Thursday, February 16, 2012

लेखक की अंतरात्मा की यात्रा@गोपाल प्रधान

किसी भी लेखक की डायरी उसका कबाड़खाना होती है । इसको देखना थोड़ा दखलंदाजी जैसा लगता तो है लेकिन अगर लेखक ने उसे प्रकाशित करवा दिया है तो वह हमें इस अवैध काम के लिए उकसाता है । इस मामले में रमेशचंद्र शाह की डायरी 'इस खिड़की से' को देखना मजेदार अनुभव है । रमेशचंद्र शाह हमारे समय की रचनाशीलता के विश्लेषण के लिए अनेक कोणों से संदर्भ विंदु की तरह हैं ।

वैसे तो इस डायरी में मुख्य रूप से 82 से 2004 तक की प्रविष्टियाँ हैं लेकिन पहले की एक डायरी मिल जाने से 72-73 की भी कुछ टीपें शामिल कर ली गई हैं । शाह जी ने इसके लिए पाठकों से क्षमा माँगी है लेकिन मुझे इसकी जरूरत नहीं महसूस हुई । बल्कि लगा कि ऐसा होने से ठीक ही हुआ क्योंकि इससे बाद की टीपों को पृष्ठभूमि प्राप्त हो गई है । कोई क्रमभंग भी महसूस नहीं होता । शायद इसका कारण यह है कि शाश्वत उनकी चेतना का स्थायी भाव है जो थोड़ा हेर फेर के साथ दोनों ही कालखंडों में मौजूद है । यह जरूर है कि शुरू में इसका रूप कुछ अधिक ही रहस्यवादी पुट लिए हुए है लेकिन बाद के दौर में बाहर बिखरा जीवन ज्यादा दिखाई देता है ।

इस डायरी को पढ़ते हुए रामचंद्र शुक्ल की एक टिप्पणी का ध्यान रखना चाहिए । औपनिवेशिक भारत में आध्यात्मिकता के शोरगुल से परेशान होकर शुक्ल जी ने इसके जड़ मूल को पहचानते हुए कहा कि यूरोप के लोगों ने कह दिया कि भारत के लोग बहुत आध्यात्मिक होते हैं तो दिखा चले हम अपनी आध्यात्मिकता ।

डायरी में शुरू से ही कविता और कला को आध्यात्मिकता के साथ अनेक तरह से जोड़ा गया है । पहली ही टीप मेंअतिविरल उदाहरण होगा यह, जहाँ योग की उच्चतम भूमिका पर पहुँचकर भी योगी उसका इस तरह बखान कर सकता है; कवि की तरह शब्दों से काम ले सकता है ।इसके बाद वे सवाल करते हैंउससबदकी साधना का इस कविजनोचित शब्द साधना से क्या संबंध है ?’ फिर मानो इसी सवाल का जवाब देते हुए कहते हैंसृष्टि में वाक तत्व का प्रवेश और प्रतिष्ठा एक नई और जबर्दस्त घटना थी ।---भाषा एक आवरण बन गई, संसार के भीतर एक प्रति संसार को जन्म देती हुई । तत्व का सीधा साक्षात्कार असंभव सा बना देती हुई । बहुत बड़ा कलेजा चाहिए इस खोल को फाड़कर सृष्टि का सीधा आघात अपनी चेतना पर झेलने के लिए । यह साहस योगी को सहज सिद्ध हो जाता होगा; किंतु मुझे ऐसा लगता रहा है कि कवि का कवित्व भी कहीं इस प्रक्रिया से जुड़ता है ।आगे वे इन दोनों के बीच फ़र्क भी बताते हैंकवि का संघर्ष भाषा के सीमांतों से है । पर वह यह तोड़ फोड़ मचाने के बाद फिर से भाषा में लौट आ सकता है । जबकि योगी या संत वापस नहीं आना चाहता- उसी भूमिका पर बने रहना चाहता है ।इसी क्रम में उन्हें संतों की वाणी की याद आती है । इनकी विशेषता का संकेत सा करते हुए वे कहते हैंयह जो सामान्य चेतना और सामान्य भाषा के सीमांतों को भेदकर अव्यक्त को भी व्यक्त कर दे सकने की और इस तरह भाषा के फ़्रंटियर्स को और आगे खींचने बढ़ाने की सामर्थ्य है, उसकी बात । तब फिर, जिस व्यक्ति में योगी होने के साथ साथ अपने कवित्व को भी साधने की जिद है, वह यदि इसी जिद के चलते जीवन संसार को ही रूपांतरित कर देने की, बदल देने कि संभावना की शोध करता है और अपने कवित्व को ऐसी शोध का उपकरण या साधन बनाता है, तो इसमें अजब क्या है ?’

अपने साथ होने वाली कुछ रहस्यमय क्रियाओं को लेखक ने दर्ज किया है । मसलन 6 नवंबर 1972 का इंदराजये शक्ति की तरंगें नहीं तो क्या हैं जो मेरे स्नायु तंत्र से खेलती हैं !---सारे शब्द ओछे पड़ जाते हैं जिस अनुभव का बखान करने के लिए उसे क्या कहूँ ?---कभी कभी अद्भुत शांति का अनुभव होता है । भीतर लहर लेती ऊर्जा तरंगों का खेल नहीं; बस संपूर्ण निश्चलता और शांति ।लेकिन फिरकिंतु यह अवस्था उतनी ही देर क्यों टिकती है ? बाद में, जब आप ध्यान से बाहर निकलकर अपने दैनिक जीवन संसार में लौटते हैं तब वह सुलभ क्यों नहीं रहती ?’ दोबारा 12 नवंबर को अपने द्वंद्व को दर्ज कियाबड़ा डर लगता है, ध्यान में चरितार्थ अपनी असामान्य शांति और निरुद्विग्न अवस्था को स्मरण करके उनको लिपिबद्ध करने का उपक्रम करना ।---सबसे ज्यादा उद्विग्न करने वाली बात यह, कि यह सिर्फ़ याद करना है; उसे पुनरुपलब्ध करना नहीं । वह अवस्था वहीं की वहीं क्यों रह जाती है ? सामान्य जीवन को आलोकित रूपांतरित क्यों नहीं करती ?’ उसी दिन की टीप में असली समस्या प्रकट हुई हैतुम साहित्य को नहीं छोड़ सकते । तुम्हें यह ध्यान योग भी चाहिए और वह कागज कलम वाला ध्यान भी चाहिए । और तुम्हारी जिद है कि दोनों को आपस में जुड़ जाना चाहिए । जबकि तुम्हारा अनुभव यह है कि दोनों एक दूसरे के विरुद्ध जाते हैं ।अपने आप को संबोधित यह संशय ही इस डायरी की टेक है । एक ओर साहित्य तो दूसरी ओर अंतर्मन । पता नहीं कैसे लेखक ने इस कशमकश पर विजय पाई क्योंकि इसमें फिर 82 की प्रविष्टियाँ शुरू हो जाती हैं । लेकिन बाद की टिप्पणियों के लिए 72 की टीपों से भूमिका जरूर तैयार हो जाती है ।

रमेशचंद्र शाह के प्रिय कवि जयशंकर प्रसाद हैं ।छायावाद की प्रासंगिकतामें विस्तार से उन पर विचार किया गया है । इसके अलावा साहित्य अकादमी के लिए उन्होंने प्रसाद पर एक मोनोग्राफ़ भी लिखा है । उनसे संबंधित इंदराज समूचे साहित्य के बारे में शाह जी के दृष्टिकोण का खुलासा करती है । लिखते हैंप्रसाद का कृतित्व भारतीय भाव बोध और भारतीय विश्व दृष्टि की शर्तों पर आधुनिक विश्व को आत्मसात करने की आत्मविश्वासपूर्ण प्रक्रिया को भी झलकाता है । यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास इकहरी आत्मतुष्टि से उपजा हुआ नहीं है; आलोचनात्मक बुद्धि भी उसमें सक्रिय है बराबर । विलक्षण व्यक्तिमत्ता से उत्तरोत्तर निर्वैक्तिक आत्म दर्शन और विश्व दर्शन तक की यात्रा इसमें देखी जा सकती है । साथ ही उसमें एक ऐसा इतिहास बोध भी उत्तरोत्तर गहराता प्रतीत होता है जो आज के भारतीय लेखक बौद्धिक के लिए बड़ा प्रेरक अर्थ रखता है ।साफ है कि उनकी भारतीयता सांस्कृतिक स्तर पर पश्चिम विरोध की जानी पहचानी भूमि पर खड़ी होती है । प्रसाद जी तो मात्र बहाना हैं । इसकी पुष्टि इसी टीप में युवा लेखकों पर एक कड़ी बात से होती है । वे कहते हैं ‘---युवा आवेगों के ढल जाने के बाद जीवनानुभव और यथार्थ ज्ञान की प्रौढ़ावस्था के साथ कवि धर्म को निबाहते चलना जिस भाविक परिपक्वता की माँग करता है, उसका प्रमाण हमारे अधिकांश कवि (कवि ही क्यों, कथाकारों पर भी यह आलोचना उतनी ही सख्ती से लागू होगी) नहीं देते लगते । इस भाविक नपुंसकता की क्षतिपूर्ति वे या तो दादागिरी (हाँ, साहित्य में भी दादागिरी सर्वथा मान्य और प्रचलित है) से, राजनीतिक प्रतिबद्धता के पुण्य लोलुप प्रदर्शनों से करते हैं, या फिर दार्शनिकता झाड़ने लगते हैं ।इस प्रसंग में उनकी भाषा का तीखापन ही प्रतिबद्धता से उनकी चिढ़ को बता देता है ।

बहरहाल 72 के बाद डायरी सीधे 82 में प्रवेश कर जाती है । यहाँ उनकी प्रारंभिक आध्यात्मिक रुचि कला की समझ में व्यक्त होने लगती है । एक मामले में यह बदलाव अच्छा लगता है क्योंकि फिर देशी और विदेशी संदर्भों में कला के विभिन्न रूपों का साक्षात्कार पाठकों को होता चलता है । लगे लिपटे दोस्तों की दुनिया भी उजागर होती चलती है और आश्चर्य नहीं कि इस दुनिया में अज्ञेय, निर्मल वर्मा, रामकुमार आदि मौजूद पाए जाते हैं । नये दौर के इन भारतविदों के साहचर्य और संबंध तथा थोड़ी मुग्धता भी डायरी में यदा कदा उभर आती है । इन सबके बीच कामन फ़ैक्टर भी डायरी को पढ़ते हुए स्पष्ट होते चलते हैं ।

पहले ही हमने उनकी जिस चिढ़ का जिक्र किया वह बाद में भी उनमें कायम रही है । 15 अक्टूबर 1982 की टीप में बंसी कौल केसमुद्र मंथनके नाट्य प्रदर्शन पर उनकी प्रतिक्रिया दर्ज है । क्षुब्ध होकर उन्होंने लिखासस्ता पोलिटिकल रेह्टरिक, आत्मभ्रामक पुण्यात्मा मानसिकता से प्रेरित तथाकथित सोशल क्रिटिसिज्मबस, मानो इतना काफी है दर्शकों को दो घंटे किसी तरह उलझाए रखने को । नाटक किसी को नहीं चाहिए ।---चाहिए बस तथाकथित सोशलिस्ट रियलिज्म और हुड़दंगी तमाशे का एक वर्णसंकर, बस ।स्पष्ट है कि अब उनकी चिढ़ दर्शकों की रुचि की निंदा तक पहुँच गई है ।

उनके लेखन की बड़ी विशेषता उनका आत्मसंशय है । 12 अगस्त 1986 की टीप में एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे पर वे इसी शैली में दर्ज करते हैंमेरे लेखन से किसी को यह भ्रम हो सकता है कि मैं पश्चिम और पूर्व को दो सर्वथा असंगत विरोधी ध्रुवों के रूप में देखता हूँ और इस तरह सोचता हूँ जैसे पश्चिम में जो कुछ भी है वह एक सरीखा है और पूर्व का उलटा ।फिर अपनी ही सफाई देते हुए वे फँस जाते हैंकिंतु मेरी दृष्टि कदापि इतनी सरलीकृत विभाजन की नहीं है ।साफ़ है कि यह किसी का आरोप नहीं उनके ही मन का द्वैध है । अपनी जटिल दृष्टि की व्याख्या करते हुए भी वे कह ही देते हैंमैं जानता और मानता हूँ कि यह द्वंद्व है तो सही : दो विश्व दृष्टियों का, दो जीवन दर्शनों का ।इसके बाद ही दूसरा भी फ़र्क बताते हैंवहाँ वैज्ञानिक प्रयोगशील चिंतन और धार्मिक चिंतन के बीच जिस तरह का तनाव रहा- यहाँ नहीं हो सकता था ।अब अगर इसे पश्चिम और पूर्व को विरोधी ध्रुवों के बतौर देखना नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे । वे अपनी जो जटिलता बताते हैं वह भारतविदों के साथ पूर्व के सामंजस्य की है ।वहाँ के दार्शनिकों और धर्माचार्यों की अपेक्षा वहाँ के कवियों- उपन्यासकारों के साथ हम तुरंत सहानुभूति स्थापित कर लेते हैं ।मानो पश्चिमी साहित्यकार पश्चिम की विचारधारा से सर्वथा स्वतंत्र होकर ताउम्र भारत में ही रहते आए हों ! इसी तर्क पद्धति का अनिवार्य परिणाम आध्यात्मिक भारत की खोज निकलता है जो उनकी डायरी की आगे की प्रविष्टियों में बिखरा पड़ा है ।

88 के आते आते डायरी में इस खोज की शुरुआत होती है । इसके लिए लेखक अनेक यात्राएँ करता है और हरेक यात्रा में उसका पाला किसी न किसी अचंभे से पड़ता है । ऐसी ही एक यात्रा का विवरण 1 अक्टूबर 1988 को लिखा गया है जो बीकानेर की यात्रा में देखे हुए अचंभों से जुड़ा हुआ है । इसमें सदा की तरह उनका संशयी मन भी मौजूद है ।अब हम एक चौक में खड़े थे । एक क्षण को लगा मैं रोम पहुँच गया हूँ ।---ऐसी कला, ऐसे कर्मकौशल के पीछे जो कठोर श्रम झलकता है---। इस सौंदर्य और कला के पीछे कितनी तपस्या है, कितनी एकरस आवृत्ति भी !’ फिर वे अचानक सजग हो जाते हैंमैं तो इसके सर्वथा विपरीत सोचता रहा हूँ कि मनुष्य में कुछ है जो यांत्रिकता से उसे उबारता है और उसी का नाम आत्मा है ।सामान्य प्रकृति भी उन्हें अचंभे में डालती हैआगे पीछे चौतरफ़ा मरुस्थल का विस्तार और ऊपर बदरौंहा आसमान । कौन किसका प्रतिबिंब है, कहना कठिन था । एक सा, बल्कि एक ही पसारा दोनों का ।न सिर्फ़ आसमान और जमीन एक ही तत्व का पसारा दिखाई देती है बल्कि योगी अरविंद और मुक्तिबोध भी एक ही नजर आने लगते हैं । नमूना देखिए ‘---औपनिवेशिक ज़हनियत के मारे हमारे बुद्धिजीवियों को अरविंद या मुक्तिबोध सरीखी जीवनदायी और मूलगामी आलोचना की जगह विचारमूढ़ परप्रत्ययनेयता की टेव पड़ गई दीखती है जो आत्म विगर्हणा को ही आत्मालोचना मान बैठती है ।मुक्तिबोध हुआ करें सामाजिक प्रश्नों के विचार विमर्श से गायब होने पर चिंतित हम तो उन्हें अरविंद के साथ नाथकर ही मानेंगे ! धर्म के साथ बंधु को इसी देश मेंचत्वारि मूर्ख पंडिताःने जोड़ा था । करना होगा तो आत्मालोचना करेंगे आत्म विगर्हणा नहीं !

इस खोज में अन्य तमाम चीजों के अलावा सबसे महत्वपूर्ण चीज हाथ लगती है स्वाध्याय आंदोलन । यह बताने की जरूरत नहीं कि सामाजिक सुधार का यह आंदोलन अंततः भाजपाई खेमे में जा पहुँचा है । इस आंदोलन को समझने के लिए एक जुटान हुई थी जिसमें लेखक के साथ धर्मपाल, राजीव वोरा, रमण श्रीवास्तव और वेद प्रताप वैदिक थे । उसके बाद दोबारा हुई बैठक में विद्या निवास मिश्र, निर्मल वर्मा आदि भी जुड़ गए और इस तरह पूरी मित्र मंडली ने स्वाध्याय आंदोलन को अपने तरीके से समझा । निर्मल वर्मा को लेखक ने बड़ी मुद्दे की बात कहते हुए उद्धृत किया है ‘सबसे पहले तो हमें यही देखना चाहिए कि कहीं हम इस निरर्थक मानसिक ग्रंथि से तो पीड़ित और प्रेरित नहीं हो रहे हैं कि कहीं हमें “हिंदू” या हिंदुत्ववादी न समझ लिया जाए । आखिर ऐसा क्यों है कि किसी भी अन्य धर्मावलंबी समाज के बुद्धिजीवियों को तो ऐसी चिंता नहीं सताती; मगर एक हिंदू समाज के बुद्धिजीवी को ही यह चिंता क्यों सताती है ?’ इस समग्र प्रयास का मूल्यांकन सा करते हुए लेखक का कहना है ‘यह तो बात है ही कि अन्य धर्मों की तुलना में हिंदू धर्म का सामाजिक पक्ष कम संवदनशील और परिवर्तन विरोधी बताया जाता रहा है ।’ ध्यान दें बताया जाता रहा है, है नहीं । स्वाध्याय आंदोलन को लेखक इस आलोचना का उत्तर मानता है और कहता है ‘यह एक दूरगामी महत्व की घटना है जिसमें हिंदू समाज और स्वयं जिसे “बिहैवियरल हिंदुइज्म” कहा जाता है- यानी आचरणगत हिंदुत्व उसके भी सार्थक और प्रगतिशील कायाकल्प की संभावनाएँ उजागर हुई हैं ।’ आडवाणी जी यह तो कर ही सके कि बुद्धिजीवी समाज हिंदू समाज जैसी कोटियों में सोचने विचारने लगा था । लेखक ने बताया कि ‘स्वयं इस बुद्धिजीवी समुदाय को भी अपनी समझ का कायाकल्प करने की जरूरत है और “स्वाध्याय” का यह प्रभावशाली प्रयोग उन्हें ऐसा एक अवसर सुलभ कराता है निस्संदेह ।’

लेकिन हाय कि लेखक का यह एजेंडा पूरा नहीं होता है तो वह गाली गलौज पर उतर आते हैं । उनके क्रोध के शिकार न सिर्फ़ ‘सहमत’ छाप कार्यकर्ता वरन साहित्य में विचार और समाज देखने वाले सभी लोग होते हैं । पूछना सिर्फ़ यह है कि भारत को सबको स्वीकार करने वाला और उदारमना बतानेवाले परिभाषा निर्माता मार्क्सवाद और वामपंथ का नाम आते ही संकीर्ण और अनुदार क्यों हो जाते हैं ? कहीं यह उनकी स्नायविक कमजोरी का सबूत तो नहीं ?

Sunday, February 12, 2012

प्रगतिशील आंदोलन की प्रासंगिकता

आज के समय प्रगतिशील आंदोलन को हम याद ही क्यों कर रहे हैं ? इस सवाल का जवाब आज के दौर की पहचान में निहित है । आज के समय की विशेषता को समझने के लिए हमें आठ दस साल पहले के समय पर निगाह डालनी होगी जब विचारधारा के नाम पर उत्तर आधुनिकता का बोलबाला हुआ करता था । अस्मिता आधारित आंदोलनों को पचाने के लिए सत्ता को राजसत्ता के अलावा हर कहीं खोजा पाया गया था और पूँजीवाद को भी समाज के रेशे रेशे में फैला हुआ तथा फलस्वरूप गायब बताया जाता था । परिस्थिति पर व्यंग्य करते हुए रणधीर सिंह ने कहा था कि पूँजीवाद न सिर्फ़ सत्ता के केंद्र से गायब हो गया है बल्कि हम वामपंथियों के चिंतन से भी अनुपस्थित हो चला है । उस दौर की तुलना में आज पूँजीवाद की करतूतें न केवल अधिक प्रत्यक्ष हैं बल्कि उसके समर्थकों को भी आज के हालात के लिए उसे जिम्मेदार ठहराते हुए देखा जा सकता है । वर्तमान आर्थिक संकट के पीछे उसकी भूमिका तो देखी ही जा रही है अस्मिता आधारित आंदोलन भी तमाम किस्म की असमनाताओं का समर्थन करने और उसके विरोध को दबाने में राज्य मशीनरी की भूमिका को पहचान रहे हैं और अधिकाधिक राजनीतिक होते जा रहे हैं ।

पूँजीवाद ने शासन के लिए व्यापक सामाजिक सहमति बनाने के लिहाज से संसदीय लोकतंत्र की प्रणाली अपनाई थी लेकिन पूरी दुनिया में वह सवालों की ज़द में है । भारत में यह संकट ज्यादा प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रहा है अन्यथा इसे बचाने के लिए इतना शोरगुल क्यों ? पश्चिमी मुल्कों में यही चीज तरह तरह की पाबंदियों की शक्ल में नजर आ रही है । ऐसे माहौल में मुक्तिबोध की कवितापूँजीवादी समाज के प्रतिऔर ज्यादा प्रासंगिक नजर आती है ।

इस बौद्धिक वातावरण में प्रगतिशील साहित्य की जो विशेषता हमारा ध्यान सबसे पहले खींचती है वह है साहित्य या कविता में राजनीति का दखल । ऐसा नहीं है कि राजनीतिक साहित्य लेखन का यह विस्फोट अचानक हुआ । हिंदी नवजागरण की शुरुआत ही साहित्य के पारंपरिक कार्यभार पर बदलाव के दबाव की सूचना देती है । इसी दबाव में भारतेंदु युग से ही कविता का राजनीतिक स्वरूप उभरने लगता है । आज के लिहाजन एक और बात पर ध्यान देना सही होगा । भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है । औपनिवेशिक सत्ता ने खेती के साथ जो खिलवाड़ किया उसी परिप्रेक्ष्य में हम हिंदी कविता में किसान समुदाय की उपस्थिति को एक तरह के प्रतिरोध के बतौर पढ़ सकते हैं । तब शुरू किया गया सर्वनाश आज चरम पर पहुँचता हुआ दीख रहा है ।

इस सिलसिले में यह बहस बेमानी है कि प्रगतिशील साहित्य की शुरुआत कब से मानी जाए ? जैसे धरती पर मनुष्य एक ही जगह पैदा होकर वहाँ से अलग अलग दिशाओं में नहीं गया बल्कि पृथ्वी पर एक साथ अनेक जगहों पर एक साथ उसका उद्भव हुआ उसी तरह प्रगतिशील साहित्य की शुरुआत भी 1930 के बाद से विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनेकानेक परिस्थितियों के चलते हुई । इसे आज भी भारतीय भाषाओं में जनता के साहित्य के बतौर सबसे मजबूत प्रवृत्ति माना जाता है जिसमें मार्क्सवाद को साहित्य के साथ सृजनात्मक रूप से मिलाया गया और जनता की ही भाषा में उसके लिए सदा से वर्जित रही साहित्य संस्कृति की दुनिया को उसके लिए सुलभ बनाया गया ।

प्रगतिशील कविता में किसान जीवन के सुख दुख की मौजूदगी उनके पिछड़ेपन की निशानी नहीं बल्कि नवजागरण की इसी विरासत का सकारात्मक विकास था । इसे विकास के वैकल्पिक रास्ते का आग्रह भी समझना चाहिए जो सोवियत रूस की मौजूदगी के कारण वास्तविक लगता था और हिंदी लेखकों को इसकी आहट प्रेमचंद के युगांतरकारी निबंध ‘महाजनी सभ्यता’ में ही मिलने लगी थी । आज़ादी के बाद जो विचलन आए उनमें खुद प्रगतिशील लेखक संघ के लोगों ने ही अपनी इस क्रांतिकारी विरासत से पीछा छुड़ाया और कलावादी, रूपवादी साहित्यिक प्रवृत्तियों से हेलमेल शुरू किया । उस महान आंदोलन के वारिसों में जो पतन आया उसकी याद दिलाने के लिए प्रलेस के स्वर्ण जयंती समारोह की घटनाओं का जिक्र काफी होगा । असल में इस विरासत का उद्धार वामपंथ की तीसरी धारा ने किया और उसे दोबारा प्रासंगिक बनाया ।

फ़ैज़ का लेखन : पाकिस्तानी, भारतीय या अफ़्रो एशियाई ?

(12 फ़रवरी 2012 को जनसत्ता में ‘फ़ैज़ का अंतरंग’ शीर्षक से प्रकाशित समीक्षा का मूल )

फ़ैज़ की जन्म शताब्दी के अवसर परनया पथने एक विशेषांक निकाला था जो महज एक सौ रुपये का था । पत्रिका में प्रकाशित सामग्री को ही जोड़ घटाकर उन्हीं संपादकों के संपादन में दो किताबों में बाँटकर अब राजकमल प्रकाशन की ओर से छापा गया है । पहली किताब उनकी शख्सियत परअंधेरे में सुर्ख लौशीर्षक से है और दूसरी उनकी शायरी परएक जुदा अंदाज़ का जादूशीर्षक से है और दोनों की सम्मिलित कीमत आठ सौ रुपया हो गई है । कीमत की बढ़ोत्तरी के बावजूद फ़ैज़ के अपने लेख जोनया पथमें थे उन्हें इन संग्रहों में शामिल नहीं किया गया है जिसके चलते पाठक को उनके आलोचक व्यक्तित्व की जानकारी नहीं हो पाती । यह जरूर है कि कुछ नए लेख भी इन पुस्तकों में शामिल किए गए हैं जो या तो पत्रिका में छपने से रह गए या छपने के बाद उपलब्ध हुए होंगे । ये नए लेख भी महत्वपूर्ण हैं । हिंदी भाषी पाठक को इतने बड़े पैमाने पर फ़ैज़ के बारे में जानकारी के लिए संपादकों और प्रकाशक का शुक्रगुजार होना चाहिए ।

इन किताबों से फ़ैज़ का विराट व्यक्तित्व सामने आता है जो सिर्फ़ एक भाषा या मुल्क तक महदूद नहीं था । इसकी ज़द में आज का भारत, पाकिस्तान, बांगलादेश, फ़िलिस्तीन, बेरूत, अल्जीरिया और तकरीबन सारी दुनिया शामिल है । भारत से अलग होकर एक नए मुल्क के बतौर उभरे पाकिस्तान में अंधराष्ट्रवाद का बोलबाला स्वाभाविक था । फ़ैज़ के जीवन काल में पाकिस्तान ने भारत के साथ तीन लड़ाइयाँ लड़ीं । फ़ैज़ पर दबाव था कि वे भारत विरोधी देशभक्तिपूर्ण कविताएँ लिखें लेकिन उन्होंने चीन के खिलाफ़ आग उगलने वाले भारत के देशभक्त कवियों की तरह इस दबाव के सामने समर्पण नहीं किया और सच्चे मायने में अंतरराष्ट्रीयतावादी बने रहे । स्वतंत्र भारत में नागार्जुन की गिरफ़्तारियों के अलावा किसी बड़े लेखक को निर्वासन और जेल नहीं भुगतनी पड़ी लेकिन फ़ैज़ ने अपनी मान्यताओं की कीमत दोनों के जरिए चुकाई ।

सबसे पहले उस महत्वपूर्ण सामग्री की बात जोनया पथमें नहीं थी और इन किताबों में दिखाई पड़ी है । अतुल तिवारी नेलखनऊ और फ़ैज़शीर्षक संस्मरण लिखा है जिसमें प्रलेस के पहले सम्मेलन में फ़ैज़ की भागीदारी को नाटकीय तरीके से प्रेमचंद के अध्यक्षीय भाषण को उन्हें सुनते हुए प्रस्तुत किया गया है । सोचकर रोमांच हो आता है कि महज बीस साल की उम्र में फ़ैज़ न सिर्फ़ इस सम्मेलन में मौजूद थे बल्कि तभी जो वैचारिक प्रतिबद्धता अपनाई उसे तमाम मुश्किलों के बावजूद अंतिम दम तक निभाया । फिर भी कहीं आत्म-प्रशंसा नहीं अन्यथा एकाध कहानियों कविताओं के प्रकाशन के बाद लोग अपनी चर्चा छोड़कर और किसी की बात ही नहीं करना चाहते । उनका संकोच एक नायाब साक्षात्कार में दिखाई देता है जो दूसरी किताब में परिशिष्ट के बतौर संकलित है । जब मुज़फ़्फ़र इक़बाल ने उनकी तुलना अन्य वतनबदर कवियों नाजिम हिकमत और महमूद दरवेश से करनी चाही तो फ़ैज़ ने जोर देकर कहा कि उपरोक्त निर्वासित कवियों के साथ उनकी तुलना उचित नहीं है क्योंकि वे तो अपनी मर्जी से मुल्क से बाहर रह रहे हैं जबकि उपरोक्त कवियों को बाकायदे निर्वासित किया गया है । इसी साक्षात्कार में जब इक़बाल साहब ने कहा किआपने 1949 ईसवी से स्वयं को इससे (प्रगतिशील आंदोलन से) अलग कर लिया थातो प्रतिवाद करते हुए फ़ैज़ कहते हैंयह गलत प्रचार है ।यह साक्षात्कार अनेक प्रश्नों पर फ़ैज़ की समझदार टिप्पणियों के कारण प्रगतिशील आंदोलन की उलझनों को समझने में मदद करता है । भारत पाकिस्तान की अज़ादी के कारण आए फ़र्क की याद दिलाते हुए वे कहते हैंयह संगठन या आंदोलन उस समय अस्तित्व में आया जब हमारे देश में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन अपने उत्कर्ष पर था ।यानी देश की आज़ादी ऐसा मुद्दा था जिस पर आम सहमति थी औरस्वतंत्रता के रूप में पहले उद्देश्य की प्राप्ति हो गयी थी, यद्यपि शीघ्र ही इस बात का आभास हो गया कि सच्ची आज़ादी प्राप्त करना अभी बाकी है । हर किसी का अपना फ़ार्मूला था ।इसमें जो बात अनकही है वह भारत की नेहरू की सत्ता के प्रति तब के वामपंथी बुद्धिजीवियों के रुख के प्रति खामोश विरोध है । इस मुख्य मुद्दे के अलावासाहित्य में जीवन एवं उसकी समस्याओं का किस प्रकार यथार्थ चित्रण किया जाये, इस पर भी अनेक मत थे । जब समाज में बौद्धिक कुहासा हो और मार्गदर्शन का अभाव हो तो प्राय: देखा गया है कि लोग या तो समस्या के बाह्य रूप का चित्रण करते हैं या उसके सर्वथा विपरीत बातें करते हैं । याद रखिए कि फ़ैज़ न सिर्फ़ लेखक थे बल्कि बाकायदे ट्रेड यूनियन के नेता भी थे । उनकी राजनीतिक परिपक्वता का सबूत उनके संकलित साक्षात्कार हैं । इन किताबों से यह भी पता चलता है कि वे सिर्फ़ कवि नहीं बल्कि सुलझे हुए और गंभीर विचारक भी थे । पहली किताब में नईम अहमद के साथ बातचीत में फ़ैज़ एक जरूरी सूत्र सुलझाते हैं । निजी और सार्वजनिक अनुभवों के बीच बनावटी खाई को ढहाते हुए वे कहते हैंबेहद व्यक्तिगत अनुभव भी बाहर के वातावरण, परिस्थितियों और घटनाओं से जो असर पड़े, भावानाओं और अनुभूतियों में जो हलचल पैदा हो, उसके नतीजे होते हैं, सारी चीजें आपके अवचेतन का हिस्सा बन जाती हैं ।

फ़ैज़ की अपनी आपबीती भी खुद उन्हीं की कलम से दर्ज हुई है जो पहली किताब में दो लेखों की शक्ल में संग्रहित है । उर्दू के अन्य प्रगतिशील कवियों के मुकाबले फ़ैज़ के यहाँ प्रकट क्रोध सबसे कम दिखाई देता है, इसके बावजूद उन्हीं के गीत आंदोलनकारियों में सबसे अधिक गाए गए । इस रहस्य को समझने की कोशिश ज्यादातर लेखों में की गई है । क्रांतिकारी शायरी के लिए फ़ैज़ ने पारंपरिक उर्दू शायरी में से जगह निकाली थी और इसके लिए उन्होंने एक हद तक परंपरा का पुनराविष्कार किया या कहें तो परंपरा के भीतर ही एक दूसरी परंपरा खोज निकाली । इसी वजह से अनेक लोग फ़ैज़ की शायरी को रवायती शायरी भी कहते हैं । खुशी की बात है कि किताबों के लेखों में रवायत के भीतर से नई राह निकालने की उनकी काबिलियत पर ध्यान दिया गया है ।

फ़ैज़ ने यह काम उन्होंने किसी तोड़ मरोड़ के जरिए नहीं बल्कि महान शायरों के कलाम में छिपी हुई क्रांतिकारिता को उद्घाटित करके किया । मसलन ग़ालिब के शेर हैं-

हरचंद हो मुशादहए हक़ की गुफ़्तगू

बनती नहीं है बादा ओ सागर कहे बग़ैर

मक़सद है नाजो गम्जा वले गुफ़्तगू में काम

चलता नहीं है दश्ना ओ खंजर कहे बग़ैर

मतलब कि ईश्वर की बात शराब के जिक्र के बिना नहीं हो सकती और प्रेम की बातों में भी छुरी खंजर का जिक्र आना ही है । स्पष्ट है कि उर्दू शायरी की परंपरा इकहरी नहीं रही और फ़ैज़ ने नए जमाने की बात करने के लिए एक हद तक परंपरा के भीतर से जगह निकाली । फ़ैज़ अपनी शायरी की इस विशेषता को जानते थे और दृष्टिकोण के बतौर इसे सही भी समझते थे । मुज़फ़्फ़र इक़बाल के साथ बातचीत में उन्होंने माना भी है किमेरे विचार से परंपरा ने हमें जो दिया है, हमने उसका भरपूर उपयोग नहीं किया । अभी बहुत कुछ करना बाकी है । वास्तव में हमने ऐसा करने की चेष्टा भी नहीं की । हमारी पीढ़ी ने परंपरा से दूरी बना रखी है । परंपरा ने क्या दिया है, हमने सोचने की कोशिश नहीं की ।

फ़ैज़ की शायरी की इस विशेषता के कारण अक्सर उनके इस्तेमाल किए हुए प्रतीकों के सही मानी तक पहुँचना मुश्किल होता है । कांतिमोहन सोज़ के दो लेखवो बात जिसका फ़साने में कोई ज़िक्र न था’ (पहली किताब) औरजिस धज से कोई मक़तल में गया’ (दूसरी किताब) इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं ।

दूसरी किताब में एक अन्य बहुत महत्वपूर्ण लेख प्रणय कृष्ण का ‘ग़म और रूमानियत : एक जिरह’ है जिसमें लेखक ने न सिर्फ़ फ़ैज़ की शायरी की विशेषता को गंभीरता से समझने की कोशिश की है बल्कि उनकी बाद की शायरी पर नाउम्मीदी के आरोपों को तर्क सहित खारिज भी किया है । इसमें फ़ैज़ की नज्म ‘मंज़र’ और ‘तुम ही कहो क्या करना है’ तथा ‘शाम’ की मौलिक व्याख्या की गई है । दूसरी ही किताब में हिंदी के अशोक वाजपेयी, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, अरुण कमल, मनमोहन, कृष्ण कल्पित आदि अनेक कवियों के लेख भी शामिल हैं जो उनकी कविता से फ़ैज़ को जोड़ते हैं हालाँकि अशोक वाजपेयी का लेख पहली किताब में शामिल किया जाना चाहिए था । पहली किताब के ज्यादातर लेख संस्मरणात्मक हैं । इस तरह के एकाध लेखों में इशारा सा किया गया है कि फ़ैज़ स्त्री लोभी और शराबी थे लेकिन फिर भी यह तय नहीं होता कि इसके बावजूद सभी ऐसे लोग फ़ैज़ हो जाते हैं । अपवाद के बतौर मेजर मुहम्मद इसहाक का लेख ‘रूदादे क़फ़स’ संस्मरणात्मक होने के बावजूद अनेक आलोचनात्मक लेखों से उम्दा है और उसे दूसरी किताब में दिया जाना उचित होता । दूसरी किताब के अंतिम लेख में सुहैल हाशमी ने फ़ैज़ के गायकों के बहाने उनकी प्रसिद्धि को रेखांकित किया है । उनकी पंजाबी कविता पर भी सतिंदर सिंह नूर का आलेख है । नूर जहीर ने एलिस के खतों पर लिखकर स्वयं एलिस के संस्मरणयादों के साएपर मुहर लगाई है । सज्जाद ज़हीर की पत्नी रज़िया के नाम फ़ैज़ का खत तथा फ़ैज़ के खतों के बारे में ज़हूर सिद्दीक़ी का लेख फ़ैज़ की सामाजिक जिंदगी कि जीवंत तस्वीर पेश करते हैं । इस तरह इन किताबों में समूचे फ़ैज़ को समेटने की सफल कोशिश की गई है संपादकों की महात्वाकांक्षा से उत्पन्न कमियों के विनम्र स्वीकार के बावजूद ।

इन किताबों में एक कमी खटकती है जोनया पथके फ़ैज़ विशेषांक में नहीं थी । संकलित लेखों में फ़ैज़ की जिन ग़जलों/शेरों के संदर्भ आए हैं वे कहीं दे दिए गए होते तो पाठक उन्हें खोलकर देख लेता लेकिन इसके अभाव में उसे कोई संग्रह भी खरीदना पड़ेगा । बाज़ार के नजरिए से यह जितना भी लाभदायक हो पाठक के लिए अतिरिक्त बोझ ही होगा ।