी क्रांतिकारी वाम दबाव के प्रतिनिधि के रूप में समझा जा सकता है । जब साहित्य और उसकी आलोचना के क्षेत्र में दक्षिणपंथी दबाव बनता है तो सबसे पहले साहित्य को जनसमुदाय, जनांदोलन और जनराजनीति से अलग करने का प्रयास होता है । न सिर्फ़ उसके सृजन, ग्रहण और मूल्यांकन के क्षेत्र से जनता को गायब कर दिया जाता है बल्कि आलोचना के ऐसे मानदंड भी विकसित किए जाते हैं जो कृति की संरचना में ही उसके सौंदर्य को अपघटित कर दें । मैनेजर पांडे ने इन सभी मोर्चों पर न सिर्फ़ रक्षात्मक बल्कि अनेकश: आक्रामक युद्ध भी लड़ा है ।
आलोचना के क्षेत्र में जनांदोलनों के योगदान को मुक्त कंठ से स्वीकार करने वाले संभवत: अकेले आलोचक मैनेजर पांडे हैं । 'आलोचना की राजनीति' शीर्षक लेख में वे लिखते हैं- 'आज के समय में आलोचनात्मक चेतना के निर्माण और विकास का एक स्रोत जनांदोलन है । ज्ञान का विकास केवल एकांत साधना से नहीं होता, सामाजिक आंदोलनों से भी होता है । सामाजिक आंदोलनों से उपजा ज्ञान एकांत साधना से अर्जित ज्ञान की तुलना में अधिक ऊर्जावान और दीर्घगामी होता है ।' इसी पारगामी दृष्टि के कारण वे अकादमिक संस्थाओं की दुनिया में रहते हुए भी उनकी सीमाओं में न बँधकर हिंदी समाज में चलने वाली उथल पुथल से अपनी आलोचना को जोड़ सके ।
चूँकि उन्होंने आलोचना के प्रसंग में और अन्य प्रसंगों में भी राजनीति की चर्चा की है इसलिए राजनीति के जरिए कुछ बातें करना अनधिकार चेष्टा न होगी । प्रगतिशील आलोचना के उत्थान पतन को भारत की परंपरागत वामपंथी राजनीति के संदर्भ से समझना आवश्यक है । नामवर सिंह प्रगतिशील हिंदी आलोचना की सर्वाधिक सक्रिय उपस्थिति रहे हैं । उनके वैचारिक निर्माण में तेलंगाना आंदोलन के पतन के बाद व्यवस्था में समायोजन की वामपंथी कार्यनीति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । उनके आलोचनात्मक लेखन ने हिंदी साहित्य की जनपक्षधर परंपरा के साथ बहुधा न्याय नहीं किया । मुक्तिबोध को उन्होंने नेहरू के समर्थन में खड़ा कर दिया और उनके लेखन के क्रांतिकारी सार को 'अस्मिता की खोज' के रहस्यमय मुहावरे के नीचे दबा दिया । नागार्जुन जैसे जनसंघर्षों के पक्षधर कवि का मूल्यांकन 'दूसरे काव्यशास्त्र' के निर्माण तक के लिए स्थगित कर दिया गया । प्रेमचंद प्रयोगों की नवीनता के प्रति उपजे आकर्षण के कारण पुराने पड़ गए । रामचंद्र शुक्ल को 'ब्राह्मणवादी' और 'वर्णाश्रम का समर्थक' बनाया गया ताकि नए सामाजिक आंदोलनों से उनके एजेंडे पर ही तालमेल बिठाया जा सके । इस तरह प्रगतिशील आलोचना ने अपनी ही विरासत को नकारकर अपनी जगह बनानी चाही ।
इसी वातावरण में मैनेजर पांडे के वैचारिक संघर्ष का ऐतिहासिक महत्व पहचाना जा सकता है । उन्होंने वर्तमान जनांदोलनों का सवाल तो उठाया ही, प्रगतिशील आलोचना की अवसरवादी धारा द्वारा किनारे कर दी गई विरासत को भी नए सिरे से प्रासंगिक बनाया । वर्तमान की चिंताओं ने कैसे परंपरा के पुनराविष्कार की उनकी दृष्टि को रूपायित किया है, इसके लिए रामचंद्र शुक्ल और नाथूराम शर्मा 'शंकर' संबंधी उनकी आलोचना को देखा जा सकता है । इन लेखों के भीतर भारत के पुन:उपनिवेशीकरण की चिंता से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन के साथ साहित्य के संबंध के रेखांकित करने के प्रयास को देखा- पढ़ा जा सकता है । इसी तरह अंधाधुंध उद्योगीकरण से हाशिए पर पड़ते जा रहे ग्रामीण जनसमुदाय के साथ लगाव को प्रेमचंद के लिए होने वाली लड़ाई के मूल में देखा जा सकता है । नागार्जुन की कविता 'हरिजन गाथा' पर अतिरिक्त बल को भी बिहार के किसान आंदोलन और दलित उभार से पैदा आवेग के परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है ।
समकालीन भारत का यथार्थ मात्र पूँजीवाद का उभार ही नहीं है । तस्वीर का दूसरा पहलू नए सामाजिक आंदोलन भी हैं । इन आंदोलनों के कारण आलोचना में पैदा हुई नई सामाजिकता को रेखांकित करते हुए पांडे जी ने 'आलोचना की सामाजिकता' की भूमिका में लिखा है- '---पिछले कुछ दशकों से हिंदी स्त्री लेखन, दलित लेखन और आदिवासी लेखन का जो विकास हुआ है उससे साहित्य और साहित्यिकता की पुरानी धारणाएँ और मान्यताएँ लगभग ध्वस्त हुई हैं और साहित्य की नई सामाजिकता सामने आई है । यह साहित्य विनोद का साधन नहीं है, वह स्वतंत्रता के लिए बेचैन आत्मा की पुकार है । इस साहित्य की व्याख्या में वही आलोचना सक्षम होगी जो स्त्रियों, दलितों और आदिवासियों की स्वतंत्रता की आकांक्षा की पहचान करेगी और उनके रचने की सामाजिकता का मूल्यांकन करेगी ।' इन आंदोलनों के प्रसंग में थोड़ा विस्तार से विचार करने की जरूरत है ।
नए सामाजिक आंदोलनों से उत्पन्न ऊर्जा ने वामपंथी हिंदी बौद्धिक समुदाय के लिए नई चुनौती पेश की । कुछ लोगों ने इसके समक्ष पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया तो कुछ लोग कभी खारिज करने और कभी इनके उत्तर आधुनिक एजेंडे के साथ तालमेल बिठाने की अतियों के बीच झूलते रहे । इसके बरक्स मैनेजर पांडे ने इनकी सकारात्मकता को रेखांकित किया लेकिन इनकी सीमाओं की ओर भी संकेत करते रहे । मसलन 'आलोचना की सामाजिकता' में उन्होंने लिखा- 'स्त्रीवादी दृष्टि और दलितवादी दृष्टि में एक प्रकार का धुँधलापन है । लेकिन यह धुँधलापन अंधेपन से तो बेहतर ही है ।' इन दोनों धाराओं विशेषकर स्त्री लेखन के प्रसंग में उन्होंने पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा मजबूत की गई सत्ता संरचना की निशानदेही की है । आज जबकि दलित आंदोलन की एक धारा (बसपा) सत्ता संरचना का अंग हो चली है हमें दलित लेखन की धारा के साथ गंभीर बहस चलानी होगी क्योंकि वैसे भी हिंदी दलित लेखन ने कभी उन खेतिहर मजदूरों की पीड़ा को महत्व देते हुए अपनी जगह नहीं बनाई जो दलितों में बहुसंख्यक हैं । इस प्रश्न पर मैनेजर पांडे का लेखन वामपंथी चिंतन का आकाश विस्तारित करने की संभावना प्रस्तुत करता है ।
मार्क्सवादी साहित्य- समाज चिंतन उनके आलोचनात्मक लेखन की आधार भित्ति है । इससे विचलन के विरुद्ध संघर्ष के लिए उन्होंने अपने अग्रज और दीर्घकालीन वरिष्ठ सहयोगी नामवर सिंह को भी नहीं बख्शा । 'नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि' शीर्षक लेख किसी भी वरिष्ठ सहकर्मी के योगदान और उसके विचलन के संयत संतुलित आकलन का नमूना है । नामवर सिंह का उनका विरोध किसी चिढ़ का परिणाम नहीं बल्कि प्रगतिशील आलोचना की सच्चाई को सामने ले आने और प्रासंगिक बनाए रखने के कर्तव्य से प्रेरित है ।
भाषा संबंधी संवेदनशीलता का क्षरण उनकी चिंताओं का एक और महत्वपूर्ण आयाम है । याद दिलाने की जरूरत नहीं कि उनकी पहली ही पुस्तक 'शब्द और कर्म' थी । भाषा के मूल में सामाजिक क्रिया होती है, इसे चिन्हित करते हुए वे 'राजनीति की भाषा' में लिखते हैं- 'समाज भाषा की जन्मभूमि है और कर्मभूमि भी । यहीं से नए शब्द पैदा होते हैं, पुराने शब्दों में नया अर्थ भरता है और उन्हें नया जीवन मिलता है । समाज ही भाषा की शक्ति का मुख्य स्रोत है और समाज के कर्ममय जीवन में भाषा की क्रियाशीलता सार्थकता पाती है ।' शासक वर्ग के सामाजिक कर्म ने निरंतर भाषा को क्षरित किया है । ऐसी स्थिति में मनुष्य की सृजनात्मकता में आस्था रखनेवालों को इस शासकवर्गीय दुरभिसंधि के विरुद्ध निरंतर अपने कर्म से भाषा के अर्थ की रक्षा करनी पड़ती है ।
उनके लेखन में 'सार्थकता' को महत्वपूर्ण धारणा की तरह बार बार दोहराया गया है । इसके जरिए वे अतीत की रचनाओं को पुन: पुन: प्रासंगिक बनाते हैं । अश्वघोष की वज्रसूची, दारा शिकोह के मजमुल बहरैन, देउस्कर की देश की बात, महावीर प्रसाद द्विवेदी की संपत्ति शास्त्र, महादेवी वर्मा की शृंखला की कड़ियाँ- इस सूची पर ध्यान दें तो प्रतिरोध की एक भारतीय परंपरा का नक्शा खड़ा हो जाता है ।
सार्थकता की धारणा के सहारे वे रचना की संरचना में ही उसके अर्थ को खोजनेवाली कलावादी दृष्टि का मुकाबला कर रचना को सामाजिक गतिशीलता के बीच ला खड़ा करते हैं । अपनी चिंताओं, सरोकारों और वर्तमान की क्रियाशीलता से संबद्धता तथा मार्क्सवाद में आस्था से अर्जित भ्रमभेदक दृष्टि के कारण वे साहित्य को सामाजिक हलचलों के भीतर रखकर देखनेवालों के लिए जीवंत आश्वासन की तरह लगते हैं । आगे भी वे इस आश्वासन को बनाए रखेंगे, ऐसा उनके परवर्ती लेखन से प्रतीत होता है । आज के समय ने जवाबों की आश्वस्ति छीन ली है और प्रश्नों के समक्ष नई पीढ़ी को खुला छोड़ दिया है । ऐसे में सवालों को सही संदर्भों में अवस्थित करना भी बड़ा काम है । मुक्तिबोध ने कभी बुर्जुआ रणनीति की पहचान करते हुए कहा था- वे प्रश्न छलमय/ और उत्तर और भी छलमय । इस छलना के माहौल को भेदने के लिए निरंतर धैर्यपूर्वक अलगाव झेलते हुए भी सक्रिय रहना अभूतपूर्व रूप से आवश्यक हो गया है और वे लगातार सक्रिय हैं ।          
             

Monday, March 10, 2014

मैनेजर पांडे और जनसंस्कृति



           
                                                                                                                     
मैनेजर पांडे को जो भी जानता है वह इस बात पर ध्यान दिए बगैर नहीं रह सकता कि जन संस्कृति के साथ उनका वर्तमान आलोचकों में सबसे अधिक जुड़ाव है । इसे हम महज उनकी ग्रामीण पृष्ठभूमि के जरिए नहीं व्याख्यायित कर सकते । क्योंकि हिंदी आलोचना में सक्रिय वरिष्ठों की पीढ़ी में तकरीबन सभी की जड़ें गाँवों में ही हैं । फिर भी इसे अन्य अधिकांश आलोचकों ने जहाँ भुलाने और दबाने की कोशिश की है वहीं मैनेजर पांडे ने इसे न सिर्फ़ बहुधा घोषित किया बल्कि जन संस्कृति मंच के साथ जुड़कर इसे सैद्धांतिक ऊँचाई दी । मैनेजर जी का यह पहलू ही इस लेख का विषय है ।
जन संस्कृति मंच (जसम) की स्थापना एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा था । अस्सी के दशक में लोकतांत्रिक संगठनों का उभार बड़े पैमाने पर हुआ था । सांस्कृतिक दुनिया में नुक्कड़ नाटकों की धूम थी । जनता पार्टी के बिखराव के बाद इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के बाद लोकतांत्रिक ताकतों कि बड़े पैमाने पर गोलबंदी हुई थी । ऐसे वातावरण में बनारस में 1980 के एक सम्मेलन में राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा और पटना के एक सम्मेलन में नवजनवादी सांस्कृतिक मंच का गठन हुआ था । इसी तरह के अनेक संगठनों के निर्माण और उनकी आपसी चर्चा का समेकन जसम के रूप में सामने आया । ये सभी मंच और मोर्चे हिंदी में नक्सलबाड़ी के प्रभाव को प्रतिबिंबित करते हैं । यह प्रभाव संगठन के रूप में अपेक्षाकृत देर से सामने आया लेकिन जब आया तो बेहद परिपक्व रूप में ।
जसम के साथ मैनेजर पांडे के जुड़ाव का एक कारण संस्थापक महासचिव गोरख पांडे भी थे । गोरख जी बस्ती के रहनेवाले थे जो मैनेजर जी के घर सिवान से तकरीबन लगा हुआ है । हिंदी कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के बारे में भी इस सिलसिले में कुछ कहना जरूरी है । उनके संबंध में नामवर सिंह के अंधभक्त संस्मरण लेखकों ने एक प्रवाद फैला रखा है । ऐसा लिखा गया कि उन्होंने होली के दिन रंग डालने से नामवर सिंह को रोकने के लिए कुश्ती कर ली थी । इससे लगता है मानो वे भारतीय संस्कृति के विरुद्ध थे । लोगों ने यह नहीं बताया कि उस साल होली भगत सिंह के शहीद दिवस के दिन पड़ी थी । अब के लोहियावादी भी भूल गए हैं कि लोहिया अपना जन्मदिन इसीलिए नहीं मनाते थे क्योंकि वह भगत सिंह की शहादत के दिन पड़ता था । लेकिन सर्वेश्वर को याद था । तो ऐसी ही मान्यताओं वाले सर्वेश्वर अपने अंतिम दिनों में वामपंथी आंदोलन की तीसरी धारा की ओर खिंचे थे । वे आई पी एफ़ के स्थापना सम्मेलन में शरीक तो हुए ही उसके राष्ट्रीय पार्षद भी चुने गए थे । वे भी गोरख के पड़ोस गोरखपुर के रहनेवाले थे । बहरहाल उनकी मृत्यु जन संस्कृति मंच की स्थापना से पहले ही हो गई अन्यथा वे भी इस प्रयास के सहभागी होते । मंच के साथ मैनेजर जी का जुड़ाव शुरुआत से ही हो गया था । जसम के निर्माण के लिए बनी तैयारी समिति में तो वे थे ही उसकी स्वागत समिति में भी थे । स्थापना सम्मेलन दिल्ली में हुआ ।
जन संस्कृति मंच की स्थापना 1985 में हुई । गोरख पांडे इसके महासचिव और गुरुशरण सिंह अध्यक्ष निर्वाचित हुए । प्रोफ़ेसर मैनेजर पांडे सम्मेलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य चुने गए । इसके तुरंत बाद हुए दिल्ली राज्य सम्मेलन में वे दिल्ली इकाई के अध्यक्ष निर्वाचित हुए । जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय की अकादमिक व्यस्तताओं के बावजूद वे चंडीगढ़ मे हुए पहले सालाना जलसे और फिर हजारीबाग की गोष्ठी में गोरख जी के साथ ही शरीक रहे । वह दशक कवियों की अस्सी दशक की पीढ़ी की आत्ममुग्धता के समक्ष नक्सलबाड़ी के योगदान को दबाने की कोशिशों का था । गोरख पांडे के साथ ही मैनेजर जी ने भी आधुनिक हिंदी कविता के इतिहास में नक्सलबाड़ी के योगदान को रेखांकित किया । विभिन्न सभाओं और गोष्ठियों में उन्होंने कहा कि समाज के इतिहास में साहित्य के हस्तक्षेप के तो छोटे उदाहरणों को भी साहित्यवादी विचारक बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं लेकिन साहित्य के इतिहास में समाज के हस्तक्षेप की परंपरा के भीतर नक्सलबाड़ी की चर्चा उदाहरण के बतौर भी नहीं होती । इस परिघटना पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि इस आंदोलन ने न सिर्फ़ अपने समय की जन विरोधी साहित्यिक प्रवृत्तियों को खामोश कर दिया बल्कि अपने पूर्ववर्ती साहित्य की प्रासंगिकता में भी हस्तक्षेप किया । प्रगतिशील कवि नागार्जुन, त्रिलोचन और केदार नाथ अग्रवाल उस तमाम समय में सक्रिय रहे जब नयी कविता और उसके बाद विभिन्न आधुनिकतावादी काव्य प्रवृत्तियों का जोर रहा लेकिन इस शोरगुल में उनकी आवाज दबी रही थी । नक्सलबाड़ी ने उन्हें दोबारा प्रासंगिक बना दिया । न सिर्फ़ प्रगतिशील काव्यधारा बल्कि रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसे लोहियाई विपक्ष के कवियों को भी नक्सलबाड़ी ने पुनर्जीवन दिया ।
बहरहाल जन संस्कृति मंच का दूसरा सम्मेलन पटना में 1988 में गोरख पांडे के जीवनकाल में ही हुआ लेकिन मानसिक स्वास्थ्य ठीक न होने से वे इसमें भाग न ले सके । इस सम्मेलन तक परिस्थिति बदल जाने से एक नया दस्तावेज पेश किया गया जिसके ढीले ढाले ढंग से सूत्रबद्ध होने पर मैनेजर जी ने आपत्ति जाहिर की । सम्मेलन ने राणा प्रताप को महासचिव और शिव मंगल सिद्धांतकार को कार्यकारी अध्यक्ष चुना । पांडे जी कार्यकारिणी के सदस्य बने रहे ।
सम्मेलन के बाद के वर्षों में बिहार लालू यादव मार्का सामाजिक न्याय के उभार की प्रयोगभूमि बना । सांप्रदायिकता के विरोध के नाम पर पारंपरिक वामपंथ लालू के साथ खड़ा हो गया ।  किसी भी जीवंत संगठन की तरह जसम भी बिखराव का शिकार हुआ । इस दौर में न सिर्फ़ बिहार बल्कि केंद्र में भी जनता दल की सरकार को अपूर्व आमसहमति के तौर पर भाजपा और माकपा दोनों का समर्थन प्राप्त हुआ था । स्वाभाविक रूप से किसी भी जनविरोधी सरकारी कदम का विरोध करते हुए जनता के हाथ बँधे हुए थे । बिहार में एक के बाद एक नरसंहार होते रहे लेकिन सरकारी वामपंथ हाथ बाँधे खड़ा रहा । उस समय की विडंबना को मैनेजर जी सभाओं और गोष्ठियों में एक लोक कथा के माध्यम से अनेक बार बताते थे । कथा के मुताबिक जंगल को काटने का आदेश हुआ तो पेड़ों में हलचल मची लेकिन एक बुजुर्ग पेड़ ने कहा कि जब तक हममें से ही कोई इन पेड़ काटनेवालों का साथ नहीं देगा तब तक चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है । अंततः पेड़ काटने वालों के पास के हथियारों में एक पेड़ की लकड़ी का बेंट लगा तभी वे पेड़ काटने में कामयाब हो सके । यह कथा शासक वर्ग के साथ वामपंथ की एक धारा के खड़े हो जाने से जनता के निहत्थे हो जाने की विडंबना को बखूबी जाहिर करती थी ।    
इसके उपरांत लंबे अंतराल के बाद तीसरा सम्मेलन वाराणसी में हुआ जिसमें त्रिलोचन शास्त्री अध्यक्ष और राम जी राय महासचिव चुने गए । मैनेजर पांडे को कार्यकारिणी में यथावत बनाए रखने का फ़ैसला सम्मेलन ने किया । सम्मेलन का केंद्रीय विचार विंदु भाजपाई उभार के विरुद्ध एक नए नवजागरण की जरूरत था । चौथा सम्मेलन इलाहाबाद में हुआ जिसमें यही टीम जारी रही । इसमें भी पांडे जी कार्यकारिणी में चुने गए । सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विरोध में अनेकशः उन्होंने कहा कि यह भारत की दूसरी खोज का अभियान है । पहली खोज के पीछे स्वाधीनता अर्थात भविष्य के भारत की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष आकांक्षा थी तो इस दूसरी खोज के पीछे प्राचीन भारत की पुनर्स्थापना की हताशा भरी कोशिश है । 
जसम का पाँचवाँ सम्मेलन 1998 में दिल्ली में हुआ जिसमें बृज बिहारी पांडे महासचिव चुने गए । सम्मेलन के कुछ ही दिन पहले नागभूषण पटनायक की मृत्यु होने के कारण पहले दिन का खुला सत्र शोकसभा में बदल गया जिसमें मैनेजर पांडे शरीक रहे । छठवाँ सम्मेलन बनारस में हुआ जिसमें अजय सिंह महासचिव बने । सातवाँ सम्मेलन पटना में हुआ जिसमें मैनेजर पांडे को उपाध्यक्ष चुना गया । आठवाँ सम्मेलन राँची में हुआ जिसमें मैनेजर जी को जसम का अध्यक्ष चुना गया । तबसे निरंतर प्रोफ़ेसर मैनेजर पांडे न सिर्फ़ संगठन के अध्यक्ष पद पर बने हुए हैं बल्कि एक सक्रिय कार्यकर्ता और नेता की तरह निरंतर संगठन का मार्गदर्शन करते रहे हैं । बहरहाल संगठन का नवाँ सम्मेलन बेगूसराय में हुआ जिसमें प्रणय कृष्ण को महासचिव चुना गया । दसवें और ग्यारहवें सम्मेलन क्रमशः धूमिल के गाँव खेवली और भिलाई में हुए जिनमें पदाधिकारियों की यही टीम जारी रही । मैनेजर पांडे की सक्रियता और नेतृत्व जसम के प्रत्येक कार्यक्रम में दिखाई पड़ती है । भिलाई सम्मेलन में दस्तावेज पर चल रही बहस में निर्णायक हस्तक्षेप करते हुए उन्होंने परिस्थिति को निराशाजनक बताने के विचार का खंडन करते हुए लातिन अमेरिकी जनता के साम्राज्यवाद विरोधी संघर्षों की ओर प्रतिनिधियों का ध्यान खींचा । देश के स्तर पर भी उन्होंने जगह जगह चलने वाले भूमि अधिग्रहण विरोधी संघर्षों की सकारात्मक भूमिका को रेखांकित किया । उन्होंने किसानों की आत्महत्याओं का उदाहरण देते हुए कहा कि दुनिया में अन्य किसी भी देश में इतने बड़े पैमाने पर किसानों ने आत्महत्या नहीं की है इसलिए प्रथम किसान की आत्महत्या वाले दिन को राष्ट्रीय शर्म दिवस के बतौर मनाया जाना चाहिए । 
स्थापना सम्मेलन में ही मैनेजर जी ने जसम का व्यापक परिप्रेक्ष्य सामने रखते हुए कहा था किपहली बार संपूर्ण सांस्कृतिक संदर्भों को ध्यान में रखकर संगठन बनने जा रहा है । यह सिर्फ़ लेखकों का संगठन न होकर तमाम रचनाकारों का संगठन है जो नई बात है । उन्होंने यह भी कहा था कि संपूर्ण सांस्कृतिक संदर्भ को ध्यान में रखकर ही संगठन का घोषणापत्र तैयार किया गया है ।इसीलिए जब राँची में बाजारवाद के विरुद्ध केंद्रित सम्मेलन में वे अध्यक्ष बने तो उन्होंने मीडिया, लोकभाषाओं और आदिवासी संस्कृति पर कार्यशालाओं की योजना प्रस्तुत की । अंततः हाल में गुरुशरण सिंह, कुबेर दत्त और राम दयाल मुंडा की याद में आयोजित सभा में जसम ने इन कामों को पूरा करने का संकल्प घोषित किया । जन संस्कृति और लोकभाषाओं के प्रति उनके अनुराग को हम भिखारी ठाकुर से जुड़े उनके काम तथा कबीर को मूलतः भोजपुरी कवि मानने के आग्रह में देख सकते हैं । इसी भावना के वशीभूत वे हरेक साल जनूबी पट्टी जिला बस्ती में आयोजितलोकरंगमें मौजूद रहते हैं ।
सोवियत संघ के पतन से उपजे माहौल में उन्होंने अनुवाद और संग्रह करके एक पुस्तक प्रकाशित करवाई जिसका शीर्षक ही थासंकट के बावजूद। इससे पहले ही उन्होंने सृजनात्मक तरीके से इस माहौल में हस्तक्षेप करते हुए क्रांतिकारी कविता के एक संकलनमुक्ति की पुकारका संपादन किया था जिसकी भूमिका का शीर्षक ही हैअँधेरी रात में जलती मशाल। इन कामों में समाजवाद के पहले प्रयोग को लगे धक्के के वस्तुगत मूल्यांकन के साथ ही आशा के नए केंद्रों की तलाश की गई है । खासकरसंकट के बावजूदकी लंबी भूमिका में उन्होंने समाजवाद के धक्के के बाद उपजी वैचारिकी उत्तर आधुनिकता का जोरदार प्रत्याख्यान किया । हाल में ही उत्तर आधुनिक दौर में मध्ययुगीनता की वापसी को उजागर करते हुए उन्होंने लेख लिखे हैं । फिलहाल वे सामाजिक विज्ञान की एक पत्रिका हिंदी में निकालने की तैयारी में लगे हुए हैं ताकि हिंदी भाषी जनता में विद्वानों तक ही चलने वाली बहसों को न सिर्फ़ सुलभ कराया जा सके वरन इन सामाजिक विज्ञानों की दुनिया में हिदी भाषी जनता के ठोस अनुभवों का प्रवेश भी कराया जा सके । सामाजिक विज्ञानों की दुनिया में वे रणधीर सिंह और एजाज अहमद से नजदीकी का अनुभव करते हैं क्योंकि ये विद्वान उन्हीं की तरह पश्चिमी जगत से आने वाले विचारों की आँधी में उड़ते नहीं बल्कि तीसरी दुनिया के मुल्कों में जारी जन संघर्षों की आँच से प्रेरणा ग्रहण करके उनसे बहस करते हैं । मार्क्सवादी चिंतन परंपरा के भीतर उनकी गहरी जड़ें हैं और मार्क्स के अलावा वे ग्राम्शी से खासकर सांस्कृतिक प्रश्नों पर ढेर सारा साझा करना पसंद करते हैं ।
मैनेजर पांडे ने समस्त धर्मनिरपेक्षता पर चली बहस में दारा शिकोह के काम को उजागर करके नया कोण पैदा किया है । ऐसे ही अतीत चर्चा के शोर में बौद्ध चिंतक अश्वघोष की वज्रसूची पर बातचीत के जरिए उन्होंने इस बहस में नया आयाम जोड़ा । भारत के पुनः उपनिवेशीकरण के वैचारिक माहौल में देउस्कर की किताब की लंबी भूमिका के साथ उसका संपादन और प्रकाशन एक अलग तरह का हस्तक्षेप था । दलित और स्त्री विमर्श के प्रति उनका रुख संवाद का रहा है । महादेवी वर्मा की किताब ‘शृंखला की कड़ियाँ’ पर उनका लेख स्त्री विमर्श संबंधी बहस में ठोस योगदान था । 
उनका मानना है कि किसी भी सांस्कृतिक संगठन को साहित्यकार और पाठक के बीच पुल का काम करना चाहिए । यह काम यांत्रिक तरीके से नहीं बल्कि सृजनात्मक ढंग से किया जाना चाहिए । इसके लिए एक ओर तो संगठन को साहित्य के प्रचार प्रसार के लिए कवि सम्मेलन, नाटक और कार्यशालाओं का आयोजन करना होगा दूसरी तरफ़ निर्देश की शैली में नहीं वरन बहस मुबाहसे के जरिए सामने उपस्थित प्रश्नों पर वैचारिक साफ सफाई करनी होगी । इसके लिए उन्होंने कविता, कहानी और आलोचना की स्थिति पर कार्यशालाओं का प्रस्ताव रखा है । उन्होंने यह भी प्रस्तावित किया कि संगठनों को साहित्यकारों की मदद करनी चाहिए और उन्हीं की पहल पर जसम ने वरिष्ठ कथाकार अमरकांत की आर्थिक सहायता की ।
पंजाब में आतंकवाद के दिनों में तथा काश्मीर और पूर्वोत्तर में लगातार चल रहे राज्य दमन के धुर विरोधी मैनेजर जी तो हैं ही आंध्र और देश के अन्य हिस्सों में नक्सलवाद को दबाने के नाम पर जारी दमन की मुखालफ़त के प्रयासों में वे शरीक रहे हैं । सभाओं और गोष्ठियों में उनकी उपस्थिति हमेशा एक ताजगी भरा माहौल पैदा करती है । इन उपस्थितियों ने उन्हें एक सम्मानित सार्वजनिक बौद्धिक बना दिया है ।             

प्रगतिशील साहित्य के पक्ष में बहस का एक तेवर : केदारनाथ अग्रवाल का आलोचनात्मक लेखन



  
                                                              
केदारनाथ अग्रवाल के आलोचनात्मक लेखन पर उनके जीवनकाल में ध्यान नहीं दिया गया । रामविलास शर्मा भी उनके गद्य की तारीफ़ उनकी चिट्ठियों के प्रसंग में ही ज्यादातर करते हैं । लेकिन शताब्दी वर्ष में हम उनके गद्य के मुक्त प्रवाह मात्र पर नहीं बल्कि उसकी तार्किकता पर विचार कर सकते हैं । इसके लिए उन्हें बाकी प्रगतिशीलों के साथ रखकर देखना होगा । उनके आलोचनात्मक लेखों के तीन संग्रह, समय समय पर (परिमल प्रकाशन, 1970), विचार बोध (परिमल प्रकाशन, 1980),विवेक विवेचन (परिमल प्रकाशन, 1981) हैं । इसके अलावा उन्होंने अपने काव्य संग्रहों की भूमिकाएँ लिखी हैं जिनका इस्तेमाल भी उनके लेखन पर विचार करते हुए किया जाएगा । 
सबसे पहली बात यह कि केदार जी को पढ़ते हुए एक तरह की सरलता का अनुभव होता है । इसे अनेक लोग अभिधा कहकर छोटा साबित करना चाहते हैं लेकिन एक उलटबाँसी करते हुए कहा जा सकता है कि आसान लिखना कठिन है और कठिन लिखना अपेक्षाकृत आसान । अभिधा को न सिर्फ़ श्रेष्ठ कविता का लक्षण माना गया है (यहाँ अभिधा पर आचार्य शुक्ल के बल को उनकी निजी रुचि नहीं बल्कि काव्य चिंतन की एक समानांतर परंपरा का उद्घाटन समझना चाहिए) बल्कि शब्द शक्ति विचार में भी इसको लेकर संघर्ष रहा है । कुछ विद्वान शब्द की तीन शक्तियाँ मानते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो उसकी केवल एक शक्ति, अभिधा, मानते हैं और अन्य अर्थों को तात्पर्य वृत्ति के सहारे समझने पर जोर देते हैं । लिखने में एक तरह की बनावट परंपरा से ही हमें मिल जाती है इसलिए उसके दबाव से पीछा छुड़ाकर सहज लेखन बेहद कठिन होता है ।
अपने गद्य की विशेषता बताते हुए केदार जी ने लिखा- ‘वकील हूँ इसलिए मेरा गद्य विश्लेषणात्मक और तथ्यपरक अधिक है । तर्क से तना मेरा गद्य जो बात कहता है दम खम से उभारकर बिना शील संकोच के बल देकर कहता है । मेरे गद्य की भाषा भी कभी कभी बहसनुमा कभी कभी कठोर और कटु कटारनुमा होती है । मेरा गद्य मेरे अनुभूत सत्य का पक्ष प्रेषित करता और स्थापित करता है ।---जैसे मैं आदमी को उसके परिवेश के संदर्भ में समझता हूँ वैसे मेरा गद्य उसे उसके परिवेश के संदर्भ में समझता है । मैं होकर भी मैं औरों से घनिष्ठ हूँ मेरा गद्य भी मेरा होकर औरों के गद्य से घनिष्ठ है । कवि भी हूँ इसलिए कभी कभी मेरा गद्य भी काव्यात्मक हो जाता है ।--गद्य में भी काव्य की समस्याओं के मूल कारणों को जानना मेरा लक्ष्य होता है । जैसे मैं अंतर्गुहावासी अहं नहीं हूँ वैसे मेरा गद्य भी अंतर्गुहावासी नहीं है ।’ (भूमिका, समय समय पर)संक्षेप में कि केदार का गद्य उनके व्यक्तित्व का ही विस्तार है । किसी के लिए भी यह उपलब्धि स्पृहणीय है ।
इस पूर्वपीठिका के बाद हम उनके लेखन की चिंताओं को समझने की कोशिश कर सकते हैं । इसके दायरे में उनकी कविता, उनके समय की कविता, अतीत की कविता के अलावा विचार को कविता में आयत्त करने की जद्दोजहद है । आश्चर्यजनक रूप सेदेश देश की कविताशीर्षक से प्रकाशित देश दुनिया की कविताओं के अनुवाद के बावजूद इन लेखों में विदेशी संदर्भ बेहद कम आए हैं । कुल एक लेख हंगरी के कवि सैंडर्स पेटाफी पर है । शायद इसका कारण उनका संकोच है जो रामविलास शर्मा को लिखी चिट्ठियों में बहुत मुखर है । इस संदर्भ में तथा अन्य मामलों में भीमित्र संवादका जिक्र मौके बेमौके हम करते रहेंगे ।
केदार नाथ अग्रवाल का मूल्यांकन प्रगतिशील कवियों के भीतर उन्हें रखकर ही करना उचित होगा । इस नाते परंपरा के प्रत्यक्ष संदर्भ उनके यहाँ सबसे कम दिखाई देते हैं बल्कि एक तरह का आलोचनात्मक रुख ही पुराने कवियों के प्रति दिखाई देता है । उदाहरण के लिएकालिदास की कविता और मैंमें कालिदास की कुल प्रशंसा के बावजूदकालिदास की अपनी युगीन सीमायें थीं । उन राजकीय सीमाओं के भीतर रहकर उन्होंने कविता को एक तरफ़ राजकीय बनाया और दूसरी तरफ़ लोक जीवन से संबद्ध करके उसे मानव भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति में लगाया ।शिव पार्वती के उनके चित्रण पर भी एक हल्का सा विरोध- ‘भोगवाद की यह व्यंजना दार्शनिक स्तर पर भले ही उचित समझी जाये लेकिन जीवन के स्तर पर काम वासना का ऐसा निरूपण किसी भी प्रकार से औचित्यपूर्ण नहीं कहा जा सकता ।इसी तरह तुलसी के प्रसंग मेंरामायण के संदर्भ में तुलसी की कर्मपक्षीय चेतनामें कहते हैंआदर्श चरित का यह ग्रंथ लोक जीवन जीने वालों के लिए आत्म तोष का ग्रंथ हो गया है । आत्मतोष के ग्रंथ के रूप में यह वंदनीय ग्रंथ है । किंतु करनी का ग्रंथ न होने की वजह से असमर्थ ग्रंथ है ।जबकि इसमें वर्णित धर्मकर्मठ धर्म है । वह धर्म लौकिक कर्म है । इसलिए इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि रामायण किसी भी प्रकार से पुजापा का ग्रंथ न बने ।इस मामले में वे तुलसी के अंतर्विरोध की चर्चा करते हैं- ‘यह कहना कि उन्होंने राम से अधिक राम के नाम को माना है और उसके जप की महिमा बखानी है इसलिए वह कर्म से अधिक धर्म के कायल थे सरासर गलत होगा । उनका यह कहना उनके चिंतन के अंतर्विरोध को प्रकट करता है ।जब रामविलास जी तुलसी की प्रशंसा करते हैं तो भी केदार जी की आलोचनात्मकता में कोई फ़र्क नहीं पड़ता । 13 फ़रवरी 1974 के पत्र में लिखते हैंअब इस युग में तुलसी का सेवार ही सब तरफ़ उतराया फिर रहा है । ---बेचारे सतह के नीचे धँसे तुलसी का असली मर्म तो कोई समझता ही नहीं ।फिर 26 अक्टूबर 1974 के पत्र में दोबारा विश्वनाथ त्रिपाठी की पुस्तकलोकवादी तुलसीदासपढ़ने के बादमैंने सोचा था कि इस पुस्तक से मेरा भ्रम टूटेगा ।---वह भ्रम न टूटा । बल्कि इस किताब से और भी साफ हो गया कि तुलसी अवध के राज्य के आदर्शों से भरपूर बँधे थे और कदापि क्रांतिदर्शी न थे ।अतीत के प्रति उनका यह रुख उन्हें थोड़ा ज्यादा ही कठोर साबित करता है ।
सारे प्रगतिशील कवि मार्क्सवाद के संपर्क में आने से पहले ही कविता करने लगे थे । उन पर अनेक विचारधाराओं के प्रभाव पड़ चुके थे । इसलिए इन सबने मार्क्सवाद को ग्रहण करने के लिए बड़ी मेहनत की थी । केदार जी में विचार को पकड़ने की ललक सबसे अधिक है । नागार्जुन उसके लिए कोई संघर्ष किए बगैर उसे साध लेते हैं । केदार जी की आलोचना में इस मामले में आत्मसंघर्ष सबसे ज्यादा है । इसी कारण उनसे कभी अति भी हुई है लेकिन महत्वपूर्ण बात उनकी ईमानदारी है । रामविलास शर्मा का साथ पाने के कारण वे इसमें ज्यादा गहरे उतरे भी । विचारधारा की पकड़ के लिए उनकी लड़ाई हमें मुक्तिबोध की याद दिलाती है । अपने संग्रहसमय समय परकी भूमिका में उन्होंने इस आत्मसंघर्ष का जिक्र किया है ।ऐसे स्वभाव का मैं, भौतिकवादी दर्शन से तालमेल बैठाकर, कविता को वस्तुसत्ता के संदर्भ में पढ़ने समझने लगा और पढ़ते पढ़ते समझते समझते इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि कविता भी वस्तुसत्ता की आत्मपरक अभिव्यक्ति है और यह अभिव्यक्ति भी देश काल से बँधी है और ऐसे बँधकर ही नअहंकी अभिव्यक्ति है- न वस्तुसत्ता की ठोस अभिव्यक्ति है वरन दोनों की वास्तविक अभिव्यक्ति है जो आदमी को आदमी से जोड़ती है, एक युग को दूसरे युग से जोड़ती है; वर्तमान को भूत और भविष्य से मिलाती है; और आदमी की सभ्यता और संस्कृति का विकसित प्रारूप प्रस्तुत करती है ।इसी आधार पर वे कहते हैं- ‘मैं इसे भी वैज्ञानिक नहीं समझता कि काव्य का मूल्यांकन- या पुनर्मूल्यांकन- केवल कथ्य या शिल्प या कलात्मकता के आधार पर किया जाए और उसके सामाजिक या राजनयिक प्रभाव को दरकिनार कर दिया जाए और कृति को केवल कृति की एक मात्र इकाई के रूप में देखा जाय ।पुनःइस इकाई का वस्तुजगत मेंयथार्थ जगत में- इतिहास में- आदमियों के समाज में- देश काल में- एक स्थान होता है । अपने उस स्थान पर आकर यह इकाई दूसरों को उस वस्तुसत्ता का भान कराती है जो मूर्तजगत की वस्तुसत्ता के आत्मपरक बनने के उपरांत रचना प्रक्रिया से होकर संबद्धशीलता पा चुकी होती है और दूसरों के लिए एक ग्रहणीय संवेदनशील वास्तविक सत्य बन चुकी होती है ।इस टुकड़े की व्याख्या से हम कविता की रचना प्रक्रिया और लिख जाने के बाद उसके सामाजिक प्रकार्य की रहस्यपरक समझ के मुकाबले एक ज्यादा साफ तस्वीर प्राप्त कर सकते हैं ।
साहित्य के प्रसंग में मार्क्सवादी समझ को अंगीकार करने की उनकी कोशिश का प्रमाणविचार बोधमें संकलितसंज्ञान की कलात्मक अभिव्यक्ति: कविताशीर्षक लेख है । इस लेख में उन्होंने लेनिन की काग्नीशन संबंधी धारणा को समझने का प्रयास किया है । ध्यान देने की बात यह है कि लेनिन को आम तौर पर राजनीतिक नेता ही माना जाता रहा है और बेहद प्रतिबद्ध लोगों को छोड़कर शेष बौद्धिक उन्हें गंभीर विचारक नहीं मानते । यह लेख केदार जी की कविता संबंधी मान्यताओं के मूल को निरूपित करता है इसलिए इसे थोड़ा विस्तार से देखना जरूरी है । कहते हैं ‘---कविता केवल व्यक्ति की मानसिकता या चेतना की इकाई मात्र नहीं होती । वह वस्तुसत्ता से निरूपित हुई एक नितांत नयी संश्लिष्ट इकाई होती है । यह संश्लिष्ट इकाई मानवीय बोध की इकाई होकर दूसरों के मानवीय बोध की इकाई बन जाती है । ऐसा ही क्रम बराबर चलता रहा है और आदमी ऐसे क्रम के द्वारा ही अपने को, अपने समाज को, अपने परिवेश को और देशकाल के घटनाक्रम को और उसके विभिन्न आयामों को और तदनुरूप कविता को रचता रहा है ।इस क्रम को स्पष्ट करते हुए वे समूची हिंदी कविता के इतिहास का मूल्यांकन करते हैं और बताते हैं किहिंदी कविता के अब तक के इतिहास से यही पता चलता है कि वह उसी ऐतिहासिक जीवन के नाना रूपों को जीती चली आई है, जिस ऐतिहासिक जीवन के रूपों को आदमी का समुदाय जीता चला आया है ।इसके बाद प्रगतिशील कविता के जड़ मूल खोजते हुए भारतेंदु के समय आने वाले परिवर्तन को रेखांकित करते हैं जबकविता शास्त्रीय काव्य लोक से बाहर निकलकर लोक जीवन के हर्ष विषाद से आलोड़ित होने लगी। फिरप्रथम महायुद्ध के बाद जन जागृति जोरदार हुईकवियों के मन पंख खोलकर मुक्त आकाश में उड़ने लगे---जो प्रकृति पहले उद्दीपन के लिए ही प्रयुक्त होती थी वह प्रकृति अब स्वयं कविता का विषय बन गयी ।याद रहे कि यह सब कुछ प्रगतिशील कविता के समर्थन में हिंदी नवजागरण को खड़ा करने के लिए है । प्रगतिशील कविता का योगदान था किजन जीवन के लिए समर्पित हुई इस कविता ने पूर्वकालीन और पारंपरिक साहित्यिकता से कविता को बाहर निकाला ताकि आम आदमी भी कविता को कविता की तरह प्यार करने लगे और समाजवादी यथार्थवाद की मानसिकता से वह संबद्ध होने लगे ।यह काम आज़ाद भारत के सत्तारूढ़ शासकों के लिए परेशानी का सबब बन गया औरदेश के राष्ट्रीय कर्णधारों ने जब शासन का कार्यभार संभाला तब वह इस आंदोलन से सहम गये---देश के बुर्जुआ मनोवृत्ति वाले पढ़े लिखे लोगों ने दल बनाकर इस आंदोलन को कुचल डालने का जान कर या अनजान कर षड़यंत्र रचा ।नतीजा किविरोध में प्रयोगवाद का नया आंदोलन चलाया गया ।---हिंदी कविता को इस प्रयोगवाद ने सामाजिक और राजनीतिक मूल्यों से शून्य कर दिया । अब आई नयी कविता ।---यह प्रयोगवाद से आगे तो गये लेकिन ये भी बिना किसी ठोस जीवन दर्शन के खोखले मानववाद के वृत्त में भ्रमण करते रहे और इस बात में खुश होते रहे कि वे व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के लिए जी रहे हैं । इसलिए नयी कविता का कथ्य और शिल्प लोक जीवन का कथ्य और शिल्प नहीं हो सका ।प्रसंगवश हमें विजय देव नारायण साही केलघु मानवऔर इस भंगिमा के ही चक्कर में उनको सर पर उठाए प्रगतिशील आलोचकों के मुकाबले केदार जी का यह मूल्यांकन गहराई से देखना होगा ।
इसी लेख में केदार जी ने प्रगतिशील कविता के सामने उपस्थित कार्यभार भी गिनाए हैं । उनका उल्लेख इसलिए आवश्यक है क्योंकि वे अन्य जड़ प्रतिबद्ध लोगों से अलग एक हद तक खुले और आत्मालोचनात्मक भी थे:
सबसे पहली बात तो यह है किसंज्ञानसे प्राप्त हुए सत्य की अभिव्यक्ति करने वाली कविता तभी कविता होगी जब वह कलात्मक होगी । कलात्मक होने की पहली शर्त यह है कि वह सत्य जिसकी अभिव्यक्ति कविता करती है स्पष्ट और लोक जीवन को बिंबित करने वाला हो---। अस्पष्टता और दुरूहता कविता की कलात्मकता को नष्ट करने वाले तत्व होते हैं ।
इस टिप्पणी से ही कविता की कलात्मकता के प्रति उनकी सावधानी को समझा जा सकता है । अक्सर ऐसा लगता है कि सभी प्रगतिशीलों ने कला के प्रति एक तरह की असावधानी बरती है लेकिन इस समझ को गलत साबित करने के लिए त्रिलोचन की कविता सशक्त प्रमाण तो है ही केदार जी की यह राय भी कोई कम सबल तथ्य नहीं है । इस नाते प्रगतिशील कवियों की कला पर न के बराबर काम हुए हैं ।  
दूसरी बात यह है कि जिस तथ्य की या सत्य की अभिव्यक्ति की जाये वह सशक्त बिंब विधान से उद्दीप्त हो अर्थात वह केवल सत्य की नंगी पकड़ न होकर हो वरन वह आवश्यक वस्तु सत्ता की बुनावट के रूप में उभरकर अभिव्यक्त हुआ हो । अन्यथा पाया हुआ सत्य यदि केवल प्रतीकात्मक शैली में ही व्यक्त हुआ तो वह दुर्बल और क्षीण हो जाता है---
शायद याद दिलाने की जरूरत नहीं कि इस मान्यता में रामचंद्र शुक्ल की इस धारणा की गूँज है कि कविता में अर्थग्रहण की बनिस्बत बिंबग्रहण अपेक्षित होता है । असल में प्रगतिशील साहित्य ने सचमुच हिंदी की स्वस्थ परंपरा का पुनरुद्घाटन किया था ।
तीसरी बात यह है कि यदिसंज्ञानसे पाया हुआ सामाजिक या राजनीतिक सत्य अखबारी भाषा में या मोहल्ले की चलताऊ भाषा में व्यक्त किया गया तो वह वैसे स्थायित्व की संरचना के रूप में नहीं होगी जो समय के प्रहार से ढहने से बच सके ।
चौथी बात यह है कि जनता की बनी बनाई मानसिकता तभी टूट सकती है जब नयी मानसिकता मानवीय जीवन के अंतर्विरोधों की समस्या का कोई समाधान दे सके । इसके लिए कविता को वे वस्तुवत्तीय तत्व व्यक्त करने होंगे जो आदमी को विरूपित करते रहते हैं ।
पाँचवीं बात यह है कि कवि की अनुभूतियाँ दूसरे की अनुभूतियाँ बनें ।
इस बात को वे अक्सर प्रयोगवादी और नई कविता के कवियों के विरोध में उठाते हैं और अपनी निजी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति का माध्यम कविता को बनाने का विरोध करते हैं ।
छठीं बात यह है कि कोई भी कला शाश्वत नहीं है---इसलिए इस मोह में नहीं पड़ना चाहिए कि कविता स्वयं में कोई सिद्धि है और वह देश और काल का अतिक्रमण कर सकती है ।
सातवीं बात यह है कि---सत्य का और शिल्प का जब द्वंद्व चलता है तभी कथ्य का अपना शिल्प तैयार हो जाता है और वही अर्थ बोध देने लगता है ।
आठवीं बात यह है कि कला भी और कविता की कला भी आदमी की चेतना का बिंबन करती है ऐसा न हो कि कवि की आत्मपरकता ही कविता में व्यक्त हो और वस्तुसत्ता के वे तत्व उसमें न आयें जो उस आत्मपरकता के कारण खो चुके हैं ।
नवीं बात यह है कि न कला, कला के लिए है और न कविता, कविता के लिए है इसलिए शुद्ध कविता मानवीय मूल्यों से वंचित कविता होती है ।---
अंत में कविता को संश्लिष्ट कविता बनाये जाने की अवधारणा औचित्यपूर्ण लगती है । तभी कविता बोलती है और कवि नहीं बोलता ।
यह अंतिम माँग तो उन्हें बहुत ही गहरे चिंतक की कोटि में खड़ा कर देती है । कविता को उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व प्रदान करना कठिन साधना की माँग करता है ।
इस पूरे उद्धरण में केदार जी ने हालाँकि रामचंद्र शुक्ल की तरह कहीं भी अपनी कविता का उदाहरण नहीं दिया है लेकिन उनकी कविता को समझने की इससे बेहतर कुंजी नहीं हो सकती लेकिन इसका महत्व महज इसी कारण नहीं । आज की कविता पर विचार करने वालों और कवियों के लिए भी इसमें अनेक काम की चीजें हैं ।  
केदार जी के आलोचनात्मक लेखन को पढ़ते हुए लगातार उस वैचारिक कशमकश के माहौल में रहना पड़ता है जिसे हम शीत युद्ध का वैचारिक संघर्ष कहते हैं । चाहे वे किसी पुराने कवि की बात करें या अपने लेखन की चर्चा करें या फिर समकालीन वातावरण का जिक्र करें, यह खेमेबंदी लगातार बोलती रहती है । इस चक्कर में कहीं कहीं जोश में वे भूलें भी कर जाते हैं । मसलन अपने लेखशासन, जनता और लेखकमें पश्चिमी लेखन का सर्वेक्षण करते हुए वे तत्कालीन खेमेबंदी के जबर्दस्त प्रभाव में सार्त्र, सीमोन, काफ़्का सबको एक ही डंडे से हाँकते हैं और भ्रमवश सीमोन को पुरुष लेखक के बतौर बतलाते हैं । लेकिन हिंदी साहित्य की दुनिया में उनका पक्ष इतना कमजोर नहीं है । वे जनपक्षधर परंपरा के लेखक प्रेमचंद और निराला की सकारात्मकता को बलपूर्वक उठाते हैं और इनके जरिए अपने पक्ष को मजबूत बनाते हैं । मार्क्स के शब्दों को एक दूसरे प्रसंग में याद करें तो ऐसा लगता है कि वर्तमान में गुत्थमगुत्था शक्तियों को जब अपनी ताकत कम लगती है तो वे अतीत के प्रेतों को अपनी मदद के लिए बुला लेते हैं ।
प्रगतिशील साहित्य के पक्ष में तर्क करते हुए केदार जी ने अज्ञेय के नेतृत्व में संचालित प्रयोगवादी आंदोलन पर सबसे ज्यादा खुलकर आक्रमण किया और उसके खतरे भी उठाए । कलावादी या उन्हीं के शब्दों में अहं के अंतर्गुहावासी खेमे से तो उन्हें क्या मान्यता मिलती खुद प्रगतिशील आलोचना के भीतर आए भटकाव के नेताओं ने भी उन्हें दरकिनार ही किया । इसकी झलक मित्र संवाद के एक पत्र से मिलती है जिसमें वे नामवर सिंह के रुख का जिक्र करते हैं । बहरहाल उन्हें हिंदी के सबसे बड़े और ईमानदार प्रगतिशील आलोचक रामविलास शर्मा की मित्रता का सुख और उनका सहयोग सुलभ था । यही उनकी सबसे बड़ी पूँजी थी और यह कोई छोटी- मोटी पूँजी न थी ।
स्वार्जित समझ और प्रगतिशील लेखक संघ की बजाय प्रगतिशील साहित्य और जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति अटूट आस्था के कारण ही वे प्रलेस की स्वर्ण जयंती के अवसर पर लखनऊ में होने वाले समारोह में सरकारी मदद की आलोचना करते हैं । वामपंथी आंदोलन के एक खेमे द्वारा आपातकाल का समर्थन करने के बावजूद वे अपना विरोध व्यक्त करते हैं । अपने खुलेपन के कारण ही वे वाम की तीसरी धारा के कवि सौमित्र मोहन की कवितालुकमान अलीकी भूरि भूरि प्रशंसा करते हैं जोसमय समय परमें संकलित है । इसी संग्रह की भूमिका में उन्होंने अन्य प्रगतिशील कवियों से अपने आपको अलगाते हुए इस खुलेपन को रेखांकित किया हैमेरी प्रगतिशीलता कइयों की प्रगतिशीलता से भिन्न रही है । मैंने अपने दार्शनिक सिद्धांतों को कविता के कसने की कसौटी नहीं बनाया । वहपार्टीवादहोता और उसपार्टीवादसे परखना इस अपने युग की काव्य उपलब्धियों के साथ न्यायसम्मत न होता ।इसीलिए यह प्रशंसा कोई आशीर्वाद नहीं है बल्कि उस कविता से उपजे प्रश्नों का स्वीकार है । वे कहते हैंयुगीन और आधुनिक कथ्य को- जन मानस में व्याप्त विसंगति को- जो अब तक की लिखी छोटी बड़ी कविताएँ न कह सकीं उसको इसने कहा और ऐसा कहा कि भरपूर इंपैक्ट पड़ा ।
कविता की धारणा के मामले में जहाँ उनके विचार सचमुच उन्हें गहराई से देखने के लिए मजबूर करते हैं वहीं अतीत की कविता का मूल्यांकन करते हुए वे मानव इतिहास और संस्कृति की एक तरह की भोंड़ी समझ का प्रदर्शन करते हैं जब ‘युग की गंगा’ की भूमिका में कहते हैं कि ‘—कवि अथवा उसके व्यक्तित्व को अर्थनीति का अंश ही समझना चाहिए । कवि की विचारधारा और भावधारा दोनों ही अर्थनीति से निःसृत होती हैं---।’ उनके बारे में रामविलास जी का मूल्यांकन एक हद तक सही है जो एक पत्र की शक्ल में है ‘तुम्हारा इंद्रिय बोध तगड़ा है, वैसा ही दृढ़ भाव बोध भी है किंतु इनके साथ विचार और चिंतन की वह गहराई नहीं है—-इसलिए कि तुम सहज कवि हो, दार्शनिक नहीं ।’ कोई कारण नहीं कि इस बेबाक टिप्पणी पर अविश्वास किया जाए । इसके आलोक में हमें केदार जी से दोनों ही तरह से सीखना होगा । उनके ईमानदार संघर्ष की मूल्यवान थाती को संजोते हुए उनकी समझ की कमजोरियों के पार जाना होगा ।